Thursday, August 17, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - अठ्ठाइस

(फोटो: https://travelshoebum.com से साभार)

नब्बू डीयर ने अपने सखाओं के साथ हल्द्वानी चलने का फैसला करने के लिए एक दिन की मोहलत माँगी जिसे थोड़े ना-नुकुर के बाद स्वीकार कर लिया गया. दरअसल पिछले तीन दिनों से जिस तरह का जीवन गिरधारी और परमौत जी रहे थे, खुद उनकी अपनी देहें भी उनसे एक दिन की मोहलत मांग रही थीं.

पिछली रात के डिनर और उस के बाद की घटनाओं की अप्रत्याशितता ने उन की नींद की ऐसी-तैसी कर दी थी. खड़ा-खड़ा बीबन पहले तो खाना खा रहे मेहमानों की थालियों पर टॉर्च चमकाता रहा. बचेसिंह द्वारा एक बार झिड़के जाने पर उसने टॉर्च बुझा दी और बाहर चला गया. परमौत उससे रुकने का आग्रह करना चाहता था लेकिन बचेसिंह ने इशारे से कहा कि उसे चढ़ गयी है और उसका घटनास्थल से बाहर चला जाना ही श्रेयस्कर है.  खाना खाते हुए बचेसिंह ने हल्द्वानी से आए मेहमानों को झिंगेड़ी में  प्रचलित एकाधिक दन्तकथाएं सुनाईं जिनका विषयसूत्र एक ही था - बीबन को दारू नहीं पचती. इस सीरीज की चौथी और महा-अझेल कथा का वाचन हो रहा था जब बाहर से बीबन की क्रमशः ऊंची होती आवाज़ आनी शुरू हुई - "साइमन कमीसन गो बैक! इन्द्रा गांदी जिंदाबाद! जन्ता पाल्टी जिन्दाबाद! मात्मा गांदी कम बैक! ..."

खाना छोड़ तीनों खिड़की से बाहर देखने लगे. पटांगण के पटालों पर चांदनी दमक रही थी और जॉन साइमन से लेकर इन्द्रा गांधी तक की जागर लगाए बीबन एसडीएम मुल्क के पचास साल के इतिहास को लेफ़्ट राईट परेड करवा रहा था. झिंगेड़ी की फिज़ा में क्रान्ति तैराकी कर रही थी. गिरधारी और परमौत को यह दृश्य बहुत लुभावना लगा. बचेसिंह वापस खाने की थाली पर लौट गया था. अचानक वह "बोतल भी उठा ले गया रे साले बीबनौ ..." कहता हुआ दरवाज़े से बाहर लपका. जब तक परमौत और गिरधारी चौंक कर पलटते, बचेसिंह पटांगण तक पहुँच गया था और बीबन की खोपड़ी पर एक रैपट खींच चुका था.

"थम!" कहकर बीबन ने अपनी परेड को विराम दिया. बचेसिंह द्वारा किये गए कृत्य से वह ज़रा भी विचलित नहीं हुआ लगता था. इसके पहले कि बचेसिंह अगला रैपट लगाता, वह उछलकर पटांगण की दीवार पर चढ़ गया और मुठ्ठी का माइक बनाकर भाषण देने लगा - "फ्रेन्ड्स, रोमन्स एंड कंट्रीम्यन, दिस इज दी डे ऑफ दी रिपब्लिक ऑफ ए इन्ड्या एंड लेप्टन जन्नल भी.पी. सिंग फ्रॉम दी आलइन्ड्या रेडियो इज वेल्कमिंग यू इन झिंगेड़ी बेकौज साइमन इज गोइंग टू बागेस्वर एज अ सरभेंट ऑफ दी इन्द्रा गांदी ... लेफ्फाईट लेफ्फाईट ल्याफ्ट ..." संक्षिप्त प्रस्तावना के बाद अब वह दीवार पर ही परेड करने लगा.

बचेसिंह का उठा हुआ हाथ अब नीचे आ गया था और वह भी परमौत और गिरधारी की तरह बीबन की पर्फौरमेन्स के मज़े लेने के मूड में था. एकाध मिनट तक बीबन ने परेड की और बचेसिंह की तरफ से कोई कार्रवाई न होती देख सम्हाल कर नीचे उतर गया. नीचे उतरते ही उसने सावधान की मुद्रा अख्तियार कर ली और ज़मीन से निगाह चिपका कर बोला - "नाउ देयर इज ए टाइम ऑफ़ दी सैलेंस एज ऑफ टू मिनट फॉर दी ड्यथ ऑफ मात्मा गांदी हू इज फ़ादर ऑफ नेशन."

बीबन ने दो मिनट का तो नहीं आधे मिनट का मौन रखकर बाकायदा राष्ट्रपिता के लिए शोक प्रदर्शित किया और बचेसिंह के एक ही बार "उप्पर चल के एक रोटी खा लेता यार बीबनौ ..." कहते ही भीगी बकरी की तरह वापस कमरे में आ गया.

परमौत और गिरधारी ने जीवन में ऐसे एक से एक सांस्कृतिक कार्यक्रम देख रखे थे और वे इन्हीं दुर्लभ क्षणों को हर महफ़िल का कुल हासिल मानते थे. इन कार्यक्रमों की ख़ूबी यह होती थी कि एक बार शुरू हो जाने के बाद वे कब और किस मरहले पर तमाम होंगे - इसका जवाब दुनिया का सबसे बड़ा नजूमी भी नहीं दे सकता था. ये कार्यक्रम भविष्य की महफ़िलों के मनोरंजन के लिए खाद का काम भी करते थे जिनमें इन कार्यक्रमों की एक-एक तफसील का कई-कई बात दोहराव किया जाना होता था. बीबन के एकल कार्यक्रम के अगले चरण के दीदार की हसरत से सराबोर उनकी निगाहें चौकन्नी हो गईं. बैठने से पहले, बाहर से लाई गयी खाली बोतल को किसी शील्ड की तरह प्रदर्शित करते बचेसिंह ने सूजा हुआ मुंह बनाकर दोनों को इत्तला देते हुए शर्मिंदगी भरा अफ़सोस ज़ाहिर किया कि बीबन ने बोतल में बचा हुआ पव्वे से अधिक माल अकेले निबटा दिया.

"कुत्तूं को घी जो क्या पचने वाला हुआ परमौद्दा ..." जैसा कोई वक्तव्य देकर बचेसिंह अपराधी को कुछ और लताड़ लगाने की नीयत रखता था लेकिन बीबन भीतर आते ही अपने बिस्तर पर कटे पेड़ जैसा गिरा और सो गया. परमौत और गिरधारी को दो बातों का अफ़सोस हुआ - बोतल निबट गयी थी और बीबन सो गया था.

बरतन वगैरह उठाकर बाहर रखने और मेजबानी के अन्य कार्यों को त्वरित गति से समाप्त कर बचेसिंह ने पुनः क्षमायाचना की - "सारी दावत बिगाड़ के रख दी साले ने परमौद्दा ... माफ करना हो सैप ... पी-ही के ऐसेई करने वाला हुआ बीबन हर बार ..." कुत्तों को घी न पचने वाले मुहावरे को दोहराया गया. जाने से पहले बचेसिंह ने मेहमानों को उनके बिस्तर तक छोड़ा और अगली सुबह चाय-नाश्ते पर अपने घर मिलने की बात कही.

परमौत और गिरधारी ने थोड़ी देर बीबन की साइमन-परेड की बाबत हल्का-फुल्का वार्तालाप किया और थकान और नशे के मिश्रण से किसी पल दोनों की आँख लग गयी.

"व्हेन! व्हेन! ..." गिरधारी के सपने में कोई अंग्रेज़ी में पूछ रहा था.

"व्हाट! व्हाट! ..." गिरधारी की अचानक आँख खुली तो उसने पाया कि आवाज़ बगल के कमरे से आ रही थी. उसे यह समझने  में थोड़ा वक़्त लगा कि परमौत उसकी बगल में सोया हुआ है और वे बीबन के घर पर हैं. "व्हेन! व्हेन! ..." के दोबारा होने पर गिरधारी को लगा वह नींद में बड़बड़ा रहा होगा. उसने करवट बदल कर सोने की कोशिश की. खिड़की के खुले हुए पल्ले से भीतर आ रही चाँदनी के उजाले में उसने देखा कि परमौत का मुंह खुला हुआ था और वह हल्के खर्राटे ले रहा था.

करवट बदलते ही बीबन के कमरे से माता-पिता का स्मरण करती "ओइजा ... ओबा ..." की कराह जैसी निकली. आँखें बंद करने की कोशिश करते गिरधारी को अहसास हुआ कि उनका मेज़बान उठ गया है और दरवाज़े की तलाश में है. कुछ देर सांकल की खड़खड़ हुई और अंततः चरमराहट की विलंबित ध्वनि के साथ दरवाज़ा खुला. पटांगण से बीबन के डगमग क़दमों की धीमी चाप आने लगी तो गिरधारी के सोचा कि उसे किसी तरह की हाजत का निपटान करना होगा. उनींदे गिरधारी ने टटोलकर सिरहाने रखी घड़ी में समय देखा. रेडियम लगी सुइयां बता रही थीं कि साढ़े बारह बज गया था. 

गिरधारी ने जम्हाई ली और असमय टूट गयी नींद को वापस लाने के प्रयास में सन्नद्ध हो गया.

"व्हेन! व्हेन! ..." गिरधारी के सपने में किसी ने फिर से पूछना शुरू किया.

"पैन्चो ..." धीमी आवाज़ में के उच्चार के साथ इस बार न सिर्फ गिरधारी सपने से जागा बल्कि खीझ कर उठ खड़ा हुआ. वह बीबन के कमरे की तरफ जा रहा था कि उसकी निगाह खुले दरवाज़े पर गिरी. बाहर से वापस आकर बीबन शायद दरवाज़ा बंद करना भूल गया था. गिरधारी दो सीढ़ियां उतरकर दरवाज़ा बंद करने ही वाला था कि उसने देखा कि पटांगण में टॉर्च जलाकर बैठा बीबन एसडीएम एक बड़े से कागज़ पर निगाहें गड़ाए झुका बैठा था. अनुभवी गिरधारी ने अपने मन में बीबन के प्रति उभर रही नापसंदगी को पार्श्व में धकेलकर सहानुभूति के लिए राह बनाई और दबे कदमों बीबन के पास जाकर खड़ा हो गया.

