Tuesday, August 14, 2018

पानी का धोका है और सोन मछरिया है


अजन्ता देव के पांच माहिये

1.
खुलने से खुले बस्ता
तू कितनी महँगी है
मै भी तो नहीं सस्ता.

2.
ये जोग बिजोग के दिन
काटेगा भला कैसे
कमबख्त बड़ा कमसिन. 

3.
ये रेत का दरिया है
पानी का धोका है
और सोन मछरिया है.

4.
हाँ मैंने दिया है दिल
पर सारे क़िस्से में
ये चाँद भी है शामिल.

5.
आंधी के पत्ते हैं
उड़ते फिरते रहते
दिल्ली कलकत्ते हैं.

अजन्ता देव 



Monday, August 6, 2018

एक तस्वीर की कहानी


इस फोटू के साथ दो या तीन कहानियां वाबस्ता हैं. मशहूर चित्रकार बी. मोहन नेगी ने करीब बाईस-तेईस साल पहले नैनीताल में इसे खींचा था जो एक कार्यक्रम के सिलसिले में अपनी चित्र प्रदर्शनी लेकर आये थे..

फोटू में वीरेनदा ने जो सफ़ेद स्वेटर पहना हुआ है वह मैंने बड़ी हसरत से उसी सुबह अपने लिए खरीदा था. वह बरेली से मिलिट्री ग्रीन कलर की एक पुरानी सड़ियल जैकेट पहन कर आया था जिसके भीतर की लुगदी जैसी लाइनिंग उधड़ कर बाहर आ गई थी.

मुझसे मिलते ही उसने इमोशनल ब्लैकमेल किया, जैसा वह हमेशा करता था और वह नया स्वेटर उतरवा लिया. मैं नक़्शेबाज़ लौंडा था सो मैंने बदले में उस जैकेट को पहनने से सफा इनकार करते हुए कहा कि वह मुझे कुछ नया खरीद कर दिलाए.

उसने हूँ-हाँ जैसा कुछ करना शुरू किया ही था कि सामने से गिर्दा आता दिखाई दिया. गिर्दा ताज़ा-ताज़ा भोपाल से लौटा था और वहां से लाई कत्थई रंग की नई वास्कट पहने हुए था. अब वीरेनदा ने गिर्दा को ब्लैकमेल किया और मिनट से पहले उसकी वास्कट उतरवा कर मुझे पहना दी. मैंने वही पहनी हुई है.

फोटू में गिर्दा नज़र नहीं आ रहा क्योंकि पूरी दोपहर वह दूर खड़ा, बीड़ी फूंकता, उस लद्धड़ हरी जैकेट को थामे हम दोनों को गाली देता रहा. शाम को ओल्ड मंक की संगत में उसका गुस्सा शांत हुआ. तब भी उसने वीरेनदा से वायदा लिया कि अगली सुबह उसे नई वास्कट के लिए साढ़े चार सौ रूपये देगा!

ज़ाहिर है वह हिसाब कभी पूरा नहीं हुआ.


"किताबें और कपड़े दोस्तों के बीच यात्रा करने के लिए बने होते हैं!" - वीरेनदा कहता था.

कौन थे चन्द्रसिंह गढ़वाली


1994 में भारत सरकार ने उनकी फोटू वाला एक डाक टिकट जारी किया और नामकरण किये जाने से छूट गईं एकाध सड़कों के नाम उनके नाम पर रख दिए. उत्तराखंड बनने के बाद जब राज्य सरकार को अपने स्थानीय नायकों की आवश्यकता पड़ी तो इतिहास के पन्ने पलटे गए और चन्द्रसिंह गढ़वाली का नाम खोज निकाला गया क्योंकि अनेक सरकारी योजनाओं का नामकरण करने को एक नाम की ज़रुरत थी.

आज चन्द्रसिंह गढ़वाली द्वारा पेशावर में की गयी एक ऐतिहासिक घटना की जयन्ती है सो उनके बारे में लिखा जाना ज़रूरी लग रहा है

अप्रैल 1930 में पेशावर के किस्साखानी बाज़ार में खां अब्दुल गफ्फार खां के नेतृत्व में हजारों लोग सत्याग्रह कर रहे थे. इसे कुचलने के लिए अंग्रेज़ हुकूमत ने रॉयल गढ़वाल राइफल्स को तैनात किया गया था. यह भारत के इतिहास के उस दौर की बात है जब गांधी के दांडी मार्च को बीते तीन-चार हफ्ते ही बीते थे और सारा देश आज़ादी के आन्दोलन में हिस्सेदारी करने को आतुर हो रहा था.

24 दिसंबर 1891 को गढ़वाल की थैलीसैण तहसील के एक सुदूर गाँव में जन्मे चन्द्रसिंह भी पेशावर में तैनात टुकड़ी का हिस्सा थे. बहुत कम पढ़ा-लिखा होने और अंग्रेज़ फ़ौज में नौकरी करने के बावजूद पिछले दस से भी अधिक वर्षों में चन्द्रसिंह ने देश में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन से अपने आप को अछूता नहीं रखा था और फ़ौजी अनुशासन की सख्ती के होते हुए भी जब-तब आज़ादी की गुप्त मीटिंगों और सम्मेलनों में शिरकत की थी और देशभक्ति के सबक सीखे.

