Thursday, April 27, 2017

एक जीनियस का जाना



1968 में जब रॉबर्ट पिरसिग ने अपनी किताब 'ज़ेन एंड दी आर्ट ऑफ़ मोटरसाइकिल मेंटेनेन्स' की पहली सिनॉप्सिस और अपनी लिखाई के चन्द नमूने 122 प्रकाशकों को भेजे तो सिर्फ एक प्रकाशक ने उन्हें पलटकर जवाब दिया. विलियम मॉरो प्रकाशन के जेम्स लैनडिस ने उन्हें लिखा कि न तो वे किसी बड़ी रकम के एडवांस के तौर पर दिए जाने की उम्मीद रखें न ही किताब के बिकने की. चिठ्ठी मिलने के एक महीने के बाद पिरसिग अपने युवा बेटे क्रिस और अपने दोस्तों जॉन और सिल्विया सदरलैंड के साथ अपनी होंडा सुपरहॉक पर सत्रह दिन की यात्रा पर निकल पड़े - मिनियापोलिस से सान फ्रांसिस्को. अगले छः सालों में उन्होंने किताब के दो ड्राफ्ट लिखे और करीब सात लाख शब्दों को लिखने के बाद बनी  यह किताब छपने के तुरंत बाद एक अंतर्राष्ट्रीय बेस्टसेलर बन गयी. 1960 के दशक की विद्रोही पीढ़ी से 1970 के दशक की "मी जेनेरेशन" के संक्रमण के लिए दिशानिर्देशिका जैसी इस किताब ने करोड़ों की संख्या में पाठकों को अपनी ओर खींचा.

न्यू यॉर्कर रिव्यू में 'अनईज़ी राइडर' शीर्षक से लिखी अपनी समीक्षा में जॉर्ज स्टीनर ने इस किताब की तुलना हर्मन मेलविल के उपन्यास 'मोबी डिक' से की. अन्य समीक्षकों ने थोरो, जैक कैरुआक वगैरह के नाम लिए. पिरसिग ने अपनी किताब के लिए तमाम हिप्पी लेखकों से प्रेरणा ली थी और एक जगह लिखा था - "अध्यात्म एक एक ऐसा रेस्तरां है जिसमें आपको तीस हज़ार पन्ने का मेन्यू मिलता है पर खाना नहीं दिया जाता."

उनकी मोटरसाइकिल एक रूपक का काम करती है. उनके सहयात्री सदरलैंड दंपत्ति बाइक की तकनीक नहीं समझ पाते लेकिन पिरसिग जोर देकर कहते हैं कि भगवान उतने ही आराम से मोटरसाइकिल के गीयर्स में रह सकता है जैसे वह किसी पहाड़ की चोटी पर या किसी फूल की पंखुड़ी में रह सकता है. उपन्यास का उपशीर्षक था - मूल्यों की एक पड़ताल. अपने नायक फैड्रस के माध्यम से पिरसिग "गुणवत्ता" की तलाश करते हैं जो कि एक परिवर्तनशील मूल्य है और अरस्तू के सम्पूर्ण मूल्य अर्थात "सत्य" से बिलकुल अलहदा है.

अपने भीतरी टकरावों को ज़बान देते हुए वे कहते हैं "पूरब में गुरु को जीवित बुद्ध कहा जाता है जबकि मिनेसोटा में आप हैरान होते हैं कि वह बेरोजगार क्यों है" वे मिनियापोलिस में जन्मे थे. क़ानून के शिष्य उनके पिता मेनार्ड जर्मन मूल के थे जबकि उनकी माँ हैरियेट स्वीडिश थीं. दोनों परिवारों की गहरी स्थानीय जड़ें थीं. रॉबर्ट ने उत्तर-पश्चिमी लन्दन के हेंडन में रहते हुए अपनी स्कूली शिक्षा शुरू की जबकि उनके पिता इन्स ऑफ़ कोर्ट में प्रशिक्षण ले रहे थे. जब उनका परिवार मिनेसोटा लौटा और उनके पिता ने विश्विद्यालय में कानून पढ़ाना शुरू किया. रॉबर्ट तब तक इतना अधिक सीख चुके थे कि उन्हें दो कक्षाएं पढ़नी ही नहीं पड़ीं.

