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Tuesday, October 29, 2013

राजेन्द्र यादव का निधन


‘हंस’ के संपादक और हिन्दी के वरिष्ठ रचनाकर्मी राजेन्द्र यादव का कल देर रात निधन हो गया.


कबाड़खाने की और से श्रद्धांजलि.

राजेन्द्र यादव का यह परिचय http://www.literatureindia.com से साभार -
राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को आगरा में हुआ था। उनके पिता चिकित्सक थे। वे आंरभिक वर्षों में पिता के साथ मेरठ के कई जगहों पर रहे। मिडिल की परीक्षा उन्होंने सुरीड़ नामक जगह से पास की। फिर उसके बाद पढ़ने के लिए मवाना (मेरठ) अपने चाचा के पास गए। वहीं हॉकी खेलते हुए पैरों में चोट लग गई जिसके कारण उनके पैर की एक हड्‌डी को निकालना पड़ा। उसी दौरान उन्होंने उर्दू की कहानियों-उपन्यासों आदि को पढ़ा। चाचा का तबादला झांसी होने के कारण वे झांसी चले गए और वहीं से उन्होंने  मैट्रिक (1944) किया।उन्होंने आगरा कॉलेज से बी..(1949) किया। आगरा विश्वविद्यालय से ही उन्होंने एम..(1951) भी किया। उसके बाद सन्‌ 1954 में वे कलकत्ता चले गए तथा 1964 तक वहीं रहे। उन्होंने वहीं ज्ञानोदय दो बार छोटी-छोटी अवधि के लिए नौकरी भी की। सन्‌ 1964 में दिल्ली आने पर अक्षर प्रकाशन की स्थापना की और कई महत्वपूर्ण लेखकों की प्रथम रचना को छापा। सन्‌ 1986 से वे साहित्यिक मासिक हंस का संपादन कर रहे हैं।

 नवीन सामाजिक चेतना के कथाकार राजेन्द्र यादव की पहली कहानी प्रतिहिंसा’(1947) कर्म योगी मासिक में प्रकाशित हुई थी। उनके पहले उपन्यास प्रेत बोलते हैं जो बाद में सारा आकाश’ (1959) नाम से प्रकाशित हुई उन्हें अपने समय के अगुआ उपन्यासकारों में स्थापित कर दिया। राजेन्द्र यादव नई कहानी आंदोलन के कुछ महत्वपूर्ण कथाकारो में गिने जाते हैं।

अपनी कहानी में उन्होंने मानवीय जीवन के तनावों और संघर्षों को पूरी संवेदनशीलता से जगह दी है। नगरीय जीवन के आतंक और विडंबना को बड़ी कुशलता से वे सामने लाये। उनकी एक कमजोर लड़की की कहानी’ ‘जहां लक्ष्मी कैद है’ ‘अभिमन्यु की आत्महत्याछोटे-छोटे ताजमहल’ ‘किनारे से किनारे तक जैसी कहानियां हिन्दी की ही नहीं विश्व साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में गिनी जाती हैं। देवताओं की मूर्तियां’ ‘जहां लक्ष्मी कैद है’ (1957) ‘छोटे-छोटे ताजमहल’(1961)’टूटना और अन्य कहानियां’(1987) उनके अन्य कहानी संग्रह हैं। उनकी अब तक की तमाम कहानियां पड़ाव-1′ ‘पड़ाव-2′ और यहांतक शीर्षक से तीन जिल्दों में संकलित हैं।
राजेन्द्र यादव औपन्यासिक चेतना के कथाकार माने जाते हैं। उनका पहला उपन्यास सारा आकाश हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों में से एक है। सारा आकाश की लगभग आठ लाख प्रतियांं बिक चुकी हैं। सारा आकाश की कहानी एक रूढ़िवादी निम्नमध्य वर्गीय परिवार की कहानी है जिसका नायक एक अव्यवहारिक आदर्शवादी है। आज की आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था किस प्रकार एक आदर्शवादी मनुष्य को समझौतावादी बना देती है- यह उनके उपन्यास उखड़े हुए लोग’ (1956) की मुख्य कथा वस्तु है। शह और मात’(1959) डायरी शैली में लिखा गया उपन्यास है।उपन्यास कुलटा समाज के उच्चवर्गीय महिलाओं की खिन्नता को उजागर करती है। अपनी लेखिका पत्नी मन्नू भंडारी के साथ लिखा गया उपन्यास एक इंच मुस्कान खंडित व्यक्तित्व वाले आधुनिक व्यक्तियों की प्रेम कहानी है। अनदेखे अनजाने पुल’ ‘मंत्र विद्ध’(1967)
उनके अन्य उपन्यास हैं जो जीवन और उसके विरोधाभासों को और भी स्पष्टता में दिखाते हैं। आवाज तेरी है ‘(1960) नाम से उनकी कविताओं का एक संग्रह भी प्रकाशित है।

उन्होंने समीक्षा निबंध की कई पुस्तकें भी लिखी हैं। कहानी :स्वरूप और संवेदना’ (1968) ‘कहानी :अनुभव और अभिव्यक्ति ‘(1996) और उपन्यास :स्वरूप और संवेदना’(1997) आलोचना की महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। दस खंडों में प्रकाशित कांटे की बात श्रृंखला में उनके हंस मेंं छपे संपादकीय को मुख्यत:लिया गया है। औरों के बहाने’ 1981 में प्रकाशित हुई थी। नए साहित्यकार पुस्तकमाला की श्रृंखला में मोहन राकेश कमलेश्वर फणीश्वनाथ रेणु मन्नू भंडारी तथा स्वयं अपनी लिखी हुई चुनिंदा कहानियों का उन्होंने संपादन किया।

कथा दशक’(1981-90) ‘हिन्दी कहानियां :आत्मदर्पण’(1994) ‘काली सुर्खियां’(1994 अफ्रीकी कहानियां) और एक दुनियां समानांतर का भी उन्होंने संपादन किया।उनके द्वारा किए गए महत्त्वपूर्ण अनुवादों में हमारे युग का एक नायक’ (लमेल्तोव) ‘प्रथम प्रेम’ ‘वसंत प्लावन’ (तुर्गनेव) ‘टक्कर’(चेखव) ‘संत सर्गीयस’ (टालस्टॉय) ‘एक महुआ :एक मोती’ (स्टाइन बैक) और अजनबी’ (अलबेयर कामू) हैं। मुड़-मुड़ के देखता हूं’ (2001) ‘वे देवता नहीं हैं ‘(2000) और आदमी की निगाह में औरत’ (2001) उनके संस्मरणों के संग्रह हैं।

Tuesday, October 15, 2013

कोलाहलमय कारस्तानियों पर चुप्पी के खतरे


जानता हूं
, ज्यादातर लोगों की दिलचस्पी सिर्फ जल्दी से उस वीडियो को देखकर भर्त्सना में छिपी उत्तेजित किलकारी मारते हुए आगे बढ़ लेने में है ताकि प्रधानमंत्री, पड़ोसन, चुनिंदा मॉडलों और धर्माचार्यों के अलग अलग रस देने वाले अन्य वीडियो देखने के लिए आंखे मुस्तैद रख सकें. फिर भी कभी न कभी मुझे इस व्यापार में पड़ना ही था. तो आज ही क्यों नहीं?

बीती मई में राजेन्द्र यादव से जिन्दगी में पहली बार कायदे से मुलाकात हुई. साल के शुरू में उन्होंने अपनी बेटी रचना के जरिए मेरा ट्रैवलॉग मंगाकर पढ़ा था, पाठकों से उसे पढ़ने की सिफारिश करते हुए प्रशंसा के झाग से उफनाता संपादकीय हंस में लिखा था. उससे पहले दुआ सलाम भर थी. उन्होंने दो बार मेरी लंबी कहानी नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं को यह कहते हुए कहानी मानने से ही इनकार कर दिया था कि इसमें कोई नायक नहीं है. मेरा कहना था, नायक समाज में ही नहीं है तो कहानी में जबरदस्ती चला आएगा?

मैने पहले ही शर्त रख दी थी कि मैं आपसे सिर्फ महिला लेखिकाओं और सेक्स व क्रिएटिविटी के बीच के धागों पर बात करना चाहता हूं. वे राजी थे और जरा खुश भी.

