Wednesday, May 31, 2017

विज्ञान का अंतिम लक्ष्य दरअसल ईश्वर बन जाना है

सुन्दर सुरुक्कई बंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज में प्रोफेसर हैं. उनके इस महत्वपूर्ण लेख का अनुवाद कबाड़खाने के लिए  प्रिय मित्र आशुतोष उपाध्याय ने किया है.

नई टेक्नोलॉजी और पुराना धर्म
- सुन्दर सरुक्कई

संवर्धित यथार्थ हमारे ब्रह्माण्ड को नया रूप देने के लिए
भौतिक संसार व मनुष्य की लालसा के बीच सेतु को उलट रहा है.

आकाशवाणी हो चुकी है. उनका सपना जल्द ही आपके निजी गैजेट का रूप धर लेगा. एफ 8 की पिछले माह संपन्न सालाना ग्लोबल डेवेलपमेंट कांफ्रेंस में फेसबुक के सीईओ मार्क ज़ुकरबर्ग ने नई टेक्नोलॉजी के बारे में अपनी परिकल्पनाओं का खुलासा किया. वह हमारी ज़िंदगियों को बदल डालना चाहते हैं. इसके लिए वह उन तौर-तरीकों को बदलना चाहते हैं, जिनके जरिये हम अपने आस-पास की वास्तविक दुनिया को महसूस करते, उससे जुड़ते और उसका अनुभव करते हैं. वह हमारी रोजमर्रा दुनिया के ठोस यथार्थ को मसालेदार संवर्धित यथार्थ (अगमेंटेड रियलिटी) में बदलना चाहते हैं. मसलन, एक ऐप के ज़रिए वह हमारे दलिये के कटोरे को तैरती हुई छोटी-छोटी शार्कों की छवियों से भर सकते हैं.
संवर्धित यथार्थ कुछ इसी तरह का है. यह हमारे सामने पसरी दुनिया से उपजने वाली असंतुष्टि की ज़मीन पर उगना शुरू करता है. यह हमारी निकृष्टतम लालसाओं को पंख लगाता है. इसके लिए एक ऐसी दुनिया का सृजन करता है जो हममें से हरेक के लिए ख़ास होती है, मानो हमारी इच्छाओं की ग़ुलाम हो जबकि हकीक़त इससे ठीक उलट होती है.

जाना-पहचाना प्रलोभन
ज़ुकरबर्ग के सपने में कुछ भी नया नहीं है. हालांकि इसे कुछ इस तरह परोसा गया मानो निहायत नयी चीज़ हो. लेकिन टेक्नोलॉजी की इस नई परिकल्पना में बहुत कुछ वही है जो कभी प्राचीन धार्मिक कल्पनाओं का हिस्सा रहा है.
ज़ुकरबर्ग चाहते हैं कि हम "अपने आसपास की उन तमाम चीज़ों के बारे में सोचें जिन्हें वास्तव में भौतिक स्वरूप की ज़रूरत नहीं है." दुनिया के पदार्थ रूप पर संदेह करने वाला उनका सपना ऐसे तकनीकी प्रयास की ओर इशारा करता है जो हमेशा सामने मौजूद वास्तविक यथार्थ के पार जाता है. नई टेक्नोलॉजी का यह नजरिया पुरानी धार्मिक कल्पनाओं से काफी-कुछ मेल खाता है. यह कहता है कि हम जितना डिजिटल और टेक्नोलॉजिकल होते जाएंगे, हमारी धार्मिकता उतनी ही सघन होती जाएगी. क्या इसे सिर्फ संयोग माना जाय कि इस डिजिटल युग के साथ धार्मिकता और नव-गुरुओं की संख्या में ज़बरदस्त इजाफ़ा हुआ है?
अगर यह बात आपको बेतुकी लगे तो कृपया इस विश्लेषण पर गौर करें. धर्म की तरह यह नई टेक्नोलॉजी भी वास्तविक भौतिक दुनिया पर संदेह से शुरू होती है. यह हमेशा उससे ज्यादा की मांग करती है जो हमारे सामने ठोस रूप में मौजूद है. टेक्नोलॉजी और धर्म दोनों भौतिक शरीर को नश्वर जगत की तमाम समस्याओं की धुरी मानते हैं. भौतिक दुनिया के मकड़जाल से भाग निकलने के लिए वे मुक्ति व स्वतंत्रता के चुनिंदा विचारों का इस्तेमाल करते हैं.
टेक्नोलॉजी और धर्म दोनों मनुष्य के कर्म की स्वायत्तता की बुनियाद पर ही सवाल खड़े करते हैं: क्या हम ईश्वर के सम्मुख अपनी स्वायत्तता को ठीक उसी तरह नहीं खो बैठते जैसे हम डिजिटल गैजेटों के सामने खो देते हैं? दोनों चमत्कार का इस्तेमाल करते हैं और अपनी ओर खींचने के लिए हमारी आँखों पर अपने रंग का चश्मा चढ़ा देते हैं. दोनों सुरक्षा और आश्वस्ति का अहसास देते हैं और अपने प्रति एक तरह की निर्भरता पैदा करते हैं. और अंत में उस एक जैसी रणनीति को नहीं भूलना चाहिए जो ये दोनों इस्तेमाल करते हैं: कीमत का सवाल.
धर्म बहुत सस्ते में हमें तमाम सुविधाओं का वादा करता है. ज़ुकरबर्ग ने भी यह पाठ अच्छी तरह सीखा है: वह अपना सपना इस दावे के साथ बेचते हैं कि टेक्नोलॉजी की मदद से भविष्य में 500 डॉलर के एक टीवी का काम 1 डॉलर का ऐप कर डालेगा. लेकिन भौतिक संसार के साथ वास्तव में समस्या क्या है? आखिर डिजिटल टेक्नोलॉजी वालों और धार्मिक कल्पनाकारों को भौतिक वास्तविकता का विचार इतना दिक्कततलब क्यों लगता है?