उनके सहपाठी ज़ाहिर है उनसे बड़े थे और उन पर रौब जमाया करते थे, उनके अध्यापकों ने उन्हें दाएं हाथ से लिखने पर मजबूर किया और उन्होंने हकलाना तक शुरू कर दिया था. लेकिन ब्लेक स्कूल में एक महत्वपूर्ण छात्रवृत्ति की प्रतियोगिता जीतने के बाद उन्हें उन्हीं की आयु के बच्चों के साथ रखा गया और उनका आई क्यू लेवेल 170 पाया गया. पंद्रह साल की आयु में उन्होंने मिनेसोटा विश्वविद्यालय में पढ़ना शुरू कर दिया. दो साल बाद उन्हें फ़ौज में एनलिस्ट किया गया और वे कोरिया भेज दिए गए. वहां उन्होंने मजदूरों को अंग्रेज़ी पढ़ाना शुरू किया.  इस अनुभव के बारे में उन्होंने कहा - "मैंने उन्हें समझाया कि छब्बीस अक्षरों में आप समूचे ब्रह्माण्ड के बारे में बता सकते हैं. लेकिन उन्होंने साफ कहा - नहीं. इसने मुझे सोचने पर विवश किया. पूर्व में अनुभव के आधार को परिभाषित नहीं किया जा सकता. इसी बात ने मुझे ज़ेन के मार्ग पर पहुंचाया."

पिरसिग जापान गए और दर्शनशास्त्र में डिग्री हासिल करने मिनेसोटा वापस आये. एक साल उन्होंने बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में पढाई की. वापस घर लौटकर उन्होंने पत्रकारिता सीखने के साथ साथ कवि एलन टेट से लेखन सीखना आरम्भ किया. कॉलेज की साहित्यिक पत्रिका पर काम करते हुए उनकी मुलाक़ात नैन्सी एन जेम्स से हुई और 19५४ में वे रेनो, नेवादा आ गए. नैन्सी ने अपने पति से तलाक ले लिया और वे कसीनो डीलर्स की हैसियत से काम करने लगे. शादी के बाद पिरसिग ने पहले यूनाइटेड प्रेस और बाद में जनरल मिल्स रिसर्च लैबोरेटरी के लिए तकनीकी लेखन किया और फिर वे पत्रकारिता में मास्टर्स डिग्री लेने वापस मिनेसोटा आ गए.

उन्होंने मोंटाना स्टेट यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू किया लेकिन उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी क्योंकि एक तो वे ग्रेडिंग सिस्टम से संतुष्ट नहीं थी दूसरे एक जनजातीय अंतिम संस्कार में उन्होंने नशा करने वाली एक जड़ी की खोज कर ली थी. जब 1962 में मोंटाना के गवर्नर की एक हवाई जहाज़ हादसे में मौत हुई तो उनकी जेब में जिन पचास विध्वंशक और सरकार के लिए ख़तरा समझे जाने वाले लोगों की लिस्ट थी उनमें रॉबर्ट पिरसिग का भी नाम था.

उन्होंने शिकागो में दर्शनशास्त्र पर पीएचडी पर काम शुरू किया लेकिन "गुणवत्ता" की अपनी तलाश के चलते अपने विभागाध्यक्ष से उनकी लड़ाई हो गयी जो अरस्तू के दर्शन पर बड़े खलीफा माने जाते थे. वे इलिनोय-शिकागो में पढ़ाने लगे लेकिन घर पर उनका व्यवहार लगातार अनियमित और धमकीभरा होता चला गया. 1961 के साल क्रिसमस के दिन उन्हें काफी खराब स्थिति में अस्पताल में भरती कराया गया. उन्होंने अध्यापन छोड़ दिया और एक मनोचिकित्सालय में भरती हो गए. अंततः वे 1963 में वापस मिनेसोटा आये जहां वेटरन्स हॉस्पिटल में उन्हें बिजली के झटकों का इलाज़ देना पड़ा.

'ज़ेन एंड दी आर्ट ऑफ़ मोटरसाइकिल मेंटेनेन्स' में इस अनुभव को उन्होंने याद किया है. वे लिखते हैं कि इस अनुभव ने "मुझे दूसरों के साथ रह सकना और उनसे सहमत होना सिखाया. फैड्रस अधिक ईमानदार था, वह कभी समझौता नहीं करता था और युवा लोग उसका आदर करते थे." उसे "महसूस होता था कि वह सिर्फ अपनी त्वचा ही बचा सका था."  इलाज के बाद पिरसिग ने पचास से ऊपर नौकरियों के लिए आवेदन किये लेकिन सभी के अस्वीकार हो जाने ने उन्हें बहुत गहरे शर्मसार कर दिया.

इस किताब को पिरसिग ने अमूमन आधी रात के समय लिखा, जब वे व्यावसायिक लेखन कार्य कर रहे थे. 1970 में किताब के पहले ड्राफ्ट को उन्होंने फेंक दिया लेकिन लैनडिस की मदद से उन्होंने अंतिम पांडुलिपि को आकार दिया और किताब को दो लाख शब्दों में सीमित किया. उपन्यास 1974 में छपा. अचानक पिरसिग दुनिया भर में जाना जाने वाला नाम बन गए. रॉबर्ट रेडफोर्ड किताब के फिल्म राइट्स खरीदना चाहते थे पर बात कीमत पर अटक गयी.