पटाल पर धरा कागज़ किसी किस्म का नक्शा लग रहा था. बीबन की बगल में उकडूं बैठते हुए गिरधारी ने धीमे से पूछा - "क्या चल रा है विपिन बाबू?"

गिरधारी के आगमन से बीबन की एकाग्रता ज़रा भी भंग नहीं हुई और उसने नक़्शे पर एक जगह अपनी उंगली स्थिर करते हुए बस "हूँ ..." की आवाज़ निकाली.

"कोई खजाना ढूंढ रहे हो बीबनदा सायद. ... हैं? मल्लब ..."

परिचित नाम से आदरसहित पुकारे जाने का असर यह हुआ कि बीबन ने आँख उठाकर गिरधारी को देखा और कहना शुरू किया - "झिंगेड़ी का नक्सा है ... झिंगेड़ी का." अपनी स्थिर उंगली को एक बार उठाकर वापस नक़्शे पर रखते हुए वह बोला - "ये हुआ हमारा मकान ... और ये ठैरे हमारे खेत वगैरौ ..." श्रमपूर्वक बनाए गए नक़्शे में चिन्हित किये गए हिस्सों पर क्रमशः उंगली धरते हुए बीबन ने अपने पैतृक खेत गिनाना शुरू किया - "नहीं बी होगी तीन शौ नाली जमीन होगी बाबू के नाम पर कम शे कम ... थिरी हंड्रेड ... और मल्लब ... ये हुआ खड़कदा का खेत ... यहाँ से आघे फिर हमारा खेत हुआ वो उद्धर गोलज्यू के थान तक ... फीर आघे घनुवा पन्थ के खेत हुए ... उशके आघे फीर हमारेई हुए ..."

गिरधारी अचानक बिलकुल चौकस हो गया. बीबन की एकचित्तता देखकर गिरधारी समझ गया कि सांस्कृतिक कार्यक्रम अभी समाप्त नहीं हुआ है और थोड़े से धैर्य और मशक्कत से अर्थात बीबन की सायास जुगलबंदी करने के उपरान्त मौज के नए आसमान खोले जा सकते हैं.

"मल्लब आप तो यहाँ के जमींदार टाइप हुए यार बीबनदा ... क्या बात है ... गज्जब ..." - गिरधारी द्वारा दिए गए प्रोत्साहन ने बीबन को थोड़ा सा कांफिडेंस दे दिया और वह "एक मिनट रुको जरा!" कहकर डगमगाता हुआ निचली मंजिल के गोठ की तरफ चला गया. वापस आया तो उसके हाथ में एक सफ़ेद ढेला था. उसने ढेले को नक़्शे पर रखा और गिरधारी को रहस्योद्घाटन करने के स्वर में बताने लगा - "ये वाली खड़िया निकली ठैरी इस वाले खेत से ..." उसने एक खेत पर उंगली रखी - "... और इसके बगल वाला ... ये खेत हुआ बचदा का ... उसके बाद आघे के बीश-तीश हमारे हुए ... और ... अग्गर ... शब में खड़िया निकल गयी तो महीने के पांच-सात हजार निकल जाने का काम हुआ ... मल्लब फाईब-सेभन थाउजेंड एभरी मंथ ... अब दिक्कत ये आ रही हुई जो है कि पटवारी साला है अंग्रेजों का आदमी ... हम ठैरे गद्दर पाल्टी वाले ... कल कोई साला जॉन-फॉन टाइप का अंग्रेज कलक्टर आ के कैता है कि मिश्टर भीपीसिंग यू आर अंडर अरैस्ट तो मुझको तो हो जाने वाली हुई कालापानी ... मल्लब आइसलैंड ऑफ दी अंडमान एंड निकोबार ..."

सीधे-सादे पहाड़ी खेतों में अंग्रेज़ कलेक्टर की एंट्री से गिरधारी इतना उत्साहित हुआ कि इस बार उसने कहा - "एक मिनट!" और भीतर चला गया जहां हल्द्वानी से सीखी डिज़ास्टर-मैनेजमेंट की कला के पहले पाठ के तौर पर बागेश्वर से खरीदा गया इमरजेंसी कोटा झोले से बाहर निकाले जाने की पुकार लगाने लगा था. नया कुबद्दर करने की प्रेरणा से उपजे उत्साह से पूरित हो वह अपने झोले को खोलकर उसमें सबसे नीचे अड़ाकर रखे अद्धे को निकालने की कोशिश कर रहा था कि खटर-पटर से परमौत की आँख खुल गयी. परमौत ने अचम्भे से उसे देखा तो गिरधारी ने संक्षेप में बाहर चल रहे कार्यक्रम से अवगत कराया और साथ चलने की दावत दी.

पटांगण में अद्धा खोला जा चुका था, कांसे के गिलासों में उसके भीतर का पदार्थ ढाला जा चुका था और इस आशातीत घटनाक्रम ने बीबन के इतिहासकार को जगा दिया था - "... एक बार मिस्टर एठकिशन कमिस्नर नैनताल से बागेस्वर आया हुआ दौरे पर तो मेरे बड़बाज्यू के बड़बाज्यू ने उशको और उशके पाटनर को कोटपीश में हरा दिया हुआ ... मल्लब फुल डिफीट ऑफ दी इंग्लिस ... त्तो ... उशने क्या किया कि मेरे बड़बाज्यू के बड़बाज्यू को बना दिया रायबहादुर और झिंगेड़ी की रियासत तोफे में दे दी हुई. तब से हुए हम यहाँ के जिमीदार फैमली ... वो तो इन्द्रा गांदी ने इमर्जेंटी लगा दी नईं  तो हमारे यहाँ तो हाथी भी रहने वाले हुए ..."

बीबन के दिमाग पर उसकी क्रमिक असफलताओं ने गहरा असर किया था. अमूमन मितभाषी लेकिन पर्याप्त चढ़ जाने पर वाचाल हो जाने वाला, किसी समय गाँव का पहला ग्रेजुएट बन चुका बेरोज़गार बीबन अंग्रेजों और इंदिरा गांधी को अपनी सारी आपदाओं का ज़िम्मेदार मानता था. स्पष्ट शब्दों में कहा जाय तो ऐतिहासिक कारणों से उसकी चवन्नी गिर चुकी थी जिसके मिल पाने की संभावनाएं नगण्य थीं. सो वह पूरी शिद्दत से अपने मस्तिष्क के भीतर चल रही गड्डमड्ड को अनवरत शब्द देता जा रहा था और इस बण्डलहांक को सुनने का लुत्फ़ उठाते गिरधारी और परमौत एक दूसरे को इशारे करते हुए मौज ले रहे थे और बीच-बीच में "गजब दाज्यू गज्जब ..." कहते हुए बीबन का उत्साह बढ़ाते चलते.

बीबन के पास देश, गाँव और ब्रह्माण्ड के समाजशास्त्र, इतिहास और भूगोल को लेकर अनेक नवल विचार थे जिन्हें सुनने को पहली बार उसे ऐसे तत्पर श्रोता मिले थे. इमरजेंसी कोटे का आधा हिस्सा बीबन को समर्पित हुआ. एटकिंसन से लेकर हैनरी रैमजे और लाजपतराय से लेकर संजय गांधी तक तमाम चरित्र बीबन के बेमतलब एकालाप का हिस्सा बनते रहे और उसकी जुबान क्रमशः लड़खड़ावस्था के क्रमिक स्तरों का आरोहण करती गयी. आधे घंटे बाद कुछ भी नया न घटते देख और रात के वास्ते पर्याप्त मनोरंजन प्राप्त कर चुके परमौत और गिरधारी चट से गए तो उन्होंने कार्यक्रम को मुल्तवी करने की बात छेड़ी और जम्हाई लेते हुए उठने का उपक्रम चालू किया.

बीबन अब सिर्फ अंगरेजी बोल रहा था - "दी लेप्टन जन्नल ऑफ दी गोरमेन्ट ऑफ इण्डिया इज ए नॉन-क्वाप्रेटिव सोल्जर इन दी भिलेज ऑफ झिंगेड़ी बाय दी औडर इन दी रिपब्लिक डे परेड एज ए बागेस्वर ..."

परमौत और गिरधारी उठकर जाने को हुए तो एकालाप पर विराम लगाते हुए बीबन ने उन पर एक तटस्थ निगाह फेरी और खुद भी खड़ा हो गया. उसके चेहरे पर किसी संत का निष्कपट भाव था. "एक मिनट! वन मिनट ओनली शर!" कह कर वह फिर से गोठ में घुस गया. इस बार उसके हाथ में कपड़े का एक थैला था - "आप लोग इन्नी दूर शे झिंगेड़ी आए रहे ... कुछ तो तोफा आपको देना पड़ने वाला हुआ मल्लब ... आइये शर पिलीच!" वह घर की चारदीवार से बाहर निकल गया और अपनी टॉर्च उनकी दिशा में चमकाने लगा. मरता क्या न करता की तर्ज़ पर परमौत और गिरधारी को झख मारकर उसके पीछे जाना पड़ा. कुछ देर बाद वे झिंगेड़ी के एक बंजर खेत में खड़े थे. बीबन के थैले में आटा भरा हुआ था जिससे चूने का काम लेते हुए तेज़-तेज़ उल्टा चलते हुए रायबहादुर बीबन ने खेत में बाकायदा ज़मीन के एक टुकड़े को चार तरफ से मार्क किया और रात के अंतिम प्रहर के चन्द्रमा को साक्षी बनाने की घोषणा के साथ हल्द्वानी से आये दो निर्धन लेकिन भले सन्यासियों को उसका ऑनरेरी स्वामित्व प्रदान किया.

***

सुबह के दस बजे हुए थे. बीबन को सोया छोड़कर, बचेसिंह के यहाँ चाय पी चुकने के बाद फिलहाल आधे घंटे से गिरधारी और परमौत नब्बू डीयर के साथ उसके घर के बाहर बैठे हुए थे. दोपहर बाद की पाली से छुट्टी लेकर गाँव आ जाने और उन्हें आसपास के इलाके का भ्रमण करवाने का वादा कर बचेसिंह बागेश्वर चला गया था. नब्बू थोड़ा कम बीमार लगा रहा था और उस का चेहरा पिछली शाम से थोड़ा सा भर गया सा दिख रहा था. इतनी लम्बी अनुपस्थिति के बाद अंतरंगतम मित्रमंडली की संगत उसके लिए अमृत का काम कर रही थी. 