मयूर विहार के उनके घर में अभी अंडे की भुजिया से भाप उठ रही थी, पहला पेग हाथ में था, कान भी गरम नहीं हुए थे कि हिन्दी की नई सनसनी ज्योति कुमारी का जिक्र चला आया. पैतृक पृष्ठभूमि, कलही दाम्पत्य, अलगाव, बीमार विचार का डिक्टेशन, बेस्ट सेलर लेखिका, नामवर सिंह की समीक्षा, महत्वाकांक्षा वगैरा से ऊबा डालने की सीमा पर (मैं पहले कुछ पुरानी लेखिकाओं के बारे में सुनना चाहता था) उन्होंने कहा, उसके बिना अब मेरा काम नहीं चलता. उस पर बहुत निर्भर हो गया हूं. सोती बहुत है. मैं ही रोज फोन करके जगाता हूं.

अच्छी लड़की है...उन्होंने गर्व से कहा. उसके बिना मैं अब कुछ नहीं कर पाता.

मैने सुना...मेरे अनुकूल लड़की है. इन दिनों जीवन में जो अच्छा है उसी की वजह से है.

अब तो शरीर निष्क्रिय हो चुका होगा. आप क्या कर पाते होंगे.

तुम्हारा क्या मतलब है?’ उन्होंने मुझे मोटे लेंसों के कारण और बड़ी दिखती, थकी आंखों से मुझे घूरा.

ये तो कोई चमत्कार ही होगा कि आप इस उम्र में भी सेक्सुअली एक्टिव होंगे.

मन नहीं मानता... उन्होंने कुर्ते के गले के ऊपर ऊपर बेचैनी से पंजा हिलाते हुए कहा, कभी सीने से चिपका विपका लिया, सहला दिया. और क्या होना है.

गिल्ट फील नहीं होता आपको?’

नहीं तो. क्यों होगा. मैं जबरदस्ती नहीं करता. किसी को ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं करता.

मन्नू जी से बात होती है.’

उससे...आज ही हुई थी. बायोडाटा का सही अनुवाद क्या होगा. इस पर हम दोनों देर तक माथापच्ची करते रहे.

थोड़ा ठहर कर  गिलास को देखते हुए सहज भाव से उन्होंने कहा, पंजाबी में एक शब्द है ठरक. सुना है कभी.

फिर मुझे देखा, समझ लो कि वही ठरकी बुड्ढा हूं.’

हमारे यहां भोजपुरी में इसका पैरेलल है हिरिस. ऐसी दुर्निवार कामना जो कहते हैं कि कपाल क्रिया के बाद भी खोपड़ी में बची रहती है.’

*

अस्मिता बचाने के साहसिक अभियान पर निकली ज्योति कुमारी सबको बता रही हैं कि राजेंद्र यादव उन्हें बेटी की तरह मानते थे. और इसके अलावा कोई रिश्ता नहीं था. वह ऐसा करके एक कल्पित नायिका स्टेटस और शुचिता की उछाल पाने के लिए एक संबंध और अपने जीवन को ही मैन्यूपुलेट कर रही हैं. वह उस असल तथ्य को ही झूठ के नीचे दफन कर दे रही हैं जो वीडियो बनाने, ब्लैकमेल की कोशिश, झगड़ा, कपड़े फटने और प्रमोद नामक युवा के जेल जाने की वजह है. यह अस्वाभाविक नहीं है कि लोग मानते हैं कि एक कहानीकार के तौर खुद को धूमधड़ाके से प्रचारित करने के लिए उन्होंने ऐसा ही एक और मैन्यूपुलेशन किया होगा. दूसरी ओर राजेंद्र यादव एक बमुश्किल परिचित आदमी के सामने खुद को ठरकी बुड्ढा कहते हुए ज्योति के साथ अपनी अंतरंगता को स्वीकार करते हैं. इस पेंचीदगी और खुलेपन के बीच एक बड़ा समकालीन सच फंसा हुआ है.

*

ज्योति कुमारी अकेली नहीं हैं. हमारे बौद्धिक तबके द्वारा उपलब्ध कराया जीवन का पुराना मॉडल यही है. हिन्दी का विचारक, लेखक, बुद्धिजीवी ऐसे जीता है जैसे बेचारा जन्मते ही बधिया कर दिया गया हो. जो यौन आवेग उसके मन और शरीर के सबसे अधिक स्पेस में दनदनाते रहते हैं और उसका रोजमर्रा का व्यवहार निर्धारित करते हैं वही लेखन और वक्तव्यों से नदारद हो जाते हैं. यह ऑटो सेन्सर है जिसका काम हर तरह के खतरे से सुरक्षित रखना और भली छवि के साथ कल्पित कीर्ति दिलाना है. वह अपनी रचनाओं में एक अधकचरा, लिजलिजा जीवन प्रस्तुत करता है जो दरअसल कहीं होता ही नहीं. इसीलिए पाठक उसकी ओर आंख उठाकर देखता भी नहीं क्योंकि वह कहीं अधिक मुकम्मल जीवन को भोग रहा होता है.

जिस देश में सेक्स के मंदिर हों, शास्त्र सम्मत चौरासी आसन हों, कामसूत्र हो, कालिदास जैसा कवि हुआ हो, सर्वाधिक प्रकार के विवाहों और संतानोत्पत्ति के प्रयोगों का अतीत हो वहां के लेखक की सांस शरीर के अंगों, चुंबन, हस्तमैथुन, सोडोमी के जिक्र से उखड़ने लगती है. वह आतंकित होकर कलम फेंक देता है. साहित्य की एक नकली भाषा ईजाद की गई है जिसमें वे गालियां तक नहीं है (मंटो, इस्मत चुगताई, उग्र, काशीनाथ सिंह, राजकमल चौधरी जैसे कुछ अपवाद भी हैं) जिन्हें घरों, खेतों, सड़कों पर सुनते हुए हर भारतीय बच्चा बड़ा होता है. हमारे लेखक की हालत हिन्दी भाषी देहाती महिला से भी गई बीती है जो स्त्री रोग विशेषज्ञ डाक्टर के सामने समझ ही नहीं पाती कि अपनी समस्या कैसे कहे. पूछा जाना चाहिए कि बातूनी होने के लिए निन्दित हिन्दी पट्टी की महिला के अंतर को किसने लकवाग्रस्त कर डाला है?

ज्योति कुमारी और बुद्धिजीवी ही नहीं पूरे हिन्दी समाज में शरीर, सेक्सुअलिटी समेत हर ऐसी चीज के आसपास चुप्पी से गूंजता हुआ ब्लैकहोल है जिसे कहने के लायक नहीं समझा जाता है. पूजा पंडाल, संतों के प्रवचनस्थल, मंदिर, बस, ट्रेन या किसी भी भीड़ वाली जगह पर एक बिडंबना को मंचित होते देखा जा सकता है. पुरूष शातिर चोरों की तरह औरतों को टटोलते, मसलते रहते हैं, औरतें बुत की तरह अनजान बनी खड़ी रहती हैं क्योंकि जो चल रहा है उसके बारे में बात करने का रिवाज नहीं है. शारीरिक जरूरतें अदम्य हैं लेकिन उन पर समाज गूंगा है लिहाजा वे पूरा होने के लिए ताकत, तिकड़म, प्रलोभन के आदिम, बर्बर, निःशब्द रास्ते खोजती हैं. यह चुप्पी ही वह जगह है जहां औरतों पर सेक्सुअल हमलों, बलात्कार, योजनाबद्ध यौनशोषण के समीकरण बनाए और अमल में लाए जाते हैं। अगर सेक्सुअलिटी की अभियक्ति हमारे जीवन का हिस्सा होती तो शायद किसी महिला या पुरूष के साथ जोर जबर्दस्ती की स्थितियां ही नहीं बनतीं. सबसे पहले तो यही होता कि हम सिनेमा के परदे पर बलात्कार से कामुक उत्तेजना की खुराक खींचना बंद कर देते.

देर सबेर युवाओं को समाज और हिंदी साहित्य में सेक्सुअलिटी पर एक दिन खुलकर बात करनी ही पड़ेगी क्योंकि बलात्कार, शोषण और यौन हमले असंख्य सुराखों वाले हमारे जर्जर लोकतंत्र में कानून और पुलिस के रोके रूकने वाले नहीं हैं. यौन अपराधों को रोकने वाले खुद यौन हिंसा के अलावा और कोई तरीका नहीं जानते. अभी तो पुलिस वाले समलैंगिकों से बलात्कार और बलात्कारियों की गुदा में पेट्रोल टपकाने और उत्पीड़ित महिलाओं से बलात्कार का पुनर्मंचन कराने में ही व्यस्त हैं. 