रेडफोर्ड के साथ अपनी मुलाक़ात को पिरसिग ने अपनी अगली किताब 'लीला' में कहानी के तौर पर पेश किया. यह किताब 1991 में छपी लेकिन 'ज़ेन एंड दी आर्ट ऑफ़ मोटरसाइकिल मेंटेनेन्स' जैसी सफलता उसे नहीं मिली.  

उन पर 2008 में एक डॉक्यूमेंट्री बनी - 'अराइव विदाउट ट्रैवलिंग'.पिरसिग हमेशा कहते थे कि 'ज़ेन एंड दी आर्ट ऑफ़ मोटरसाइकिल मेंटेनेन्स' उनके जीवन की कथा है उर यह कि उसका कल्ट बन चुकना उन्हें डराता है. "पहले मैं एक आउटसाइडर था, और अब वह आउटसाइडर नंबर वन इनसाइडर बन गया है. ... यह बहुत बेचैन करने वाला अनुभव है."

रॉबर्ट पिरसिग (1928-2017)

6 सितम्बर 1928 को जन्मे रॉबर्ट मेनार्ड पिरसिग बीती 24 अप्रैल को नहीं रहे.

श्रद्धांजलि.

('द गार्डियन' में छपे एक लेख पर आधारित)


Friday, April 21, 2017

कफ़ील भाई घोटकी वाले, राइट आर्म लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलर


पाकिस्तान के सिंध प्रदेश के धुर उत्तरी इलाके में एक धूल-धक्कड़ भरा कस्बा है घोटकी तालुका. तमाम तरह के अनेक कारखानों वाले इस कस्बे ने 1980 के दशक में बड़ा नाम कमाया. किसी औद्योगिक क्रान्ति के चलते नहीं ऐसा हुआ था. दरअसल उन्हीं दिनों पाकिस्तान के कई लोगों ने गौर करना शुरू किया कि वहां चलने वाले रंग-बिरंगे ट्रकों के पीछे - कफ़ील भाई घोटकी वाले, राइट आर्म लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलर - लिखा दिखने लगा था. जल्द ही इस हस्ताक्षर वाले ट्रकों की तादाद इस कदर बढ़ने लगी कि जिज्ञासु लोगों  ने ट्रकों के ड्राइवरों से पूछना शुरू कर दिया कि ये कफ़ील भाई हैं कौन और ये राइट आर्म लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलर है क्या बला.
मजेदार बात यह है कि बहुत से ड्राइवरों को यह बात पता तक नहीं लगी थी कि उनके ट्रकों पर कफ़ील भाई के हस्ताक्षर हैं.जब कुछ स्थानीय सिंधी अखबारों ने इस बाबत छानबीन की तो उन्होंने पाया कि कफ़ील भाई घोटकी के एक अति साधारण परिवार में जन्मे एक युवा क्रिकेटर और बेहद प्रतिभावान चित्रकार थे.1970 के दशक के अंतिम और 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों में उन्हें लगता था कि वे दुनिया के इकलौते गेंदबाज़ हैं जो दाएं हाथ से घातक ऑफ स्पिन गेंदबाजी कर सकने के साथ बाएं हाथ से वैसी ही खतरनाक लेग स्पिन फेंक सकते थे. उन्होंने घोटकी की अनेक लोकल टीमों के लिए अपने नगर के धूसर मैदानों पर अपनी प्रतिभा का जलवा बिखेरा. वे गेंदबाजी तो दोनों हाथों से कर लेते थे लेकिन दुर्भाग्यवश उनकी गेंदों में ज़रा भी स्पिन पैदा नहीं होती थी और बल्लेबाज़ उनकी बढ़िया धुनाई किया करते. गेंदबाज़ का काम होता है पिच को दोष देना और कफ़ील भाई ने भी यही किया और नाराज़ होकर अपनी किस्मत चमकाने कराची चले गए. कराची में उनकी प्रतिभा को पहचानने को एक भी क्लब सामने नहीं आया और लम्बे इंतज़ार के बाद वे हताश होकर वापस घोटकी आ गए. उनकी शिकायत रही कि पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड में उनकी प्रतिभा को समझ तक पाने की कूव्वत नहीं थी.
घोटकी में कफ़ील भाई का ज़्यादातर समय हाईवे से लगे पेट्रोल पम्पों पर गुज़रने लगा. इन पम्पों के आसपास के ढाबे और होटल कराची और पेशावर के बीच औद्योगिक माल, गन्ना और गेहूं वगैरह ढोने वाले ट्रकों के ड्राइवरों-क्लीनरों से आबाद रहा करते थे.
हालांकि जैसी कि परम्परा चल चुकी थी, इनमें से ज़्यादातर ट्रकों पर तमाम तरह के चित्र बने रहते थे. कफ़ील भाई उन ट्रकों की शिनाख्त करते जिन पर कलाकारी नहीं की गयी होती थी और उनके ड्राइवरों को फ़ोकट में उनकी गाड़ियों पर कलाकारी करने का प्रस्ताव देते थे. बदले में वे सिर्फ पेंट और ब्रशों की मांग किया करते.

