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Friday, February 26, 2016
Friday, February 7, 2014
क्या-क्या बसन्त आकर उस वक़्त जगमगाई
नज़ीर
अकबराबादी साहेब की बसन्त सीरीज़ से एक और बेमिसाल नज़्म
मिलकर सनम से अपने हंगाम दिलकुशाई
हंसकर कहा ये हमने ए जां! बसन्त आई
सुनते ही उस परी ने गुल गुल शगुफ़्ता हो कर
पोशाक ज़रफ़िशानी अपनी वोही रंगाई
जब रंग के आई उसकी पोशाक पुर नज़ाकत
एक पंखुड़ी उठाकर नाज़ुक सी उंगलियों में
रंगत फिर उसकी अपनी पोशाक से मिलाई
जिस दम किया मुक़ाबिल कसवत से अपने उसको
देखा तो उसकी रंगत उस पर हुई सवाई
फिर तो बसद मुसर्रत और सौ नज़ाकतों से
नाज़ुक बदन पे अपने पोशाक वह खपाई
चम्पे का इत्र मल के मोती से फिर खुशी हो
सीमी कलाइयों में डाले कड़े तिलाई
बन ठन के इस तरह से फिर राह ली चमन की
देखी बहार गुलशन बहरे तरब फ़िज़ाई
जिस जिस रविश के ऊपर आकर हुआ नुमायां
किस किस रविश से अपनी आनो अदा दिखाई
क्या क्या बयां हो जैसे चमकी चमन चमन में
वह ज़र्द पोशी उसकी वह तर्ज़े दिलरुबाई
सदबर्ग ने सिफ़त की नरगिस से बेतअम्मुल
लिखने को वस्फ़ उसका अपनी कलम उठाई
फिए सहन में चमन के आया बहुस्नो ख़ूबी
और तरफ़ा तर बसन्ती एक अंजुमन बनाई
उस अन्जुमन में बैठा जब नाज़ो तमकनत से
गुलदस्ता उसके आगे हंस हंस बसन्त लाई
की मुतरिबों ने ख़ुश ख़ुश आग़ाज़े नग़्मा साज़ी
साक़ी ने जामे ज़र्रीं भर भर के मै पिलाई
देख उसको और महफ़िल उसकी ’नज़ीर’ हरदम
क्या-क्या बसन्त आकर उस वक़्त जगमगाई
मिलकर सनम से अपने हंगाम दिलकुशाई
हंसकर कहा ये हमने ए जां! बसन्त आई
सुनते ही उस परी ने गुल गुल शगुफ़्ता हो कर
पोशाक ज़रफ़िशानी अपनी वोही रंगाई
जब रंग के आई उसकी पोशाक पुर नज़ाकत
एक पंखुड़ी उठाकर नाज़ुक सी उंगलियों में
रंगत फिर उसकी अपनी पोशाक से मिलाई
जिस दम किया मुक़ाबिल कसवत से अपने उसको
देखा तो उसकी रंगत उस पर हुई सवाई
फिर तो बसद मुसर्रत और सौ नज़ाकतों से
नाज़ुक बदन पे अपने पोशाक वह खपाई
चम्पे का इत्र मल के मोती से फिर खुशी हो
सीमी कलाइयों में डाले कड़े तिलाई
बन ठन के इस तरह से फिर राह ली चमन की
देखी बहार गुलशन बहरे तरब फ़िज़ाई
जिस जिस रविश के ऊपर आकर हुआ नुमायां
किस किस रविश से अपनी आनो अदा दिखाई
क्या क्या बयां हो जैसे चमकी चमन चमन में
वह ज़र्द पोशी उसकी वह तर्ज़े दिलरुबाई
सदबर्ग ने सिफ़त की नरगिस से बेतअम्मुल
लिखने को वस्फ़ उसका अपनी कलम उठाई
फिए सहन में चमन के आया बहुस्नो ख़ूबी
और तरफ़ा तर बसन्ती एक अंजुमन बनाई
उस अन्जुमन में बैठा जब नाज़ो तमकनत से
गुलदस्ता उसके आगे हंस हंस बसन्त लाई
की मुतरिबों ने ख़ुश ख़ुश आग़ाज़े नग़्मा साज़ी
साक़ी ने जामे ज़र्रीं भर भर के मै पिलाई
देख उसको और महफ़िल उसकी ’नज़ीर’ हरदम
क्या-क्या बसन्त आकर उस वक़्त जगमगाई
Tuesday, February 4, 2014
धरती के बेल बूटे, अन्दाज़े नौ से फूटे

ताहिरा सैयद कर रही हैं
बसन्त का इस्तकबाल.
यहां इस बात का ज़िक्र बेमानी नहीं
होगा कि यही रचना उनकी माता मल्लिका पुखराज भी गा चुकी हैं.
लो फिर बसन्त आई, लो फिर
बसन्त आई, फूलों पे रंग लाई.
...लो फिर बसन्त
आई, लो फिर बसन्त आई, फूलों
पे रंग लाई...
चलो बे दरंग, लबे आबे
गंग, बजे जलतरंग, मन पर उमंग
छाई,
लो फिर बसन्त आई , फूलों पे
रंग लाई ,
आफत गई खिज़ां की, किस्मत
फिरी जहाँ की,
चले मै गुसार, सूये लाला
जार, मै पर्दादार, शीशे के
दर से झाँकी ,
आफत गई खिज़ां की, किस्मत
फिरी जहाँ की,
खेतों का हर चरिंदा, खेतों हर
चरिंदा, बागों का हर परिंदा ,
कोई गर्म खेज़, कोई नग़मा
रेज़, सुब को और तेज़,
फिर हो गया है ज़िन्दा, बागों का
हर परिंदा ,
खेतों का हर चरिंदा , धरती
के बेल बूटे,
अन्दाज़े नौ से फूटे, हुआ पख्त
सब्ज़, मिला रख्त सब्ज़,
हैं दरख्त सब्ज़ , बन
बन के सब्ज़ निकले ,
धरती के बेल बूटे, अन्दाज़े
नौ से फूटे,
है इश्क़ भी, जुनूं भी, है इश्क़ भी, जुनूं भी,
कहीं दिल में दर्द, कहीं आह
सर्द, कहीं रंग ज़र्द ,
है यूँ भी और यूँ भी , मस्ती
भी जोशे खूँ भी ,
है इश्क़ भी, जुनूं भी,
फूली हुई है सरसों , फूली
हुई है सरसों,
भूली हुई है सरसों , नहीं
कुछ भी याद,
यूँ ही बामुराद, यूँ ही
शाद शाद ,
गोया रहे कि बरसों, फूली हुई
है सरसों,
फूली हुई है सरसों, इक नाज़नीं
ने पहने, इक नाज़नीं ने पहने,
फूलों के ज़र्द गहने, है मगर
उदास, नही पी के पास,
घमो रंजो यास , दिल
को पड़े हैं सहने , इक नाज़नीं ने पहने,
फूलों के ज़र्द गहने, लो फिर
बसन्त आई,
लो फिर बसन्त आई, फूलों पे
रंग लाई, लो फिर बसन्त आई ,
(फ़ोटो 'ट्रिब्यून' से साभार)
Wednesday, January 20, 2010
लो फिर बसन्त आई
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