मिशेल फूको ने किसी और से अधिक, हिन्दी की सबसे नई पीढ़ी से ही कहा था- एक रोज लोग ये सवाल पूछेंगे कि अपनी सबसे कोलाहलमय कारस्तानियों पर छायी चुप्पी को बनाए रखने पर हम इतने आमादा क्यों हैं?

*

इसमें कोई शक नहीं राजेन्द्र यादव हिन्दी के अकेले संपादक हैं जिन्होंने महिलाओं, दलितों की फुसफुसाहटों को मुखर बनाने के साथ ही इस चुप्पी को तोड़ने के सर्वाधिक साहसिक प्रयोग किए हैं और उसकी कीमत भी चुकाई है. उनके बनाए कई वीर बालक और बालिकाएं हैं जो सीमाएं तोड़ने के संतोष और निन्दा के अभिशाप के बीच आगे का रस्ता खोज रहे हैं.

लेकिन उनका कसूर यह है अपनी ठरक को सेक्सुअल प्लेज़र तक पहुंचाने की लालसा में उन्होंने आलोचकों (जिसमें नामवर सिंह भी शामिल हैं), प्रकाशकों, समीक्षकों की मंडली बनाकर ढेरों अनुपस्थित प्रतिभाओं के अनुसंधान का नाटक किया, चेलियां बनाईं और साहित्य के बाजार में उत्पात मचाने के लिए छोड़ दिया जो खुद उन्हें भी अपने करतबों से चकित कर रही हैं.


जनपक्षधरता, नाकाबिले-बयान समझी जाने वाली चीजों को व्यक्त करने के प्रयोगों, डेमोक्रेटिक टेम्परामेन्ट, लेखकीय ईमानदारी और लगभग बिना संसाधनों के जनचेतना को प्रगतिशील बनाने की कोशिशों का क्या यही हासिल होना था. ऐसा क्यों हुआ कि विवेक के फिल्टर से जो कुछ जीवन भर निथारा उसे अनियंत्रित सीत्कार और कराहों के साथ मुंह से स्खलित हवा में उड़ जाने दिया. अगर वे मूल्य इतने ही हल्के थे तो राजेंद्र यादव को 'हंस' निकालने की क्या जरूरत थी? किसी सांड़ की तरह यौनेच्छाओं की पूर्ति करते और मस्त रहते. जिस तरह आसाराम बापू नामक संत से अनपेक्षित था था कि वह समस्याग्रस्त भक्तिनों को सेक्स के लिए फुसलाएगा और धमकाएगा वैसे ही 'हंस' के संपादक से भी उम्मीद नहीं थी कि वह किसी लड़की को दाबने-भींचने के लिए जीवन भर की अर्जित विश्वसनीयता, संबंधों और पत्रिका की सर्कुलेशन पॉवर को सेक्सुअल प्लेज़र के चारे की तरह इस्तेमाल करने लगेगा. ज्योति कुमारी का महत्वाकांक्षी होना अपराध नहीं था लेकिन उन्होंने इसे उसकी कमजोरी की तरह देखा, उसे साहित्य का सितारा बनाने के प्रलोभन दिए और उसका इस्तेमाल किया. 

अब भी राजेन्द्र यादव को पिता बताकर ज्योति कुमारी उनकी मदद ही कर रही हैं. अगर वाकई उन्हें स्त्री अस्मिता के लिए लड़ना है तो पहले वात्सल्य और कामुकता में फर्क को स्वीकार करना पड़ेगा. वरना इस समाज को तो देवी और देवदासी, बहन और प्रेमिका, सेक्रेट्री और रखैल के बीच के धुंधलके में चलने वाले खेलों से मिलने वाली उत्तेजना पर जीने की आदत पड़ चुकी है.

Sunday, October 13, 2013

कब तोड़ेंगे चुप्पी आप?

हिन्दी साहित्य के परिदृश्य पर इधर के दो-चार सालों में घटनाएं कम घटी हैं दुर्घटनाएं और प्रकरण ज़्यादा. जैसे मोबाइल फ़ोनों में कैमरे लगने के बाद अश्लील एमएमएस बनाने का रिवाज़ चल निकला था और इंटरनेट के प्रसार के बाद उन्हें बाकायदा शीर्षक दिए गए ताकि सुधीजनों को वांछित अश्लील एमएमएस खोजने में दिक्कत न हो; मिसाल के तौर पर डीपीएस स्कैंडल, मिस जम्मू स्कैंडल वगैरह वगैरह ... उसी तरह हिन्दी साहित्य भी पिछले कुछ महीनों से ऐसे ही शीर्षक पैदा कर रहा है – छिनाल प्रकरण, साहित्य अकादमी पुरुस्कार प्रकरण वगैरह, वगैरह. और हिन्दी का बड़ा वर्ग जिसमें पाठक और रचनाकार दोनों शामिल हैं - इसका रस लेता नज़र आ रहा है. पत्रिकाएँ एक से एक सनसनीखेज़ विशेषांक निकाल रही हैं. ख़ूब इनाम बंटते-बंटवाये जाते हैं, इनकी राजनीति की चर्चा होती है, ख़ूब थू थू ख़ूब ही ही हा हा होती है.   
यहाँ मैं फ़क़त अपनी तुच्छ दृष्टि की बात कर रहा हूँ. इसका पहला विशुद्ध परिणाम व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह रहा है कि हिन्दी के समकालीन लेखन के प्रति मेरी दिलचस्पी काफ़ी कम हुई है और घर में आने वाली तमाम पत्रिकाओं में से कई को तो अब खोलने तक का मन नहीं करता.
फ़िलहाल कल शाम से दिमाग भन्नाया हुआ है – फेसबुक पर एक मित्र की वॉल पर किन्हीं आशीष कुमार ‘अंशु’ ने ज्योति कुमारी से अपनी लंबी बातचीत का लिंक पोस्ट किया हुआ था. आशीष एक ब्लॉग बतकही चलाते हैं. यह दुर्भाग्य मेरे हिस्से आना था कि मैं उस लिंक की मार्फ़त हिन्दी साहित्य के तथाकथित उदार लोकतांत्रिक घटिया नैक्सस के एक और रूप से परिचित हुआ. इस तरह का खटका मन में पहले से था तो पर पहली बार किसी ‘बड़ी’ पत्रिका से सम्पादक से सम्बंधित किसी वाकये को पढ़ते हुए लगा जैसे ‘मनोहर कहानियां’ पढ़ रहा हूँ. और इसी बड़ी पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के शुरुआती दौर में मैंने हिन्दी साहित्य से जुड़ना शुरू किया था. समय बीतते बीतते पत्रिका की भाषा बेलगाम होती गयी और कोई दसेक साल से मैंने इस पत्रिका को देखने की ज़रुरत तक महसूस नहीं की है. 

आशीष कुमार 'अंशु' की वॉल पर एक पाठक Mahi Singh की टिप्पणी ये रही:

''दो तीन दिन से आशीष कुमार 'अंशु' भाई का पोस्ट पढ़ रहा हूँ ... किसी राजेंद्र यादव के बारे में है , वो जो कि साहित्य के एक बड़े नाम है , मै नहीं जानता कि वो क्या है ? पर साहित्य से थोडा प्रेम होने के कारण टिप्पणी को विवश हूँ और इतना तो जरुर कहूँगा कि आज के इन तथाकथित साहित्यकारों ने साहित्य को दोयम दर्जे पर खड़ा कर दिया है. जो साहित्य समाज का आईना कहलाता था आज वो आईना धुंधला पड़ गया है.''
यह एक पाठक की प्रतिक्रिया है जो युवा है और पढ़ना चाहता है. खैर जाने दीजिये.  
अफ़सोस मुझे इस बात का है कि हिन्दी के सारे महामना शुतुरमुर्ग बने हुए हैं. 