एक किस्सा यूं है कि जब 1921 में गांधी कुमाऊँ आये और बागेश्वर में उनकी सभा चल रही थी. चन्द्रसिंह अपनी प्रिय गोरखा टोपी पहने थे. गांधी ने उन्हें देखकर कहा - "गोरखा हैट पहने मुझे डराने को यह कौन बैठा है?" चन्द्रसिंह तुरंत खड़े होकर बोले - "सफ़ेद टोपी मिले तो मैं उसे भी पहन सकता हूँ." यह सुन कर सभा में मौजूद किसी आदमी ने चन्द्रसिंह की तरफ सफ़ेद गांधी टोपी फेंकी. चन्द्रसिंह ने वही टोपी गांधी की तरफ उछालते हुए कहा - "अगर ये बुड्ढा अपने हाथ से देगा तभी पहनूंगा!" गांधी ने चन्द्रसिंह की इच्छा पूरी की. गांधी ने बाद में कहा कि अगर उन्हें चन्द्रसिंह जैसे चार लोग मिल जाएं तो देश बहुत जल्दी आज़ाद कराया जा सकता है.

पेशावर में चल रहे सत्याग्रह की गूँज दूर तक पहुँच रही थी और अंग्रेज़ उसके दमन के लिए कुछ भी करने को तैयार थे. अपने हुक्मरानों की मंशा भांप चन्द्रसिंह पेशावर की हरिसिंह लाइन की अपनी बैरक में देश और स्वतंत्रता जैसे विषयों पर अपने साथियों के साथ लगातार चर्चा करते रहे थे.

23 अप्रैल 1930 के दिन पेशावर में हज़ारों सत्याग्रही जुलूस निकाल रहे थे. एक मोटरसाइकिल सवार अंग्रेज़ सिपाही इस भीड़ को चीरता हुआ निकला - कई लोग घायल हुए. गुस्साई भीड़ ने सिपाही को दबोच कर पीटा और मोटरसाइकिल को आग लगा दी.

इस घटना से मौके पर मौजूद अंग्रेज़ अफसरान घबरा गए और रॉयल गढ़वाल राइफल्स के सिपाहियों को किस्साखानी बाज़ार के काबुली फाटक पर तैनात कर दिया गया. कमांडर ने लाउडस्पीकर पर लोगों को घर जाने का आदेश दिया लेकिन भीड़ की उत्तेजना बेकाबू हो चुकी थी. कमांडर ने अंततः गोली चलाने का आर्डर जारी करते हुए चिल्लाते हुए कहा - "गढ़वाली ओपन फायर!"

कमांडर की ऐन बगल से उससे भी तेज़ एक निर्भीक आवाज़ आई - "गढ़वाली सीज़ फायर!" यह चन्द्रसिंह गढ़वाली थे जिनकी बात मानते हुए 67 सिपाहियों ने अपनी बंदूकें ज़मीन पर रख दीं.

1857 के ग़दर के बाद यह भारत के इतिहास में घटी सैन्य विद्रोह की सबसे बड़ी घटना थी. बौखलाए अंग्रेजों ने गोरे सिपाहियों को कत्लेआम का आदेश दिया. बड़ी संख्या में जानें गईं और चन्द्रसिंह गढ़वाली और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया.

जब अंग्रेज़ कप्तान टकर ने बगावत की वजह जाननी चाही तो चन्द्रसिंह गढ़वाली का उत्तर था - " हम हिंदुस्तानी सिपाही हिंदुस्तान की हिफाजत के लिए भर्ती हुए हैं, न कि अपने भाइयों पर गोली चलाने के लिए!" कोर्टमार्शल के बाद सभी सिपाहियों को सज़ा हुई. आजीवन कारावास के रूप में सबसे बड़ी सजा चन्द्रसिंह को मिली.

चन्द्रसिंह की वीरता पर गांधी की प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी. उन्होंने लिखा - "जो सिपाही गोली चलाने से इनकार करता है, वह अपनी प्रतिज्ञा भंग करता है. अगर में आज उन्हें हुक्मउदूली करना सिखाऊंगा तो मुझे डर लगा रहेगा कि शायद कल को मेरे राज में भी ऐसा ही करे." ये वही गांधी थे जो चन्द्रसिंह जैसे चार लोगों को लेकर देश को जल्दी आज़ाद करा देने की बात सार्वजनिक रूप से कह चुके थे. जवाहरलाल नेहरू ने उनके साहसिक कृत्य को फ़क़त "भावना से उपजा काण्ड" बताया.


चन्द्रसिंह गढ़वाली ने तमाम यातनाएं सहते हुए अपनी सज़ा पूरी की. उनकी संपत्ति पहले ही कुर्क कर ली गयी थी. भारत-छोड़ो आन्दोलन में शिरकत करने पर उन्हें फिर से जेल में डाल दिया गया. 1947 में आज़ादी मिलने के बाद भी स्वतंत्र भारत में इस योद्धा को अपने साम्यवादी विचारों के कारण कई बार जेल जाना पड़ा. शर्म की बात है कि आज़ाद भारत में जब उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया गया तो वारंट में पेशावर काण्ड करने को उनका अपराध बताया गया था. 1957 में उन्होंने विधानसभा चुनाव भी लड़ा लेकिन उसमें वे बुरी तरह परास्त हुए.

आजीवन संघर्ष करते और भीषण आर्थिक अभावों से जूझते हुए चन्द्रसिंह गढ़वाली की 1 अक्टूबर1979 को दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में मृत्यु हुई थी.

