Tuesday, October 15, 2013

कोलाहलमय कारस्तानियों पर चुप्पी के खतरे


जानता हूं
, ज्यादातर लोगों की दिलचस्पी सिर्फ जल्दी से उस वीडियो को देखकर भर्त्सना में छिपी उत्तेजित किलकारी मारते हुए आगे बढ़ लेने में है ताकि प्रधानमंत्री, पड़ोसन, चुनिंदा मॉडलों और धर्माचार्यों के अलग अलग रस देने वाले अन्य वीडियो देखने के लिए आंखे मुस्तैद रख सकें. फिर भी कभी न कभी मुझे इस व्यापार में पड़ना ही था. तो आज ही क्यों नहीं?

बीती मई में राजेन्द्र यादव से जिन्दगी में पहली बार कायदे से मुलाकात हुई. साल के शुरू में उन्होंने अपनी बेटी रचना के जरिए मेरा ट्रैवलॉग मंगाकर पढ़ा था, पाठकों से उसे पढ़ने की सिफारिश करते हुए प्रशंसा के झाग से उफनाता संपादकीय हंस में लिखा था. उससे पहले दुआ सलाम भर थी. उन्होंने दो बार मेरी लंबी कहानी नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं को यह कहते हुए कहानी मानने से ही इनकार कर दिया था कि इसमें कोई नायक नहीं है. मेरा कहना था, नायक समाज में ही नहीं है तो कहानी में जबरदस्ती चला आएगा?

मैने पहले ही शर्त रख दी थी कि मैं आपसे सिर्फ महिला लेखिकाओं और सेक्स व क्रिएटिविटी के बीच के धागों पर बात करना चाहता हूं. वे राजी थे और जरा खुश भी.

मयूर विहार के उनके घर में अभी अंडे की भुजिया से भाप उठ रही थी, पहला पेग हाथ में था, कान भी गरम नहीं हुए थे कि हिन्दी की नई सनसनी ज्योति कुमारी का जिक्र चला आया. पैतृक पृष्ठभूमि, कलही दाम्पत्य, अलगाव, बीमार विचार का डिक्टेशन, बेस्ट सेलर लेखिका, नामवर सिंह की समीक्षा, महत्वाकांक्षा वगैरा से ऊबा डालने की सीमा पर (मैं पहले कुछ पुरानी लेखिकाओं के बारे में सुनना चाहता था) उन्होंने कहा, उसके बिना अब मेरा काम नहीं चलता. उस पर बहुत निर्भर हो गया हूं. सोती बहुत है. मैं ही रोज फोन करके जगाता हूं.

अच्छी लड़की है...उन्होंने गर्व से कहा. उसके बिना मैं अब कुछ नहीं कर पाता.

मैने सुना...मेरे अनुकूल लड़की है. इन दिनों जीवन में जो अच्छा है उसी की वजह से है.

अब तो शरीर निष्क्रिय हो चुका होगा. आप क्या कर पाते होंगे.

तुम्हारा क्या मतलब है?’ उन्होंने मुझे मोटे लेंसों के कारण और बड़ी दिखती, थकी आंखों से मुझे घूरा.

ये तो कोई चमत्कार ही होगा कि आप इस उम्र में भी सेक्सुअली एक्टिव होंगे.

मन नहीं मानता... उन्होंने कुर्ते के गले के ऊपर ऊपर बेचैनी से पंजा हिलाते हुए कहा, कभी सीने से चिपका विपका लिया, सहला दिया. और क्या होना है.

गिल्ट फील नहीं होता आपको?’

नहीं तो. क्यों होगा. मैं जबरदस्ती नहीं करता. किसी को ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं करता.

मन्नू जी से बात होती है.’

उससे...आज ही हुई थी. बायोडाटा का सही अनुवाद क्या होगा. इस पर हम दोनों देर तक माथापच्ची करते रहे.

थोड़ा ठहर कर  गिलास को देखते हुए सहज भाव से उन्होंने कहा, पंजाबी में एक शब्द है ठरक. सुना है कभी.

फिर मुझे देखा, समझ लो कि वही ठरकी बुड्ढा हूं.’

हमारे यहां भोजपुरी में इसका पैरेलल है हिरिस. ऐसी दुर्निवार कामना जो कहते हैं कि कपाल क्रिया के बाद भी खोपड़ी में बची रहती है.’