मानवीय और दैवीय
इंसानों की दुनिया और दैवीय संसार के बीच फ़ासला बहुत बड़ा है. इस फ़ासले के एक पक्ष को इंसानों के भौतिक अस्तित्व से परिभाषित किया जा सकता है. हम सब हाड़-मांस के बने हैं, जगह घेरते हैं और भौतिक उत्पादों पर जीवित रहते हैं. हमारा शरीर भौतिकता की जीती-जागती मिसाल है और यही शरीर मुक्ति की कई अवधारणाओं के लिए भी मुसीबत बन जाता है.
शरीर एक समस्या है क्योंकि कोई भी भौतिक वस्तु, परिभाषानुसार, नियमों के दायरे में संचालित होती है. शरीर इस लिहाज से भी एक भौतिक निकाय है क्योंकि अपनी भौतिकता के कारण यह कई चीज़ें नहीं कर पाता. मुक्ति का विचार प्रथमतः भौतिक दुनिया से मुक्ति की बात करता है. देवलोक भौतिक दुनिया को परिभाषित करने वाले कारकों से संचालित नहीं होता. ईश्वर और फ़रिश्ते उड़ सकते हैं लेकिन हम नहीं. वे समय और काल की सीमाओं से भी बंधे हुए नहीं हैं. ईश्वर हमारी तरह नहीं होते. परिभाषा के मुताबिक़ वे अपदार्थ हैं, सर्वत्र हैं, अविनाशी हैं, आत्मा हैं, चेतना हैं. ईश्वर डिजिटल दुनिया का पहला उदाहरण है जिसे भौतिक शरीर जैसी कोई बाधा नहीं बांधती. पश्चिम की परम्परा में ईश्वर के विचार की गणित के साथ गहरी साम्यता की यह भी एक वजह है. ज्यामिति को ईश्वर की सर्वत्रता, जबकि अंकगणित को उसकी निरंतरता का प्रतिरूप माना जाता है. आइजैक न्यूटन उन विद्वानों में गिने जाते हैं जिन्होंने इन दो अभौतिक क्षेत्रों के बुनियादी सम्बन्ध को स्वीकार किया था.
संवर्धित यथार्थ इस चीज़ को एक कदम और आगे ले जाता है. यह विज्ञान और टेक्नोलॉजी की कल्पनाशक्ति का तार्किक अंत है. विज्ञान दुनिया की अपने ढंग से विवेचना करता है लेकिन विज्ञान का लक्ष्य मात्र विवेचना तक सीमित नहीं रहता.
विज्ञान का बुनियादी उद्देश्य इस विवेचना को इस्तेमाल करना और उस दुनिया के साथ कुछ न कुछ करना है, जिसकी यह विवेचना करता है. विज्ञान अमूमन प्रकृति के ज्ञान को इस्तेमाल करता है ताकि इसे नियंत्रित व काम में लाया जा सके. यद्यपि, विज्ञान का एक और महत्वपूर्ण उद्देश्य है: आखिरकार प्रकृति की रचना करना.
विज्ञान के लिए यह जान लेना पर्याप्त नहीं कि चीज़ें जैसी दिखाई देती हैं वैसी क्यों हैं या वे क्यों इस तरह व्यवहार करती हैं. उसके लिए इससे भी ज्यादा ज़रूरी है कि कैसे इस दुनिया को रचा जाय, बल्कि और 'बेहतर' कैसे रचा जाय. विज्ञान का अंतिम लक्ष्य दरअसल ईश्वर बन जाना है, क्लोनिंग, बीटी फसलें, कृत्रिम बुद्धि और संवर्धित यथार्थ इस यात्रा की शुरुआत के डगमगाते कदम भर हैं.
धर्म और ज़ुकरबर्ग में एक और बात समान है. दोनों इस तथ्य पर निर्भर हैं कि मनुष्य खुद से और इस दुनिया से हमेशा नाराज़ रहते हैं. धर्म उन्हें दूसरे लोक की, परलोक की घुट्टी पिलाकर तसल्ली देता है. ज़ुकरबर्ग अपने डिजिटल खिलौनों में एक स्वर्ग रचना करना चाहते हैं. वह हमें खुद को बदलने सलाह देने के बजाय हमारी दुनिया को ही बदल देना चाहते हैं.
ईश्वर का दायरा हम इंसानों की दुनिया से अलग है. इसलिए मुक्ति का मतलब इस जगह को छोड़कर इसके परे कहीं और जाना बताया जाता है. मगर संवर्धित यथार्थ इस किस्म की मुक्ति की बात नहीं करता. यह हममें हरेक के दरवाजे के बाहर एक स्वर्ग की रचना करना चाहता है. या कम से कम हममें से हरेक के स्मार्टफोन के बाहर.

सामाजिक साझेदारी की मनाही
सामान्यतया धर्म के विपरीत संवर्धित यथार्थ आत्ममुग्धता से परिपूर्ण और आत्म-केन्द्रित होता है. धर्म हमेशा से सामाजिक रहे हैं. वे सामाजिक रूप से व्यवहार में लाये जाते हैं और सामाजिक कर्मकांडों से भरे होते हैं. लेकिन इस नए तकनीकी कृत्रिम संसार में, जिसे हममें से हरेक अपनी लालसाओं व फंतासियों के अनुरूप गढ़ सकता है, सामाजिक साझेदारी की गुंजाइश नहीं है. यह एक व्यक्ति को रचता है और बाहरी संसर्ग से अलग करता है, जिसका अंत सामाजिक मतिभ्रमता में होता है.
यह डिजिटल दुनिया है, क्षणभंगुर, अनिर्धारित, स्वतंत्र और चलायमान प्रतीत होती, जो इंसान के हकीकी दुनिया से बाहर का रास्ता दिखाती है. यह नई टेक्नोलॉजी एक नए धर्म का मायाजाल रचने के लिए वह सब देने का स्वांग भरती है, जिसे देने की बात पुराना धर्म करता था. तमाम धर्मों की तरह यह भी भूल जाती है कि डिजिटल और क्षणभंगुर हमेशा पदार्थ की बुनियाद पर ही खड़े हैं. ठीक उसी तरह जिस प्रकार मनुष्य जीवन निरंतर खोते जाने और मौत की आधारशिला पर खड़ा है.

ज़ुकरबर्ग हमें केवल बाहरी चकाचौंध के दर्शन करा रहे हैं. इसे हकीकत में बदलने वाले पीछे रखे तारों और ब्लैक बॉक्सों को वह नहीं दिखाते. लेकिन आखिरकार वह उन चीज़ों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं, जिन्हें उन्होंने सिरजा है. ये हम हैं, पीड़ित, बोझ से दबे सशरीर इंसान,जो उनके पास अपनी लालसाओं की क्षुधा शांत करने के लिए जाते हैं. हम अपने डिजिटल मालिकों के हाथों की कठपुतलियां हैं. और हम उस बिंदु से आगे निकल आए हैं कि पूछ सकें कि क्या हम अपनी कारगुजारियों और मंजिल को जानते हैं. हम इस नए धर्म की ज़मीन में पांव रख चुके हैं.