Sunday, August 5, 2018

चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो

फ़िल्मी गानों की समीक्षा – 4

चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो
प्रस्तावना: ऐतिहासिक महत्त्व की यह कविता 1960 के दशक के भारतीय विज्ञान की सीक्रेट फाइल्स में दफ्न एक कथा पर आधारित है.
काव्य समीक्षा: कुमाऊनी लोकगायन की बैर शैली में रची गयी इस कविता में कवि का डबल रोल है. कहीं-कहीं इसे उकसावा अथवा अनुमोदन शैली भी कहा जाता है. ऐसी कविताओं में हाँ में हाँ मिलाने का कायदा है. इसके अलावा जिस तरह तीन चौथाई बहुमत वाली सरकार द्वारा किसी भी अनापशनाप बिल को पास कराते बखत विपक्ष के लिए तर्क-जिरह या सवाल-जवाब की कतई गुंजाइश नहीं होती यहाँ भी कवि द्वारा पाठकों की भावनाओं का कोई ख़याल न करते हुए केवल स्वयं अपनी ही बात का अनुमोदन करना होता है.
कविता के प्रारम्भ में हृदयधारी प्रेयसी से चन्द्रमा से आगे जाने आह्वान किया जाता है – ‘चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो’. थोड़ा सा रूमानी हो जाने के इस चैलेन्ज के त्वरित रेस्पोंस में प्रेयसी उक्त कार्य के लिए अपने तत्पर होने की घोषणा करती है – ‘हम हैं तैयार चलो’.
प्रेम के प्रस्फुटन के शुरुआती लक्षण यहाँ देखे जा सकते हैं जब सद्यःनिर्मित प्रेमी-प्रेमिका बेवकूफों की तरह एक दूसरे की हर बात पर “वाव यू आर कूल मैन!” कहने की व्याधि से ग्रस्त पाए जाते हैं. और चंद्रमा से आगे जाने से अधिक कूल क्या हो सकता है! यह अलग बात है कि उनमें झगड़े शुरू होने में ज़्यादा समय नहीं लगता और वे अपने-अपने तरीकों से गम गलत करने के उपाय खोजना शुरू करते हैं.
कविता का दूसरा पैरा बतलाता है कि नायक-नायिका अपनी अंतरिक्ष यात्रा पर निकल चुके हैं या निकलने ही वाले हैं. वे नक्षत्रों के मध्य अलोप हो जाना चाहते हैं ताकि अन्याय और अत्याचार से भरी इस धरा का विचारमात्र भी उन्हें परेशान न करे -
आओ खो जाएं सितारों में कहीं
छोड़ दें आज ये दुनिया ये ज़मीं”
बिल्कुल प्रारंभ में इन पंक्तियों के लेखक ने जिस गुप्त कथा को संदर्भित किया है उसके परिप्रेक्ष्य में अगली पंक्तियाँ आधिकारिक प्रमाण का कार्य करती हैं. यात्रा के बीच में नायक नायिका से कहता है कि उसे नशा हो रहा है और उसे सम्हाला जाय – ‘हम नशे में हैं सम्भालो हमें तुम’. नायिका उससे भी अधिक धुत्त है और सूचित करती है कि उसका हाल तो नायक से भी खराब है – ‘नींद आती है जगा लो हमें तुम.’
पाठक को यहाँ यह जानने का अधिकार है कि प्रेमी युगल की ऐसी हालत हुई तो कैसे हुई. क्या कोई तीसरा था जिसने उनके सफ़र को बाधित करने की कोशिश की और उनके दूध में धतूरा घोल दिया? क्या नायक-नायिका इतने लम्बे सफ़र पर ठीक से तैयारी किये बिना निकल गए थे? सुधी पाठको, इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए आपको थोड़ा धैर्य रखना होगा.
कविता का अंत उसी शाश्वत थीम पर होता है कि जीवन में सब कुछ नाशवान और भुसकैट होने के बावजूद उल्फ़त अर्थात प्रेम की यात्रा अनंत चलती रहती है. यहाँ यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि नायक-नायिका अपने-अपने परिवारों के बड़े-बूढ़ों के कहने पर चंद्रमा से आगे तक की यात्रा करने का विचार त्याग कर वापस संसार में आ चुके हैं. आदमी को दफ्तर भी जाना होता है, दुकान खोलनी होती है, सुबह कुकर पर चार सीटी लगा कर दाल गलानी होती है, बच्चों का टिफिन तैयार कर उन्हें टैम्पू स्टैंड तक छोड़ने जाना होता है इत्यादि-इत्यादि! उल्फ़त का क्या है – उसने तो चलते रहना है. कोई टिकट थोड़े ही लगता है!