*

अस्मिता बचाने के साहसिक अभियान पर निकली ज्योति कुमारी सबको बता रही हैं कि राजेंद्र यादव उन्हें बेटी की तरह मानते थे. और इसके अलावा कोई रिश्ता नहीं था. वह ऐसा करके एक कल्पित नायिका स्टेटस और शुचिता की उछाल पाने के लिए एक संबंध और अपने जीवन को ही मैन्यूपुलेट कर रही हैं. वह उस असल तथ्य को ही झूठ के नीचे दफन कर दे रही हैं जो वीडियो बनाने, ब्लैकमेल की कोशिश, झगड़ा, कपड़े फटने और प्रमोद नामक युवा के जेल जाने की वजह है. यह अस्वाभाविक नहीं है कि लोग मानते हैं कि एक कहानीकार के तौर खुद को धूमधड़ाके से प्रचारित करने के लिए उन्होंने ऐसा ही एक और मैन्यूपुलेशन किया होगा. दूसरी ओर राजेंद्र यादव एक बमुश्किल परिचित आदमी के सामने खुद को ठरकी बुड्ढा कहते हुए ज्योति के साथ अपनी अंतरंगता को स्वीकार करते हैं. इस पेंचीदगी और खुलेपन के बीच एक बड़ा समकालीन सच फंसा हुआ है.

*

ज्योति कुमारी अकेली नहीं हैं. हमारे बौद्धिक तबके द्वारा उपलब्ध कराया जीवन का पुराना मॉडल यही है. हिन्दी का विचारक, लेखक, बुद्धिजीवी ऐसे जीता है जैसे बेचारा जन्मते ही बधिया कर दिया गया हो. जो यौन आवेग उसके मन और शरीर के सबसे अधिक स्पेस में दनदनाते रहते हैं और उसका रोजमर्रा का व्यवहार निर्धारित करते हैं वही लेखन और वक्तव्यों से नदारद हो जाते हैं. यह ऑटो सेन्सर है जिसका काम हर तरह के खतरे से सुरक्षित रखना और भली छवि के साथ कल्पित कीर्ति दिलाना है. वह अपनी रचनाओं में एक अधकचरा, लिजलिजा जीवन प्रस्तुत करता है जो दरअसल कहीं होता ही नहीं. इसीलिए पाठक उसकी ओर आंख उठाकर देखता भी नहीं क्योंकि वह कहीं अधिक मुकम्मल जीवन को भोग रहा होता है.

जिस देश में सेक्स के मंदिर हों, शास्त्र सम्मत चौरासी आसन हों, कामसूत्र हो, कालिदास जैसा कवि हुआ हो, सर्वाधिक प्रकार के विवाहों और संतानोत्पत्ति के प्रयोगों का अतीत हो वहां के लेखक की सांस शरीर के अंगों, चुंबन, हस्तमैथुन, सोडोमी के जिक्र से उखड़ने लगती है. वह आतंकित होकर कलम फेंक देता है. साहित्य की एक नकली भाषा ईजाद की गई है जिसमें वे गालियां तक नहीं है (मंटो, इस्मत चुगताई, उग्र, काशीनाथ सिंह, राजकमल चौधरी जैसे कुछ अपवाद भी हैं) जिन्हें घरों, खेतों, सड़कों पर सुनते हुए हर भारतीय बच्चा बड़ा होता है. हमारे लेखक की हालत हिन्दी भाषी देहाती महिला से भी गई बीती है जो स्त्री रोग विशेषज्ञ डाक्टर के सामने समझ ही नहीं पाती कि अपनी समस्या कैसे कहे. पूछा जाना चाहिए कि बातूनी होने के लिए निन्दित हिन्दी पट्टी की महिला के अंतर को किसने लकवाग्रस्त कर डाला है?

ज्योति कुमारी और बुद्धिजीवी ही नहीं पूरे हिन्दी समाज में शरीर, सेक्सुअलिटी समेत हर ऐसी चीज के आसपास चुप्पी से गूंजता हुआ ब्लैकहोल है जिसे कहने के लायक नहीं समझा जाता है. पूजा पंडाल, संतों के प्रवचनस्थल, मंदिर, बस, ट्रेन या किसी भी भीड़ वाली जगह पर एक बिडंबना को मंचित होते देखा जा सकता है. पुरूष शातिर चोरों की तरह औरतों को टटोलते, मसलते रहते हैं, औरतें बुत की तरह अनजान बनी खड़ी रहती हैं क्योंकि जो चल रहा है उसके बारे में बात करने का रिवाज नहीं है. शारीरिक जरूरतें अदम्य हैं लेकिन उन पर समाज गूंगा है लिहाजा वे पूरा होने के लिए ताकत, तिकड़म, प्रलोभन के आदिम, बर्बर, निःशब्द रास्ते खोजती हैं. यह चुप्पी ही वह जगह है जहां औरतों पर सेक्सुअल हमलों, बलात्कार, योजनाबद्ध यौनशोषण के समीकरण बनाए और अमल में लाए जाते हैं। अगर सेक्सुअलिटी की अभियक्ति हमारे जीवन का हिस्सा होती तो शायद किसी महिला या पुरूष के साथ जोर जबर्दस्ती की स्थितियां ही नहीं बनतीं. सबसे पहले तो यही होता कि हम सिनेमा के परदे पर बलात्कार से कामुक उत्तेजना की खुराक खींचना बंद कर देते.