ड्राइवरों को उनका काम पसंद आने लगा और कफ़ील भाई ने मैडम नूरजहां और घोड़ों से लेकर लेडी डायना तक के चित्र सिंध के ट्रकों पर उकेरना शुरू किये. चित्रों के नीचे उनके गौरवपूर्ण हस्ताक्षर होते - कफ़ील भाई घोटकी वाले, राइट आर्म लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलर.
1987 तक उर्दू मुख्यधारा के कुछेक अखबार वगैरह उन पर लेख छाप चुके थे और ड्राइवरों में अपनी गाड़ियों पर उनके हस्ताक्षर करवाने का क्रेज़ बन गया था. लेकिन कफ़ील भाई अपनी सेवा के बदले अब भी किसी तरह की फीस नहीं वसूलते थे. वे पेंट और ब्रश के अलावा ढाबों पर मिलने वाली एक चाय भर के बदले इस काम को किया करते. उन्होंने अपने हस्ताक्षर में अब यह भी जोड़ दिया - मशहूर-ए-ज़माना स्पिन बॉलर कफ़ील भाई का सलाम!
उनकी रोजी-रोटी कैसे चलती थी मालूम नहीं लेकिन उनके सुबह-शाम के खाने का बंदोबस्त उन ढाबों के जिम्मे था जिनके बगल में खड़े ट्रकों पर वे चित्रकारी करते थे.
1992 में उनकी ख्याति अपने चरम पर पहुँच गयी थी जब एक फ्रांसीसी कला पत्रिका ने उनकी ट्रक-कला को अपने पन्नों पर जगह दी. इसके बाद कुछेक फ्रेंच पर्यटक घोटकी आये भी और उन्होंने कफ़ील भाई को फ्रांस आ कर वहां के ट्रकों पर चित्र बनाने की दावत दी. कफ़ील भाई ने एक शर्त रखी कि उन्हें फ्रांस के ट्रकों पर भी अपने हस्ताक्षर करने की छूट होगी. फ्रेंच पर्यटकों में कहा कि वे इसकी गारंटी नहीं दे सकते. इतना सुनना था और कफ़ील भाई ने साफ़ मना कर दिया.
कफ़ील भाई तीस से ऊपर के हो चुके थे और एक दिन उन्होंने पेन्टिंग करना छोड़ दिया. अपने कुछ प्रशंसकों से उन्होंने थोड़ी रकम उधार ली और फर्नीचर की एक दुकान खोली. इस नए धंधे से थोड़ा बहुत पैसा बनाने के बाद उन्होंने शादी करने का फ़ैसला किया. 2000 की शुरुआत में उन्होंने दुकान बंद की, सारा सामान बेचा और कराची चले गए.
कफ़ील भाई का 1989 में लिया गया फोटो
फिलहाल कोई नहीं जानता कि वे कराची में कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं. कफ़ील भाई ने गायब हो जाने का फ़ैसला कर लिया था. समय के साथ-साथ कफ़ील भाई घोटकी वाले, राइट आर्म लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलर के हस्ताक्षर भी ट्रकों से अदृश्य होते चले गए.
(यह पोस्ट 'डॉन' अखबार में अगस्त 2016 में छपे एक लेख पर आधारित है)

Sunday, April 16, 2017

कैसे हैं क्यू साहब

हम सब के जीवन में एक क्यू साहब होते हैं लेकिन इस थीम पर बहुत दोनों बाद यह शानदार कविता पढ़ने को मिली. देहरादून में रहनेवाले दिनेश चन्द्र जोशी फेसबुक पर मेरे मित्र हैं और कबाड़खाने पर पोस्ट होने वाली यह उनकी पहली रचना है. आशा करता हूँ यह अंतिम नहीं होगी. कविता को यहाँ प्रस्तुत करने की सहर्ष अनुमति देने के लिए दिनेश जी का शुक्रिया.