ऐतिहासिक शोध: 1962 में नेहरूजी के कहने पर विक्रम साराभाई ने इसरो शुरू किया था. अपनी स्थापना के अगले ही सप्ताह इस संस्थान ने ब्रह्माण्ड के सभी ग्रहों तक अपने लोगों को पहुंचाने का प्रोजेक्ट लांच कर दिया. उत्तराखंड के लमगड़ा नामक स्थान के निवासी हयातसिंह लमगड़िया, जिन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर रखी थी, को साराभाई अपना दायाँ हाथ मानते थे. चन्द्रमा और अन्य स्थानों पर भविष्य में बनाई जाने वाली हाउसिंग कालोनियों के डिजाइन बनने के लिए इन्हीं हयातसिंह को इंचार्ज बनाया गया था. नेहरूजी को मालूम था कि बढ़ती आबादी वाले हमारे देश में बहुत जल्द ज़मीन की कमी होने जा रही है और ऐसे हाउसिंग प्रोजेक्ट्स से ही देश का भला हो सकेगा.
उस रात इसरो की मैस में परोसे गए भरवां बैगन की सब्जी के सेवन के अतिरेक से हयातसिंह को पेट की मरोड़ उठी. जिसके चलते उन्हें स्थानीय सरकारी डिस्पेंसरी में भर्ती कराया गया. पेट की मरोड़ शांत होने के उपरान्त उन्होंने वहां रात्रिकालीन ड्यूटी कर रही दक्षिण भारतीय नर्स भद्रालक्ष्मी सुन्दरम को देखा और मशहूर हिन्दी लेखक ज्ञानरंजन के शब्दों का इस्तेमाल किया जाय तो उनका ‘स्टार्ट’ हो गया.
कालान्तर में जब तक हयातसिंह और भद्रालक्ष्मी सुन्दरम का प्रेम-संबंध सार्वजनिक होता, विक्रम साराभाई अपने पहले अंतरिक्ष मिशन की बागडोर अपने दक्षिणहस्त अर्थात हयात सिंह को सौंप चुके थे. मोहब्बतान्ध हयातसिंह लमगड़िया अपनी माशूका को साथ ले जाने की जिद पर अड़ गए. बताते हैं कि पहले तो साराभाई इसके लिए तैयार हो भी गए थे लेकिन स्टाफ के विरोध और राजनैतिक हस्तक्षेप के बाद उन्हें हयात सिंह से स्पष्ट मना करना पड़ा.
इससे खिन्न होकर हयातसिंह ने एक रात खूब शराब पी और अपनी मोहब्बत का हवाला देकर बेचारी भद्रालक्ष्मी के हलक में भी दो पैग उड़ेल दी. अच्छा टुन्न होने के उपरान्त हयातसिंह अपनी होने वाली शरीके-हयात को लेकर प्रयोगशाला में घुसे और उसे ले जाकर तकरीबन पूरा बन चुके अंतरिक्ष यान की ड्राइविंग सीट में बिठाकर रोमांटिक गाने सुनाते रहे. नशा बढ़ जाने के बाद वे बाकी सारी रात साराभाई को गाली बकते रहे. नशे की ही हालत में अलसुबह प्रयोगशाला से बाहर निकलते हुए हयातसिंह अंतरिक्ष यान को माचिस दिखा आए.
इसरो की सीक्रेट फाइल्स में इस अकल्पनीय हयातसिंह- भद्रालक्ष्मी कथा में पुलिस, राजद्रोह, भगोड़ा जैसे शब्दों की भरमार है. उन दोनों का आखिर में क्या हुआ यह जानने की लालसा मेरी भी है.
इस प्रकरण के दो दूरगामी परिणाम हुए –
1. भारत का अन्तरिक्ष प्रोग्राम खटाई में पड़ गया. हयातसिंह लमगड़िया को मिलने वाला सम्मान नील आर्मस्ट्रांग को मिला.
2. हयातसिंह द्वारा उस रात गाये गए गीतों की स्मृति से समीक्षित की जा रही अमर कविता का सृजन हुआ.
वीडियो रिव्यू: पहली बात तो ये कि बजरे या कश्ती पर बैठ कर अंतरिक्ष यात्रा नहीं की जा सकती.