देर सबेर युवाओं को समाज और हिंदी साहित्य में सेक्सुअलिटी पर एक दिन खुलकर बात करनी ही पड़ेगी क्योंकि बलात्कार, शोषण और यौन हमले असंख्य सुराखों वाले हमारे जर्जर लोकतंत्र में कानून और पुलिस के रोके रूकने वाले नहीं हैं. यौन अपराधों को रोकने वाले खुद यौन हिंसा के अलावा और कोई तरीका नहीं जानते. अभी तो पुलिस वाले समलैंगिकों से बलात्कार और बलात्कारियों की गुदा में पेट्रोल टपकाने और उत्पीड़ित महिलाओं से बलात्कार का पुनर्मंचन कराने में ही व्यस्त हैं. 

मिशेल फूको ने किसी और से अधिक, हिन्दी की सबसे नई पीढ़ी से ही कहा था- एक रोज लोग ये सवाल पूछेंगे कि अपनी सबसे कोलाहलमय कारस्तानियों पर छायी चुप्पी को बनाए रखने पर हम इतने आमादा क्यों हैं?

*

इसमें कोई शक नहीं राजेन्द्र यादव हिन्दी के अकेले संपादक हैं जिन्होंने महिलाओं, दलितों की फुसफुसाहटों को मुखर बनाने के साथ ही इस चुप्पी को तोड़ने के सर्वाधिक साहसिक प्रयोग किए हैं और उसकी कीमत भी चुकाई है. उनके बनाए कई वीर बालक और बालिकाएं हैं जो सीमाएं तोड़ने के संतोष और निन्दा के अभिशाप के बीच आगे का रस्ता खोज रहे हैं.

लेकिन उनका कसूर यह है अपनी ठरक को सेक्सुअल प्लेज़र तक पहुंचाने की लालसा में उन्होंने आलोचकों (जिसमें नामवर सिंह भी शामिल हैं), प्रकाशकों, समीक्षकों की मंडली बनाकर ढेरों अनुपस्थित प्रतिभाओं के अनुसंधान का नाटक किया, चेलियां बनाईं और साहित्य के बाजार में उत्पात मचाने के लिए छोड़ दिया जो खुद उन्हें भी अपने करतबों से चकित कर रही हैं.


जनपक्षधरता, नाकाबिले-बयान समझी जाने वाली चीजों को व्यक्त करने के प्रयोगों, डेमोक्रेटिक टेम्परामेन्ट, लेखकीय ईमानदारी और लगभग बिना संसाधनों के जनचेतना को प्रगतिशील बनाने की कोशिशों का क्या यही हासिल होना था. ऐसा क्यों हुआ कि विवेक के फिल्टर से जो कुछ जीवन भर निथारा उसे अनियंत्रित सीत्कार और कराहों के साथ मुंह से स्खलित हवा में उड़ जाने दिया. अगर वे मूल्य इतने ही हल्के थे तो राजेंद्र यादव को 'हंस' निकालने की क्या जरूरत थी? किसी सांड़ की तरह यौनेच्छाओं की पूर्ति करते और मस्त रहते. जिस तरह आसाराम बापू नामक संत से अनपेक्षित था था कि वह समस्याग्रस्त भक्तिनों को सेक्स के लिए फुसलाएगा और धमकाएगा वैसे ही 'हंस' के संपादक से भी उम्मीद नहीं थी कि वह किसी लड़की को दाबने-भींचने के लिए जीवन भर की अर्जित विश्वसनीयता, संबंधों और पत्रिका की सर्कुलेशन पॉवर को सेक्सुअल प्लेज़र के चारे की तरह इस्तेमाल करने लगेगा. ज्योति कुमारी का महत्वाकांक्षी होना अपराध नहीं था लेकिन उन्होंने इसे उसकी कमजोरी की तरह देखा, उसे साहित्य का सितारा बनाने के प्रलोभन दिए और उसका इस्तेमाल किया. 