भाई आशीष कुमार ‘अंशु’ ने ज्योति कुमारी से लंबी बातचीत के अंत में लिखा है कि वे दूसरी पार्टी की बात सुनने से पहले इस ‘कहानी’ को पूरा नहीं मानेंगे अलबत्ता रात अपनी फेसबुक वॉल पर आशीष कुमार ‘अंशु’ ने यह लिखा – जैसा कि इस श्रृंखला के पहले अंक में लिखा गया था कि यह कहानी अधूरी है, जब तक राजेन्द्र यादव का पक्ष इसके साथ नहीं जुड़ जाता. इस संबंध में बतकही की तरफ से राजेन्द्र यादव से उनका पक्ष को जानने के उद्देश्य से फोन किया गया था, श्री यादव के अनुसार- इस संबध में उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है. राजेन्द्रजी का पक्ष अभी भी हमारे लिए महत्वपूर्ण है. यदि उनका पक्ष नहीं आता तो ज्योति के बयान पर उनका यह मौन, ‘सहमतिमाने जाने का भ्रम उत्पन्न करेगा. वैसे राजेन्द्र यादव के शुभचिन्तक कह रहे हैं कि राजेन्द्र यादव ब्लॉग को गंभीर माध्यम नहीं मानते, यदि उन्हें जवाब देना होगा तो हंस के नवम्बर अंक में अपने संपादकीय के माध्यम से देंगे. वास्तव में हमारे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उनका पक्ष कहां आता है, किसके माध्यम से हम सबके बीच आता है. महत्वपूर्ण यह है कि उनका पक्ष सबके सामने आए. बहरहाल आशीष कुमार अंशुसे ज्योति कुमारी की बातचीत का दूसरा भाग यहां प्रकाशित कर रहे हैं. इस बातचीत को साक्षात्कार या रिपोर्ट कहने से अच्छा होगा कि हम बयान कहें. चूंकि पूरी बातचीत एक पक्षीय और घटना केन्द्रित है. यहां गौरतलब है कि दूसरा पक्ष जो राजेन्द्र यादव का है, उन्होंने इस विषय पर बातचीत से इंकार कर दिया है. फिर भी उनका पक्ष उनकी सहमति से कोई रखना चाहे तो स्वागत है. यदि राजेन्द्र यादव स्वयं अपनी बात रखें तो इससे बेहतर क्या होगा?

उन्होंने मुझे अनुमति दी है कि मैं उनकी इस पोस्ट का इस्तेमाल कर सकता हूँ. कबाड़खाने में इस पूरी की पूरी पोस्ट को लगाता हुआ मैं उम्मीद कर रहा हूँ कि हिन्दी के कुछ ‘बड़े’ लेखकों का जमीर जागेगा और वे कुछ तो कहेंगे. चाहे गाली ही दे जाएं. वैसे भी ‘राजेन्द्र यादव ब्लॉग को गंभीर माध्यम नहीं मानते’. और इतने खुलासों के बाद भी किसी और तस्दीक की ज़रुरत है क्या. ज्योति कुमारी स्त्री पहले हैं और लेखिका बाद में. एक बहादुर स्त्री की बहादुरी को कबाड़खाने का सलाम. इसे यहाँ पोस्ट करने की अनुमति देने के लिए भाई आशीष कुमार ‘अंशु’ का आभार. 
मूकदर्शक बने रहे राजेन्द्र यादव: ज्योति कुमारी
जुलाई 2013 में एक खबर आई थी कि राजेन्द्र यादव की प्रिय लेखिका ज्योति कुमारी ने ‘हंस’ का बहिष्कार किया है. सितम्बर के संपादकीय में ज्योति को लेकर श्री यादव का अनर्गल प्रलाप छपा. अक्टूबर संपादकीय में उन्होंने अपनी गलती के लिए युवा लेखिका से क्षमा मांग ली. राजेन्द्र यादव और हंस के बहिष्कार को लेकर आशीष कुमार ‘अंशु’ ने ज्योति कुमारी से लंबी बातचीत की. ज्योति ने विस्तार से पूरी कहानी बयान की. इस कहानी में यदि आने वाले समय में राजेन्द्र यादव का पक्ष शामिल होता है तो यह कहानी पूरी मानी जाएगी. यहां प्रस्तुत है, ज्योति का बयान, जैसा उन्होंने आशीष को बताया. 