Saturday, August 4, 2018

सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नहीं

फ़िल्मी गानों की समीक्षा – 3
सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नहीं

काव्य समीक्षा:
ख़्वाबों में छुपाया तुमको,
यादों में बसाया तुमको”
- कवि द्वारा नायिका का अपहरण कर उसे न सिर्फ सपनों में छिपाया गया है कवि की स्मृतियों में मुल्क में उसका फर्जी पासपोर्ट भी बनवा दिया गया है. इन अपराधों के लिए कवि को इन्डियन पीनल कोड की धाराओं 363 और 369 के तहत सज़ा हो सकती है. बेपरवाही कवियों के स्वभाव में होती है सो इस सब से बेखबर इस कविता का रचयिता इतना बौड़म है कि अपराध कर चुकने के पश्चात विचार करना चाहता है कि जिस मंशा से उसने जुर्म को अंजाम दे दिया वह ठीक थी भी या नहीं –
सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नहीं.”
और
ये दिल बेकरार करें कि नहीं.”
मल्लब भैया पहले नहीं सोच सकते थे प्यार करना है या नहीं करना है. दिल को बेकरार करना है या नहीं करना है. हो सकता है कवि को भांग-सुल्फा इत्यादि का कुटैव भी रहा हो. जाहिर है ऐसे नशेड़ी-बौड़म कवि के पास मिमियाते हुए अपने अपराध को जस्टीफाई करने और दूसरों की मिन्नत के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं बचता. कविता के दूसरे पैरे में कवि नायिका के सौदर्य इत्यादि के बारे में कंवल, गजल, चाँद का टुकड़ा जैसी घिसी हुई फूहड़ उपमाओं का प्रयोग करता है.
तीसरे पैरा में ज्ञात होता है कि कवि के घरवालों ने उसे डांट-डपट कर नायिका को उसके घर छोड़कर आने को कहा होगा और फिलहाल वह वह ऐसा कर भी आया है अलबत्ता लगातार भविष्यकाल में बात करता हुआ अपनी काली योजनाओं की तफसीलें पाठकों के साथ शेयर करता है. उसकी शब्दावली देखिये – देखेगी, होगा, रखेंगे, भर लेंगे, सुलझाएंगे, भुलाएंगे.
"जिस दिन तुमको देखेगी नज़र
जाने दिल पे होगा क्या असर
रखेंगे तुमको निगाहों में
भर लेंगे तुम्हें बाँहों में
ज़ुल्फ़ों को हम सुलझाएंगे
इश्क़ में दुनिया भुलाएंगे"
नायक संभवतः बेरोजगार है और घर पर रहकर अपने बाप की कमाई रोटी तोड़ा करता है. 363 और 369 के के बारे में उसे शायद किसी ने बता दिया है सो कविता की अंतिम पंक्ति में वह अपने बौड़मपन और नायिका के न मिल सकने की वास्तविकता के साथ समझौता करता हुआ अपनी औकात पर आकर अपनी वर्तमान परिस्थिति को स्वीकार कर लेता है – “ये बेकरारी अब तो होगी न कम.”
कवि को बताया जाना चाहिए कि बेटा बेकरारी कम कभी न होत्ती. दो महीने पहले टूटी टांग का पलस्तर अस्पताल जाकर कटा तो आये हो, दरद होत्ता रहेगा.
वीडियो रिव्यू: मोहल्ले के किसी ऐसे मुटाते हुए प्रौढ़ लौंडे टाइप के आदमी को काला चश्मा पहना कर उसके हाथ में उलटा गिटार (*गिटार न हो तो हारमोनियम या संपेरे की बीन या बैंडपार्टी के साथ चलने वाला झुन्ना भी चलेगा) थमा कर नायक बना दिया जाय जो बात-बात पर अपने ज़माने की पूनम ढिल्लों या किम्मी काटकर के नामों का जाप करने लगता हो - बताया जाता है ऐसा कवि ने अपने फुटनोट्स में लिखा था सो यही किया गया है. ऊपर से पिच्चर में नायक को सफ़ेद सूट पहनाया गया है. नायिका दर्शकों में बैठी हुई मंद-मंद मुस्करा रही है और उसकी मुस्कान का स्रोत इस तथ्य में निहित है कि घर पर जीजाजी आये हुए हैं और उन्होंने कह रखा है कि शाम को सारी बच्चापार्टी को आगरा चाट वाले के यहाँ गोलगप्पे दबाने ले चलेंगे.
दरअसल यह होली के समय गाई जाने वाली टुन्न-कविता है. बेहतर होता नायक को होली के रंगों में रंगा पुराना और फटा हुआ सफ़ेद कुर्ता-पाजामा पहना कर हुड़दंग मचाते समूह का नेतृत्व करते नायिका की गली में दिखाया जाता. इससे बौड़म कवि द्वारा भांग का सेवन कर लिया जाना भी न्यायोचित लगता और मोहल्ले के खड़ूस बुड्ढों को सबक सिखाने की नीयत से छत से कीचड़ से भरी बाल्टी रखे नायिका को कुछ एक्शन करने का अवसर मिलता. पिच्चर की स्पीड बढ़ती. यह अलग बात है कि नायिका जैसे ही नायक पर कीचड़ फेंकने को होती है उसके जीजाजी पीछे से आकर उसके गालों में नजीबाबाद से लाया हुआ असली मार्का सफेदा पोत जाते हैं.
क्षमा करें होली का नाम सुनते ही इन पंक्तियों का लेखक भावुक हो जाता है और उसके मानसपटल पर होलिका-प्रेरित उन तमाम फिल्म-कविताओं की पंक्तियाँ और उन पर रचित दृश्य गड्डमड्ड होने लगते हैं जिन्हें वास्तविकता में गा या परफॉर्म सकने की इच्छा लिए-लिए न जाने कितने कवियों की पीढ़ियां आगरा चाट भण्डार के सामने दम तोड़ गईं.

मल्लब आखिर क्यों? यही तुम्हारा ईमान है?

मालवीय नगर की बात क्या कहूं

हमारे समय के बड़े कवि की ताज़ा कविताओं की सीरीज़ – 2


प्रेम वाटिका
- असद ज़ैदी 

''मुस्कुराते क्यों हो?" तुमने कहा, ''यह घर
प्रेम ही से चला है अब तक."

''अभी तुम मिले देखा कितनी सुंदर बहू है मेरी
फ़ादार बेटा और इतना प्यारा सा इनका बच्चा...
और फिर मैं भी यहाँ हूँ जैसा तुमने कहा—
निश्चिंतप्रसन्न और सम्पन्न दिखती विधवा!"

मैंने घूमकर उसका घर देखा इतने बरस बाद
दो दालानउन में फलते फूलते मोगरेअनार,
हरसिंगारमौलसरीकचनारकरौंदाअमरूद,
गुड़हलहरदम गदराई मधुमालती...
''क्या बिना प्रेम के इतना सब हो सकता है?’’
मैंने पता नहीं किस धुन में कहा— बिल्कुल हो सकता है सीमा,
बिल्कुल हो सकता है...

क्या तुमने ज़ालिमों के बागीचे नहीं देखे...
उनकी चहल पहल भरी हवेलियाँ
जिनमें सदा हँसी गूँजा करती थी...
अलबत्ता जहाँ नियति ने अब अपार्टमेंट बना दिए हैं.

''हूँ...’’, उसने कहा, ''और तुम्हें क्या क्या याद है?"

मैंने कहाकुछ नहीं इतना याद है तुम स्कूल में सिर्फ
एक दरजा मुझसे आगे थीं पर रौब के साथ 'ए जूनियर’ कहकर
मुझको तलब किया करती थी.

''हूँ...’’, कहकर उसने पूछा, ''अपने स्कूल का क्या हाल है?"