अब भी राजेन्द्र यादव को पिता बताकर ज्योति कुमारी उनकी मदद ही कर रही हैं. अगर वाकई उन्हें स्त्री अस्मिता के लिए लड़ना है तो पहले वात्सल्य और कामुकता में फर्क को स्वीकार करना पड़ेगा. वरना इस समाज को तो देवी और देवदासी, बहन और प्रेमिका, सेक्रेट्री और रखैल के बीच के धुंधलके में चलने वाले खेलों से मिलने वाली उत्तेजना पर जीने की आदत पड़ चुकी है.

16 comments:

Ram Prakash Anant said...

स्त्री विमर्श को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। ज्योति के बहाने सुधी साहित्यकार यह कर रहे हैं। आगे का विमर्श यह बनता है कि सहित्य के आसाराम राजेन्द्र यादव ने एक महिला को बदनाम करने के लिए अनिल यादव को यह झूठा इंटरव्यू दिया है।

devrag said...

साहित्य का आसाराम तो पाखंडी आसाराम से भी अधिक घटिया निकला !

Pramod Singh said...

स्‍त्री अस्मिता, स्‍त्री विमर्श जैसी अभिव्‍यक्तियां हिंदी समाज में कुर्ते के कॉलर को सहलाने, हिलाने से अलग, मालूम नहीं और क्‍या है. एक बहुत बड़ा समाज, जो मुंह से कहता भले कुछ हो, मिज़ाज में जीता मनोहर कहानियों वाला नैरेटिव ही है.. अच्‍छी लिखाई का वैसे धन्‍नबाद.

मुनीश ( munish ) said...

अच्छी लिखाई ? अगर यही अच्छी लिखाई है तो विस्फोट क्या होगा ! हिन्दी साहित्य की कायनात को फाड़ के रख दिया इस क़लम ने । कल ही इनकी मार्कस्वाद के पावन पथ पर पढ़ रहा था । अगर अब भी लोग खुल के उतरते नहीं तो मर ही चुका बस दफ़नाना शेष है हिन्दी साहित्य का भंभलभूसा ।

मुनीश ( munish ) said...

#भूल सुधार- पुरानी मित्र ने धिक्कारा है सो क्षमा माँगता हूँ । वर्तनी की अशु्द्धि हुई है । पढ़िए- मार्क्सवाद । क्षमाप्रार्थी हूँ ।

Ravindra Katyayn said...

अनिल भाई ! कोलाहलमय कारस्तानियों पर चुप्पी हमेशा से ख़तरनाक रही है। बेहद ज़रूरी आलेख। आपने अंतिम पंक्तियों मे जो लिखा है वह ज्योति कुमारी का ही नहीं हमारे समाज का भी सच है। वात्सल्य और कामुकता में फ़र्क को समझना सबसे ज़रूरी है। ख़ास तौर पर तब जब मामला स्त्री-विमर्श के सबसे बड़े पैरोकार (?) से जुड़ा हो। मुझे लगता है कि कोई स्त्री कभी भी किसी मर्द की निगाहों को पहचानने में भूल नहीं करती। तो फिर ज्योति कुमारी जी से यह भूल कैसे हुई। और यदि यह भूल नहीं है तो आत्म स्वीकार होना चाहिये। साहित्यकार को तो साहस दिखाना ही होगा।

arvind mishra said...

यही वह पोस्ट है जिसकी तलाश में मैं दर दर भटक रहा था . यही वह सच है जिसका उद्घाटन हों था ...
इस के प्रकरण के बहाने ही सही एक प्रवृत्ति पर एक चिरस्थायी महत्त्व का लेख -भाषा और अभिव्यक्ति का तो कहना ही क्या ?

Virendra Kumar Sharma said...

पढ़ लिया बड़ा व्यापक कैनवास है विषय का कुछ कहते लिखते नहीं बन रहा। अभी तक हम यही समझते थे सेक्स सिर्फ पीएचडी और डीलिट प्राप्त करने का नुस्खा है अब पता चला बूम्रांग भी है।

चित्त कोबरा और गुड़िया के अंदर गुड़िया दोनों पढ़ीं लेकिन एक और उपन्यास बाट जोह रहा है बिंदास लिखाड़ी की ,किसी लिखाड़ीन की -सेक्स की बैसाखियाँ।

एक मर्तबा हजारीप्रसाद दिवेदी जी ने कहा था -यौन चूक एक ऐसी चूक है जिसे मुआफ़ किया जाना चाहिए। आदमी का किरदार बड़ा होता है फिर बैसाखीगणेश जो करते हैं खुले आम करते हैं।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

नंगबाबा.