‘हंस’ का बहिष्कार करना किसी भी नई लेखिका के लिए आसान फैसला नहीं होता. खास तौर पर जब मेरे लेखन की अभी शुरूआत है. इस बात से कोई इंकार नहीं है कि हंस में जब कहानी छपती है तो अच्छा रिस्पांस मिलता है. मेरी कहानियां ‘हंस’, ‘पाखी’, ‘परिकथा’, ‘नया ज्ञानोदय’ और अभी बहुवचन में छपी है लेकिन हंस में प्रकाशित किसी भी कहानी के लिए सबसे अधिक फोन, एसएमएस और चिट्ठियां मिली हैं. किसी भी लेखक को यह अच्छा लगता है.
 मैं पिछले दो सालों से राजेन्द्र यादव और हंस के लिए काम कर रहीं थी. मेरा वहां काम यादवजी जो बोले, उसे लिखने का था, हंस में अशुद्धियों को दुरुस्त करना और उसके संपादन से जुड़े काम को भी मैं देखती थी. जब ‘स्वस्थ्य आदमी के बीमार विचार’ पर काम शुरू किया, उसके थोड़ा पहले से मैं उनके पास जा रही थी. लगभग दो साल से मैं उनके पास जा रही हूं. इस काम के लिए वे मुझे दस हजार रूपए प्रत्येक महीने दे रहे थे. मैं मुफ्त में उनके लिए काम नहीं कर रही थी. सबकुछ ठीक था. यादवजी का स्नेह भी मिल रहा था. उस स्नेह में कहीं फेवर नहीं था. अपनी कहानियों के लिए कभी मैंने उन्हें नहीं कहा. मैं उन्हें लिखने के बाद कहानी दिखलाती थी और कहती थी कि यह यदि हंस में छपने लायक हो तो छापिए. मेरी पांच-छह कहानियां हंस में छपी.
यदि किसी लेखिका की पहली कहानी छपना उसे किसी साहित्यिक पत्रिका का प्रोडक्ट बनाता है तो मुझे ‘परिकथा’ का प्रोडक्ट कहा जाना चाहिए. मेरी पहली कहानी ‘परिकथा’ में छपी है. मैं हंस की प्रोडक्ट नहीं हूं. यह सच है कि कथा संसार में मेरी पहचान हंस से बनी. ‘हंस’ मेरे लिए स्त्री विमर्श की पत्रिका रही है. ‘हंस’ से मैने स्त्री अधिकार और स्त्री सम्मान को जाना है. राजेन्द्र यादव जो अपने संपादकीय में लिखते रहे हैं और जो विभिन्न आयोजनों में बोलते रहे हैं. इन सबसे उनकी छवि मेरी नजर स्त्री विमर्श के पुरोधा की बनी. 
एक जुलाई 2013 को उनके घर में जो दुर्घटना हुई, उससे पहले उनसे मेरी कोई शिकायत नहीं थी. सबकुछ उससे पहले अच्छा चल रहा था. मैं उन्हें अपने अभिभावक के तौर पर पितातुल्य मानती रहीं हूं. मेरा उनसे इसके अलावा कोई दूसरा रिश्ता नहीं रहा. इसके अलावा केाई दूसरी बात करता है तो गलत बात कर रहा है. राजेन्द्र यादव मुझसे कहते थे- ‘तुझे देखकर मेेरे अंदर इतना वातशल्य उमरता है, जितना बेटी रचना के लिए भी नहीं उमरा. कभी मैं उन्हें कहती थी कि मुझे हंस छोड़ना है तो वे मुझे बिटिया रानी, गुड़िया रानी बोलकर, हंस ना छोड़ने के लिए मनाते थे. राजेन्द्र यादव हमेशा मेरे साथ पिता की तरह ही व्यवहार करते थे. 
जब से मैं उनके पास काम कर रहीं हूं, प्रत्येक सुबह 8ः00 बजे- 8ः30 बजे उनके फोन से ही मेरी निन्द खुलती थी. फोन उठाते ही वे कहते- अब उठ जा बिटिया रानी. मैं उनके घर 10ः30 बजे सुबह पहुंचती थी. वे रविवार को भी बुलाते थे. रविवार को उनके घर शाम तीन-साढे तीन बजे पहुंचती थी. 
राजेन्द्र यादव का मानना था कि वे हंस कार्यालय में एकाग्र नहीं हो पाते हैं. इसलिए वे संपादकीय लिखवाने के लिए घर ही बुलाते थे. जब मैंने राजेन्द्र यादव के साथ काम करना शुरू किया, उन दिनों राजेन्द्र यादव दफ्तर नहीं जाते थे. वे बीमार थे. तीन-चार महीने तक वे बिस्तर पर ही पड़े रहे. ‘स्वस्थ्य आदमी ......’ वाली किताब उन्होंने घर पर ही लिखवाई. उस दौरान वे हंस नहीं जा रहे थे. जब उन्होंने हंस जाना प्रारंभ किया, उसके बाद भी वे रचनात्मक लेखन घर पर ही करते थे. दफ्तर में वे चिट्ठियां लिखवाते थे. मेरी नौकरी उनके घर से शुरू हुई थी, इस तरह मेरा एक दफ्तर उनका घर भी था. 
30 जून 2013 की रात 10ः00-10ः15 बजे के आस-पास मेरे मोबाइल पर नए नंबर से फोन आया. नए नंबर के फोन इतनी रात को मैं उठाती नहीं. लेकिन एक नंबर से दो-तीन बार फोन आ जाए तो उठा लेती हूं.  जब दूसरी बार में मैंने नए नंबर वाला फोन उठाया तो दूसरी तरफ से आवाज आई- ‘मैं प्रमोद बोल रहा हूं.’ जब मैने पूछा -‘कौन प्रमोद?’ तो उसने राजेन्द्र यादव का नाम लिया. प्रमोद, राजेन्द्र यादव का अटेन्डेन्ट था. ‘हंस’ में मेरी राजेन्द्र यादव और संगम पांडेय से बात होती थी और किसी से कुछ खास बात नहीं होती थी. मैं बातचीत में थोड़ी संकोची हूं, यदि सामने वाला पहल ना करे तो मैं बात शुरू नहीं कर पाती. प्रमोद से मेरी बातचीत सिर्फ इतनी थी कि वह दफ्तर पहुंचने पर राजेन्द्र यादव के लिए और मेरे लिए एक गिलास पानी लाकर रखता था और पूछता था- ‘मैडम आप कैसी हैं?’ इससे अधिक मेरी प्रमोद से कोई बात हुई हो, मुझे याद नहीं. 
उसका फोन आना मेरे लिए आश्चर्य की बात थी. उसने फोन पर कहा- ‘मुझसे आकर मिलो. मैंने तुम्हारा वीडियो बना लिया है. उसे मैं इंटरनेट पर डालने जा रहा हूं.’ 
यह फोन मेरे लिए झटका था. कोई यदि वीडियो बनाने की बात कर रहा है तो निश्चित तौर पर यह किसी आम वीडियो की धमकी नहीं होगी. वह नेकेड वीडियो की बात कर रहा होगा. मैंने राजेन्द्र यादव को उसी वक्त फोन मिलाया. जब राजेन्द्र यादव से मेरी बात हो रही थी, उस दौरान भी प्रमोद का फोन वेटिंग पर आ रहा था. राजेन्द्र यादव को मैने फोन पर कहा- ‘प्रमोद नेकेड वीडियो की बात कर रहा है, आप देखिए क्या मामला है? 
राजेन्द्र यादव ने कहा- अब मेरे सोने का वक्त हो रहा है. सुबह बात करूंगा. उनसे बात खत्म हुई प्रमोद का फोन जो वेटिंग पर बार-बार आ ही रहा था. फिर आ गया- उसने फिर मुझे धमकाया. 
राजेन्द्र यादव जो दो साल से प्रतिदिन मुझे फोन करके उठाते थे. उस दिन उनका फोन नहीं आया. जब मैंने फोन किया तो उन्होंने कहा- ‘मैं आंख दिखलाने एम्स जा रहा हूं. तुमसे दोपहर में बात करता हूं. फिर राजेन्द्र यादव का फोन नहीं आया. फिर मैंने ही फोन किया, राजेन्द्र यादव ने फोन पर मुझे कहा- प्रमोद कह रहा है, वीडियो सुमित्रा के पास है और सुमित्रा कह रही है वीडियो प्रमोद के पास है. पता नहीं चल पा रहा कि वीडियो किसके पास है. ऐसा करो, इस मसले को अभी रहने दो. इस पर बात 31 जुलाई वाले कार्यक्रम के बीत जाने के बाद बात करेंगे. मुझे यह बात बुरी लगी. मैंने कहा- ‘आज एक जुलाई है. 31 जुलाई में अभी तीस दिन है. इस बीच प्रमोद ने कुछ अपलोड कर दिया तो फिर मेरी बदनामी होगी. आप भारतीय समाज को जानते हैं. मैं कहीं की नहीं रहूंगी. मैंने कई बार राजेन्द्र यादव को फोन किया और एक बार प्रमोद को भी फोन किया- ‘आप सच बोल रहे हैं या कोई मजाक कर रहे हैं. क्या है उस वीडियो में? 
उसने ढंग से बात नहीं की. उसका जवाब था- ‘जब दुनिया देखेगी, तुम भी देख लेना.’ 
जब कई बार फोन करने के बाद भी राजेन्द्र यादव ने मेरी बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया फिर मैंने उन्हें फोन करके कहा कि मैं शाम में आपके घर आ रही हूं. यह छोटी बात नहीं है. आप प्रमोद से बात करिए. 