Monday, May 1, 2017

मैं तैनूं फेर मिलांगी - कबाड़खाने की 5000 पोस्ट्स

यह मेरी दोस्त शायदा बानो के ब्लॉग उनींदरा की पहली पोस्ट है. बल्कि इसे उनकी  पहली चार पोस्ट्स को इकठ्ठा कर बनाया गया है. 2008 के अगस्त की यह पोस्ट जैसे किसी बहुत पुराने समय की बात लगती है जब हिन्दी में नई-नई शुरू हुई ब्लॉगिंग को लेकर अभूतपूर्व उत्साह था. न फेसबुक था न ट्विटर.

शायदा के लेखन  का मैं तब भी फैन था आज भी हूँ. मीठी उदासी और गहरे अपनेपन से भरे अवसाद में डूबी उनके उनींदरे की भाषा हिन्दी में अद्वितीय है. यह अलग बात है कि उन्होंने ब्लॉग पर लिखना लम्बे समय से बंद किया हुआ है और मैं उनसे एकाधिक बार इसे पुनर्जीवित करने की दरख्वास्त कर चुका हूँ. कबाड़खाने की 5000 पोस्ट पूरी होने के मौके पर उनकी यह पोस्ट यहाँ पेश करता हुआ मैं उनसे इस निवेदन को यह कहते हुए दोहरा रहा हूँ कि हमें आपका लिखा सारा कुछ याद है और हमें उसकी बहुत याद आती है. हम आपके नए लफ़्ज़ों को पढ़ने के इंतज़ार में हैं.

इमरोज़ और अमृता

मैं तैनूं फेर मिलांगी

हम ऑनलाइन थे, लेकिन निरुपमा को अपनी बात कहने के लिए फोन करना ठीक लगता है. बताया ... इमरोज़ आ रहे हैं. सात तारीख़ को दोपहर में तुम भी आ जाओ. पहुंची, तो देखा पूरा घर अमृता की पेंटिंग्स और स्केचेज़ से सजा था. जैसे बारात आई हो निरुपमा के घर और दूल्हा बने बैठे हों इमरोज़. तक़रीबन पंद्रह बरस के बाद देखा था उन्हें. लगा, जैसे उनका चेहरा अमृता जैसा होता जा रहा है, प्रेम का संक्रमण ऐसा भी होता है क्या ... थोड़ी देर में ही निरुपमा दत्त का घर दोस्तों से भर गया. इमरोज़ ने नज़्म पढ़ना शुरू किया. एक के बाद एक, पढ़ते गए. हाथ में फोटोस्टेट किए पचास से ज़्यादा काग़ज़ थे. सबमें अमृता. वो उसके अलावा कुछ और सोच सकते हैं क्या, मुझे लगा नहीं और कुछ सोचना भी नहीं चाहिए उन्हें. 

एक थी अमृता ... कहने से पहले ही इमरोज़ टोक देते हैं. फिर दुरुस्त कराते हैं - कहो एक है अमृता. हां, उनके लिए अमृता कहीं गई ही नहीं. कहने लगे - एक तसव्वुर इतना गाढ़ा है कि उसमें किसी ऐसी हक़ीक़त का ख़याल ही नहीं कर पाता, जिसमें मैं अकेला हूं. हम उस घर में जैसे पहले रहते थे, वैसे ही अब भी रहते हैं. लोग कहते हैं, अमृता नहीं रही ... मैं कहता हूं-हां, उसने जिस्म छोड़ दिया, पर साथ नहीं. ये बात कोई और कहता, तो कितनी किताबी-सी लगती. उनके मुंह से सुना, तो लगा जैसे कोई इश्कि़या दरवेश एक सच्चे कि़स्से की शुरुआत करने बैठा है. उन्होंने सुनाया- प्यार सबतों सरल इबादत है ...सादे पाणी वरगी. हां, ऐसा ही तो है, बिलकुल ऐसा ही, हम कह उठते हैं. लेकिन ये सादा पानी कितनों के नसीब में है... इस पानी में कोई न कोई रंग मिलाकर ही तो देख पाते हैं हम. वो ताब ही कहां है, जो इस पानी की सादगी को झेल सके. 

घर के बाहर बरसात थी और अंदर भी. नज़्मों और रूह से गिरते उन आंसुओं की, जो कइयों को भिगो रहे थे. पहली मुलाक़ात का जि़क्र हमेशा से करते आए हैं, एक बार फिर सुनाने लगे- उसे एक किताब का कवर बनवाना था. मैंने उस दिन के बाद सारे रंगों को उसी के नाम कर दिया. जहां इमरोज़ बैठे थे, ठीक पीछे एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो रखा था. एक रेलिंग के सहारे हाथ में हाथ पकड़े उन दोनों को देखकर मैंने पूछा, ये कहां का है. उन्होंने बताया- जब हम पहली बार घूमने निकले, तो पठानकोट बस स्टैंड पर ये फोटो खिंचवाया था. इमरोज़ को रंगों से खेलना अच्छा लगता है, लेकिन अपनी जि़ंदगी में वे बहुत सीधे तौर पर ब्लैक एंड व्हाइट को तरजीह देते हैं. यहां तक कि अपने कमरे की चादरों में भी यही रंग पसंद हैं उन्हें, जबकि अमृता के कमरे में हमेशा रंगीन चादरों को देखा गया. 

ये सोचना कई बार मुश्किल होता है कि क्‍या रब ने अमृता-इमरोज़ को इसी दुनिया के लिए बनाकर भेजा था ... फिर ये भी लगता है कि दुनिया में प्‍यार का नाम बाक़ी रहे इसके लिए उसे कुछ न कुछ तो करना ही था न. पर क्‍या इन्‍हें बनाने के बाद रब ने सांचा ही तोड़ डाला ... अगर नहीं, तो क्‍यों नहीं दिखते, और कहीं अमृता-इमरोज़...! मेरी सोच गहरी हो जाती, तो वे टोक कर कहते, मेरी नज्‍़मां नईं सुनदी ... मैं फिर सुनने लगती ध्‍यान से. बताने लगे "हम एक बार ऐसे ही घूम रहे थे कि अमृता ने पूछा- पैलां वी किसी दे नाल तुरयां ए (पहले भी कभी किसी के साथ घूमे हो) मैंने कहा-हां तुरयां हां, पर जागा किसे दे नाल नईं (हां, घूमा हूं लेकिन जागा किसी के साथ नहीं). इसके बाद उसने मेरा हाथ ज़ोर से पकड़ लिया और इस तरह चल पड़ी जैसे सारी सरहदें पार करके आगे जाना हो." इमरोज़ ने अपनी जाग को फिर कभी ऊंघने नहीं दिया, अमृता के सो जाने के बाद भी.