Samar said...

हिंदी पट्टी में भरी हुई गलाजत का प्रतिनिधि संस्मरण है यह संस्मरण... हिंदी समाज के मर्दों के दिमाग में भरी गन्दगी का हलफिया बयान.
शराब के नशे में (या होश में ही) एक पुरुष दूसरे लगभग अपरिचित पुरुष के सामने अपनी यौन कुंठाओं की उल्टी कर देता है. पहला पुरुष रस ले लेकर सुनता है... हर्फ़ ब हर्फ़ याद रखता है और फिर मौका आते ही दाग देता है..
हाँ, उस स्त्री से उसका पक्ष नहीं पूछता...दूसरे पुरुष का बयान सच है, झूठ है की फंतासियों की उड़ान.. सेक्सुआलिटी का विमर्श जरुरी है पर किसी की देह पर लिख के नहीं साहिबान... शर्म आनी चाहिए आप सबको..

मुनीश ( munish ) said...

वो अजब सी टिप्पणी दिखाई नहीं दे रही जिसका जवाब देने मैं दोबारा यहाँ वक्त मिलते ही चला आया । कल रात कोई यहाँ ये कह रहा था कि अनिल को ये सब नहीं बताना चाहिए था जबकि खुद वही सज्जन फ़्रिज में नहीं कहीं और वायाग्रा की टिकिया रखी होने की बात का धड़ल्ले से खुलासा कर रहे थे । खैर, अब क्या कहें ? हिन्दी पट्टी में जो मवाद भरा है उसका फूट कर बह आना ज़रूरी है ताकि फोड़ा कुछ तो कम हो । मैं इसे एक प्रतिनिधि संस्मरण की तरह कई बार पढ़ पढ़वा चुका हूँ और अगर अनिल जी ने न लिखा होता तो पूरी तस्वीर सामने शायद न आती ।

arvind mishra said...

""सेक्सुआलिटी का विमर्श जरुरी है पर किसी की देह पर लिख के 'नहीं साहिबान... शर्म आनी चाहिए आप सबको'.. "

समर सेक्सुअलिटी को देह से पृथक करने की क्या तरकीब है यार ? :-) "

प्रज्ञा पांडेय said...

sach ke behad kareeb ka sach ! ek sach yah bhi hai ki ham 3 ghante yadaw ji paas baithe aur ve mitra bhaaw se baat karate rahe . maine unaki aankhon men kuchh bhi ashshliil nahin paaya .aur tab maine likha tha unhone nahin striyon ne shoshan kia hai unaka .

prem said...

बात ये नही कि ज़्योति और रजेन्द्र यादव की पर्स्नल जिन्दगी को अनिल लिखना चाह रहे है! स्त्री विमर्श को नये आयम मिले इस्मे क्या गलत है! ज़्योति राजेन्द्र यादव ह्मारे लिए कोइ भी रिश्ते रखे उसमे कोइ बहस नही होनी चाहिये, राजेन्द्र यादव और ज्योति समाज मे तो हर जगह है ही! अनिल विमर्श करना चाह रहे है, हमे रजेन्द्र यादव से उपर उठ्ना चाहिये! लेखक किसी को निशाना नही बनाता अगर ऐस करता तो वो सहित्य का बलात्कार करता है और अनिल ऐसा कुछ नही कर रहे. मंटो बहुत बद्नाम थे, लेकिन किसी से उनकी दुशमनी नही थी अनिल यादव एक आइना दिखा रहे है और कुछ नही..हम कैसे समझना चाहते है वो बहस है. और ये कोई क्राइम रेपोर्ट नही है कि ज्योति क्या कहती है...जब तक राजेन्द्र है तब तक ज्योति भी है

मुनीश ( munish ) said...

संयम, संतुलन, शालीनता एवम् समझ की मिसाल है प्रेम जी की ये टिप्पणी । मैं दावे से कह सकता हूँ कि इन्होंने विश्व नहीं तो कम से कम अंग्रेज़ी साहित्य का पर्याप्त अवगाहन किया है । केवल हिन्दी साहित्य का सेवन ऐसा है जैसा मैदा युक्त समोसे , बिस्कुट एवम् कुलचादिक भकोसे जाना और फ़ाइबर के तौर पर कुछ न खाना जिससे कब्ज़ की समस्या उत्पन्न होती है और यही हिन्दी साहित्य संसार की समस्या है मोटे तौर पर ।

Kamal K Mishra said...