ठीक ही चलता लगता है—मैंने कहा—उसके चारों तर
बस्तियाँ बस गई हैंपर स्कूल का परिसर बचा हुआ हैऔर हाँ,
पाकड़ का पेड़ अभी भी वहीं खड़ा हैमैदान के किनारे पर.
बच्चों से अब वहाँ रोज़ वंदे मातरम् गवाया जाता है...

''हूँ... और तुम्हारे मालवीय नगर के क्या हाल हैं?"

तुम्हारी ये ''हूँ...की आदत अभी तक गई नहींसीमा!

''ऐसा नहीं है लड़केबस तुम्हें देखकर लौट आई है.:"

और हम हँसने लगे चालीस साल लाँघ कर,
हँसते हँसते लगभग निर्वाण की दहलीज़ तक जा पहुँचे.

रही मालवीय नगर की बात सो क्या कहूं ...
जैसा भारत मालवीय जी चाहते थे वहाँ बसा हुआ है.


29.1.2018

Friday, August 3, 2018

दिल जलता है तो जलने दे

फ़िल्मी गानों की समीक्षा –  2
दिल जलता है तो जलने दे

प्रस्तावना: दिल अर्थात हृदय के अस्तित्व को लेकर विशेषज्ञ अभी एकमत नहीं हो सके हैं. कोई कहता है कि यह मनुष्य की आत्मा का दूसरा नाम है तो कोई इसे मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा वहम बतलाता है. एक अपेक्षाकृत नवीन चलचित्र का नायक इसे कैमिकल लोचे के स्रोत का नाम देता है. इसके बावजूद सर्वमान्य सर्वज्ञात तथ्य है कि इसके बगैर हमारी फ़िल्में लूली हो जातीं. फिल्मों ने लम्बे समय से सामाजिक जागरण तथा मानवता का सन्देश देने का ठेका उठा रखा है. तो ऐसा माध्यम विकलांग कैसे हो सकता है? इसका एक आर्थिक पहलू यह भी है कि फ़िल्में लूली नहीं हो सकतीं क्योंकि उनके निर्माण में बड़ा रुपया लगता है.
काव्य समीक्षा: राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत यह कविता देश के नागरिकों से अपील करती है कि उसे अपने कैमिकल लोचे से तनिक भी न घबराते हुए, बिना शिकायत किये सभी परेशानियों को झेलते चले जाना चाहिए. शास्त्रों में जीवन को दुखों का सागर बताया गया है. यहाँ पर्दानशीं अर्थात घूंघट के पीछे बैठी प्रेमिका से कवि का आशय उस आर्थिक सामाजिक उन्नति से है जिसकी प्रत्याशा में इस गीत को विभिन्न संस्करणों-रूपों में चालीस के दशक से गाया जा रहा है. मनुष्य को अपनी ग़ुरबत का सम्मान करना चाहिए क्योंकि वह विकास रूपी ऐसी नायिका का प्रेमी है जो अपना मुँह इस जन्म में तो दिखाने से रही.
"दिल जलता है तो जलने दे
आँसू ना बहा फ़रियाद ना कर
तू परदानशीं का आशिक़ है
यूँ नाम-ए-वफ़ा बरबाद ना कर"
कविता का दूसरा पैरा अत्यधिक प्रेरक है जिसमें अपने आप को पहले से और अधिक घायल बनाने की ललकार है – “मासूम नजर के तीर चला, बिस्मिल को बिस्मिल और बना.” देशभक्त को कोई लाज शर्म नहीं होनी चाहिए, ऐसा कवि का मंतव्य है.
कवि कहता है कि हे पाठको! मैं खुद जीवन भर अपने विकास की उम्मीद लगाए रहा लेकिन तमाम वायदों के बावजूद वह नहीं हो सका. अंतिम कराह के रूप में वह विकास से मुखातिब होता है – “या सूरत आ के दिखा जाओ!” लेकिन अपनी वास्तविकता और राष्ट्रीय कर्तव्य का भान होते ही वह स्वयं को चेतावनी देता है – “या कह दो हमको याद ना कर”
पचास के दशक के आलोचकों के हिसाब से कवि ने मूल कविता का शीर्षक यूं रखा था – “आंसू ही बहा फ़रियाद ही कर.” इस बाबत कोई आधिकारिक मतैक्य न होने के कारण इस विषय को छोड़ दिया जाना ही श्रेयस्कर है. इक्कीसवीं शताब्दी के परिप्रेक्ष्य में यह कविता इतनी कालजयी साबित हुई है कि हैरानी होती है इसे अब तक राष्ट्रीय गीत या धरोहर घोषित क्यों नहीं किया गया. इसके बड़े उद्देश्य की प्राप्ति लिए एक बड़े सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता है. कविता के अंत में नायक बारम्बार चीखता हुआ अपने कैमिकल लोचे की घोषणा करता है और गर्व से कहता है कि वह राष्ट्रभक्त है. कि उसकी गरीबी ही उसका धर्म है. कि उसका विकास से वंचित रह जाना ही उसकी जीस्त का मानी है. उसकी घोषणा में जनता के लिए एक आवश्यक आह्वान है.
वीडियो रिव्यू: इस कविता के फिल्मांकन हेतु काले और सलेटी रंगों वाले सैट का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. बेहतर है इसे ब्लैक एंड व्हाईट में शूट किया जाए. ऐसा ही किया भी गया है. नायक का मनहूस और उदास होना अनिवार्य है. नायिका विकास के स्वप्न सरीखी सुन्दर लेकिन मनहूस दिखनी चाहिए. यह निर्देशक की प्रतिभा और कला की समझ पर निर्भर करता है कि वह ऐसी खूबसूरत हीरोइन को भी मनहूस कैसे दिखा सकेगा. कविता की अंतिम पंक्तियों के फिल्मांकन के लिए नायक के सामने एक छोटा और पिद्दी काष्ठस्तम्भ होना चाहिए जिसे उखाड़ने का प्रयास करते हुए वह अंतिम चीत्कार कर सके. इससे दर्शकों में कविता के समाप्त हो जाने के उपरान्त भी जिज्ञासा बनी रहती है कि नायक कुछ उखाड़ पाया कि नहीं.