क्यू साहब
- दिनेश चन्द्र जोशी


नाम था उनका कुतुबुद्दीन अहमद,
पर शोहरत थी ज्यादा क्यू साहब के नाम से
दस्तखत में बनाते थे बड़ा सा अंग्रेजी का क्यू 
फिर घसीट मारते थे कीड़े सी लम्बी,
याद आये अचानक इतने वर्षो बाद,
जब इलेक्शन की जीत के उन्माद में लोग 
लानतें भेज रहे थे, हर तीसरे मुसलमान पर,
जाने क्यों याद आये ,रह रह कर क्यू साहब ,
याद आई उनकी मौलवीगंज की गली,घर बैठक,
सोफा लकड़ी का, मेज कुर्सी,परदा,
किस जमाने के इन्जीनियर थे,तालिब ए.एम.यू के,
हाकिम हुए बाद में महोबा पालिटेक्निक में,
ले गये साथ हम दो शागिर्दों को,दिलवाई नौकरी
अपने दस्तखत से
लाल रंग की स्याही से लिखा था क्यू अहमद,
रखा होगा अभी भी वो तैनाती खत कागजों
के बीच कहीं,
मिली पहली तनख्वाह उनकी मातहती में,
बोलेआंसू पोछने को बहुत है ये पगार ,
छूटी एडहाक की नौकरीक्यू साहब भी जेहन 
से छूटते चले गये,
भला हो इलेक्शन की जीत के उन्माद का,
याद आई क्यू साहब की इतने वर्षों बाद,
होंगें कहां जाने, शायद गुजर गये बर्षों पहले
जिन्दा होते तो पूछता - 'कैसे हैं ,क्यू साहब!'

दिनेश चन्द्र जोशी

Friday, April 14, 2017

उन्हें नहीं पता था कि उनकी हत्या होगी

Zan Zezavy की पेन्टिंग 'मर्डर' (1920) 

कविता का रामदास और मेवात के पहलू ख़ाँ
-शिवप्रसाद जोशी

रामदास उस दिन उदास था
लेकिन पहलू ख़ाँ उदास नहीं थे
वो ख़ुश थे कि उन्हें दुधारू गाय मिली थी
और उनकी डेयरी चल निकलनी थी

चौड़ी सड़क थी कोई गली न थी
जहाँ पहलू ख़ाँ को बेटों के साथ रोका गया
मारा गया
मारते गये वे रक्षक उन्हें
नरभक्षी आ गये बाबा
बेटे के मुँह से निकला
नहीं नहीं मेरे बेटे के मुँह से
पहलू ख़ाँ का बेटा तो तब बेहोश था.

दिन का समय था घनी बदरी नहीं थी
पसीना पौंछते हुए पहलू ने फिर से टटोले क़ाग़ज़
रामदास उस दिन उदास था
पहलू ख़ाँ उदास नहीं थे उस दिन
उन्हें नहीं पता था कि उनकी हत्या होगी.

(रघुबीर सहाय की एक कविता “रामदास” से प्रेरित)


Monday, April 10, 2017

या शायद तुम उस रास्ते से नहीं आईं


मोहब्बत कोई नुमायाँ निशान नहीं
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

मोहब्बत कोई नुमायाँ निशान नहीं
जिस से लाश की शिनाख़्त में आसानी हो

जब तक तुम मोहब्बत को दरयाफ़्त कर सको
वो वैन रवाना हो चुकी होगी
जो उन लाशों को ले जाती है
जिन पर किसी का दावा नहीं

शायद वो रास्ते में
तुम्हारी सवारी के बराबर से गुज़री हो
या शायद तुम उस रास्ते से नहीं आईं
जिस से
मोहब्बत में मारे जाने वाले ले जाए जाते हैं

शायद वो वक़्त
जिस में मोहब्बत को दरयाफ़्त किया जा सकता
तुम ने किसी जबरी मश्क़ को दे दिया

पत्थर की सिल पर लिटाया हुआ वक़्त
और इंतिज़ार की आख़िरी हद तक खींची हुई
सफ़ेद चादर
तुम्हारी मश्क़ ख़त्म होने से पहले तब्दील हो गए

शायद तुम्हारे पास
इत्तिफ़ाक़ीया रुख़्सत के लिए कोई दिन
और मोहब्बत की शनाख़्त के लिए
कोई ख़्वाब नहीं था

उस वक़्त तक जब तुम
मोहब्बत को अपने हाथों से छू कर देख सकतीं
वो वैन रवाना हो चुकी होगी
जो उन ख़्वाबों को ले जाती है
जिन पर किसी को दावा नहीं


(नुमायां = प्रकट, दरयाफ़्त = खोज, मश्क़ = अभ्यास)

Sunday, April 9, 2017

हम किसी को भी याद आ सकते हैं जब उसे कोई याद न आ रहा हो


ज़िंदगी हमारे लिए कितना आसान कर दी गई है

-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद 

ज़िंदगी हमारे लिए कितना आसान कर दी गई है
किताबें
कपड़े जूते
हासिल कर सकते हैं
जैसा कि गेहूं हमें इम्दादी क़ीमत पर मुहय्या की जाती है
अगर हम चाहें
किसी भी कारख़ाने के दरवाज़े से
बच्चों के लिए
रद करदा बिस्कुट ख़रीद सकते हैं
तमाम तय्यारों, रेलगाड़ियों, बसों में हमारे लिए
सस्ती नशिस्तें रखी जाती हैं