कुछ हादसे सिर्फ खौफ़ पैदा करते हैं और कुछ घृणा, लेकिन कुछ दुर्घटनाएं ऐसी भी होती हैं जो व्यक्तिगत और सामाजिक तौर पर भी दोनों ही तरह के मनोभावों को जन्म देती हैं। ऐसी किसी त्रासदी से गुजरते हुए एक बार तो ऐसा लगता है की कुछ कहने सुनने का होश ही कहीं गुम हो गया है। शायद यही वजह हो कि हिंदुस्तान में रेप या यौन उत्पीडन के वैसे ज्यादातर मामले, जहाँ परिवार का ही कोई सम्बन्धी शामिल होता है, समाज की निगाहों से बहोत दूर खामोशी की कब्र में चुपचाप दफ्न हो जाते हैं। जो कुछ थोड़े से मामले सामाजिक प्रतिक्रिया और गुनाहगारों को सजा दिलाने के लिए सामने आ पाते हैं वो इस लिए कि ऐसे मामलों में पीडिता या उसके परिवार में इनके ब्योरों को छिपाने के बजाय उजागर करने का हौसला दिखता है। राजेंद्र यादव की मुहंबोली बेटी और करीबी रहीं चर्चित युवा लेखिका ज्योति कुमारी ने भी यादव जी के यहाँ घरेलू नौकर का काम करने वाले प्रमोद कुमार महतो द्वारा एक तथाकथित अश्लील वीडियो की आड़ में उनको ब्लैकमेल करने की कोशिशों और इस पूरे प्रकरण में नारीवाद के चैंपियन और पिता समान राजेंद्र यादव की गैर सैद्धांतिक भूमिका का एकतरफा खुलासा कर के हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में एक हडकंप मचा दिया है। लेखिका को अपमानित और ब्लैकमेल करने का प्रयास करने वाला प्रमोद कुमार अपने अपराधिक कृत्य के चलते जेल की सलाखों के पीछे है। अगर उसका जुर्म साबित हुआ तो निश्चित है की उसे कुछ न कुछ सजा जरुर मिलेगी। इस मामले में राजेंद्र यादव की निभाई ढुलमुल और एक हद तक संदिग्ध भूमिका से- जिसको लेखिका ने सामाजिक तौर पर उजागर करने का प्रयास किया है- उनकी अपनी साख पर भी बट्टा तो लग ही गया है। अब सवाल ये है कि इस घटना या दुर्घटना को आप महज प्रमोद बनाम ज्योति या राजेंद्र यादव बनाम ज्योति देखते हैं या इसके कुछ और भी गहरे निहितार्थ हैं। अनिल यादव ने भी अपने कुछ ब्योरे रखते हुए एक खास और कुछ उकसाने वाले अंदाज में, जो संभव है हम में से कुछ लोगों को पसंद न आये, इसी सवाल से टकराने का प्रयास किया है। मैं मानता हूँ की असली अपराधी की शिनाख्त और पीडिता को न्याय दिलाने की हड़बड़ी बेशक बुरी नहीं है। और पितृ सत्ता से नारी मुक्ति के प्रयासों को भी मेरा पूरा सहयोग और समर्थन है। लेकिन क्या सेक्सुअलिटी याने यौनिकता और यौन कुंठाओं के मसले पर अभी चुप रहना ही अच्छा है क्योंकि समर पांडे और हिमांशु पंड्या जैसे हमारे खैरख्वाह मुजरिमों की फांसी के बाद ही तस्वीर के इस पहलू पर गौर करना चाहते हैं। अंत में, अगर ज्योति कुमारी अपने प्रयासों से सियाह रात की ख़ामोशी को तोड़ रही हैं, तो अनिल यादव भी एक गंभीर लेखक और संजीदा इन्सान हैं जिन्हें चर्चाओं में रहने का न तो शौक है और न आदत और मुमकिन है कि यह हुनर ही शायद उन्हें नहीं आता। लेकिन अनिल के पोस्ट का जो मूल स्वर है याने यौनिकता के सवाल पर अनवरत जारी चुप्पी से प्रतिवाद वहां मैं उनके साथ हूँ .