इतने शॉर्ट नोटिस पर हल्द्वानी चल सकने में असमर्थता व्यक्त करते हुए जब वह अपने घर की विवशताओं को तीसरी बार गिना रहा था तो थालियों में रोटी सब्जी का नाश्ता लेकर बाहर आ रही उसकी माँ ने भरी आँखों से गिरधारी से कहा - "हल्द्वानी जाके जरा ठीक से इलाज हो जाएगा नबुवा का, बिस्जी! यहाँ क्या होता है! वैसाई हुआ हर दिन. जो कट गया वो कट गया समझो इष्टों की किरपा से. हमारा तो वैसे भी बुढ़ापा हुआ. के न के कर ही लेंगे. तुम ले जाओ हो इसको हल्द्वानी - सौ-पचास रुपे का जो भी खर्चा लगेगा वो मैं दे देने वाली हुई ..." वह थालियाँ लिए-लिए आँगन में ही बैठ गयी और सुबकने रोने लगी - "गरीब हुए हम लोग ... क्या कर सकने वाले हुए ... अब तुम लोग आए हुए रहे अपने दगड़ी-दोस्त के देखने को ... नहीं तो कौन आ रहा हुआ यहाँ बज्जर-पड़े झिंगेड़ी में ... ले जाओ मेरे नबुवा को अपने संग नहीं तो यहीं मर-हर जाएगा बिगैर दवाई-इलाज के ..." संकोच और ग्लानि से भर रहा नब्बू डीयर अपनी माँ को हल्का झिड़क कर भीतर जाने को कहता इसके पहले ही वह उठी, उन्हें थालियाँ थमाईं और अपने पिछले डायलॉग को दोहराते हुई घर के भीतर चली गयी - " गरीब हुए हम लोग बेटा! ... क्या कर सकने वाले हुए ..."

इस करुणा-उपजाऊ वार्तालाप ने परमौत और गिरधारी लम्बू को उतना गहरे और उस तरह प्रभावित नहीं किया जितना दूसरा कोई हो गया होता. वे जानते थे कि नब्बू डीयर का परिवार गरीब है और झिंगेड़ी-बागेश्वर में उसका सलीके का इलाज संभव नहीं. नब्बू उनका घना दोस्त था और मित्रधर्म का कर्तव्य निभाने का कोई पाठ सिखाये जाने की उन्हें कोई दरकार नहीं थी. नब्बू डीयर को हल्द्वानी ले जाया जाना था - बस! इस बात को नब्बू भी जानता था और उसे अपने दोस्तों पर गर्व था. उन्होंने चुपचाप रोटी खाना शुरू किया. सामने से अपना भावहीन चेहरा लिए नंगे पाँव, सीधा कब्र से उठकर आ रहा लगता, अपने विचारों में अलोप बीबन आता दिखाई दिया - उसके बाल उड़े हुए थे और उसकी अस्तव्यस्त वेशभूषा समेत उसके मुंह और हाथों पर पर जहां-तहां पिछली रात का आटा शोभायमान था.

(जारी)     

Thursday, August 10, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - सत्ताईस

(फ़ोटो - http://kalmatia-sangam.blogspot.in/ से साभार )

आसन्न रात को आता देख परमौत और गिरधारी इंतज़ार में थे कि नब्बू डीयर कब उनसे घर के भीतर चलने को कहेगा. सुबह से जूतों में बंद उनके पैर हल्का दर्द करने लग गए थे. चाय पी जा चुकी थी और उनसे थोड़ी दूरी बनाकर बैठा बचेसिंह अब भी पथरौटों के बारीक निरीक्षण में व्यस्त था.

वार्तालाप में संजीदगी वापस आने पर परमौत और गिरधारी द्वारा अपनी और अपने पिता की तबीयत के बारे में पूछे गए सवालों का नब्बू डीयर ने बेपरवाही से उत्तर दिया और दोस्तों के मन के असमंजस को भांपते हुए किंचित सकुचाते हुए कहा – “देखो यार गिरधर गुरु, बाबू हो रहे हुए भयंकरी बीमार मल्लब ... टट्टी-पिसाब सब मल्लब अन्दर ही करने वाले हुए ... अब वहां की चुरैन-हगैन में तुम्हारे बस की ठैरी नहीं ... तो ऐसा है कि रात को तेरे और परमौती वस्ताज के रहने का बचदा के यहाँ कर दिया है ... मल्लब बचदा के भतीजे का मकान खाली जैसा ही हुआ ... बस यहीं परी हुआ चार कदम आगे ... ठीक हुआ?”

नब्बू डीयर की समस्या वाजिब और जायज थी जिसे दोनों दोस्तों ने तुरंत समझ लिया. परमौत ने अपनी बांह को नब्बू की गर्दन के गिर्द लपेटते हुए उसे आँख मारी – “वैसे तो बागेश्वर से बोतल लाये हुए ठैरे तुम्हारे लिए नब्बू गुरु ... लेकिन अब जो है बचदा के संग मौज की जाएगी ... रात भर की बात हुई बस ... और तुम हर हाल में कल सुबे हल्द्वानी चलने की तैयारी कर लेना बस ...

नब्बू की आवाज़ का संकोच कृतज्ञतापूर्ण मोहब्बत में तब्दील हो गया. वह धीमी आवाज़ में बोला - "कल की बात कल देखी जाएगी यार परमौत बाबू ... अभी एक काम करो. तुम लोग बचदा के यहाँ को जाओ. और खाना ईजा अन्दर बना रही है तुम लोगों के लिए. बचदा बाद में ले जाएगा यहाँ आ के ..."

परमौत ने नब्बू डीयर के बाबू को एक बार देखने और उसकी माँ से विदा लेने की बात की तो नब्बू मुस्कराता हुआ बोला - "वो सब कल करना यार ... अभी तुम जाओ. बचदा के यहाँ बच्चे-कच्चे हुए बिचारे ... रस्ता देख रहे होंगे बाबू का ... हंहो बचदा! ... ले जातो हो भलै इन फंटूसों को अब ..."

नब्बू की बात का मान रखा गया और गुडनाईट कहकर वे बचदा के पीछे-पीछे लग लिए. बचेसिंह का घर वाकई बहुत नज़दीक था और नब्बू डीयर के घर से थोड़ा ही अधिक संपन्न और करीनेदार दीखता था. पटांगण पार कर उन्हें ऊपर की मंजिल पर मौजूद बाहरी कमरे में ले जाया गया जहाँ लालटेन की रोशनी में बचेसिंह की दो बच्चियां कापी-किताबों पर झुकी हुई थीं. अन्दर रसोई के कमरे से आ रही दो अपेक्षाकृत बड़ी बच्चियों की आवाजें अचानक भीतर घुसे बचेसिंह के "ज़रा चहा रखो तो गुड़िया, डौली रे ..." की पुकार लगते ही शांत हो गईं.

पढ़ाई कर रही बच्चियों ने परमौत और गिरधारी लम्बू को देखा तो वे शर्मा कर भीतर रसोई में चली गईं. उनकी कापी-किताबों को एक तरफ सरका कर मेहमानों के बैठने के लिए जगह बनाई गयी. कम ऊंचाई वाले रसोई के दरवाज़े से अपना सर झुका कर बचाता हुआ बचेसिंह भी भीतर चला गया. वह कुछ पलों के बाद कमरे में आया तो उसकी टांगों से सटकर खड़ीं चारों सकुचाई बच्चियां ज़मीन से निगाह चिपकाए परिचय कराने जाने के इंतज़ार में उपस्थित थीं. दस से चौदह साल की चारों बच्चियों के चेहरों पर तकरीबन एक जैसी उत्सुकता और अनिश्चितता के भाव थे. परिचय कराये जाने के तुरनत बाद वे रसोई की जानी-पहचानी शरण में वापस चली गईं. बचेसिंह ने चारों की स्कूली शिक्षा वगैरह के बारे में इधर-उधर के बातें कीं. जब सबसे छोटी बच्ची चाय लेकर आई तो बचेसिंह ने उसे निर्देश दिया - "ज़रा देख के आ तो सरू, एसडीएम चचा आ गए कि नहीं ... सामान रख आते हैं सैप लोगों का."

सरू के बाहर भागते ही बचेसिंह ने बताया कि वह उस गृहस्वामी का पता लगाने गयी है जिसके यहाँ उन्हें रात बितानी है. एसडीएम का नाम सुनकर परमौत और गिरधारी लम्बू के मन में बचेसिंह के लिए अचानक थोड़ा आदर उत्पन्न होने लगा. ऐसे निहायत पराजित और नैराश्यपूर्ण मनुष्य का कोई संबंधी ऐसे ऊंचे ओहदे वाला बड़ा सरकारी अफसर हो सकता है - दोनों की कल्पनाओं से परे जैसी कोई बात थी. दोनों चुपचाप चाय पीते रहे.

"आ गए बाबू ... यहीं को आ रहे है बीबन कका ..." बाहर से ही इन सूचनाओं को जारी करती हांफती हुई सरू भागती ही वापस आई और रसोई के पूरा भीतर जाने की जगह दरवाज़े की ओट से शहरी मेहमानों को ताकने लगी. परमौत उसकी तरफ देख कर मुस्कराया तो वह झेंपती हुई चट से भीतर अदृश्य हो गयी.

बचेसिंह उठकर सीढ़ी पर खड़ा हो गया ताकि बीबन अर्थात विपिन नामक अपने अफसर संबंधी का स्वागत कर सके. पालथी मार कर बैठे हुए परमौत और गिरधारी ने अपनी मुद्रा को भरसक प्रेजेंटेबल बनाने की कोशिश की ताकि आगंतुक अफसर के सम्मुख थोड़े बहुत सभ्य दिखाई दें.

