Saturday, July 12, 2014

निश्चित मौत से अगर आप ऐसी भिड़ंत कर सकते हैं तो आप हैं आर. अनुराधा


ज़माने की औपचारिकताओं का तकाज़ा है कि इस पोस्ट को यहाँ बहुत पहले लग जाना चाहिए था. लेकिन मेरी अपनी स्वास्थ्य-सम्बन्धित व्यस्तताएं थीं और एक दोस्त को खो चुकने का गहरा ग़म. अनुराधा के जाने की अवश्य्म्भाव्य्ता की जानकारी होना एक लम्बे अवसाद का विषय बन चुका था लेकिन आज मैं एक स्त्री को याद कर रहा हूँ जो जहां गयी वहाँ अपनी निशानियाँ ऐसे छोड़ आई जैसे पत्थरों चट्टानों पर बहता पानी चुपचाप धर आता है.

कई साल पहले जब हिन्दी में ब्लॉगिंग शुरू हुई थी अनुराधा और दिलीप से आत्मीय संबंधों की डोर महान अश्वेत गायक पॉल रोब्सन के गीतों ने जोड़ी जिन्हें मैं उन दिनों कबाड़खाने पर पोस्ट कर रहा था.

ऐसे सम्बन्ध बन जाने के बाद पहली या दूसरी या तीसरी या सौवीं मुलाकातें कोई मायने नहीं रखतीं. मीर बाबा फ़रमा चुके हैं –

रोज़ मिलने पे नहीं निस्बत-ए-इश्क़ी मौकूफ़
उम्र भर एक मुलाक़ात चली जाती है.

उस दिन मैं और सबीने लक्ष्मीबाई नगर स्थित अनुराधा-दिलीप के घर गए थे. अनुराधा ने बाटी-चोखा बनाया था.

उस दिन अनुराधा-दिलीप और राजू (यानी बेटा अरिंदम) हल्द्वानी आये थे.

उस दिन मेरी बहन के नवजात बेटे का नाम राजू के नाम पर अरिंदम धरा गया था.

बहन का बेटा अरिंदम अनुराधा के साथ
उस दिन मेरे घर कोई था ही नहीं जब अनुराधा-दिलीप और राजू के अलावा दिल्ली से इरफ़ान अपना पूरा कुनबा लेकर हल्द्वानी पहुँच गए थे. छोटी बहन कुछ खाना-वाना बनाने में मदद करने आ तो गयी थी पर दस-बारह लोगों के वास्ते रोटियाँ अनुराधा ने ही बेलीं-पकाईं.

अरिंदम, इरफ़ान की सुपुत्री और अनुराधा
मैं अपने बाथरूम में अमूमन एक ताज़ा फूल ज़रूर सजाए रखता था. सिर्फ अनुराधा थीं जिन्होंने उसे देखा और मुझसे पूछा कि उस फूल को कौन रोज़ बदल जाता है. अब कौन कहे कि अनुराधा मेरा मन अब वैसा कभी नहीं कर सकेगा.

उस दिन मुनीश और विनय और मैं एक लीटर की व्हिस्की लेकर अनुराधा-दिलीप के पास पहुँच गए थे तो हमें उसी आत्मीयता से बिठाया-खिलाया गया.   

लेकिन हमें या किसी को पता तक उस स्त्री ने नहीं चलने दिया कि वह कितने बड़े संग्राम से वर्षों से रू-ब-रू थी. उसकी कैंसर विजेता की डायरी मेरी माँ ने भी पढ़ी मेरी बहन ने भी और वे उस की सादगी और हिम्मत के हमेशा कायल रहे.

जब अनुराधा की कवितायेँ ‘जानकी पुल’ पर छपीं तो उन्होंने मुझे उनका लिंक भेजा. उसके बाद कविता संग्रह के प्रकाशन संबंधी सूचना देते हुए उनका मुझे भेजा गया मेल शायद अंतिम संवाद था किसी भी तरह का.