अमृता-साहिर.इमरोज़ ... ये त्रिकोण होकर भी तिकोना नहीं दिखता. ... कैसी अजीब बात है. इसके कोनों को किसने घिसकर इतना रवां कर दिया कि वे किसी को चुभते ही नहीं. क्‍या था ऐसा. ... इमरोज़ बताते हैं - साहिर उसकी मुहब्‍बत था, मैं उससे कैसे इन्‍कार करता. बरसों से जो वो दिल में रखे थे उसे निकाल फेंकने की कू़वत मुझमें नहीं थी, शायद सच्‍चा इश्‍क़ करने वाले किसी भी इंसान में ऐसी कू़वत नहीं होती. वो तो बस सबकुछ सौंप देता है आँख बंद करके, फिर सामने वाले की मर्जी़, वो चाहे जो करे. अमृता की किताबों में दर्ज कि़स्‍से को दोहराते हुए उन्‍होंने कहा "एक बार वो कहीं इंटरव्यू दे आई कि जब वो स्‍कूटर पर पीछे बैठती है तो मेरी पीठ पर उंगली से साहिर-साहिर लिखती रहती है. ये बात मुझे पता नहीं थी. इंटरव्यू आने के बाद लोग मुझसे सवाल करने लगे. मेरा जवाब था- लिखती है तो क्‍या हुआ. ... ये पीठ भी उसकी है और साहिर भी उसीका, वो चाहे जो करे". क्‍या सचमुच इतना आसान रहा होगा इसे सहना. ... उन्‍होंने कहा - हां बिलकुल, मैंने उससे मिलने के बाद ही जाना कि अपने आप को सौंपते वक्‍़त किसी तरह की जिरह की कोई गुंजाइश उठाकर नहीं रखी जाती. खु़द को देना होता है पूरा का पूरा. कुछ भी बचाकर नहीं रखा जाता. कितना सच था इस बात में, वाक़ई कुछ उठाकर रख लेने से ही तो बदनीयती आती है.

वे एक साथ हौज़ ख़ास वाले घर में रहे. मैं अंदाजा लगाना चाहती थी इस प्रेम के भौतिक स्‍वरूप का. उन्‍होंने भांपा और बोले-जब शरीर के साथ उस घर में मेरे साथ थी तो हम दोनों मिलकर ख़र्च करते थे. किचन का सामान भरते और साथ मिलकर ही बाक़ी ख़र्च चलाते. कभी पैसे को लेकर कोई सवाल आया ही नहीं. मुझे याद है कि जब मैं इंश्‍योरेंस करवा रहा था तो एजेंट ने पूछा नॉमिनी कौन? मेरा उसके सिवा कौन था जो नाम लेता, कहा अमृता, एजेंट ने पूछा रिश्‍ता बताओ, मैंने वहां लिखवाया दोस्‍त. क्‍योंकि उस जगह को भरने के लिए एक शब्‍द की ज़रूरत थी. हमारा रिश्‍ता इस शब्‍द का मोहताज नहीं था पर क़ाग़ज़ का पेट भरना ही पड़ा. एजेंट मेरी तरफ़ देखकर हैरान था कि क्‍या दोस्‍त को भी कोई नॉमिनी बनाता है. उसे मेरी बात समझ आनी नहीं थी इसलिए समझाया भी नहीं. बाद में जब वो पॉलिसी मेच्‍योर हुई उसका पैसा हमने साथ मिलकर ख़र्च किया. इमरोज़ फिर सुनाने लगे - दुनिया विच कोई प्राप्ति बणदी ... जे मुहब्‍बत कामयाब न होवे ...

सच को दूर से देखो तो उस पर सहज ही विश्वास हो जाता है. सामने आकर खड़ा हो जाए तो उसे छूकर, परख लेने का जी होता है. शायद हम तसल्ली कर लेना चाहते हैं कि सच को छूना ऐसा होता है, उसे जान लेना ऐसा होता है. अमृता-इमरोज़ का प्रेम ऐसा सच है जो पूरा का पूरा उजागर है. कहीं कुछ छिपा हुआ नहीं दिखता ... तो भी इमरोज़ को सामने पाकर इच्छा होती है जान लेने कि फलां बात कैसे शुरू हुई थी, फलां वक़्त क्या गुज़री थी उनपर. यही वजह थी दोपहर से लेकर शाम तक इमरोज अमृता की ही बातें करते रहे. ये सारी बातें वही थीं जो हम अब तक कई बार पढ़ चुके थे, सुन चुके थे. 

इमरोज़ सुनाने लगे- उड़दे क़ाग़ज़ ते मैं उसनूं नज्मां लिखदा रहंदा हां, जदों वी कोई पंछी आके मेरे बनेरे ते आ बैठदा, मैं जवाब पढ़ लेंदा हां ... नज़्मों का अमृता तक जाना और उसके जवाब का आ जाना ... ये बात शायद किसी के लिए एक ख़याल भर हो सकती है, लेकिन इमरोज़ के लिए उतना ही सच है, जितना उनके आंगन में खिले वो हरे बूटे जिन्हें पानी देते हुए वे अक्सर 'बरकते...' कहकर अमृता को पुकारा करते थे. उनमें से कुछ पौधों ने उन्हें साथ देखा ही होगा न, और उस बनेरे ने भी... जिस पर आकर पंछी बैठते हैं. मुझे लगा कि उन्हें साथ देखकर ही किसी दिन पंछी और बनेरे के बीच तय हुआ होगा इस संदेस के ले जाने और लाने का मामला. 

