Sunday, February 24, 2013

कुम्भ की तस्वीरें - रोहित उमराव के कैमरे से - १








आजकल कोई भी मनुष्य मनुष्य का प्रचार नहीं करता



वस्तुओं का न्याय  

कुमार अम्बुज

आजकल कोई भी मनुष्य
मनुष्य का प्रचार नहीं करता
कोई नहीं कहता मुझे वापरिये - मैं आदमी हूँ

यह जरूर होता है कि जब मैं सड़क पार करता हूँ
पेड़ के नीचे सुस्ताता हूँ या रुकता हूँ लालबत्ती पर
अचानक एक आदमी आता है कहता है
इस तरफ आइयेमैं आपको एक वस्तु दिखाता हूँ

मैं एक मनुष्य को छूता हूँ
वह मुसकराता रहता है
कभी-कभी उसमें से एक बीप सुनाई देती है
तब मालुम होता है कि वह मनुष्य नहीं,वस्तु है

फिर मेरी पहचान एक मशीन करती है
जैसे वह मेरा भार जानती है और पासंग भी
वस्तुएँ ही करती हैं मेरा न्याय
वे मेरी हर चीज को दो खानों में रख देती है
कुल दो खानेः काला या सफेद
वे कहती हैं हम हमेशा सच बोलती हैं
लेकिन तुम झूठ बोल सकते हो,तुम मनुष्य हो

यदि हम झूठ बोल रही हों तो तय है
वह किसी मनुष्य का ही झूठ है.

Saturday, February 23, 2013

पेड़ तो इतनी बार बना हूँ कि पेड़ मुझे अपने जैसा ही मानते हैं



इच्छा और जीवन

-कुमार अंबुज

अपनी इच्छा में मैं बाँस के झुरमुट के बीच एक मचान पर रहता हूँ
यों ही घूमता फिरता हूँ उड़ता हूँ कुलाँचे भरता हूँ
कभी एक चिड़िया बन जाता हूँ और कभी हिरण
पेड़ तो इतनी बार बना हूँ कि पेड़ मुझे अपने जैसा ही मानते हैं
संभ्रम में कई बार मुझ पर रात में रहने चले आते हैं तोते
नदी के किनारे पत्थर बनकर सेंकता हूँ धूप

अपने जीवन में मैं मोहल्ले की तीसरी गली में रहता हूँ
गमले में उगी मीठी नीम देखता हूँ
रोज दाढ़ी बनाता हूँ  आहें भरता हूँ  नौकरी करता हूँ
बुखार आने पर खाता हूँ खिचड़ी और पेरासिटामॉल
एक झाड़ू कापपीते का और प्लास्टिक की
बाल्टी का करता हूँ मोल भाव
खाने में पत्नी से माँगता हूँ हरी मिर्च
चंद्रमा को देखता हूँ सितारों को देखता हूँ
और इच्छाओं को इच्छा के ही जादू से
            बना देता हूँ तारे।

Thursday, February 14, 2013

जे माइज़ेल के फ़ोटोग्राफ़ - १४






सब खोल के रख दिया है मिट्ठू ने


मिट्ठू हमारे घर में

-हरीश चन्द्र पांडे 

बाहर गये हुए हैं पड़ोसी
हफ़्ते भर से मेरे घर में है पड़ोसी का मिट्ठू

चहक उठा है घर

जो दिन भर चुप्प रहा करता था वह गाना गा रहा है उसके लिए
जो बात करने के नाम पर काटने दौड़ता था वह
सीटी सिखा रहा है
घर से निकलते वक़्त सब कहने लगे हैं
अच्छा मिट्ठू जा रहा हूँ
टूटा है पिता का लम्बा अबोल
उन्होंने आज बेटा कहा है मिट्ठू से

किसके पास कितनी मिठास बची है अभी भी
सब खोल के रख दिया है मिट्ठू ने

Wednesday, February 13, 2013

जे माइज़ेल के फ़ोटोग्राफ़ - १३






बुखार के अँधेरे दर्रे में मोमबत्ती जलाये मिलती है बचपन की दोस्त


उपकार

-कुमार अम्बुज

मुसकराकर मिलता है एक अजनबी
हवा चलती है उमस की छाती चीरती हुई
एक रुपये में जूते चमका जाता है एक छोटा सा बच्चा
रिक्शेवाला चढ़ाई पर भी नहीं उतरने देता रिक्शे से
एक स्त्री अपनी गोद में रखने देती है उदास और थका हुआ सिर
फकीर गाता है सुबह का राग और भिक्षा नहीं देने पर भी
गाता रहता है
अकेली भीगी कपास की तरह की रात में
एक अदृश्य पतवार डूबने नहीं देती जवानी में ही जर्जर हो गए हृदय को
देर रात तक मेरे साथ जागता रहता है एक अनजान पक्षी
बीमार सा देखकर अपनी बर्थ पर सुला लेता है सहयात्री
भूखा जानकर कोई खिला देता है अपने हिस्से का खाना
और कहता है वह खा चुका है
जब धमका रहा होता है चैराहे पर पुलिसवाला
एक न जाने कौन आदमी आता है कहता है
इन्हें कुछ न कहें ये ठीक आदमी हैं
बहुत तेजी से आ रही कार से बचाते हुए
एक तरफ खींच लेता है कोई राहगीर
जिससे कभी बहुत नाराज हुआ था वह मित्र
यकायक चला आता है घर
सड़क पर फिसलने के बाद सब हँसते हैं नहीं हँसती एक बच्ची
जब सूख रहा होता है निर्जर झरना
सारे समुद्रों, नदियों, तालाबों, झीलों और जलप्रपातों के
जल को छूता हुआ आता है कोई कहता है मुझे छुओ
बुखार के अँधेरे दर्रे में मोमबत्ती जलाये मिलती है बचपन की दोस्त
एक खटका होता है और जगा देता है ठीक उसी वक्त
जब दबोच रहा होता है नींद में कोई अपना ही
रुलाई जब कंठ से फूटने को ही होती है
अंतर के सुदूर कोने से आती है ढाढ़स देती हुई एक आवाज
और सोख लेती है कातर कर देनेवाली भर्राहट
इस जीवन में जीवन की ओर वापस लौटने के
इतने दृश्य हैं चमकदार
कि उनकी स्मृति भी देती है एक नया जीवन

यहाँ में कहाँ वह क़ुव्वत



यहाँ में कहाँ वह क़ुव्वत

- हरीश चन्द्र पांडे

यहाँ आटे की चक्की है

एक जंग लगे टिन को रगड़-रगड़
प्राइमर के ऊपर काला रंग पोत
सफ़ेद अक्षरों में लिखा गया है इसे
और टाँग दिया गया है बिजली के खम्भे के सीने पर

यहाँ आटे की चक्की है
इस इबारत के ठीक नीचे बना है एक तीर

यहाँ में कहाँ वह क़ुव्वत
कि ग्राहक को ठीक-ठाक पहुँचा सके चक्की तक

माना कि बड़ी सामर्थ्य है शब्द में