मोतीलाल और मुनव्वर सुल्ताना बड़े कलाकार थे. बिचारे निभा ले गए. भारत कुमार के नाम से जाने वाले मनोज कुमार और सुरती से काले पड़े दांतों वाले आज के एक देशप्रेमी नायक इस कविता के नवीन फ़िल्मी संस्करण में कैसे और कैसी जान फूंकते यह अटकलों का विषय है.

पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले

फ़िल्मी गानों की समीक्षा – 1
पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले

काव्य समीक्षा: कविता की पहली पंक्ति में नायक जीवन की क्षणभंगुरता की तरफ इशारा करते हुए नायिका द्वारा फकत एक पल के लिए झूठा प्यार कर लिए जाने की अभिलाषा व्यक्त करता है कि “पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले!” सामान्य दृष्टि से देखा जाय तो प्रेम को यहीं से कविता की मूल आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित करने का उद्यम प्रारम्भ किया जाता प्रतीत होता है. 
लेकिन नायक के झूठ और उसकी बदनीयत का पर्दाफ़ाश अगली ही पंक्ति में हो जाता है – “दो दिन के लिए कोई इकरार कर ले.” 
मल्लब एक पल से सीधा दो दिन. अगर एक पल को एक बार के लिए एक सेकेण्ड के बराबर मान लिया जाय तो वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध किया जा सकता है कि नायक जिस चीज के लिए बेकरार है उसके लिए उसकी उत्कंठा उसे शब्दों में अभिव्यक्त कर देने के अगले ही क्षण 86400x2 गुना बढ़ जाती है (ज्ञात हो कि एक दिन में 86400 सेकेण्ड होते हैं). इतनी तेज़ी से बढ़ने वाली कोई भी चीज़ केवल ईश्वर ही हो सकती है. इसकी तार्किक परिणति के रूप में नायक बहुत जल्दी ही वहां तक पहुँच भी जाता है और नायिका से शिकायत करता है कि उसके सभी उदात्त प्रयत्नों के बावजूद “राम में क्यों तूने रावण को देखा.” 
कविता के अगले छंद में नायक साम-दाम-दंड-भेद टाइप की सभी तिकड़में भिड़ाकर नायिका का करीब-करीब इमोशनल ब्लैकमेल करता हुआ पहले कहता है - “सुन सुन कर तेरी नहीं नहीं जाँ अपनी निकल जाए न कहीं” और बाद में अपने आत्मसम्मान के रक्षार्थ उसे उलाहना देता हुआ सूचित करता है कि “माना तू सारे हसीनों से हसीं है, अपनी भी सूरत बुरी तो नहीं है” 
इसके तुरंत बाद नायक को अचानक अपनी औकात का भान होता है और वह घिघियाता हुआ याचक बन जाता है “कभी तू भी हमारा दीदार कर ले झूठा ही सही” (*काफ़्का की एक कहानी में भी नायक का ऐसा ही कायांतरण होता है. नायक ग्रेगोर साम्सा एक अच्छे भले इन्सान से गुबरैले में तब्दील हो जाता है.) 
दीदार झूठा कैसे हो सकता है यह बहस का मुद्दा हो सकता है. हाँ भगवान का दीदार झूठा हो सकता है हालांकि उसमें भी शक है क्योंकि तुलसीदास जी हर सुबह भगवानजी का दीदार करने के बाद ही अगली चौपाई लिखना शुरू करते थे. 
फिल्मकाव्य के मनीषी जानते हैं कि एक पल से प्रारम्भ होने वाले प्रत्येक प्रकरण को जीवन की शाश्वतता तक पहुंचना अनिवार्य माना गया है. यही शास्त्रोक्त है. यह कविता भी इस पैमाने पर खरी उतरती है क्योंकि अंतिम अनुच्छेद के प्रारम्भ में ही नायक नायिका से कह चुकता है – “पल भर के प्यार पे निसार सारा जीवन.” 
रेखांकित किया जाना चाहिए कि इस पंक्ति में नायक की उत्कंठा 86400x2 गुना से सीधे 86400x365xA गुना बढ़ जाती है (फार्मूले में A=नायक का शेष बचा जीवन वर्षों में.) 
पैनी दृष्टि वाले पाठक/दर्शक समझ जाएंगे कि नायक का रूप धारे कवि मूलतः गणितज्ञ है तथा नायिका के गणित ज्ञान की परीक्षा लेने के बहाने उससे ठिठोली कर रहा है. कविता को अपने गणित के सिलेबस में लगाकर कोई भी शैक्षिक बोर्ड धन्य हो रहेगा. 
वीडियो रिव्यू: ऐसी कविता के फिल्मांकन के लिए ऐसे कक्ष का होना अनिवार्य है जिसमें दो दर्ज़न दरवाजे, तीन दर्ज़न खिड़कियाँ और एक सौ गवाक्ष हों. इन सब पर परदे लगें हों ऐसा ही प्रावधान है. परदे न हों तो वेनेशियन ब्लाइंड्स से काम चलाया जा सकता है. 