इमरोज़ उस घर में रहते हैं जहां अमृता का परिवार है. जब मैंने पहली बार वो घर देखा तो ऊपरी तरफ़ कुछ विदेशी लड़कियां किराए पर रहती थीं. और नीचे की जगह में 'नागमणि' का दफ़्तर था. अब वहां क्या है...? इमरोज़ बताते हैं- अब नीचे भी किराए पर दे दी है जगह. अपनी जेब से इमरोज़ काग़ज़ का पैकेट सा निकालते हैं. पता चला वे चमड़े का बटुवा नहीं रखते. एक काग़ज के लिफ़ाफे़ में पैसे रखकर उस पर कुछ टेलीफोन नंबर लिखते हैं जिन्हें इमरजेंसी में कॉल किया जा सके. ये नंबर उनके हैं जो अमृता के बच्चे हैं. इमरोज़ और अमृता के नहीं. इतना साथ, इतना प्यार, इतना समर्पण, तो इन दोनों के बच्चे क्यों नहीं? इमरोज़ बताते हैं- अमृता तो पहले ही दो बच्चों की मां थी. हमने मिलकर तय किया था कि इनके अलावा हम और कुछ नहीं सोचेंगे. लेकिन क्या तय कर लेना भर काफ़ी था, अपनी इच्छाओं के आगे...? उन्होंने कहा- काफ़ी नहीं था पर हमने इसे मुमकिन कर लिया था. एक बार मैंने उसे कहा- अगली बार जब मिलेंगे, तो हम अपने बच्चे पैदा करेंगे... बस इस बार तू मुझसे पहले ही ब्याह मत कर लेना. अमृता ने जाते-जाते भी मुझसे यही कहा है न - मैं तैनूं फेर मिलांगी...

इमरोज़ उस तस्वीर को देख रहे थे जिसमें अमृता उनके हाथ में खाने की थाली पकड़ा रही हैं. तस्वीर का सच उनके चेहरे पर उतर कर आ बैठा था. मानो कह रहा हो, कितने मूर्ख हो तुम सब, जो इस रिश्ते को परिभाषा में बांधने की बात करते हो. इस तस्वीर को देखो और दुनिया की किसी भी पतिव्रता के चेहरे से उसका मिलान कर लो, कहीं भी कोई भाव को उतार पाएगी क्या, जो अम्रता की आंखों में नजर आ रहा है. अमृता दाएं हाथ से थाली पकड़ा रही हैं और इमरोज़ दोनों हाथों से उसे स्वीकार कर रहे हैं. ये महज तस्वीर नहीं है, इसमें एक फ़लसफ़ा नज़र आ रहा है. किसी को खुद को सौंप देने का, किसी का उसे दोनों हाथों से स्वीकार कर लेने का, हमेशा-हमेशा के लिए. ग़ौर से देखेंगे, तो आप भी पाएंगे कि वहां रखे पतीले और चमचे से लेकर हर छोटी-बड़ी चीज़ बुलंद आवाज़ में बता रही है कि यहां किसी ऐसे सीमेंट की ज़रूरत नहीं है, जो इन दोनों को पक्के जोड़ में जकड़ दे. न ही किसी ऐसी भीड़ की ज़रूरत, जिसकी गवाही में इन दोनों को बताना पड़े कि हां हमें साथ रहना है अब. एक वक़्त की रोटी जब इस तरह साथ खाई जाती है, तो फिर जन्म भर क्या किसी और थाली से खाने की भूख रह जाती होगी..... इमरोज़ शायद इसीलिए कभी किसी और ठौर पर रोटी खाने नहीं गए होंगे. 

हम सब अपने-अपने इमरोज़ को ढूँढ रही हैं. परन्तु क्या इतने इमरोज़ इस संसार ने पैदा किये हैं?....ऐसे ही सवाल निरुपमा में घर में भी उठे थे उस दिन. लंबी बातचीत के बीच कभी कोई कह उठती हमें इमरोज़ क्यों नहीं मिला.. तो किसी ने कहा- हमारे हिस्से का इमरोज़ कहां है....? कहां है वो शख्स जो अपनी पीठ पर एक गै़र नाम की इबारत को महसूस करते हुए भी पीठ नहीं दिखाता? एक हाथ से दी गई थाली को दो हाथों से स्वीकार करते हुए अपने चेहरे पर एक शिकन तक आने नहीं देता... कहां है वो प्रेम जो खु़द को मिटा देने की बात करता है.... कहां है वो इंसान जो किसी के चले जाने के बाद भी उसके साथ होने की बात करता है? हम सब ढूंढती हैं पर वो कहीं नहीं दिखता. शायद इसलिए कि ऐसे इमरोज़ को पाने से पहले अमृता हो जाना पड़ता है. दुनियादारी की चादर को इस तरह तह करके रखकर भूल जाना होता है कि उसकी याद तक न आए. उस चादर को बिना बरते जिंदगी गुज़ार सकने की हिम्मत पैदा कर लेनी होती है. हो सकता है, बहुत सारे अमृता और इमरोज एक ही वक़्त पर एक ही जगह इसलिए भी न दिख पाते हों कि उन्हें याद ही नहीं रहा है दुनियादारी और दुश्वारियों की चादर को कैसे तह करके रखा जाता है. 

खै़र अपनी-अपनी चादरों की संभाल के बीच भी अपने-अपने इमरोज़ को ढूंढते रहा जा सकता है, क्योंकि ईश्वर अभी भी है कहीं ... मैंने उनसे इजाज़त ली और एक बार फिर ये नज़्म सुनाने को कहा -


            साथ

            उसने जिस्म छडया है, साथ नहीं 
            ओह हुण वी मिलदी है
            कदे बदलां छांवे
            कदे तारेयां दी छांवे
            कदे किरणां दी रोशनी विच
            कदे ख्यालां दे उजाले विच
            असी रल के तुरदे रैंदे वां.

            दुख-सुख, इक दूजे नूं वेख-वेख 
            कुझ कैंदे रैंदे आं 
            कुझ सुणदे रैंदे आं.
            बगीचे विच सानूं 
            तुरदेयां वेख के 
            फुल्ल हर वार सानूं बुला लेंदे हण 
            असी फुल्लां दे घेरे विच बैठ के
            फुल्लां नूं वी 
            अपणा-अपणा कलाम सुनादें आं.

            ओ अपनी अनलिखी कविता सुनांदी है
            ते मैं वी अपणी अनलिखी नज़म सुनांदा वा 
            कोल खड़ा वक्त 
            एह अनलिखी शायरी सुनदा-सुनदा 
            अपणा रोज दा 
            नेम भुल जांदा ए.
            जदों वक्त नूं 
            वक्त याद आंदा ए
            कदे शाम हो गई होंदी है 
            कदे रात उतर आई होंदी है
            ते कदे दिन चढ़या आया होंदा है.