मेरे साथ जो दुर्घटना हुई, उसके बाद मैने लोगों से बातचीत बंद कर दी थी. अब जब फिर से बातचीत हो रही है तो यह सुनने में आ रहा है कि कुछ लोग कह रहे हैं- ज्योति अगर राजेन्द्र यादव के घर में कुछ गलत काम नहीं कर रही थी, राजेन्द्र यादव के साथ उसके नाजायज संबंध नहीं थे फिर वह वीडियो की बात से डरी क्यों? यहां स्पष्ट कर दूं कि यह वीडियो मेरा और राजेन्द्र यादव का होता तो मैं बिल्कुल नहीं डरती. ना मैं घबरातीं, वजह यह कि प्रमोद राजेन्द्र यादव के पास काम करता था, फिर क्या वह अपने मालिक का वीडियो अपलोड करता? अपलोड करता तो क्या सिर्फ ज्योति की बदनामी होती? क्या राजेन्द्र यादव की नहीं होती. राजेन्द्र यादव का कद बड़ा है. उनकी बदनामी भी बड़ी होती. यदि वे सेफ होते तो मैं भी सेफ होती लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था. वे मुझे बेटी तुल्य मानते रहे थे. मेरे लिए वे पितातुल्य थे. इसका मतलब था कि यदि प्रमोद ने कोई वीडियो वास्तव में बनाया था तो वह मेरे अकेले की वीडियो होगी. मैं राजेन्द्र यादव के यहां काम करती थी तो उनका बाथरूम भी इस्तेमाल करती थी. राजेन्द्र यादव से मेरी घनिष्ठता हो ही गई थी. कई बार जब मेरे घर पानी नहीं आया होता तो राजेन्द्र यादव कहते थे- मेरे घर आ जाओ. डिक्टेशन ले लो और यहीं पर नहा लेना. उनके बाथरूम का कई बार मैने इस्तेमाल नहाने के लिए किया है. मेरा डर यही था, बाथरूम में नहाते हुए कैमरा छुपाकर मेरा नेकेड वीडियो प्रमोद, राजेन्द्र यादव के घर में बना सकता है. एक अकेली लड़की का नेकेड वीडियो जब इंटरनेट पर डाला जाता है तो बिल्कुल नहीं देखा जाता कि वह अकेली है या फिर किसी के साथ है. यदि लड़की वीडियों में नेकेड है तो उसकी बदनामी होनी है, उसकी परेशानी होनी है. इस बात से मैं डरी थी. यदि राजेन्द्र यादव के साथ कोई वीडियो होता फिर डर की कोई बात नहीं थी. यदि राजेन्द्र यादव सेफ हैं तो उनके साथ वाला भी सेफ है. 
वीडियो वाली बात से मैं काफी परेशान थी. परेशान होकर मैं राजेन्द्र यादव के घर पहुंची. एक जुलाई को 6:30-6:45 बजे शाम में. मैंने राजेन्द्र यादव से कहा- ‘सर आप मेरे सामने प्रमोद से बात करें कि वह क्या वीडियो है? वह दिखलाए.’ 
मैं राजेन्द्र यादव को सर ही कहती हूं. उनका जवाब था- ‘मैं प्रमोद को कुछ नहीं कहूंगा. उसे बुला देता हूं, तुम खुद ही उससे बात कर लो.’ 
यह बातचीत राजेन्द्र यादव के कमरे में हुई. वे उस वक्त शराब पी रहे थे. उनके सामने ही प्रमोद ने अपशब्दों का प्रयोग किया. यह मामला अभी न्यायालय में है. प्रमोद यह आलेख लिखे जाने तक जेल में है. इस पूरी घटना में दुखद पहलू यह है कि यह सब एक ऐसे आदमी की नजरों के सामने हुुआ जिसकी छवि देश में स्त्रियों के हक में खड़े व्यक्ति के तौर पर है. वह मुकदर्शक बनकर अपने कर्मचारी द्वारा एक स्त्री के लिए प्रयोग किए जा रहे अशालीन भाषा को सुनता रहा. वे उस वक्त भी शराब पीने में मशगूल थे, जब उनका कर्मचारी स्त्री के साथ अमर्यादित व्यवहार कर रहा था. इस पूरी घटना के दौरान राजेन्द्र यादव बीच में सिर्फ एक वाक्य प्रमोद को बोले- ‘यार कुछ है तो दिखा दे ना...’ 
मानों छुपन-छुपाई के खेल में चॉकलेट का डब्बा गुम हो गया हो. जबकि प्रमोद कई बार राजेन्द्र यादव के सामने धमका चुका था- वीडियो इंटरनेट पर अपलोड कर दूंगा. फिर भी वे चुप थे. मैं भी चुप हो जाती. कोई कदम नहीं उठाती लेकिन उसके बाद जो प्रमोद ने किया वह किसी भी स्त्री के लिए अपमानजनक था. मामला न्यायालय में है इसलिए उस संबंध में यहां नहीं बता रहीं हूं. मेरे साथ जो हुआ, उसके बाद मैं समझ गई थी कि मेरा अब यहां से बच कर निकलना नामूमकिन है. मैंने राजेन्द्र यादव के कमरे में रखे टेलीफोन से सौ नंबर मिलाया. उस वक्त राजेन्द्र यादव बोले- ‘यह क्या कर रही हो? फोन रख.’ तब तक दूसरी तरफ फोन उठ चुका था. मैंने फोन पर सारी बात बता दी. मेरे साथ क्या हुआ और मुझे मदद की जरूरत है. 
फोन रखने के बाद अब तक शांत पड़े राजेन्द्र यादव फिर बोले- ‘यह सब क्या कर रही हो? पुलिस के आने से क्या हो जाएगा? बेवजह बात ना बढ़ा.’ 
पुलिस को फोन मिलाने के बाद प्रमोद शांत हो गया था. राजेन्द्र यादव ने अब प्रमोद से कहा- ‘तू जा यहां से.’ उनकी आज्ञा मिलते ही प्रमोद आज्ञाकारी बच्चे की तरह चला गया. अब राजेन्द्र यादव ने मुझसे कहा- पुलिस को कुछ नहीं बताना है. मैंने कहा- ‘यह नहीं होगा सर. आपके सामने, आपके घर में इतनी बुरी हरकत हुई है मेरे साथ. आपसे मैं बार-बार फोन पर कहती रही कि आप प्रमोद से बात कीजिए लेकिन आपने वह भी नहीं किया. अब मैं पुलिस को सारी बात बताऊंगी.’ 
यदि मेरे मन में कोई चोर होता तो मैं वहां डर जाती. मेरे मन में कोई चोर नहीं था, इसलिए मैं डरी नहीं. मेरे अंदर सिर्फ इतनी बात थी कि मेरे साथ जो हुआ है, वह गलत हुआ है. इसलिए मैं पुलिस में शिकायत करूंगी. 
राजेन्द्र यादव लगातार मुझे समझाते रहे कि पुलिस में शिकायत करने से कुछ नहीं होगा. सौ नंबर पर उन्होंने रिडायल किया, शायद यह कन्फर्म करने के लिए कि उनके घर से पुलिस के पास फोन गया था या नहीं? जब उधर से कहा गया कि फोन आया था तो यादवजी ने कहा- ‘अब पुलिस को भेजने की जरूरत नहीं है. आपसी मारपीट थी. अब सुलझ गया सब कुछ.’ 
मैं वहीं बैठी थी. मैने दुबारा फोन मिलाया कि पुलिस अभी तक नहीं आई? दूसरी तरफ से मुझसे सवाल पूछा गया- ‘मैडम आप इतनी सुरक्षित तो हैं ना, जितनी देर में पुलिस आप तक पहुंच सके? 
मैंने कहा- सुरक्षित हूं. प्रमोद बाहर बैठा है और राजेन्द्र यादव फोन पर किसी से बात कर रहे हैं. 
पुलिस आई. उन्होंने प्रमोद को थाने ले जाने के लिए पकड़ा. साथ में मुझे भी बयान के लिए ले जा रहे थे. राजेन्द्र यादव ने पुलिस वाले से कहा- ‘क्या इतनी छोटी सी बात के लिए ले जा रहे हो? बैठो यहां. स्कॉच लोगे या व्हीस्की? मेरे पास 21 साल पुरानी शराब है. एक से एक अच्छी शराब है. कहो क्या लोगे? 
लेकिन पुलिस वाले ने कहा- ‘सर लड़की के साथ ऐसा हुआ है. यह छोटी बात नहीं है.’ 
मेरा कुर्ता खींच-तान में फट गया था. मेरे पास ऐसी खबर आ रही है कि कुछ लोग कह रहे हैं कि ज्योति ने खुद ही अपने कपड़े फाड़ लिए. कोई भी लड़की पहली बात इतनी बेशरम नहीं होती कि अपने कपड़े खुद फाड़ ले. यदि फाड़ेगी तो उसका उद्देश्य क्या होगा? सामने वाले पर इल्जाम लगाना. मैने इसके लिए प्रमोद पर आरोप नहीं लगाया है. मैंने कहा है कि यह खींच-तान में फटा है. 
प्रमोद राजेन्द्र यादव के पास अप्रैल में आया है. वह राजेन्द्र यादव के घर में रहता है. उनके कमरे में सोता है. उसकी गिरफ्तारी भी राजेन्द्र यादव के घर से हुई थी.