अगर हम चाहें
मामूली ज़रूरत की क़ीमत पर
थिएटर में आख़िरी क़तार में बैठ सकते हैं
हम किसी को भी याद आ सकते हैं

जब उसे कोई याद न आ रहा हो

Saturday, April 8, 2017

अथ गणित कथा

मित्र ललित मोहन रयाल भीमताल में रहते हैं. सरकारी सेवा में हैं. उनसे परिचय बहुत पुराना नहीं है अलबत्ता जितना भी है वह इस बात की तसदीक करने को पर्याप्त है कि उनसे लम्बी दोस्ती की खासी संभावना है. उम्दा क़िस्सागोई का मैं प्रशंसक हूँ और ललित मोहन रयाल इस कला में सिद्धगस्त हैं. इन दिनों वे 'खड़कमाफी की स्मृतियों से' शीर्षक एक संस्मरण श्रृंखला पर कार्यरत हैं. उन्होंने इस सीरीज में से इस टुकड़े को यहाँ पोस्ट करने की अनुमति दी है. उनका आभार. आनंद लीजिये! 


'गणित में विद्यार्थियों का हाथ तंग है' - प्रायः सुनने को मिलता था. गणित-फोबिया से कई छात्र पीड़ित रहते थे. तत्कालीन कालखंड में हमारे अंचल में गणित विषय का हाहाकार मचा रहता था. प्रथम प्रयास में मैट्रिकुलेशन परीक्षा पास करना दुर्लभ समाचार होता था. प्रथम प्रयास में इस परीक्षा को उत्तीर्ण करना अभीष्ट भी नहीं माना जाता था. तीसरे से पाँचवें प्रयास तक को सहजता से लिया जाता था. प्रयासों की संख्या कितनी भी हो जाए, पास होना महत्त्व रखता था. पाँचवें प्रयास तक भी इस परिणाम के लिए उपयुक्त निगरानी व मार्गदर्शन की जरूरत महसूस की जाती थी.

'मैट्रिकुलेशन' शब्द की ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी मीनिंग 'रजिस्टर' दी गई है. इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि पाश्चात्य शिक्षा- व्यवस्था में इस परीक्षा के अंक रजिस्टर में इंद्राज किए जाते हैं. इसके अंक रजिस्टर में 'एंट्री' किए जाने से ही इसे 'मैट्रिकुलेशन' कहा जाता है.

प्राच्य विद्वान पी. एन. ओक इस धारणा का खंडन करते हैं. उनका दृढ़ मत है कि रजिस्टर में तो अन्य परीक्षाओं के अंकों की भी प्रविष्टि की जाती है. 'गजट' भी तो रजिस्टर ही है. इस विधान से तो समस्त परीक्षाएं ही मैट्रिकुलेशन कहलानी चाहिए.

उनका मत है कि 'मैट्रिकुलेशन' प्राचीन संस्कृत शब्द 'मातृकुलीनेषु' का पाश्चात्य संस्करण मात्र है. इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद शिक्षार्थी को उच्चतर शिक्षा प्राप्त करनी होती थी. इस उद्देश्य से उसे 'मातृकुल' से दूर जाना पड़ता था.
ज्योमिट्री की क्लास थी. वृत्त का आरेख खींचने को कहा गया था. मैं भी वृत्त का आरेख खींच रहा था. आरेखण की प्रक्रिया में कंपास बार-बार फिसलता जा रहा था. ज्योमिट्री पेपर स्निग्ध (चिकना) था. अतः मैने कंपास पर बलाघात् किया व ज्योमिट्री पेपर के घूर्णन से आरेख खींच लिया था.

यह जुगत प्रक्रिया को सुकर बनाने के उद्देश्य से की गई थी. आरेखण के इस दुर्लभ-प्रदर्शन को संभवतः गुरुजी ने भी देख लिया था.

उन्होंने पीछे से आकर धौल जमाकर मुझे धराशायी कर दिया था. बड़े कष्ट में मैं उठा. तो उन्होंने दूषित तरीका अपनाने का कारण पूछा. हमने भी भोलेपन में कह डाला-" बन तो गया है गुरु जी. आम खाने से मतलब होना चाहिए. पेड़ गिनने से क्या होगा." प्रकारांतर से हमने साध्य पा लेने की धौंस दिखायी थी. व साधन की पवित्रता-अपवित्रता के फेर में न पड़ने की दुहाई भी दी थी. गुरु तो गुरु ही होता है. उन्होंने हमें दीवार के सामने खड़ा कर दिया और हमें आदेश दिया-"इस दीवार पर सर्कल का आरेख खींचो. दीवार घुमाकर खींचो. याद रहे, कंपास नहीं घूमना चाहिए." उसके बाद उन्होंने जो किया वह वर्णनातीत है.