वे मेरे एक ब्लॉग ‘लपूझन्ना’ को खूब पसंद करती थीं और मुझसे उसे आगे बढाने को कहती थीं हर बार.

उन्होंने मुझे कई लिंक भेजकर हैदराबादी मजाहिया शायरी के कुछ नगीनों, खासतौर पर चिचा से मिलवाया. उन्होंने न जाने कितनी पीडीएफ फाइलें सहेज रखी थीं. आख़िरी दिनों की एक मेल में उन्होंने मुझे ‘कैचर इन द राई’ के पीडीएफ़ का दुर्लभ लिंक मुहैय्या कराया था.

मैं इस पोस्ट के माध्यम से उन्हें लगातार याद करते रहना चाहता हूँ और यह भी चाहता हूँ कि आप जानें कि इस मुश्किल समय में भी ऐसे जीवंत लोग मिलते हैं और उन्हें सहेज कर रखना कितना ज़रूरी होता है.
उनकी कविताओं की किताब अधूरा कोई नहीं’ से चुनिन्दा कवितायेँ यहाँ पेश की जाती हैं और उनके जाने के बाद लिखा हुआ दिलीप का एक मार्मिक गद्य और अनुराधा की कुछ तस्वीरें. 

हम तुम्हें हमेशा याद रखेंगे अनुराधा! सलाम!


1.  अधूरा कोई नहीं

सुनती हूं बहुत कुछ
जो लोग कहते हैं
असंबोधित
कि
अधूरी हूं मैं- एक बार
अधूरी हूं मैं- दूसरी बार
क्या दो अधूरे मिलकर
एक पूरा नहीं होते?
होते ही हैं
चाहे रोटी हो या
मेरा समतल सीना
और अधूरा आखिर
होता क्या है!
जैसे अधूरा चांद? आसमान? पेड़? धरती?
कैसे हो सकता है
कोई इंसान अधूरा!

जैसे कि
केकड़ों की थैलियों से भरा
मेरा बायां स्तन
और कोई सात बरस बाद
दाहिना भी
अगर हट जाए,
कट जाए
मेरे शरीर का कोई हिस्सा
किसी दुर्घटना में
व्याधि में/ उससे निजात पाने में
एक हिस्सा गया तो जाए
बाकी तो बचा रहा!
बाकी शरीर/मन चलता तो है
अपनी पुरानी रफ्तार!
अधूरी हैं वो कोठरियां
शरीर/स्तन के भीतर
जहां पल रहे हों वो केकड़े
अपनी ही थाली में छेद करते हुए

कोई इंसान हो सकता है भला अधूरा?
जब तक कोई जिंदा है, पूरा है
जान कभी आधी हो सकती है भला!
अधूरा कौन है-
वह, जिसके कंधे ऊंचे हैं
या जिसकी लंबाई नीची
जिसे भरी दोपहरी में अपना ऊनी टोप चाहिए
या जिसे सोने के लिए अपना तकिया
वह, जिसका पेट आगे
या वह,जिसकी पीठ
जो सूरज को बर्दाश्त नहीं कर सकता
या जिसे अंधेरे में परेशानी है
जिसे सुनने की परेशानी है
या जिसे देखने-बोलने की
जो हाजमे से परेशान है या जो भूख से?
आखिर कौन?
मेरी परिभाषा में-
जो टूटने-कटने पर बनाया नहीं जा सकता
जिसे जिलाया नहीं जा सकता
वह अधूरा नहीं हो सकता
अधूरा वह
जो बन रहा है
बन कर पूरा नहीं हुआ जो
जिसे पूरा होना है
देर-सबेर
कुछ और नहीं
न इंसान
न कुत्ता
न गाय-बैल
न चींटी
न अमलतास
न धरती
न आसमान
न चांद
न विचार
न कल्पना
न सपने
न कोशिश
न जिजीविषा
कुछ भी नहीं

पूंछ कटा कुत्ता
बिना सींग के गाय-बैल
पांच टांगों वाली चींटी
छंटा हुआ अमलतास
बंजर धरती
क्षितिज पर रुका आसमान
ग्रहण में ढंका चांद
कोई अधूरा नहीं अगर
तो फिर कैसे
किसी स्त्री के स्तन का न होना
अधूरापन है
सूनापन है?