इन सारी घटनाओं के दौरान जब मैं थाने में बैठी थी. मेरे मित्र मज्कूर आलम के पास फोन किया जा रहा था. मज्कूर आलम उस दिन अपने घर बक्सर (बिहार) में थे. उन्हें फोन पर बताया जा रहा था- ‘ज्योति थाने में है. यह अच्छा नहीं है. उसे वापस बुला लीजिए.’ 
मैने सुना थाने में  कई लोगों से कह कर फोन कराया गया. दबाव बनाने के लिए. यदि यह बात सच है तो दिल्ली पुलिस की सराहना की जानी चाहिए कि वे किसी के दबाव में नहीं आए. 
मैं अकेली रात एक बजे तक थाने में बैठी रही. इस बीच मेरा एमएलसी (मेडिकल लीगल केस) कराया गया. मैं वहां देर रात तक इसलिए बैठी रही क्योंकि मैंने तय कर लिया था, जब तक मेरा एफआईआर (फर्स्ट इन्फॉरमेशन रिपोर्ट) नहीं हो जाता, मैं वहां से हिलूंगी नहीं. मेरे एमएलसी में आ गया कि चोट है. ईएनटी में दिखलाया, वहां कान के चोट की भी पुष्टी हो गई. एक बजे रात में एक लेडी कांस्टेबल मुझे घर तक छोड़ कर गई. 
मुझे जानकारी मिली कि मेरे घर आने के थोड़ी देर बाद ही प्रमोद को छोड़ दिया गया. उसके बाद दो महीने तक केाई कार्यवायी नहीं हुई. मै अपने कान के दर्द से परेशान थी. मुझे चोट लगी थी. दो महीने तक पुलिस की तरफ से कोई कार्यवायी नहीं हुई. पुलिस की जांच पड़ताल चल रही होगी, यह अलग बात है. उन्होंने दो महीने तक एक जुलाई की घटना के लिए सीआरपीसी की धारा 164 में मेरा बयान भी  नहीं कराया. 
घटना के अगले दिन दो जुलाई को राजेन्द्र यादव का फोन आया मेरे पास. उन्होंने कहा -‘क्या मिल गया, पुलिस में बयान दर्ज कराके. लड़का छुट गया. लड़का घर आ गया.’ 
मैने जवाब दिया- ‘क्या हो गया यदि प्रमोद छुट कर आ गया. मैंने वही किया जो मुझे करना चाहिए.’
फिर राजेन्द्र यादव ने कहा- ‘अच्छा ऐसा कर शाम छह बजे मेरे घर आ जा.’ 
मैंने जवाब में कहा- ‘अब मैं आपके घर कभी नहीं आने वाली.’ 
राजेन्द्र यादव- ‘कभी नहीं आना, आज आ जा.’ 
ज्योतिः ‘क्यों आज ऐसा क्या खास है कि मुझे इतना कुछ हो जाने के बाद भी आपके घर आ जाना चाहिए.’ 
राजेन्द्र यादवः ‘मैने पुलिस वाले को कह दिया है, वकील को भी बुला लिया है. तू भी आ जा. प्रमोद भी रहेगा. वह तुझे सॉरी बोल देगा. बात खत्म हो जाएगी.’ 
ज्योतिः ‘उसे पब्लिकली सॉरी बोलना होगा. उसने इतनी बूरी हरकत की है मेरे साथ. तब मैं माफ करूंगी. मुझे लगता है कि जिसे वास्तव में महसूस होगा कि उसने गलती की है, वह सार्वजनिक तौर पर माफी मांगेगा. जब कोई महसूस करता है, अपनी गलती तो उसे सार्वजनिक तौर पर गलती की माफी मांगनी चाहिए. यदि वह सार्वजनिक तौर पर माफी मांगेगा तो उसे सुधरने और अच्छा बनने का एक मौका दिया जा सकता है. उस माफी के बाद भी उसकी हरकतें नहीं बदलती तो उस पर फिर कार्यवायी होनी चाहिए लेकिन प्रमोद को एक मौका मिलना चाहिए, इस बात के मैं हक में हूं.’ 
राजेन्द्र यादवः ‘फिर ऐसा कर, सोनिया गांधी को बुला ले, मनमोहन सिंह को बुला ले, ओबामा को बुला ले. रामलीला मैदान में माफी मांगने का सार्वजनिक कायक्रम रख लेते हैं.’ 
ज्योतिः ‘आपको जो भी लगे लेकिन जब तक वह सार्वजनिक तौर पर माफी नहीं मांग लेता, मैं माफ नहीं करूंगी.’ 
जब मेरी और राजेन्द्र यादव की फोन पर यह बात हो रही थी, मीडिया और साहित्य में बहुत से लोगों को इस घटना की जानकारी हो चुकी थी. बहुत से लोगों के फोन आने लगे थे. 
एक दिन पहले यानि एक जुलाई को जिस दिन दुर्घटना हुईं, जब मैं पुलिस के आने का इंतजार कर रही थी, उसी वक्त साहित्यिक पत्रिका पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज राजेन्द्र यादव के घर आए थे. प्रेम भारद्वाज जब भी पाखी का नया अंक आता है, उसे देने के लिए वे स्वयं हर महीने राजेन्द्र यादव के घर आते हैं. उस दिन भी वे पाखी देने ही आए थे. जब प्रेम भारद्वाज वहां पहुंचे तो उन्होंने मेरी हालत देखी. राजेन्द्र यादव ने प्रेम भारद्वाज के हाथ से पाखी लेकर बोला- ‘ठीक है, ठीक है. अब जाओ.’ 
मैने कहा- ‘प्रेम भारद्वाज जाएं क्यों, उन्हें भी पता चलना चाहिए, आपके घर में क्या हुआ है? 
प्रेम भारद्वाज ने पूछा - ‘क्या हुआ? 
राजेन्द्र यादव का जवाब था- ‘कुछ नहीं हुआ, तुम जाओ यहां से.’ 
प्रेम भारद्वाज के जाने के बाद पुलिस आई. पुलिस के आने का जिक्र मैं पहले कर चुकी हूं. राजेन्द्र यादव द्वारा दिया गया, शराब पीने का ऑफर जब दिल्ली पुलिस ने ठुकरा दिया और इस बात पर भी सहमत नहीं हुए कि किसी स्त्री पर हमला छोटी बात होती है तो राजेन्द्र यादव को लगा कि यह बात उनसे अब नहीं संभलेगी. उन्होंने किशन को कहा- ‘भारत भारद्वाज को फोन मिलाओ.’ 
जब तक भारत भारद्वाज आए, पुलिस दरवाजे तक आ चुकी थी. भारत भारद्वाज ने आते ही कहा- ‘मैं डीआईजी हूं आईबी डिपार्टमेन्ट में. आप पहले मुझसे बात कीजिए, उसके बाद प्रमोद को लेकर जाइएगा.’ 
मैने वहीं पर कहा- ‘ये रिटायर हो चुके हैं.’ 
मैने देखा, प्रेम भारद्वाज गए नहीं थे. वे भारत भारद्वाज के साथ लौट आए थे. हो सकता है कि वे भारत भारद्वाज के पास पत्रिका देने गए हों और राजेन्द्र यादव का फोन आ गया हो. 
भारत भारद्वाज ने फिर पूछा- ‘क्या हुआ? 
मैने पूरी कहानी उन्हें बताई, यह भी बताया कि घटना के बाद  मैने शिकायत की है और मेरी शिकायत पर पुलिस आई है. 
भारत भारद्वाज फिर राजेन्द्र यादव के लिए, सलाह देने में व्यस्त हो गए. अनंत विजय को बुला लो, उसके एक भाई सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं. पुलिस ने भारत भारद्वाज से कहा- ‘सर आपको जो भी बात करनी है, थाने में आकर करिए.’ 
जब एक महिला के साथ बलात्कार होता है या फिर बलात्कार की कोशिश होती है. लड़की की इससे सिर्फ शरीर की क्षति नहीं होती. उसका मन भी टूटता है. हमले का मानसिक असर भी गहरा होता है. मेरे साथ जो हुआ, मैं उससे अभी तक बाहर निकल नहीं पाई हूं. यह अलग बात है कि मैं लड़ रही हूं. मैने हिम्मत नहीं हारी है. कानूनी रूप से जो कर सकती थी, कर रही हूं. लेकिन इस घटना का मेरे अंदर जो असर हुआ है, उसे सिर्फ मैं समझ सकती हूं. इस तरह के अपराध के लिए समझौता कभी नहीं हो सकता है. कोई ऐसे मामले में समझौता शब्द का इस्तेमाल करता है, इसका मतलब है कि वह लड़की के साथ अन्याय करता है. मैने इस अन्याय को भोगा है. इस तरह के मामले में समझौते की बात कहीं आनी नहीं चाहिए. मैं ना समझौते के लिए कभी तैयार थी, ना हूं और ना इस मामले में आने वाले समय में समझौता करूंगी. यह संभव है कि कोई गलती करता है और अंदर से इस बात को महसूस करता है और माफी मांगता है तो उसे माफ करके एक मौका दिया जा सकता है. समझौता और माफी देने में अंतर होता है. यदि मैं प्रमोद को माफ करने पर विचार कर रही हूं तो इसे समझौता बिल्कुल ना कहा जाए. यह शब्द एक पीड़ित लड़की के लिए अपमानजनक है. एक तो लड़की के साथ गलत हुआ है. लड़की ने उसे भुगता. उस पीड़ा के शारीरिक मानसिक असर से लड़की गुजरी. अब उस पीड़ा से जुझ रही लड़की से अपराधी को माफ करने के लिए कहा जा रहा है और उसे समझौता नाम दिया जा रहा है. यह ऐसा ही है जैसे किसी ने पीड़ा से गुजर रही लड़की को दो थप्पड़ और मार दिया हो. वही सारी घटनाएं फिर एक बार मेरे साथ दुहराई जा रही हों. इसलिए समझौता नहीं, प्रमोद के लिए माफी शब्द का इस्तेमाल होना चाहिए. यदि उसे अपनी गलती का एहसास है तो जरूर उसे एक मौका मिलना चाहिए. 
