Thursday, February 25, 2010

होली को 'नज़ीर' अब तू खड़ा देखे है यां क्या



कविवर नज़ीर अकबराबादी विरचित होली के नायाब समुन्दर में से कुछ मोती आप पहले भी यहीं इस ठिकाने पर देख / पढ / सुन चुके हैं। इस सिलसिले को बढ़ाते हुए आज प्रस्तुत है ग्रन्थावली में संकलित नज़्म होली - ६ के सात अंतरों में से कुल पाँच अंतरे। यह बताना तो जरूरी नहीं फिर आप सहृदय लोग भूले न होंगे कि इस नज़्म के शुरुआती दो अंतरों को रोली सरन ने गाया भी है जो मुजफ्फर अली के संकलन 'हुस्न - ए - जानाँ' नामक कैसेट में शामिल है। साहब, मैं कबाड़ी आदमी हूँ कबाड़ संभालने का काम करता हूँ लेकिन तकनीक से दोस्ती बहुत कम है , अपन का मोबाइल भी 'टुक यूँ ही - सा ' ही है और ऊपर से होली का मौसम सो रिकार्डिंग कुछ कायदे की बन ना पाई । अब जैसी भी बन पड़ी है सो व सुनवाने लायक तो ना है। इसलिए केवल शब्द ,, स्वर के लिए माफी दै द्यो ! यह गुजारिश भी है अगर किसी के पास 'ऐ जान इधर देख ' का ठीकठाक आडियो होय तो होली का 'तोफ़ा' समझ के इस नाचीज को मेल कर देने का कष्ट उठावें और लौटती मेल से भतेरा 'सुकुरिया' पावें।

फिलहाल यह दोहराते हुए कि सबके साथ नज़ीर अकबराबादी की होली को साझा करने का यह क्रम जारी है... लीजिए पेश है नज़्म 'होली' का चुनिंदा अंश..

मिलने का तेरे रखते हैं हम ध्यान इधर देख।
भाती है बहुत हमको तेरी आन इधर देख।
हम चाहने वाले हैं तेरे जान ! इधर देख।
होली है सनम, हँस के तो इक आन इधर देख।
ऐ ! रंग भरे नौ - ग़ुले - खंदान इधर देख ॥

हम देखने तेरा यह जमाल इस घड़ी ऐ जाँन !
आये हैं यही करके ख्याल इस घड़ी ऐ जाँन !
तू दिल में न रख हमसे मलाल इस घड़ी ऐ जाँन !
मुखड़े पे तेरे देख गुलाल इस घड़ी ऐ जाँन !
होली भी यही कहती है ऐ जान ! इधर देख॥

है धूम से होली के कहीं शोर , कहीं गुल।
होता नहीं टुक रंग छिड़कने में तअम्मुल।
दफ़ बजते हैं सब हँसते हैं और धूम है बिल्कुल।
होली की खुशी में तू न कर हमसे तग़ाफुल।
ऐ जाँन ! हमारा भी कहा कहा मान इधर देख॥

है दीद की हर आन तलब दिल को हमारे।
जीते हैं फ़क़त तेरी निगाहों के सहारे ।
हर याँ जो खड़े आन के इस शौक़* के मारे।
हम एक निगाह के तेरे मुश्ताक हैं प्यारे।
टुक प्यार की नजरों से मेरी जान ! इधर देख॥

हर चार तरफ होली की धूमें हैं अहा ! हा !।
देखो जिधर आता है नजर रोज़ तमाशा।
हर आन चमकता है अज़ब ऐश का चर्चा।
होली को 'नज़ीर' अब तू खड़ा देखे है यां क्या।
महबूब यह आया , अरे नादान इधर देख।
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नौ - ग़ुले - खंदान = नए फूल जैसी मुस्कान वाले ( वाली )
तअम्मुल = सोच विचार
तग़ाफुल = देर , विलम्ब , विस्मृति
मुश्ताक =अभिलाषी, उत्सुक
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* पाठान्तर = शौक़ / शोख़
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( चित्र : नारायणन रामचंद्रन की कलाकृति , साभार )

5 comments:

Udan Tashtari said...

नज़ीर अकबराबादी को पढ़वाने का बहुत आभार!!

अमिताभ मीत said...

कमाल है.... आप यूं ही पढवाते रहिये..

नज़ीर अकबराबादी को तो जितना पढ़िए कम है. शुक्रिया शुक्रिया !!

abcd said...

जियो भिया जियो....

शब्दो का RED CARPET बीछा दिया है..

मोहब्बत मे--दिवान्गी-- का आलम है भैया --दिवान्गी-- का.....

Vinay said...

सिद्धेश्वर जी, किस पते पर भेजा जाए इस नज़्म का ऑडियो?

sidheshwer said...

विनय जी ईमेल पता मेरे प्रोफ़ाइल पर है। थोड़ा कष्ट कर लेवें प्लीज !