नायक-नायिका जितने हॉकलेट हों उतना बेहतर. 

पर ढंग के तीन मृत्युलेख भी न छपे अख़बारों में


हमारे समय के बड़े कवि की ताज़ा कविताओं की सीरीज़ – 3 

नया रिपोर्टर
-असद ज़ैदी  

एक दिन में दो हास्य कवियों का निधन!
अब इस पर रोना भी हँसने जैसा ही होगा.
रोज़ी रोटी तो उनकी खूब चली कविता से
पर ढंग के तीन मृत्युलेख भी न छपे अबारों में.

संस्कृति सम्पादक कुछ संवेदनशील टाइप के थे
इंदिरा गाँधी का ज़माना था
कहा दोनों के घर जाकर कुछ रिपोर्ट बना लाओ.

पहले हास्य कवि की विधवा से मैंने पूछा—
कैसे बने मुकुट जी हास्यकविबोलीहम बहुत निर्धन थे
धर्मयुग के पारिश्रमिक से महीने में तीन दिन का आटा
न आता था. हम रेडियो पर हास्य कवियों को
सुना करते थे. एक दिन हमनें इनसे कहा—
आप भी यह रास्ता पकड़ लो 
आमदनी का कुछ ज़रिया निकल आएगा,
रेडियो-टी वी पे आओगे तो कवि-सम्मेलनों में भी
बुलावे आने लगेंगे. इन्हें कुछ सद्-बुद्धि आई
भगवान ने हमारी सुन ली.
भगवान ने सुनी कि मुकुट जी ने आपकी सुन ली?
मैंने पूछा तो उसने ज़रा सर हिलाया और चुपचाप मुस्कुराई.
अच्छा ये बताइयेमैंने पूछाआपके पति के जीवन का
सबसे अच्छा क्षण कौन सा था?
उसने कहा—रघुवीर सहाय को इनकी भाषा पसन्द थी
एक बार फोन करके कहा—मुकुट बिहारी तुम्हारी
तहरीर इतनी अच्छी हैबोल इतने सुघड़पर विषय बड़े लचर...
ये बोले—रघुवीर जी आपको मैं क्या बताऊँ...
रघुवीर जी ने कहा—कुछ मत कहो,
हाँ यह बताओ शांति कैसी हैं?
बस भैयाऐसी ही मामूली सी बातें हैं
जिन्हें ये मूल्यवान समझते थे.

अब क्या करेंगी मैंने पूछा.
बोली—कुछ नहीं. बच्चों के बच्चे हैंउन्हीं से दिल लगाउँगी.

दूसरे कवि—अनोखेलाल 'ख़फ़ा’—की विधवा
स्वर्णलता से मैंने पूछा आपके अपने पति के बारे में
वास्तविक विचार क्या हैंउसने मुझे घूरकर देखा
पूछा—किस अबार से आये हो किस स्कूल के पढ़े हो?
तुम्हारी उम्र कितनी हैअपना नाम बताओ—पूरा!
मैंने कहा—सॉरी मैम! मैं नया हूँ अभी सीख रहा हूँ...
मैम फिर से रि-स्टार्ट करते हैं...
बोली—तुम्हें कैसे पता मैं टीचर हूँ मैंने कहा—मैम मुझे बिल्कुल नहीं पता!
तब उसने कहा चलो तुम्हें कुछ बताती हूँ.

इनका नाम अनोखेलाल 'ख़फ़ा’ नहीं सोहनलाल काबरा था
शादी के दो साल के भीतर ही दफ्तर में झगड़ा किया और नौकरी छोड़ दी
आवारागर्दी करने लगे और हास्य कविता का चस्का लगा लिया
तंग आकर मैं स्कूल की नौकरी करने लगी ये घर छोड़के जाने लगे
मैंने कहा जाते क्यों हो क्या मैं तुम्हें काटने दौड़ती हूँ?
तुम करो हास्य कवितामैं रोक रही हूँ क्यापर यह 
सोहनलाल काबरा नाम इस लाइन में चलने वाला नहीं.

अपनी बात के असर का पता मुझे यूँ चला कि एक साल के बाद
मेरे स्कूल ने मशहूर हास्यकवि अनोखेलाल 'ख़फ़ा’ को 
मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया और मैंने देखा ये तो अपने श्रीमान हैं
मुझे हैरान देखकर घबराएबोले—मुझे क्या पता था तुम यहाँ पर हो!
अब क्या बताऊँ पीठ पीछे सब स्कूल में मुझे मिसेज़ काबरा नहीं
मिसेज़ ख़फ़ा कहने लगे!

मैंने कहा—मैम यह क़िस्सा तो आपके शादीशुदा जीवन का रूपक हुआ!
रूपक?” अरे वाहशाबास!—वह बोली—कहाँ से सीख आए तुम यह सब!
खैर, ‘ख़फ़ा’ साहब की एक राबी बताती हूँ.
यूँ तो सफल थेपैसा भी बहुत बटोर लाते पर ये जो चाहते थे
होते होते रह जाता था मैंने एक बार कह दिया तो दुखी हुए
पद्मश्री मिलते मिलते रह गया
राज्यसभा में पहुँचते पहुँचते रह गए 
पिता भी बनते बनते रह गए
हमारी बेटी भी गोद ली हुई है बेटा भी 
अब तो हमारी एक नवासी है एक नवासा एक पोता भी
घर अपना है मेरी पेंशन भी होगी पर हाँ ख़फ़ा चले गए
और मुझे लगा मैम की आँखों में आँसू आया चाहते हैं.

4.4.2018