            उसने जिस्‍म छडया है साथ नहीं.



शायदा बानो

मन्ना, अब मत गाओ, नजर लग जाएगी


मन्ना डे के जन्मदिन पर कुमार अम्बुज की यह कहानी रीपोस्ट की जा रही है -

एक दिन मन्ना डे

- कुमार अम्बुज

छियासी बरस के मन्ना डे उस दिन शहर में आए थे. जीवनकाल में ही अमर हो चुके अपने अनेक गीतों को गाने के लिये. कार्यक्रम का ज्यादा प्रचार नहीं हुआ लेकिन धीरे-धीरे खबर फैलती गई कि मन्ना डे शहर में आज गाना गाएँगे. आमंत्रण पत्र से प्रवेश था. फिर भी रवीन्द्र भवन पूरा भर चुका था. सीढि़यों पर, गैलरी में, रास्ते में लोग बैठे हुये थे या खड़े थे. सब उम्मीद कर रहे थे कि मन्ना डे इस उमर में भी कम से कम चार-छः गीत तो गाएँगे ही. लेकिन उन्होंने लगभग ढाई घंटे तक गाया और पच्चीस-तीस गीत गाए. सब लोगों ने नॉस्टेल्जिक अनुभूतियों के साथ, खुशी जताते हुए, तालियाँ बजाते हुए उन्हें सुना. मुझे भी बड़ा सुख मिला. मन्ना डे जैसे बड़े पार्श्व गायक को सीधे सुनने का आनंद और संतोष हुआ.

रात नौ बजे कार्यक्रम समाप्त हुआ, भीड़ के साथ सीढि़याँ उतरते हुए मुझे प्रसाधन लिखा देखकर ख्याल आया कि इस बीच फारिग हो लूँ. भीड़ भी छँट जाएगी और तब आराम से घर जा सकूँगा. मैं जाकर खड़ा हुआ ही था कि बगल में एक आदमी कुछ निढाल-सा, थके कदमों से आया और पेशाब करने लगा. मैंने उसकी तरफ देखा, वह रुआँसा हो रहा था. निगाह मिलने पर वह कुछ सकपका गया और नजर चुराने लगा. मैंने पूछा- आपको कैसे लगे मन्ना डे? उनकी आवाज से लगता नहीं है न कि वे छियासी साल के हैं?’ 

यकायक वह आदमी रोने लगा. मैं घबरा गया. मुझे लगा कि शायद मैंने कुछ गलत बात कह दी. वह एक बाँह से आँसू पोंछने लगा. मैंने सोचा कि उसे ढाढ़स बँधाना चाहिए. जिप खींचकर मैं एक तरफ खड़ा हो गया कि जब यह इधर आए तो इससे सांत्वना के कुछ शब्द कहूँ. मैं खुद को कहीं न कहीं अपराधी समझ रहा था. वह जैसे ही पलटा मैंने कहा- माफ करें, शायद मैंने कुछ ऐसी बात पूछ ली जो आपको अच्छी नहीं लगी.’ 

नहीं भाई, आपकी बात से कुछ नहीं हुआ. मुझे तो पहले से ही रोना आ रहा था.’ उसने भर्रायी आवाज में कहा

मुझे आश्वस्ति हुई कि चलो, मेरी वजह से इसे कुछ नहीं हुआ

जैसे ही आपने कहा कि लगता नहीं वे छियासी के हैं, मैं अपने आँसू रोक नहीं पाया.’

इसमें ऐसा क्या कह दिया मैंने?’

अब क्या बताऊँ आपको! इस उमर में, बुलंद आवाज में, पूरे पक्के सुरों में उनके गाने सुनते हुए दरअसल मुझे यह ख्याल सताने लगा कि एक दिन मन्ना डे......’ वह कुछ कहते-कहते रुक गया.

एक दिन मन्ना डे, क्या? क्या मतलब?’ 

अरे भाई, मुझे अचानक यह ख्याल आया कि एक दिन मन्ना डे इस दुनिया में नहीं रहेंगे. तबसे यह कुविचार मेरा पीछा कर रहा है. मैं इससे पीछा नहीं छुड़ा पा रहा हूँ.’

मुझे समझ नहीं आया कि इस भले आदमी से आखिर क्या कहूँ. इसकी बात पर हँस दूँ, इसे समझाऊँ या टाल कर चल दूँ. उस आदमी की मुद्रा गंभीर थी. वह किसी गहरी तकलीफ में दिख रहा था. मैंने विषयांतर करने के लिए, एक तरह से उसका ध्यान बाँटने के लिये कहा- चलिए, नीचे चलते हैं, रेस्टॉरेंट में चाय पीते हैं. आपके पैन्ट्स की जिप खुली है.’ आखिरी वाक्य मैंने इस तरह कहा कि उसे बुरा न लगे. उसने अनमने मन से जिप खींची और बोला- ठीक है, आप भी चाय पीना चाहते हैं तो चलिये.’ 

हम रेस्टारेंट के एक शांत कोने की टेबुल की तरफ गए. वह अभी तक संयत नहीं हुआ था.

देखिए, आप यह मत समझिए कि मन्ना डे के लिए मैं ऐसा सोच रहा हूँ. बल्कि यह सोचना मुझ पर कितना भारी पड़ रहा है, मैं ही जानता हूँ.’

अब कुछ तो मैं भी जानता हूँ.’ मैंने मुसकराते हुए कहा. लेकिन उस पर इस परिहास का कोई प्रभाव नहीं पड़ा

लगता है आप इस बात पर भावुक हो गए हैं, कुछ हद तक डिप्रेशन में आ गए हैं.’ कहते हुए मैंने सोचा कि शायद सहानुभूति से ही इस आदमी को उबारा जा सकता है

घटनाक्रम ऐसा बनता गया कि मुझे इस अतिनाटकीयता में रुचि हो गई या कहूँ कि एक तरह से मैं फँस गया. और अब मैं घर जाने की बजाय यहाँ इस आदमी के साथ, जिसका नाम तक नहीं जानता, दो चाय का आॅर्डर देने के बाद बैठा हुआ था. मेरा कमरा पास में ही, पाँच मिनट की पैदल दूरी पर था. वह अभी भी गंभीर और उदास था. इस स्थिति में किसी औपचारिक परिचय के लेन-देन की गुंजाइश नहीं निकल रही थी.