वे ज्यामितीय तरीके से साठ अंश, पैंतालीस अंश, साढ़े बाईस अंश के कोणों का अभ्यास कराते थे. छोटे डिनोंमिनेटर्स के कोणों का अधिकाधिक अभ्यास कराते थे. फोबियाग्रस्त विद्यार्थी बहुतायत में थे. मुंशी प्रेमचंद जी तक को गणित हिमालय-सी ऊँचाई का लगता था.

हमारे एक सहपाठी अग्रज थे. स्कूल और घर दोनों स्थलों पर वे इस विषय के सताए हुए थे. एक दिन उनके फूफाजी आए हुए थे. फूफा जी ने उन्हें 'मल्टीप्लीकेशन' का सवाल हल करने को दिया. भाई ने सवाल पर निगाह डाले बिना ही हथियार डाल दिए थे. लानत-मलानत सुनकर वह हाँफते हुए बाहर आए. मित्रों को आपबीती सुना रहे थे-" यार! फूफाजी ने एक सवाल की 'मट्टी पलीद' करने को दी. तो हमारी ही 'मट्टी पलीद' हो गई."

हालांकि लॉन्ग जंप में इनका प्रदर्शन उत्कृष्ट रहता था. एक बार लॉन्ग जंप की प्रैक्टिस चल रही थी. ये कूदने के लिए खोदे गए अधिकतम स्ट्रेच मार्क से बाहर अर्थात् साढ़े तेईस फीट कूदकर फ्रैक्चर करवा बैठे थे. उत्तर प्रदेश का स्टेट रिकॉर्ड तत्समय चौबीस फीट था.

गुरुजी कक्षा में वृक्ष का समूल तना लेकर आते थे. उसको वे शस्त्र के रूप में प्रयोग करते थे. उनके इस शस्त्र से दुर्ग-द्वार भी आसानी से ढ़हाया जा सकता था. उनके दर्शन होते ही त्रेता युग की याद आने लगती थी. किष्किंधा के दंडधरों के हाथों में भी यही शस्त्र रहा करता था. उसी से वे लंका के परकोटे तोड़ने में सफल होते थे. छात्र डरे-सहमे-से रहते थे. उनमें यह भय व्याप्त रहता था कि पाठ्यक्रम समाप्ति से पूर्व गुरुजी हमें ही समाप्त न कर दें.

साप्ताहिक टेस्ट लिए जाते थे. परिणाम में कमतर प्रदर्शन वालों को वे पूर्ण शक्ति से बाहर फेंक देते थे. एक 'असवाल' सरनेम वाले सहपाठी भी थे. उनका हाथ अक्सर तंग ही रहता था. वह अक्सर प्रक्षेपित किए जाते थे. फेंकते समय गुरुजी यह अवश्य दोहराते थे कि -"तुम्हारा तो सरनेम की असवाल है.वह इसलिए है क्योंकि तुमको सवाल आते ही नहीं हैं." वे प्रायः छात्र को बस्ता-बही सहित उठाकर पलायन वेग से प्रक्षेपित कर देते थे. प्रक्षेपण-यान व मानव-शरीर की सीमा-सामर्थ्य में व्यापक अंतर बताया जाता है. इस अंतर से गुरुजी की इच्छा अपूर्ण ही रह जाती थी. उनका प्रक्षेपित शिष्य केले की सघन वृक्षों की जद तक ही पहुँच पाता था. यह कदली वन वहाँ पर था, जहाँ पर स्कूल की सीमा समाप्त होती थी. वे स्थानच्युत शिष्य को भी यहीं से उच्च स्वर में आदेश देते थे. उन्हें निर्मेय की रचना व प्रमेय का अभ्यास करने की छूट अवश्य दे देते थे. कदली वन के अभ्यासी छात्रों मे से कुछ गणित में मेधावी होकर निकले थे. कुछ गणित के योग्यतम शिक्षकों में लब्धप्रतिष्ठ हुए तो कुछ लोक सेवाओं में भी चुन लिए गए थे.  

अर्द्ध वार्षिक परीक्षाओं के उपरांत कक्षा में कापियाँ दिखाई जाती थी अर्थात् छात्रों का प्रदर्शन दिखाए जाने की प्रथा थी. अधिक स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो 'आइना दिखाने' का चलन भी था.

