Wednesday, February 24, 2010

लीलाधर जगूड़ी से बतकही - 3

लेखक का गर्भाशय और अंग्रेजी का गुलशन नन्दा

(अनिल यादव द्वारा लिए गए लीलाधर जगूड़ी जी के साक्षात्कार का अन्तिम हिस्सा)



हमारे हिंदी साहित्य का उत्स पश्चिम में क्यों है। हमारे अपने परंपरागत साहित्य में क्यों नहीं?

साहित्य एक भौगोलिक या जातीय अभिव्यक्ति मात्र नहीं है। वह वैश्विक चेतना से जुड़ने का माध्यम भी है। बाजार के आगमन से बहुत पहले वैश्विकता से हमें साहित्य ने जोड़ा था। भारतीय संस्कृति में बाजार का विरोध कभी नहीं रहा। यहां कबीर भी बाजार में लुकाठी हाथ में लिए खड़े हैं। हम अपने पुराने मेलों की बात करें तो वे क्या हैं वे हमारे परंपरागत मॉल ही तो हैं। जहां जरूरत का हर सामान मिला करता था। बाजार ने उसी मेले को बंद, वातानुकूलित दीवारों में ला खड़ा किया है जहां जाने के लिए एकादशी या पूरनमासी का इंतजार नहीं करना पड़ता। हमारा विरोध अनैतिक बाजार से रहा है।

यह बाजार की नैतिकता क्या है?

जो चीजें जैसे हवा, पानी प्रकृति से सहज सबको उपलब्ध हैं, उनकी बिक्री नहीं की जानी चाहिए। उसे बीच में बोतलबंद कर दूध के भाव बेचने वाला अनैतिक है। विदेशों में होटलों में लिखा रहता है कि बाथरूम का पानी पिया जा सकता है क्यों कि वहां पानी की सार्वजनिक सप्लाई की जगह पर ही फिल्टर लगा दिया गया है ताकि साफ पानी सबको मिले। हमारे यहां ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि सबको बिसलेरी का पानी घर के नल में मिले। लेकिन तब पानी वाला ब्यापारी नाराज हो जाएगा और उस पार्टी को चुनाव में चंदा नहीं देगा। यह अनैतिकता है और यह कोई पश्चिम की देन नहीं है।

चलिए साहित्य का उत्स कहीं भी हो सकता है लेकिन उसकी तकनीक और औजार हमने उपनिषदों से क्यों नहीं लिए जिनके बारे में आप कहते हैं कि उनका ढांचा बहुत आकर्षक और वैज्ञानिक है?

लिया, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिया। लेकिन हिंदी के आधुनिक लेखकों ने पश्चिम से लिया लेकिन वे आचार्य हजारी प्रसाद से पीछे ही रहे। अपने अस्तित्व की गहरी समझ से जो बात निकलती है वह कुछ और ही असर लिए होती है।

हिंदी समाज के खाते-पीते पढ़ते तबके में लेखक, कवि, विचारकादि के प्रति तिरस्कार, उपेक्षा का भाव कैसे आया। इसके खत्म होने के आसार है क्या ?

गंभीर कवियों को तो लोग जानते नहीं। जानते मंचीय कवियों को हैं वह भी हास्य कवियों को। हास्य कवियों की दुकान लाफ्टर चैलेन्ज जैसे शोज ने बंद कर दी है। अब वे हवाई जहाज से कवि सम्मेलनों में नहीं जा पा रहे हैं।
हमारे यहां कोई यह नहीं बताता कि अच्छी कविता, अच्छा उपन्यास या कहानी क्या है। कौन लिख रहा है। बुरा सभी बताते हैं। आलोचना स्पान्सर्ड हो गई है और कूड़ा बहुत मात्रा में लिखा जा रहा है।

साहित्य का ह्रास हुआ लेकिन अच्छी बात हुई कि लोगों ने तकनीक को समझने की शुरूआत कर दी है। लोग अपने बच्चों का भविष्य तकनीक पढ़ाने वाले कालेजों में देख रहे हैं। लेकिन वैयक्तिक तकनीक चाहे वह मंत्र हो, यंत्र हो, पेन्टिंग हो से बच्चो को दूर कर रहे हैं। उसे हॉबी भी कह सकते हैं। हॉबी पिछड़ गई कैरियर हावी हो गया है। अच्छा होता कि हॉबी ही कैरियर भी बन जाती। लेकिन मान लिया गया है कि हॉबी बिकेगी नहीं पैसा नहीं ला सकती है।

क्यों बच्चे "हाऊ टू बी मिलेनियर इन अ वीक" टाइप साहित्य या चेतन भगत का साहित्य नहीं पढ़ रहे हैं क्या?
चेतन भगत... ऐसे तो गुलशन नंदा, रानू, कुश्वाहा कान्त टाइप बहुत से साहित्यकार हुए हैं। चेतन भगत भी अंग्रेजी में वही लिख रहे हैं। कुश्वाहा कांत जैसों में फिर भी एक विजन था चेतन भगत के पास तो वह भी नहीं है।

तो अच्छे लेखक कैसे बनते हैं?

नया लेखक जिस गर्भाशय में बनता है उसकी एक दीवार पुराने लेखकों से बनी होती है और दूसरी दीवार पर नया समाज और समय होता है। इसके बीच की झिल्ली में नए लेखक का जन्म होता है।

खैर आपको कविताई करते कितने साल हो गए?

यही कोई पचास साल। सन साठ के आसपास लिखना शुरू किया था।

इस समय को पलट कर देखते हुए...जिस काम में इतना समय, इतनी ऊर्जा और संसाधन लगाया उसे देखते हुए क्या यह नही लगता कि कुछ और करते तो बेहतर था?

मुझे तो लगता है यही काम और अधिक दक्षता से करना चाहिए था।

3 comments:

Ek ziddi dhun said...

मुझे यही हिस्सा सबसे ज्यादा दिलचस्प लगा. वो अच्छा लेखक बनने वाली बात बेहद भाई. बाकी बहुत सी बैटन पर तात्कालिक वमन मेरी बेवकूफी होगी. भारतीय दर्शन और पश्चिम किसे लेखन का उत्स बनायें या क्यूँ यह शर्त हो, इस पर सोचना जरूरी है और बड़े लोगों से समझना.

abcd said...

:-))

अशोक कुमार पाण्डेय said...

नया लेखक जिस गर्भाशय में बनता है उसकी एक दीवार पुराने लेखकों से बनी होती है और दूसरी दीवार पर नया समाज और समय होता है। इसके बीच की झिल्ली में नए लेखक का जन्म होता है।

वाह