अकेला प्रमोद इस गुनाह में शामिल है या फिर कुछ और लोग भी प्रमोद के पीछे इस गुनाह में शामिल हैं. इसका सही-सही जवाब राजेन्द्र यादव दे सकते हैं. मान लीजिए प्रमोद ने किसी के बहकाने पर यह सब किया. पैसा लेकर किया. लेकिन सच यह है कि मेरे साथ अपराध प्रमोद ने किया. मेरा अपराधी प्रमोद है. उसने ऐसा कदम क्यों उठाया? इसका जवाब प्रमोद दे सकता है. 
सच्चाई है कि राजेन्द्र यादव ने मेरा वीडियो नहीं बनाया, मुझ पर शारीरिक हमला भी नहीं किया. फिर भी मैने हंस का बहिष्कार किया. इसके पीछे वजह यही है कि राजेन्द्र यादव स्त्री सम्मान की बात करते हैं लेकिन जब उनके सामने स्त्री सम्मान पर हमला हुआ तो वे चुप थे. प्रमोद को पहले दिन थाने से निकलवाने में राजेन्द्र यादव की अहम भूमिका रही. प्रमोद के खिलाफ एफआईआर ना हो, इसमें राजेन्द्र यादव की पूरी  भूमिका रही. वह नहीं रूकवा पाए, यह अलग बात है, लेकिन उन्होंने जोर पूरा लगा लिया था. पहले दिन जब प्रमोद थाने से छुट कर आया तो उनके घर में ही था. उनके घर में वह काम करता रहा. उसकी दूसरी बार दो महीने बाद  गिरफ्तारी उनके घर से ही हुई. यदि कोई लड़का आपके यहां काम करता हो तो यह बात समझ में आती है कि वह आपके नियंत्रण में ना हो और उसका अपराध आपकी जानकारी में ना हो. लेकिन जब राजेन्द्र यादव एक जुलाई की घटना के चश्मदीद हैं, सबकुछ उनकी आंखों के सामने घटा है, वे कम से कम प्रमोद से अपना रिश्ता खत्म कर सकते थे. प्रमोद उनके घर में रहा और काम करता रहा. इतना ही नहीं, उलट राजेन्द्र यादव मुझपर ही दबाव बनाते रहे कि समझौता कर लो. केस वापस ले लो. उनकी तरफ से कई लोगों के फोन आ रहे थे- ‘तुम्हारा साहित्यिक कॅरियर चौपट हो जाएगा. तुम साहित्य से बाहर हो जाओगी.’ 
मैं नहीं मानी. 
राजेन्द्र यादव ने तरह-तरह के एसएमएस भी मेरे पास भेजे. वे साहित्यिक व्यक्ति हैं, इसलिए उनकी धमकी भी साहित्यिक भाषा में थी. 
‘तुम जो कर रही हो, समझो इसमें सबसे अधिक नुक्सान किसका है? 
‘मूर्ख उसी डाल को काटता है, जिस पर बैठा होता है.’ 
‘तुम्हें आना तो मेरे पास ही पड़ेगा.’ 
यह सारे एसएमएस मेरे पास सुरक्षित हैं. 27 जुलाई को राजेन्द्र यादव का फोन आया- ‘प्रमोद माफी मांगने को तैयार है. लेकिन सार्वजनिक माफी से पहले, वहां कौन-कौन से लोग होंगे, यह तय करने के लिए हम लोग मिले. मिलकर बात करते हैं. वह मिलकर भी तुमसे माफी मांग लेगा और सार्वजनिक तौर पर भी माफी मांग लेगा. मिलने की जगह नोएडा (उत्तर प्रदेश), सेक्टर सोलह का मैक डोनाल्ड तय हुआ. 
बात हुई थी माफी मांगने की लेकिन प्रमोद वहां भी मुझे धमकाने लगा. अपना केस वापस ले लो वर्ना मार के फेंक देंगे. लाश का भी पता नहीं चलेगा. किशन भी साथ दे रहा था. उस दिन मज्कूर आलम मेरे साथ थे. राजेन्द्र यादव उनके द्वारा सार्वजनिक माफी के लिए सुझाए जा रहे सारे नामों को एक-एक करके खारिज कर रहे थे. मानों घर से राजेन्द्र यादव प्रमोद के साथ सार्वजनिक माफी की बात सोचकर निकले हों और यहां आकर बदल गए हों. नामों को लेकर राजेन्द्र यादव की आपत्ति कायम थी. नहीं यह नहीं होगा. इसे क्यों बुलाएंगे. ऐसा करो कि वकील को बुला लेते हैं. बात खत्म करो. 
उनका यह रूख देखकर मुझे हस्तक्षेप करना पड़ा. 
‘जब मैने स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक माफी से कम पर बात नहीं होगी और आपको यह स्वीकार्य नहीं है तो मिलने के लिए क्यों बुलाया? 
राजेन्द्र यादव का वहां बयान था- ‘अब मैं और तुम आमने-सामने हैं. अब प्रमोद से तुम्हारी लड़ाई नहीं है. यदि तुमने मेरी बात नहीं मानी तो अब तुम्हारी लड़ाई मुझसे है.’ 
इस घटना से पहले मैं राजेन्द्र यादव को ई मेल पर हंस और राजेन्द्र यादव के बहिष्कार की सूचना दे दी थी. उन्होंने हंस के अंक में मेरी कहानी की घोषणा की थी. मैने कहानी देने से मना कर दिया. मैं ऐसी पत्रिका को कहानी नहीं दे सकती, जिसका दोहरा चरित्र हो. मेरे ई मेल भेजे जाने के बाद भी उन्होंने मेरी समीक्षा छाप दी. (यह बातचीत हंस, अक्टूबर 2013 अंक आने से पहले हो चुकी थी, उस वक्त हंस में ‘समीक्षा’ के लिए राजेन्द्र यादव की माफी नहीं छपी थी) मैने जो ई मेल राजेन्द्र यादव को भेजा था, उसमें साफ शब्दों में लिख दिया था कि मेरा निर्णय समीक्षा पर भी लागू होता है. इसके बावजूद उन्होंने समीक्षा छाप दी. समीक्षा छापने के बाद उन्होंने मुझे सूचना भी नहीं दी. मेरी लेखकीय प्रति अब तक मेरे पास नहीं आई. 
मेरे पास एक परिचित का फोन आया, तुमने हंस का बहिष्कार किया है और तुम्हारी समीक्षा हंस में छपी है. यह फोन आने के बाद  मैने राजेन्द्र यादव को फोन किया. उनकी पत्रिका 20-21 से पहले कभी प्रेस में नहीं जाती है लेकिन राजेन्द्र यादव ने कहा- इस बार पत्रिका 18 को ही प्रेस में चली गई. इसलिए समीक्षा रोक नहीं पाए. मैने कहा- आप अगले अंक में छाप दीजिएगा कि समीक्षा कैसे छप गई? जिससे पाठकों में भ्रम ना रहे. राजेन्द्र यादव ने उस वक्त कहा कि ठीक है. तीन दिनों बाद राजेन्द्र यादव का फोन आया- ‘समीक्षा छापने का निर्णय संजय सहाय का था, इसलिए वही बताएंगे कि क्या जाएगा? 
मैने राजेन्द्र यादव से कहा- ‘आप संजय सहाय से बात करके खबर करवा दीजिएगा. 
उनकी तरफ से कोई फोन नहीं आया. मैंने फिर उन्हें ई मेल किया. आपने स्पष्टीकरण की बात कही थी, आप इस बार हंस में क्या छाप रहे हैं, आपका जवाब नहीं आया. इस ई मेल का जवाब नहीं आया तो मैने एक और ई मेल उन्हें लिखा. लेकिन उसका जवाब भी नहीं आया. 
जब हंस का सितम्बर अंक हाथ में आया, उसमें राजेन्द्र यादव ने मेरे लिए अपमानजनक बातें लिखी थी. जो उन्हें लिखना था, ज्योति ने हंस का बहिष्कार किया है. वह कहीं नहीं लिखा. उन्होंने मना करने के बावजूद समीक्षा छापने की बात भी कहीं नहीं लिखी. जब तक मैं उनके पास काम कर रही थी, तब तक बहुत अच्छी थी. जब मैने उनके घर में हुए गलत हरकत का विरोध किया तो उन्होंने मेरा साथ नहीं दिया. जब मैने उनका और उनकी पत्रिका का बहिष्कार किया तब उनको याद आया कि मेरा काम दस हजार के लायक भी नहीं था. यदि मेरा काम अच्छा नहीं था तो मुझे हंस में अपने पास रखा क्यों था? निकाला क्यों नहीं? मैंने तो कभी उनसे चंदा नहीं मांगा. क्या राजेन्द्र यादव जबर्दस्ती चंदा बांटते हैं. यदि राजेन्द्र यादव जबर्दस्ती चंदा बांटते है तो फिर यह चंदा सिर्फ ज्योति को क्यों? यदि चंदा ही दे रहे थे तो फिर बदले में इतना काम क्यों लेते थे?