आगंतुक अर्थात बीबन अर्थात एसडीएम तनिक मुटाई हुई काठी वाला पैंतालीसेक साल का एक नाटे कद का आदमी था जिसे कद में हुई एक-दो इंच की महत्वपूर्ण बढ़ोत्तरी के कारण बौना नहीं कहा जा सकता था. परमौत और नब्बू उसके नाटेपन से अधिक प्रभावित नहीं हुए और अपनी जगहों पर खड़े होकर उन्होंने उसके प्रति यथायोग्य सम्मान जताया. आगंतुक बैठा नहीं बल्कि बचेसिंह के निर्देशों का पालन करता हुआ मेहमानों के बैग कंधे पर लादने लगा.

"अरे ये क्या कर रहे हैं भाईसाब ... छोड़िये छोड़िये ...” गिरधारी आगे बढ़ने को हुआ तो बचेसिंह ने उसे रोक लिया - "अरे ले जाने दो सैप ... घर का लौंडा हुआ ... दिनमान भर खाली बैठने वाला हुआ. थोड़ा काम करके कौन सा घिस जाएगा ... अरे आप लोग बैठो तो सही दो मिनट को ..."

दोनों एयरबैग लेकर बीबन एसडीएम के बचेसिंह के साथ बाहर चले जाने पर दोनों मित्रों ने एक दूसरे को माजरा समझ में न आने वाली निगाह से देखा लेकिन कुछ भी बोलना उस समय बुद्धिमानी नहीं मानी जाती. जिस अधिकार से बचेसिंह ज़ाहिर तौर पर अपने नज़दीकी संबंधी लग रहे नाटे से बात कर रहा था उसे देखते हुए कहा जा सकता था कि बीबन अपार विनम्रता से भरपूर बड़ों की इज़्ज़त करने वाला एक संस्कारी मनुष्य होगा.

परमौत और गिरधारी के मन में चल रही ऊहापोह को अगले ही मिनट में शांत करते हुए वापस लौट आये बचेसिंह ने उन्हें बीबन एसडीएम का पूरा परिचय मुहैय्या करा दिया. कोई बारह-पंद्रह साल पहले बागेश्वर के डिग्री कॉलेज से जैसे तैसे पांच साल लगाकर बीए करने के बाद अपने घर का इकलौता चिराग बीबन बड़ी नौकरी की तैयारी करने की नीयत से गाँव वापस आ गया था. उस वक्त तक उसके माँ-बाप दोनों ज़िंदा थे. छः महीने के अंतराल में दोनों के बीमारी से मर जाने तक अर्थात अगले दस-बारह साल तक उसने लगातार बैंक, एलआईसी वगैरह के इम्तहान दिए और निष्ठापूर्वक फेल होता रहा. माँ बाप की बरसी वाले साल उसने इन छोटी-मोटी नौकरियों की चिंता करना छोड़ा और आख़िरी छलांग मारने की नीयत से पीसीएस का फॉर्म मंगवाया. गाँव में हफ्ते में एक दफ़ा डाक लाने वाले हरकारे ने फॉर्म की डिलीवरी कारने के साथ-साथ अफवाह फैला दी कि तल्ला झिंगेड़ी का बीबन एसडीएम बन गया है. बीबन ने फॉर्म तो नहीं भरा अलबत्ता समूचे इलाके में लोगों ने उसे एसडीएम साब कहना शुरू कर दिया.

बीबन की करुणाभरी कथा एक सीमा तक मनोरंजक थी और परमौत और गिरधारी अपने मेज़बान के सान्निध्य में पहुँचने को बेताब हो उठे. उनकी इच्छा ताड़कर बचेसिंह ने चलने का उपक्रम करना शुरू किया और बेटियों को सूचित किया कि वह बाहर खाकर आएगा और वे सो जाएं वगैरह.

परमौत नोटिस कर रहा था कि पिछले आधे घंटे से बचेसिंह की देहभाषा में एक अबूझ किस्म की चापलूसीभरी तत्परता आ गयी थी और वह पहले के मुकाबले सामान्य से अधिक क्रियाशील होता जा रहा था. उसे अपने बैग में धरी बागेश्वर से उठाई गयी बोतल की याद आई तो उसे माजरा कुछ कुछ समझ में आने लगा. बीबन एसडीएम ने दुमंजिले पर अवस्थित अपने एक कमरे को मेहमानों के रहने के लिए गद्दे-रज़ाई वगैरह लगाकर उनका सामान करीने से सिरहानों पर सजा दिया गया था.

बोतल की उपस्थिति में की जाने वाली बैठक के लिए 'बैठना' शब्द का इस्तेमाल सार्वभौमिक स्तर पर होने लगा है सो इस सन्दर्भ में बैठने की व्यवस्था एसडीएम साहब के कमरे में की गयी थी. टुटही मेज़ पर धरे गए पानी के जग और कांच के चार धुंधुआए गिलासों की उपस्थिति ज़ाहिर कर रही थी कि बचेसिंह द्वारा बीबन को बोतल की उपस्थिति के बारे में पर्याप्त सूचित कर दिया गया था. बीबन एसडीएम ने अपने हाथों में कम से कम दो किलो की एक पहाड़ी ककड़ी थाम रखी थी जिसने स्नैक्स का काम करना था.

परस्पर परिचय का कार्यक्रम संपन्न हुआ और बहरहाल मेहमानों के भीतर घुसने के दस मिनट के भीतर पार्टी शुरू हो गयी. बीबन ने एक बड़ी सी दरांती की मदद से थाली में ककड़ी काटना शुरू कर दिया. गिरधारी गिलास ढाल रहा था और बचेसिंह की आँखों के रास्ते उसकी जीभ लपलप करने लगी थी. पूरे माहौल को असम्पृक्त भाव से देखता परमौत लगातार नब्बू डीयर को हल्द्वानी ले जाने के तरीकों के बारे में विचार कर रहा था. लकड़ी के गिंडों जैसे बड़े-बड़े टुकड़ों में काट कर ककड़ी की हत्या जैसी कर चुकने के बाद बीबन ने अपने पाजामे की जेब से कागज़ की पुड़िया निकाली जिसमें चटपटा नमक था. गिलास बाकायदा हवा में उठाए गए और उन्हें टकरा कर  बिस्मिल्लाह किया गया.

नैसर्गिक था कि बात नब्बू डीयर, उसकी बीमारी और उसके परिवार की खस्ताहाली से ही शुरू हुई. बीबन शांत बैठा नमक में ककड़ी एक टुकड़े से रेखाएं जैसी खेंचता हुआ धीरे-धीरे अपना गिलास निबटाता जा रहा था. उस समय तक अपेक्षाकृत शांत रहा बचेसिंह तेज़ी से खुल रहा था और परमौत और गिरधारी को सैप कहना छोड़, उन दोनों के बाप जैसा लगने के बावजूद उन्हें परमौद्दा और गिरधरदा कह कर संबोधित करने लगा था.

नब्बूपुराण को अचानक ब्रेक लगाते हुए बीबन ने पाल्टी शुरू होने के बाद का अपना पहला वाक्य बोलते हुए बचेसिंह को मुखातिब होकर पूछा - "ये सूगर-हूगर का इलाज घर में हो जाने वाला हुआ, दाज्यू? मल्लब डाक्टर के जाना जरूड़ी जो क्या होता होगा. पैसे लगाने वाले हुए साले में नफे के ..."

"हैं?" बचेसिंह ने प्रतिप्रश्न किया. बीबन चुप हो गया.

शुगर की बीमारी का ज़िक्र अब तक के वार्तालाप में नहीं हुआ था - वह न नब्बू डीयर को थी, न नब्बू के पिताजी को. गिरधारी को लगा बीबन को होगी - "अरे आपको सूगर ठैरी, दाज्यू? एकाध पैक से कुच्छ जो क्या होने वाला हुआ. बाकी घर में तो ऐसा हुआ परहेज से रहना बताने वाले हुए डाक्टर लोग. दवा खानी पड़नी वाली हुई सुबे-साम ..."

"ना ना मुझको जो क्या है सूगर."

"फिर?" बचेसिंह ने बीबन को घूरा.

"फिर मल्लब? ऐसे ही पूछ रहा हुआ मैं ..." बीबन ने नज़रें नीची कीं और अगले आधे घंटे तक कुछ नहीं बोला. इस दौरान उसने एक गिलास और निबटाया और उसी ककड़ी के टुकड़े और नमक की मदद से से पिकासो की गुएर्निका की टक्कर की एक कलाकृति थाली में रच दी. बचेसिंह परमौत और गिरधारी को खड़िया के धंधे की जटिल बारीकियों और उससे पैदा किये जा सकने वाले असीम रोकड़े की बाबत लेक्चर पिला रहा था. गिरधारी की दिली इच्छा थी कि इस धंधे किसी भी तरह परमौत की दिलचस्पी पैदा हो जाए लेकिन बात बन नहीं रही थी.

"अगर इंद्रा गांधी की जगे भुट्टो भारत का प्रेसीडेन होता तो नेपाल और रसिया हमारे कब्जे में होते. सोयाबीन भी सस्ती होती. बागेश्वर में सोयाबीन का क्या रेट चल रहा होगा दाज्यू?" बीबन ने अपना दूसरा सवाल दागा.

"हैं?" बचेसिंह ने फिर से प्रतिप्रश्न किया. बीबन फिर चुप हो गया.

परमौत ने पहली बार बीबन को ध्यान से देखा. दो पैग पी चुका बीबन निगाहें नीची किये ककड़ी के उस टुकड़े से अब मेज़ पर रेखाएं बना रहा था. परमौत ने मुख्य वार्तालाप में उसे शामिल करने की नीयत से कहा - "हल्द्वानी में तो ऐसे ही दो-सवा दो का रेट चल रहा था परसों तक. बागेश्वर का रेट बचदा को जादे मालूम होगा. क्यों दाज्यू!"  

"अरे रहने दो हो परमौद्दा" बचेसिंह थोड़ा सा उखड़ने लगा था - "अब साली इन्द्रा गांधी होती या वो क्या नाम कै रा था ये ... मल्लब भुट्टो होता. रूस-नेपाल की सोयाबीन से हमारा क्या मल्लब हुआ. वैसे बीबनौ! ..." उसने अपने अनुज से पूछा - "कितनी सोयाबीन चाहिए तुझको जो रेट पूछ रहा है. हैं?"