हमारे एक सहपाठी कक्षा में दुर्लभ आसन में विराजते थे. वे बिना हत्थे की कुर्सी पर, कुर्सी की पीठ से वक्ष हटाकर वह उसके ऊपर चिबुक टिकाकर बैठते थे. इस दुर्लभ आसन वाले सहपाठी का प्राप्तांक सौ में से चार अंक था.  इन अंकों को देखकर अकस्मात् उन्हें पितृ-स्नेह का स्मरण हो आया था. फिर किसी अज्ञात प्रेरणा ने उन्हें ढ़ाढ़स बँधाया था.

उन्होंने लाल रोशनाई से एक रचनात्मक कार्य करने की ठान ली थी. कॉपी के शीर्ष पर 'चार' अंक के सम्मुख 'एक और चार' टिका दिया था. वैसे तो यह साहसिक कृत्य था. पर इस रहस्य को उन्होंने रहस्य ही रहने दिया था.

इन अंको की ब्रॉड-शीट में एंट्री की जाती है. इस अवसर पर गुरुजी ने अपनी स्मरण-शक्ति पर सारा जोर लगा डाला था. तो भी उनके स्मृति-कोष ने उन्हें सूचना दी कि-"उन्होंने उच्चतम स्कोर चालीस तक ही तो लुटाए हैं. फिर ये चवालीस का चमत्कार कैसे संभव हो सकता है." इस झोल को वे कुछ-कुछ समझ चुके थे. उन्होंने कॉपी की पुन: संवीक्षा की. कूटरचना का अनावरण हो चुका था. इस उद्विग्नता में उन्हें रात भर नींद नहीं आई थी.

अगले दिन असेंबली हो चुकी थी. दुर्लभ आसन वाले शिष्य कक्षा की ओर जा रहे थे. सहसा उसने अपने हाथ में एक फंदा-सा महसूस किया था. वह रुका, मुड़ा, मुड़कर देखा तो गुरुजी उसका पाणि ग्रहण चुके थे. वे खींचते हुए उसे प्राचार्य कक्ष की ओर ले जा रहे थे. जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़कर प्राचार्य कक्ष के दरवाजे से वे अलक्षित हो चुके थे. भीतर प्राचार्य उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. प्राचार्य ने इससे बड़े प्रेम से पूछा, "घबराने की कोई बात नहीं है. अपने मतलब के लिए तो क्या-क्या नहीं करना  है." ये सटासट-सटासट अपनी कार्रवाई का सारांश बता चुके थे. गुरुजी की विजयी मुस्कुराहट प्राचार्य की सूझ-बूझ की प्रशंसा कर रही थी. संक्षिप्त अभियोग चला था. 'समरी ट्रायल' टाइप का.

उसके पश्चात् जूरी ने छापामार युद्ध संहिता का पैंतरा अपनाया था. संयुक्त आक्रमण कर शत्रु को धराशायी किया जा चुका था. वैद्य नें इन्हे सप्ताह भर का विश्राम सुझाया था. औषध-पथ्य का नियमित सेवन भी कराया था. अगले सप्ताह सहपाठी दुर्लभ आसन पर पुनः विराजे हुए थे.

किसी छोटी कक्षा में तो इससे भी बड़ा चमत्कार हुआ था. यह 'दुर्लभ में दुर्लभतम्' टाइप का नवाचार था. किसी छात्र का प्राप्तांक सौ में से एक अंक था. पितृ-स्नेह का स्मरण होने पर उसने दाईं ओर एक शून्य बढ़ा दिया. उसके हितेषी मित्र ने उसे समझाया, "जुर्म करने पर भी ये मार्क्स, पासिंग मार्क्स नहीं बने हैं." इन वचनों को सुनकर वह अत्यंत हर्षित हुआ. इस वाणी ने उसे नितांत कलात्मक प्रयोग के लिए प्रेरित किया था. अतः उसने एक ही झटके में एक और शून्य बना लिया था. इस प्रकार एक नवीन प्रतिमान स्थापित तो हो गया था. 'बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी.' इनकी बात भी बहुत दूर तक गयी थी. अत: अगले दिन इनका अभियोग फुल बेंच के द्वारा सुना गया था. सूत्रों के अनुसार इन्हें बारी-बारी से धोया गया था. परिणाम सुनकर यह कक्षा में आए. तो ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो चौदहवीं शताब्दी के हों और अभी-अभी उत्खनन में प्राप्त हुए हों.


 गणित को भाषा में भी उच्च स्थान प्राप्त है. सद्भावना में एक और एक ग्यारह, दिन दूनी रात चौगुनी, चौदहवीं का चाँद का प्रयोग सुनने को मिलता है. विपरीतार्थक फेहरिस्त ज्यादा लंबी है. नौ दो ग्यारह होना, तीन में न तेरह में,  तिया-पाँचा करना, छत्तीस का आंकड़ा, दो और दो पाँच करना, आठ-आठ आँसू रोना व निन्यानबे के फेर में, बहुश्रुत उदाहरण है.

ललित मोहन रयाल