जब उन्होंने गाया फुलगेंदवा न मारो’, मैं मारे खुशी के झूम उठा. क्या तान थी, क्या उठान और इतनी गहरी, साफ-सुथरी आवाज कि कभी रेडियो या कैसिट पर न सुनी थी. इतनी उमर के बावजूद एक भी सुर गलत नहीं लगाया. और भाई, इसी दौरान मुझे यह दुष्ट ख्याल आ गया कि एक दिन मन्ना डे नहीं रहेंगे. इतना नायाब गायक हमारे बीच नहीं रहेगा, यह आवाज, यह गायकी नहीं रहेगी. इसकी वजह से मेरी यह खुशी गायब हो गई है कि मैंने मन्ना डे को सुना.’ उसने धीरे-धीरे, भरे हुए गले से कहा

यह तो होगा ही. एक दिन हम सब नहीं रहेंगे. पहले भी महान कलाकार हुए हैं और आखिर उनकी भी उमर पूरी हुई. यह कितनी खुशी की बात है कि मन्ना डे आज और अभी हमारे बीच हैं. दुआ है कि वे शतायु हों.’ मैंने टेबुल पर रखे उसके हाथ को छूकर कहा. सोचा कि स्पर्श उसे राहत दे सकेगा.
वह खामोश रहा.

एक बार मैंने भी कुमार गंधर्व को सुनते हुए और बचपन में मुकेश का कोई गाना सुनते हुए सोचा था कि काश, ये लोग कभी न मरें. यह ख्याल जीवन में अपने प्रिय कलाकार को लेकर कभी न कभी सबके मन में आता ही है. लेकिन इसे लेकर इतना व्यथित होने की कोई बात नहीं है.’ मैंने उसे इस तरह भी दिलासा देने का प्रयास किया.

मैं जानता हूँ. मगर अभी कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ. मैं तो उनके गाने के बीच में उठकर, चीखकर कहनेवाला था कि मन्ना, अब मत गाओ, नजर लग जाएगी. मगर मन का लोभ तो यही था कि वे गाते जाएँ, बस, गाते जाएँ. और उसी बीच यह विचार जड़ जमाता चला गया कि चार साल बाद मन्ना डे नब्बे के हो जाएँगे. और आखिर एक दिन, सात साल बाद या दस साल बाद.....’ उसने खुद को रोने से रोका. इस तरह कि पास खड़े वेटर का ध्यान भी हमारी तरफ आकर्षित हो गया. मैंने वेटर को हाथ के इशारे से जताया कि कोई ऐसी-वैसी बात नहीं, दोस्तों के बीच की ही कोई छोटी-मोटी बात है.

मैंने सोचा कि कहीं इस आदमी ने ज्यादा शराब तो नहीं पी ली है. और इस वजह से ही यह अति भावुकता का शिकार हो गया है! तब तो इसे समझाना, इसके साथ वक्त जाया करना बेकार है. मैं भी किस प्रपंच में पड़ गया. आखिर मैंने पूछ ही लिया- क्या आपने आज कुछ अल्कोहल लिया है?’ वह टेबुल पर दोहरा होते हुए मेरे पास अपना मुँह ले आया और गहरी साँस चेहरे पर छोड़ते हुए बोला- लो, सूँघ लो. मैंने पिछले दस बरस से शराब नहीं पी.’ 

मुझे पसीने की और उसके मुँह की मिली-जुली तीखी, खट्टी गंध का अहसास हुआ.

सॉरी! मुझे इस तरह नहीं पूछना चाहिए था. लेकिन आपको इतना सेण्टीमेंटल देखकर लगा कि....’

कोई बात नहीं. मुझे भी अपना मुँह आपके मुँह पर इस तरह नहीं लाना था लेकिन आपकी बात पर मुझे कुछ गुस्सा आ गया. हालाँकि मैं समझ सकता हूँ कि आप भले आदमी हैं और मन्ना डे को प्यार करते हैं. वरना मेरे रोने से, मेरे दुख से आप क्यों अपना रिश्ता जोड़ते!

आप इस तरह से किसलिये दुखी हो रहे हैं? मन्ना डे की आवाज, उनके गाये गीत धरोहर के रूप में हमारे पास, हमारी यादों में हमेशा रहेंगे. अब तो सी.डी., डी.वी.डी. वगैरह जैसी चीजें भी हैं और कितनी म्यूजिक कंपनियाँ हैं जो मन्ना डे को ही नहीं बल्कि तमाम महान गायकों को हमारे लिए, आनेवाले लोगों के लिए बचाकर रखेंगी.’

खाक बचाकर रखेंगी. जरा खोजकर देखें. पुराने गीत ढूँढ़ने में पसीने आ जाते हैं. और मेरी चिंता तो यह भी है कि डेढ़ सौ साल बाद, दो सौ साल बाद मन्ना डे की आवाज कैसे सुन पाएँगे.’

मुझे हँसी आ गई

अरे भाई, तीस-चालीस साल बाद तो हम दोनों ही नहीं रहेंगे, डेढ़ सौ-दो सौ साल बाद की परवाह आप क्यों कर रहे हैं!

आप नहीं समझ सकते. मुझे लग रहा था कि शायद आप कुछ समझेंगे. कोई नहीं समझ सकता. ओह! मैं मन्ना डे को सुनने आया ही क्यों? इस तरह उन्हें साक्षात् सुनना, जिसे यहाँ सुनकर लगा कि कोई कंपनी आज तक उनकी आवाज ठीक से दर्ज ही नहीं कर पाई, उस आवाज को सुनना! मैंने यह खुला खजाना देखा ही क्यों? काश! कोई मुझसे कह दे कि मन्ना डे हमारे बीच इसी तरह बने रहेंगे, इसी आवाज के साथ.’ वह फिर बहक गया.

शायद उसे नर्वस ब्रेकडाउन जैसा कुछ हो गया था. मैं चुप रहा

कुछ देर बाद उसने धीरे से अपनी आँखों को मला. वेटर ने चाय सर्व कर दी. संक्षिप्त शांति में हम चाय पीते रहे. चाय जैसे ही खतम हुई, वेटर बिल रख गया. उसने तुरंत बिल अपने कब्जे में लिया.
बिल इधर दीजिए. पैसे मैं दूँगा, चाय पीने का प्रस्ताव मेरा था.’ मैंने कहा.