"ना ना मुजको जो क्या चइये हुई सोयाबीन. मैं तो वैसे भी नहीं खाने वाला हुआ. गैस्टिक करती है बहुत."

"फिर?"

"फिर मल्लब? ऐसे ही पूछ रहा हुआ मैं ..." बीबन ने पुनः नज़रें नीची कर लीं और अपने खाली गिलास को ताकने लगा.

बचेसिंह ने घड़ी देखी तो उसे कुछ याद आया.

"अरे खाना बना दिया होगा यार काखी ने ... जा तो बीबनौ! जा खाना ले आ तो." बीबन से निर्विकार भाव से पाल्टी को देखा और उठ खड़ा हुआ. वह बाहर निकलने ही वाला था कि बचेसिंह ने कहा - "टॉर्च ले जा टॉर्च! रस्ते में सांप-कीड़े होने वाले हुए भुलू!"

बीबन वापस कमरे में आया और एक तरह को रखी अपनी चारपाई के सिरहाने के नीचे से टॉर्च निकालकर बोला - "ये एक म्हैने में कितना कम लेता हुआ टाटा-बिल्डा?"

"हैं?"

बचेसिंह का प्रतिप्रश्न सुनकर बीबन बाहर जाता हुआ बोला - "ऐसेई ... मल्लब पूछ रहा हूँ ..."

बीबन एसडीएम के बाहर जाते ही थोड़ा संकोच करते हुए परमौत ने पूछा - "यार बचदा ये अपने एसडीएम सैप अजीब टाइप से सवाल क्यों पूछ रहे हुए बेर-बेर? मल्लब चक्कर क्या हुआ ये?"

"अरे डिमाग खराब हो गया है बिचारे का पांच-छै महीने से परमौद्दा. नौकरी-फौकरी हुई नहीं. ग्रेचुवट अलग कर आया हुआ बिचारा. नहीं भी हो गए होंगे बीस साल हो गए होंगे. पड़े-लिखे आदमी की पूछ जो क्या हुई साली यहाँ झिंगेड़ी-फिंगेड़ी में. अब इतनी किताब-हिताब पड़ के कोई फड़वे-बेलचे का काम जो क्या करेगा मल्लब ... ऐसेई उलूलजुलूल चल रहा हुआ बिचारे का. मैं तो बुरा भी नईं मानने वाला हुआ साले का. वैसे भी बहोत तंग जो क्या करने वाला हुआ कोई. जादे बोलने वाला हुआ तो एक नड़क मार दो चुप हो जाने वाला ठैरा."

अगले दस-पंद्रह मिनट तक बीबन के बहाने बीबन, शिक्षा व्यवस्था, देश के संविधान, नागरिकों के अधिकारों और झिंगेड़ी ग्राम के सरपंच के व्यक्तिगत जीवन पर अधिवेशन चला जिसकी परिणति बीबन द्वारा - "पिलीच ओपन डोर बचिया बरदर. दी फूड इज ए ब्रिंग बाई दी बीपन एट दी होम ऑफ़ ए नबुवा ..." की लड़खड़-नशीली पुकार के लगाए जाने से हुई.

"यौ ... अब आज ज़रा देर इसकी अंगरेजी भी सुन लो परमौद्दा. पड़ा-लिखा हुआ. आज का जो हुआ बिचारा ... बीस साल पैले का ग्रेचुवट ठैरा ..." बचेसिंह बीबन की मदद करने बाहर गया तो गिरधारी ने परमौत की बांह में हल्की सी चिकोटी काटते हुए कहा - "मज़ा आ गया यार परमौद्दा वस्ताज!"

नब्बू के घर से भरसक आलीशान भोजन बना कर भेजा गया था. भोजन के अतिरिक्त एक कटोरे में घी और कागज़ की थैली में मेहमानों की लाई मिठाई की काफी मात्रा अलग से भेजी गयी थी. बचेसिंह द्वारा थालियों में भोजन परोसा गया. बीबन खड़े-खड़े थालियों पर टॉर्च चमका रहा था. परमौत और गिरधारी लम्बू बीबन के अंग्रेज़ी डायलॉगों का इंतज़ार कर रहे थे.

हरुवा भन्चक ने पहले ही उन्हें इस काम की अच्छी प्रैक्टिस करवा रखी थी.

(जारी)

हल्द्वानी के किस्से - 5 - छब्बीस


(फ़ोटो http://thegreenvillage.co.in/ से साभार) 

नब्बू डीयर की मां अपने पटांगण में बंधी, दिन भर आवारा घूमने के बाद घर आने के बावजूद सतत भुखानी और मिमियाती रहने वाली दो बकरियों को पत्ते डाल रही थी जब उसने बचेसिंह को सामने से आता देखा. माँ-बेटे के हल्द्वानी से वापस आने के बाद से बचेसिंह अमूमन हर सुबह उनके घर का हाल जानने आया करता था. सुबह के इस रोज़मर्रा बन गए कार्यक्रम में परिवार पर एक के बाद एक पड़ रही मुसीबतों की बाबत नब्बू डीयर की माँ द्वारा किये जाने वाए हाहाकारी एकालाप को बचेसिंह मनहूस चेहरा बनाए पंद्रह-बीस मिनट तक केवल ‘हाँ-हूं’ की सहायता से सुना करता और उसके बाद ही बागेश्वर के लिए निकलता था. ढलती संध्या के समय उसके यूं अपने आंगन में आ जाने पर किंचित अचकचाई नब्बू की माँ ने “किलै आज बड़ी जल्दी आ गया हो बचिया ...” कहकर अपने हाथ में पकड़ी झाडू से अपने साथी के पेट में सींग घुसेड़ने का प्रयास कर रही बकरी को फतोड़ना चालू ही किया था कि उसकी नज़र बचिया के पीछे आये दोनों शहरी बाबुओं पर पड़ी. पूर्वपरिचित होने के बावजूद उन्होंने पहली निगाह में गिरधारी को नहीं पहचाना लेकिन फिर उसके असामान्य लम्बत्व पर सश्रम गौर करते ही उसके चेहरे पर हर्ष और चिंता दोनों के भाव एक साथ उभरे.

गिरधारी, जो अपने माता-पिता समेत किसी भी रिश्तेदार के पाँव छूने को अपनी बेइज्ज़ती समझता था, लपक कर नब्बू डीयर की माँ के चरणों में झुका. उसकी देखा-देखी परमौत ने भी ऐसा ही किया. झाडू थामे हाथों से ही उन्हें आशीर्वाद देते हुए तनिक संकोच के साथ बुढ़िया बोली – “जी रया पोथा ... जी रया ... आज कहाँ से जो आ गए हुए तुम यौ बज्यौण झिंगेड़ी में हो बिस्जी ... बैठो एक मिलट को ... नबुवा को बताती हूँ अब्बी हाँ ...” उसने झटपट झाडू नीचे फेंकी और वहीं से “नब्बू ... ओ नबुवा ... नबू कहा ...” का लंबा आलाप शुरू करती हुई घर के भीतर घुस गयी.

साधारण पहाड़ी घरों की तरह नब्बू के पैतृक घर के बाहर भी पटालों से निर्मित एक आँगन अर्थात पटांगण था जिसके तीन तरफ डेढ़-दो फुट ऊंची चहारदीवारी थी जिससे मेहमानों वगैरह के बैठने और उन्हें चाय इत्यादि प्रस्तुत करने हेतु ड्राइंग रूम के फर्नीचर का काम भी लिया जाता था. बचेसिंह ने परमौत और गिरधारी लम्बू को उसी पर आसन ग्रहण करने को कहा. पटांगण के बीचोबीच एक पत्थर पर छेद कर ओखली का निर्माण किया गया था. सामने घर के दुमंजिले को जाने वाली चार-पांच सीढियां थीं. नीचे की मंजिल पर सीढ़ी के अगल-बगल क्रमशः गाय-बछियों को बाँधने का गोठ और भूसाघर थे. इसी तरह सीढ़ी के दोनों तरफ बेडरूम का काम करने वाले दो कमरे थे जिनकी खिड़कियों के पल्लों पर किसी ज़माने में की गयी नक्काशी के आलीशान किन्तु घिसे हुए डिज़ाइन बताते थे कि किसी ज़माने में घर को बड़ी मोहब्बत से बनवाया गया था. खिडकियों के आलों पर पिछली फसल के सूखे लहसुन और भुट्टे वगैरह के गुच्छों के साथ आरसी, मंजन, तेल की शीशी, साबुनदानी वगैरह शोभायमान थे. गोठ और भूसाघर के बाहर चंद डब्बे, कनस्तर, बाल्टियां, तसले और नहाने-धोने की चौकी वगैरह धरे हुए थे जिनकी संगत के लिए परित्यक्त और परित्यक्त किये जाने को तैयार तमाम मामूली चीज़ें थीं और एक निगाह में पता चल जाता था कि घर की निर्धनता ढांप-छिपा रखे जाने की किसी भी तरह की औपचारिकता से परे जा चुकी थी.

परमौत का मन इस सबको देखकर रुआंसा होने का था कि “हौजूरो ... ओ हौजूरो ...” कहता नेपाली डोटियाल सामान लादे पहुँच गया. जब सामान नीचे रखा जा रहा था परमौत ने नोटिस किया कि दूसरी मंजिल की एक बंद खिड़की झिरी भर को खुली जिससे साफ़ अंदेशा होता था कि उन्हें देखा जा रहा था. नब्बू डीयर की माँ भीतर जा कर अदृश्य हो गयी लगती थी क्योंकि डोटियाल का पेमेंट किये जाने और उसके लौट जाने के बाद भी उसका कोई पता नहीं था. परमौत ने सवालिया निगाहों से बचेसिंह को देखा तो उसने कहा – “चहा बना रही होगी सायद ... आती होगी ... मैं देख के आता हूँ  सैप ..” और वह भी “नवीन ... ओ नवीन कहा ... नवीनौ ... ओ रे नब्बू ...” कहता घर में घुस कर अलोप हो गया.

गिरधारी ने एकांत का लाभ उठाते हुए परमौत से कहा – “ऐसी जगे में क्या जो मन लगता होगा नबदा का यार परमौद्दा ... हैं. कहाँ साली हल्द्वानी की रंगत कहाँ ये गाँव की फुसकट लाइफ ... बीमार हो जाने का ही काम हुआ ऐसे में ... नहीं?”

परमौत उत्तर दे पाता कि सामने से नब्बू डीयर नमूदार हुआ. बचेसिंह के कंधे का सहारा लेकर उसने पहली सीढ़ी पर कदम रखा ही था कि गिरधारी लम्बू और परमौत लपक कर उस तक पहुँच गए.

“अबे गिरुवा लमलेट ये परमौती वस्ताज को कां से ले आया यार ... गजब ... गजब ...”  
  
वह अपना वाक्य पूरा करता उसके पहले ही दोनों दोस्तों के कंधे उसके दाएं-बाएं तैनात हो गए थे. वहीं सीढ़ियों पर वे एक दूसरे से लिपट गए. परमौत को अपनी आँखों की कोरों पर गीलापन महसूस हुआ जबकि गिरधारी बाकायदा “नबदा ... नबदा यार गुरु ...” कहता सुबकने लगा था.

हल्द्वानी वाला काइयां और तंदुरुस्त नब्बू डीयर सूख कर आधा हो गया था और परमौत ने उसकी पसलियाँ अपने सीने पर गड़ती महसूस कीं. नब्बू डीयर ने उनसे घर के भीतर आने को नहीं कहा और वे वापस पटांगण के किनारे जाकर बैठ गए.

लिपटने, हाथ मिलाने और एक दूसरे को भरपूर देख लेने का सिलसिला सैटल होने के उपरान्त परमौत ने नब्बू डीयर से कहा – “साले हल्द्वानी से जा के तो तू घाट ले जाने को जैसा तैयार हो गया यार नब्बू ... अब बचता नहीं है भलै ...” और उसकी पीठ पर एक दोस्ताना धौल जमाई. नब्बू को खांसी का दौरा पड़ा और वह दोहरा हो गया.
 
“अरे ... जादे तब्यत खराब हो रई यार नबदा की तो ...” नब्बू को अपनी मज़बूत बांहों में थामते गिरधारी ने चितित स्वर में बचेसिंह से पूछा – “हो क्या रा है इसको ... डाक्टर के पास नईं ले गए बिचारे को ...”

“क्या डाक्टर होने वाला हुआ यहाँ भूड़ जैसे गाँव में सैप! परसों छंजर को ले गए थे बागेश्वर. डाक्टर गया रहा छुट्टी तो कम्पौंडर नेई देखा ... टीबी-हीबी जैसा कुछ हो गया बता रा था ... ट्यस्ट कराने पड़ेंगे बल ... अब यहाँ कहाँ से होने वाला हुआ ट्यस्ट. डाक्टर कब्बी नईं  रैने वाला हुआ यहाँ. अब दो-चार दिन में देखते हैं अल्मोड़े-हल्मोड़े का कुछ ...” अपनी बात को इन शॉर्ट कहकर बचेसिंह चुप होकर पटांगण के पत्थरों का मुआयना करने लगा.

परमौत नब्बू की खराब हालत के बावजूद उस पर भड़क पड़ा और धीमी आवाज़ में झाड़ पिलाता हुआ बोला – “अबे नब्बू, हम साले मर गए थे कोई ... हैं ... पैन्चो ...! एक खबर देने के लायक नहीं समझा यार परमौती को तूने ... वैसे तो खूब वस्ताज-वस्ताज कैता था दारू पीने के टैम ... हैं ... कल सुबे जा रहे हैं हल्द्वानी .... समझ रा है ... देख गिरधर कैसे भी बहाने बनाएगा ना ये पैन्चो नबुवा ना, इसको ले के तो कल जाते ही हैं यहाँ से ...” ऐसा कहते-कहते परमौत को अहसास हो गया कि मरीज़ की हालत को देखते हुए वह कुछ ज़्यादा बक गया है सो न्यूट्रलाइज करने के अभिप्राय से उसने नब्बू डीयर को धीमे से पसली में कोंचकर आँख मारते हुए– “नब्बू बेटे ... भौंरा टाइप कि पतंगा टाइप ... क्या कहना हुआ तेरी भाबी से बे ...” कहा और उसी की नक़ल बनाते हुए अचारी आवाज़ निकालते हुए ‘चाँद सी मैबूबा हो मेरी’ गुनगुनाना शुरू किया.

नब्बू कुछ प्रतिक्रिया देता उसके पहले ही थाली में धरे चाय के गिलास थामे सीढ़ियों से उतरती उनकी तरफ आ रही उसकी माँ दिखाई दे गयी. बचेसिंह थाली थाम रहा था जब परमौत ने अपना एयरबैग खोलते हुए कहा – “ये सामान अन्दर रखा देते जरा हो बचदा ... और ये भी ...” दो बड़े-बड़े कट्टों को देखकर नब्बू डीयर ने दयनीय सा स्वर निकालते हुए कहा – “क्या यार परमौती गुरु ... पूरी बजार उठा लाया हल्द्वानी की मल्लब ...”

नब्बू डीयर के प्रति इतनी दूर से आये उसके मित्रों का लाड़, मिठाई के डिब्बे और सामान से भरे कट्टे  देखकर भावुक होती उसकी माँ ने अपनी मैली धोती का छोर होंठों में दबा लिया और जल्दी-जल्दी वापस घर में घुस गयी. खिड़की की खुली हुई झिरी अब कुछ और खुल गयी थी - जितना भर दिख रहा था उससे परमौत समझ गया नब्बू के लकवाग्रस्त पिता बरामदे में चल रही किसी भी गतिविधि से महरूम रहना नहीं चाहते.

चाय सुड़की जाने लगी जिससे पैदा हुई ऊष्मा ने मित्रों के वार्तालाप को और भी अन्तरंग बनाने में सहायता की. नब्बू बोला – “हल्द्वानी-फल्द्वानी जाने की बात तो देखी जाएगी परमौती ... पहले ये बता वो उसका क्या हुआ तेरी वो अनारकली मैड्यम का ... मल्लब ... क्या नाम कहते हैं उसका ... अबे वोई कम्पूटर वाली ...”

“पिरिया ...” यह गिरधारी लम्बू था.

“हां मल्लब ... कुछ बात आघे बड़ी या वोई साला रात भर डाड़ाडाड़ ही चल्ला हुआ अभी भी ...” नब्बू ने अपनी कृश बाँहें परमौत के कंधे के गिर्द डालते हुए उसे छेड़ा.

ऐसी अटपट सिचुएशन में अपनी पिरिया का ज़िक्र छिड़ने से चिढ़ने के बजाय भावविभोर होता हुआ परमौत बोला  - “बस सादी की तयारी है गुरु ... रुमाल तक तो पहुँच गया हुआ तुम्हारा ... वो क्या कहते हैं ... शागिर्द! बस पिछौड़े-लहंगे तक पौंचने की देर हुई ...” परमौत ने उचकते हुए अपनी पीछे की जेब में खुभाया हुआ मुसमुसा गया रूमाल निकाला और नब्बू के हाथ में थमा दिया – “ल्लै ... क्या याद करेगा नबदा गुरु ... असली वाला है साला ... हीरोइन के रुमाल की मौज काट ले बेटा ... क्या याद करेगा ...”

रूमाल के निकाले जाने पर गिरधारी लम्बू और नब्बू डीयर के भीतर हज़ार सवालों के फव्वारे फूटने लगे जिनका उत्तर देने के लिए बकौल हरुवा भंचक ग्यारह दिन और ग्यारह रातें चाहिए थीं. गिरधारी लम्बू हैरत कर रहा था कि हल्द्वानी से झिंगेड़ी तक के सफ़र भर में परमौत उस तारीखी चीथड़े को अपनी जेब में लिए-लिए घूम रहा था और उसने उससे इस बात का ज़िक्र तक नहीं किया था. नब्बू डीयर जैसे काइयां और प्यारे हरामी के सामने पड़ते ही परमौत ने दोस्ताना खुसफुस में अपनी प्रेमकथा में हाल के दिनों में आए मरहलों की छोटी-मोती रिपोर्ट अपने प्रेम पथ-प्रदर्शक के सम्मुख प्रस्तुत की जिसकी तफसीलें बाद में बताने का वायदा हुआ.

नब्बू डीयर के बीमार चेहरे पर मनहूस किस्म की ख़ुशी तो दिखाई दी लेकिन वह उस रूमाल को पिरिया का रूमाल मानने को तैयार नहीं था.

“परमौती बेटे ... पैली बात तो ये है कि लौंडियों के रूमाल इतने गंदे नहीं होते ... दूसरे ये कि उनमें से खुसबू आनी चइये ... और तीसरी बात ये कि लौंडिया रुमाल जभी देती है जब लौंडा उसको सोने के कंगन देता है ... और चौथी बात आप समझ लें कि पिक्चरों में जब हीरोइन ...”

नब्बू डीयर की खुड़पेंच निकालने की पुरानी आदत से वाकिफ परमौत ने उसे बीच में रोकते हुए कहा – “साले नब्बू ... ये नईं कि जरा सा खुस हो जाओ, तुम साले चाहने वाले ही नहीं हुए कि परमौती की सादी हो जाए. मल्लब मैं बी साला तेरी तरै भुसकैट मोब्बत करते-करते ड्वां-ड्वां बस डाड़ाडाड़ हालता रहूँ ... हैं ... और हाँ रुमाल जो है वो गंदा हुआ तेरा ठैरा मेरी जेब में रखे-रखे. तू क्या समज रहा उसने सिंगाणा पोछ के दे रखा है ... और पैली बात तो ये है कि रुमाल उसने मुझे जो क्या दिया ... वो तो जब वो क्लास को गयी तब मुझको नीचे गिरा हुआ मिला ...”

“यौ ... अब बता रहा कि नीचे गिरा मिला कर के ... मल्लब परमौती वस्ताज इस बात का सबूत क्या हुआ कि नीचे गिरा हुआ रुमाल पिरिया का ही होगा. अरे किसी भी औरत का हो सकने वाला हुआ. मल्लब ऐसा भी तो पॉसिबुल हुआ कि सौदा-पत्तर लेने आई किसी मुटल्ली का रुमाल नीचे गिर गया हो और परमौती गुरु उसी को सूंघ-सूंघ के काम चला रहा हुआ ...” नब्बू डीयर ने अपनी ट्रेडमार्क कमीनी हंसी हंसते हुए गिरधारी लम्बू की तरफ देखा. बेवकूफों की तरह मुंह और आंखें फाड़े, पिरिया के रुमाल को अपने हाथ में थामे उसमें किसी सुन्दरी का नक्श तलाशता हुआ गिरधारी तय नहीं कर पा रहा था कि किसके पक्ष में मतदान करे.