नहीं, पैसे मैं ही दूँगा. वरना बाद में मुझे ऐसा लगेगा कि मैं कुछ नर्वस था, दुख में था, इसलिए सहानुभूति में आपने मुझे चाय पिला दी. यह ख्याल मुझे फिर परेशान करेगा.’

अजीब तर्क था. उसने पंद्रह रुपए दिए. बारह चाय के और तीन टिप मानकर.

हम बाहर निकल आए. उसने बताया कि पेड़ के नीचे, उधर अँधेरे कोने में उसका स्कूटर खड़ा है. ‘अब आपको ठीक लग रहा है न! मैंने पूछा.

हाँ. मैं शायद ज्यादा ही भावुक हूँ. मगर सच मानिए, जरूरत पड़ने पर मन्ना डे को मैं अपना खून, अपनी किडनी, अपना लिवर तक दे सकता हूँ. लेकिन मन्ना डे को यह बात मालुम होनी चाहिए ताकि वक्त-जरूरत आने पर वे किसी तरह का संकोच न करें. पता भर लग जाए. मुझे लगता है कि मैं मर जाऊँ, बल्कि हममें से बहुत से लोग मर जाएँ और मन्ना डे बच जाएँ तो सब ठीक हो जाएगा.’ वह बाढ़ के पानी में लकड़ी के पटिये की तरह बहने लगा

हाँ, मन्ना डे के लिए तो कोई भी, कुछ भी कर सकता है.’ मैंने उसे शांत करने की नीयत से कहा.
आप भी कैसी बात करते हैं! इतने गायक, इतने कलाकार भूख से, गरीबी से, बीमारी से, उपेक्षा से मर गए, किसी ने कुछ किया? मैंने तक नहीं किया. वक्त आने पर आदमी अपने माँ-बाप तक के लिये कुछ नहीं करता. कलाकार, वैज्ञानिक बंद कमरों में सड़ जाते हैं, पागल हो जाते हैं, आत्महत्या कर लेते हैं या जानलेवा बीमारियों से मर जाते हैं. क्या आप नहीं जानते? मन्ना डे के लिए ही अभी कौन क्या कर रहा है? लेकिन अब उनके लिए मैं कुछ भी, सच में कुछ भी करना चाहता हूँ.’ 

वह फिर किसी गहरी घाटी में उतर गया.

जानबूझकर मैं चुप रहा. कि बात बढ़ाने से इस आदमी का मानसिक उत्ताप बढ़ता ही जाएगा. स्कूटर के पास जाकर वह अचानक पलटा और करीब आकर, कंधे पर हाथ रखकर बोला- आपको क्या लगता है, आयोजकों ने मन्ना जी को दो-तीन लाख रुपए भी दिए होंगे?’

नहीं, मुझे इसका अंदाजा नहीं.’ मैंने कुछ घबराहट में और कुछ उसे दूर हटाने के भाव से जवाब दिया.

मैं जानता हूँ, नहीं दिए होंगे. जबकि हर फालतू जगह पैसा पानी की तरह बहाया जाता है. खैर, मन्ना डे को इससे क्या फर्क पड़ता है! मेरी तो बस एक ही तमन्ना है कि मन्ना डे को कभी कुछ न हो!
जरूर. ऐसा ही होगा. आपकी दुआ काम आएगी.’

लेकिन मैं जानता हूँ. आप भी जानते हैं कि एक दिन मन्ना डे..... ओफ्फो! यह ख्याल मेरी जान लेकर ही मानेगा.’ निराशा में उसने अपनी उँगलियों को चटकाया

अरे भाई, आपका नाम क्या है? आप क्या करते हैं? कहाँ रहते हैं??’ मैंने एक साथ सवाल पूछे ताकि परिचय भी हो जाए और उसका ध्यान भी इस बात से हट जाये, जिस पर वह बार-बार अटक जाता है

आपकी गाड़ी कहाँ है?’ बदले में उसने पूछा. मैंने बताया कि यहीं पास में रहता हूँ, पैदल आया हूँ, पैदल जाऊँगा.

नहीं, मैं आपको छोड़ूँगा.’ इस पर मैंने आग्रहपूर्वक समझाया कि दरअसल मेरा कमरा एकदम करीब है, यह सामने कॉलोनी में. पैदल लायक ही दूरी है

तब उसने स्कूटर स्टार्ट किया और बोला- आप मुझे इसी रूप में जानें कि मैंने एक दिन मन्ना डे को सुना. मेरी यही पहचान काफी है. और देखो, अब मैं मुस्करा सकता हूँ.’  

उसके लहराते स्कूटर को दो पल मैं देखता रहा. मैंने सोचा, अजीब पागल आदमी से पाला पड़ा था. उससे छूटकर मुझे एक तरह की राहत भरी खुशी का अनुभव हुआ


कमरे का ताला खोलकर भीतर घुसते हुए मैं मन्ना डे के गानों की पंक्तियाँ गुनगुनाने लगा. मन्ना डे की आवाज और गीतों का जादू तो मुझ पर भी था. इस घटनाक्रम के बाद अब मैं इस बेहतरीन, मन्ना डे की आवाज से भरी शाम की स्मृति में अपनी तरह से वापस जाना चाहता था. बेसिन पर हाथ धोकर मैंने टिफिन उठाया. टिफिन खोलने के पहले अलमारी में से खोजकर मन्ना डे के गानों की कैसिट निकाली, उसे टू इन वन पर लगाया. फिर टिफिन खोलकर खाना खाने बैठ गया. ‘हँसने की चाह ने, कितना मुझे रुलाया है......’ 

मन्ना डे की आवाज गूँजती रही

अचानक ही मुझे रुलाई आ गई. मैंने खुद को बहुत रोका. मगर बेकार. मुझसे फिर खाना भी नहीं खाया गया

मैं वहीं बिस्तर पर लेट गया. बत्ती बुझा दी

मुझे रह-रहकर वह आदमी याद आने लगा और उसका वह ख्याल कि एक दिन मन्ना डे...... मैंने उस रात में पहली बार, उस ख्याल की मारक बेचैनी को महसूस किया

रो लेना भी एक दवा है. स्वस्थ आदमी ही इस तरह रो सकता है. कमरे के अँधेरे में इस तरह सोचते हुए, मैंने खुद को सांत्वना देने की असफल सी कोशिश की.