“हाँ हाँ ... नहीं है साला पिरिया का ... क्या उखाड़ लेगा नब्बू लाल ... हैं! है साला, सूपनखा का है माचो! लल्ता पवार का है साला! ... तेरे से जो है ना ... खुसी तो किसी देखी ही नहीं जाने वाली हुई ...” परमौत थोड़ा सा उखड़ता हुआ बोला.

नब्बू के चेहरे पर अपने कमीन तर्कों से आशिक परमौत के अरमानों और सपनों का कचूमर निकाल चुकने की उपलब्धि का स्वाभाविक हरामीपन दिपदिपाने लगा. हफ्ते भर से गंभीर बीमारी के चलते शैय्याग्रस्त होने के बावजूद वह मुस्करा रहा था और लग रहा था कि मुकेश के किसी अनिष्टकारी गीत की तान उसने अब छेड़ी तब छेड़ी.

गोदाम जीवित हो रहा था.

(जारी)  

Friday, August 4, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - पच्चीस



हल्द्वानी के दो लौंडों द्वारा पूरी जीप बुक करा कर बागेश्वर पहुँचने का समाचार सूबेदार ने शहर में यथासंभव प्रसारित कर दिया. कत्यूर बाज़ार में होटल और दुकान के लिए साग-सुल्फा खरीद कर लौट रहा बचेसिंह इस बाबत सूचित हो सकने से पहले ही अस्थाई वी आई पी का दर्ज़ा प्राप्त कर चुका था. होटल के बाहर सुदूर पहाड़ी कस्बे के जीवन की एकरसता से अघाए आठ-दस नगरवासी कुछ दिलचस्प देखने-घटने की प्रतीक्षा करते छोटा-मोटा मज़मा सजा चुके थे. होटल के स्टाफ के दो-तीन सदस्य सलाहकार बने हुए इस मजमे को इतनी जानकारी दे चुके थे कि उक्त लौंडे बचिया अर्थात बचेसिंह से मिलने की मंशा रखते हैं. बचेसिंह जैसे बेमतलब इंसान से मिलने पूरी जीप बुक करा कर भी कोई बागेश्वर आ सकता है फिलहाल वार्ता इस विषय पर चल रही थी. लोग अपने विचार प्रकट करते जाते और कनखियाँ होटल के भीतर चाय पी रहे परमौत और गिरधारी लम्बू पर लगाए रहते. दूर से बचेसिंह के नमूदार होते ही सम्मलेन तितरबितर हो गया और बचदा आ गया बचदा!कहता हुआ एक छोकरा-बैरा होटल की ओर लपका ताकि घटनाक्रम में अपनी उपस्थिति के महत्व को दर्ज़ करवा सके.

बचेसिंह ने इस बात की तस्दीक की वह नवीन लाल अर्थात नब्बू डीयर को अच्छी तरह जानता था और यह भी कि वह पिछले हफ्ते भर से बिस्तर में पड़ा हुआ था. समय, काल और परिस्थिति के मुताबिक़ बचिया, बचदा और बचेसिंह के नामों से संबोधित किया जाने वाला पैंतालीस-चालीस की ज़द में आया हुआ बचेसिंह पहली निगाह में पचास-पचपन का लगता था. जीवन ने उसे इतनी लातें मारी थीं कि वह कैसी भी खबर से उत्साहित या हतोत्साहित नहीं होता था. परमौत और गिरधारी के साथ बातें करते हुए भी उसके भीतर कुछ विशेष हलचल नहीं हुई और उसने इतना भर जाना कि इन लोगों का नब्बू से कुछ ज़रूरी काम रहा होगा. वह बिना किसी तरह की दिलचस्पी ज़ाहिर किये होटल के बाहर रखे उनके सामान की तरफ देखने लगा. परमौत और गिरधारी ने उस से गाँव की लोकेशन वगैरह जाननी चाही और कहा कि वे फ़ौरन से पहले नब्बू डीयर के पास पहुँचना चाहते थे. उनके इस आग्रह ने पहली बार बचेसिंह के मन में उनके लिए थोड़ी सम्वेदना पैदा की और उसने पूछा - "मल्लब ये सामान भी ले जाओगे अपने साथ?"

"हाँ फिर ..." गिरधारी बोला.

"झिंगेड़ी मल्लब नहीं भी होगा तो यहाँ से चार मैल तो होगा ..." मैल से उसका अभिप्राय मील से था "... पैदल ही जाना हुआ ... गाँव हुआ ... जैसा कहते हो आप लोग फिर ..." अपनी बात को हवा में टांग कर वह फिर से सामान को देखने लगा. कुछ पल सोचने के बाद उसने प्रस्ताव दिया कि यदि वे लोग एक-डेढ़ घंटा प्रतीक्षा कर सकें तो वह स्वयं उन्हें नब्बू के गाँव ले चलेगा. तीन जने होंगे तो बोझा ले जाने में आराम होगा. वह खुद नब्बू के अगले वाले गाँव में रहता था और वहां से रोज़ बागेश्वर आना-जाना करता था. गिरधारी लम्बू और परमौत के पास और कोई चारा भी न था. 

सामान वहीं छोड़ वे बागेश्वर भ्रमण पर निकल गए. सरयू नदी के तीर बसे इस नगर के पेचीदा लगने वाले जुगराफिये को समझने-समझने में ही उन्हें डेढ़ घंटा बीत गया. शाम ढलने को थी सो वे वापस अपने ठिकाने पहुंचे जहां शाम की पाली की कैजुअल लीव लेकर उन्हें नब्बू डीयर के गाँव झिंगेड़ी ले चलने को बचेसिंह तत्पर बैठा था. " ... मैं समझ रहा था कहीं भबरी तो नहीं गए आप लोग ..." कहते हुए उसने सामान से भरे दोनों कट्टे अपनी पीठ पर लादने का उपक्रम शुरू ही किया था कि परमौत बोला - "अरे कोई डोटियाल-होटियाल कर लेते हैं बचदा ... छोड़ो इस को ..."

बचेसिंह ने प्रतिवाद नहीं किया और सामान नीचे रख दिया. उसकी सपाट बुद्धि ने उसे बताया कि जो आदमी पूरी जीप बुक कर  सकता है उसके पास डोटियाल को देने को दस-पंद्रह रुपए भी होंगे ही.

"... एक घंटा लग जाएगा हाँ ... मल्लब पैदल रस्ता हुआ ..." यात्रा प्रारम्भ हुई. डोटियाल अर्थात नेपाल से काम की तलाश में आए एक लड़के को अपनी रफ़्तार से चलने और झिंगेड़ी में रिपोर्ट करने का आदेश देकर बचेसिंह उनके साथ चलने लगा. बचेसिंह कम बोलता था और पूछे जाने पर ही जवाब देता था. अलबत्ता नगर की सीमा समाप्त होने से पहले उसने पूछ लिया - "कुछ सामान-हामान और तो लेना नहीं लेना हुआ आप लोगों ने ... वहां कुच्छ नहीं मिलने वाला हुआ ... गाँव हुआ ..."

परमौत और गिरधारी ने एक दूसरे पर एक निगाह डाली और तय किया कि उन्हें कुछ और खरीदारी नहीं करनी है. उन्हें देखकर आख़िरी चेतावनी जैसी देते हुए बचेसिंह ने दोहराया - "मल्लब बीड़ी-सिरगट-पान-तमाकू कुच्छ ढंग का नहीं मिलने वाला हुआ हाँ वहां ..."

इस जोर देकर कहे गए 'कुच्छ नहीं' से बचेसिंह का अभिप्राय अब जाकर परमौत की समझ में आया और उन्होंने वापस बाज़ार का रुख कर इमरजेंसी के हिसाब के लिए बीड़ी-सिरगट-पान-तमाकू अर्थात एक बोतल समझ ली. शहर छोड़ते ही उनके चारों तरफ केवल सुन्दर प्रकृति थी. परमौत और गिरधारी लम्बू एक युग के बाद किसी पहाड़ी रास्ते पर पैदल चल रहे थे और उनके क़दमों में लम्बे सफ़र के बावजूद उत्साह बना हुआ था. परमौत का बैग बचेसिंह ने जिद करके ले लिया था. अपने बीमार सखा और उसके परिवार की बाबत उन्होंने बचेसिंह से थोड़ी बहुत जानकारियां हासिल कीं. पिताजी को लकवे का दौरा पड़ने के बाद नब्बू डीयर  और उसकी माँ दोनों को गाँव वापस आना पड़ा था.

एक साल पहले बागेश्वर से कुछ ही दूरी पर स्थित उसके ननिहाल में कप्तान मामा के खेतों में ए ग्रेड खड़िया की खान निकल आयी थी, हाल ही में जिसकी खुदाई का पट्टा उन्होंने इधर-उधर की जुगत से हासिल कर लिया था. उन्होंने सुन रखा था कि खड़िया और ख़ास तौर पर ए ग्रेड वाली खड़िया के काम में मोटा पैसा था. खड़िया की खुदाई शुरू होने के हफ्ते भर बाद जब फ़ौजी मामा को अपनी बहन के घर पर पड़ी विपदा की जानकारी मिली उन्होंने परिवार की भरसक मदद तो की ही, हल्द्वानी से लौटकर आये अपने इंटर पास भांजे यानी नब्बू को अपने पास बुला लिया कि खड़िया का काम देखने में उनकी मदद करे. महीने भर तक नब्बू ने वहां जाकर काम किया भी लेकिन नब्बू डीयर की झगड़ालू मामी के कोपभवन में चले जाने के कारण उन्हें नब्बू को वापस भेजना पड़ा. वहां से लौटने के बाद से ही नब्बू ने खटिया पकड़ ली थी.

खड़िया का नाम सुन कर गिरधारी लम्बू की दिलचस्पी में खासा इजाफा हुआ और उसने बचेसिंह से पूछा - "यार बचदा, मामू का कितने ट्रक माल जा रा होगा एवरेजन मल्लब एक महीने में हल्द्वानी ..."

"टरक-हरक का तो पता नहीं हो सैप लेकिन बुड़ज्यू ने दो ही म्हैने में खूब दल्ल-फल्ल कर दी है बल. खूब काजू-बादाम ले जा रहा बुड्ढा हर हफ्ते बागेश्वर बजार से ..."  

"एक गाड़ी में सब लगा-लुगू के पांच हज्जार बच रहे हैं बल यार परमौद्दा ... पांच हज्जार! ... समज रये हो ..." वह परमौत को भी इस वार्तालाप में शामिल करवाना चाहता था. "लॉटरी लग गयी यार नबदा के मामू की ... एक हमारे मामू हैं साले तीस साल से बेरोजगार हमारे घर में पड़े हुए हैं ..." गिरधारी लम्बू चाहता तो अपने नाकारा मामू की शान में पढ़े गए बासी पड़ चुके तमाम कसीदों को दुबारा से पढ़ सकता था लेकिन उसने खुद ही इस विषयांतर पर लगाम लगाई और वार्तालाप को वापस हिल्ले से लगा कर बोलना जारी रखा - "... अरे परमौद्दा यार वो मेहता नईं है मेहता! अरे वो सखावतगंज वाला ... जिसका बड़ा भाई तेरे परकास दाज्यू का दोस्त है ... देखा नहीं कैसी बड़ी बिल्डिंग खड़ी कर रखी है साली नैनताल रोड में दो साल में उसके बाप ने ... उनके वहां भी खड़िया निकल गयी थी बागेश्वर गाँव में बता रहे थे ... साला बड़े नोट चूट दिए खड़िया वालों ने यार ..."

इधर के दो-चार सालों में खड़िया के खेल के चक्कर में कैसे-कैसों के वारे-न्यारे हो चुकने की खबरें छिटपुट खबरें परमौत ने भी सुन रखी थीं और उसे भान था कि ऐसी सारी खबरों का उत्स बागेश्वर के इलाके में कहीं मौजूद था. उसने मुंडी झुकाए धीरे-धीरे अपने आगे चल रहे बेहद पराजित और दलिद्दर दिख रहे बचेसिंह को गौर से देखा जो गिरधारी लम्बू की बातों को सुनते हुए भी नितान्त असम्पृक्त बना हुआ बस चल रहा था. उसने नोटिस किया कि बचेसिंह जैसा दिख रहा था उसके बावजूद उसकी समूची देहभाषा में कुछ ऐसा था जो नब्बू डीयर की याद दिलाता था. उसने पंद्रह-बीस साल बाद के नब्बू डीयर की कल्पना करना शुरू किया तो उसे बचेसिंह दिखाई देने लगा. यह भयाक्रांत करने वाली छवि थी जिसे उसने दिमाग से झटक कर अलग किया और गिरधारी की बात सुनने लगा-          

"मैं तुम से कै रा हूँ  परमौद्दा अगर नबदा के मामू के खेत में थोड़ा भी ठीकठाक खड़िया निकल गयी ना ... और बचदा जैसा कह रहे हैं कि साली ए ग्रेड निकल रही है तो एक-आधा साल में समझ लो नबदा जो है राजा हो जाने वाला हुआ राजा ... इकलौता भाणिज हुआ अपने मामू का और मामू के मल्लब बच्चे-कच्चे हुए नहीं ... सब नबदा का ही हो जाने वाला हुआ लास्ट में ..."

इस बात से परमौत सहमत नहीं हुआ. उसने प्रतिवाद करते हुए कहा - "ऐसे भी साले दानी मालदार नहीं हो रहे नब्बू के मामू ... हफ्ते भर से लौंडा बीमार पड़ा है उसको हल्द्वानी नहीं ला सकते थे एक बार को यार ... अबे हल्द्वानी छोड़ साला अल्मोड़े ही ले आते ..."

परमौत के क्षोभ को समझते हुए गिरधारी ने सफाई दी - "बता तो रहे हैं बचदा ना कि अपने यहाँ बुला लिया था नबदा को बल ... अब वो वापिस आ गया तो कोई बात तो हुई होगी ना साली ... कुछ न कुछ पेंच लगा दिया होगा पैन्चो ... खुड़बुद्धि तो पैले ही से हुआ ..."

इस बार बचेसिंह ने प्रतिवाद किया - "ना सैप ना. ऐसा कुच्छ जो क्या हुआ ठैरा. नवीन तो भौत्ती होनहार लौंडा हुआ पूरे खानदान का ... वो जल्लाद औरत नहीं है उसकी मामी ... उसी ने किया रहा सब ... उसका तो ऐसा बताते हैं कि जहां जाती है वहां नरक बन जाने वाला हुआ ... नवीन तो बड़िया लौंडा हुआ ... सब की ह्यल्प करने वाला हुआ हर बखत ...  और मामू तो उस के और गजब हुए ... देवता जैसे हुए बिचारे.  उन्होंने तो कितनी बार कहा नवीन से बल कि नवीनौ बुरा मत मान बुड़िया के कुकाट का लेकिन बिचारा कब तक नहीं मानता ... अरे यहाँ बिचारे की अकेली बुड़िया इजा हुई... बाबू का टट्टी-पिसाप सब बिस्तरे में हुआ ... अब हप्ते में एक-दो बार तो घर आना हुआ ना उसने ... मामी कहने वाली हुई नौकरी करता है तो नौकर के जैसे रौ ... मल्लब एक म्हैने में एकी बार घर जा. बस हो गयी बात खत्तम! अरे सैप आप बताओ ... आप लोग तो समजदार लोग हुए. अरे ऐसे कोई नौकरी कराता है अपने भाणिज से ... मल्लब ... छोड़ आया बिचारा नौकरी-फौकरी जो भी हुआ ..."

बचेसिंह द्वारा नवीनलाल उर्फ़ नब्बू डीयर की तारीफ़ में कहे गए इन निस्वार्थ शब्दों को सुनकर गिरधारी और परमौत दोनों को अच्छा तो लगा लेकिन उसके घर की हालत की जानकारी ने उन्हें मन ही मन हिला कर रख दिया. इस दोचित्तेपन में उन्होंने अपने आसपास का जायजा लेना शुरू किया. शाम गहराने लगी थी. बचेसिंह की तरह बागेश्वर में छोटे-मोटे काम करने वाले आसपास के गाँवों के लोग अपने घरों को जा रहे थे. एक मोड़ पर थोड़ी सी खाली-पसरी जगह को क्रिकेट और गुल्ली-डंडा के मैदान में तब्दील कर खेल रहे चीखते-चिल्लाते छोकरों की पुकारें बता रही थीं कि वे जल्द से जल्द अपने-अपने खेल समेटते घरों को लौटने की तैयारी में थे. किस्म-किस्म के संबोधनों से अपने मवेशियों को पुकारती औरतें-किशोरियां उन्हें हंकाती हुई ले जा रही थीं. अपनी ड्यूटी बजाने बजाने का आनंद लेते और बेमतलब भूंकते हुए उनके उतने ही किस्म के कुत्ते पीछे-पीछे रुकते-चलते आ रहे थे. इस दृश्य में एक ख़ास किस्म की रूमानियत थी जो काफी समय के बाद शहर से गाँव आ रहे आदमी को भयंकर तरीके से विह्वल बना देती हैं. नब्बू के घर के रास्ते लगे परमौत और गिरधारी के साथ भी ऐसा ही हुआ.

शहर से आया होने के नाते बचेसिंह उन्हें 'एनीवन फ्रॉम आउट ऑफ़ टाउन इज एन एक्सपर्ट' की तर्ज़ पर बड़ा-बुद्धिमान और रईस समझ रहा था. वहीं शहर से आये इन दो दोस्तों के भीतर बचेसिंह और अपने आसपास दिख रहे सभी लोगों के प्रति एक ख़ास किस्म की एक्स्टेम्पोर करुणा उपज रही थी और वे घंटे भर के पैदल सफ़र में गाँव के जीवन की सारी तकलीफों और जटिलताओं को न सिर्फ समझ लेना चाहते थे बल्कि उन सब के लिए 'कुछ करना है' की सार्वभौमिक फर्जी उदात्तता से भरते भी जा रहे थे.

भावनाओं की इसी ओवरडोज़ के चलते गिरधारी ने बचेसिंह से, जो पिछले पांच मिनट से चुप हो गया था, पूछा - "तुम्हारे बच्चे-हच्चे कां हुए बचदा ... मल्लब यहीं हुए गाँव में ... स्कूल पड़ते होंगे ना?"

अगले पंद्रह मिनट तक बचेसिंह ने अपनी आत्मकथा का एब्रिज्ड एडीशन पेश किया जिसने उक्त ओवरडोज़ को डबल बनाने का काम किया. दस साल पहले बचेसिंह की पत्नी चौथी बच्ची के जन्म के बाद भगवान की प्यारी हो गयी थी. परिशिष्ट के तौर पर उक्त पत्नी और इन चारों बच्चियों के संक्षिप्त जीवनवृत्त भी सुनाए गए और होटल में छः सौ रुपये की पगार से जैसे-तैसे काटे जा रहे कठिन जीवन के विवरणों को इस ब्रह्मवाक्य से समाप्त किया गया कि होना तो वही है जो रामचन्द्र जी ने एडवांस में रच रखा है अर्थात संसार एक मिथ्या है जिसमें अपने हिस्से का कष्ट झेलते चले जाने में ही मनुष्य का इकलौता कर्तव्य है.

एक जुगाड़ साइनबोर्ड बता रहा था कि झिंगेड़ी गाँव आ गया था और इसके पहले कि इस अतीव त्रासद एकालाप के बाद परमौत और गिरधारी किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देते, एक खतरनाक ढाल वाली पगडंडी पकड़ते हुए बचेसिंह ने उन्हें एक छोटा झटका सा दिया जिसके लिए उस क्षण उनकी भावनात्मक तैयारी शून्य थी - "जरा आराम से आना हाँ हो सैप ... बस ये नीचे वाला हुआ नवीन का घर!"  

(जारी)