अधूरी है उसकी सोच
जिसके लिए हाथों का खिलौना टूट गया
खेलते-खेलते
या उसका आइना
जो नहीं जानती
36-28-34 के परे एक संसार है
ज्यादा सुंदर
स्तन का न होना सिर्फ और सिर्फ
उन सपनों-इच्छाओं का अधूरापन है
जो भावनाओं बराबरी के रिश्तों से परे
उगते-पलते हैं किसी असमतल बीहड़ में
जहां जीवन मूल्यहीन है, विद्रूप है, शर्मनाक है, अन्याय है

2.  भर दो मुझे

मेरे सीने में
बहुत गहराई है
और बहुत खालीपन है
भुरभुरी
बालू की तरह
भंगुर है मेरी पसलियां
इन्हें भर दो
अपनी नजरों की छुअन से
गर्म सलाखों सी तपती,
हर समय दर्द की बर्फीली आंधियों में
नर्म हथेलियों की हरारत से
इन्हें ठंडा कर दो
जैसे मूसलाधार बरसात के बाद
भर जाते हैं ताल-पोखरे
ओने-कोने से, लबालब
शांत नीला समंदर
भरता है हर लहर को
भीतर-बाहर से
या पतझड़ भर देता है
सूखे पत्तों से
किसी वीरान जंगल की
मटियाली सतह को
कई परतों में
इतने हल्के से कि
एक पतली चादर सरसराती हवा की
सजा दे और ज्यादा उन पतियाली परतों को
उनके बीच की जगहों को भरते हुए
अगर तुमने देखा हो रेतीला बवंडर
जो भर देता है
पाट देता है पूरी तरह
आकाश-क्षितिज को
बालू के कणों से
जैसे भर जाती है
हमारे बीच की हर परत, हर सतह
प्रशांत सागर-से उद्दाम प्रेम से
वैसे ही भर दो मुझे गहरे तक
कि परतों के बीच
कोई खालीपन भुरभुरापन वो दर्द
न रहे बाकी
रहे तो सिर्फ
बादल के फाहों की तरह
हल्की मुलायम सतह सीने की
और उसमें सुरक्षित
भीतरी अवयव

3. देह की भाषा

देह के मुहावरे अजीब होते हैं
भाषा अजीब होती है
तकलीफ दूर करने के लिए
तकलीफ मांगती है
आराम पाने के लिए
बेआराम होना मांगती है
बोलती है गर्मियों की उमस भरी बेचैनी
ठीक बीच रात में
दिसंबर की बर्फीली ठंड में भी
जब वह घिरी होती है
हार्मोंन की ऊंची-नीची लहरों से
भरी गर्मी में
बतियाती है ढेर सा पसीना
और हो जाती है ठंडी, निश्चल, चुप
चुप रहती है
जब कहने की जरूरत सबसे ज्यादा हो
चुप हो जाती है
जब बातें करने को लोग सबसे ज्यादा हों
आस-पास जमा हुए, आपस में बतियाते
उस बीच में रखी देह के बारे में
जो चुप हो गई
इस वाचाल को चाहिए एकांत, सन्नाटा
जब पास कोई न हो
तो बोलती है
बेबाक, बिंदास
अपने मन की,
देह की
फिर समेटती है अपने शब्द
चुन-चुन कर एक-एक
दिखाती है कविराज को
और पूछती है नुस्खे
उन्हें शांत करने के,
बुझाने के
क्योंकि देह का बोलने
यानी शब्दों का खो जाना

4.  तुम न बदलना

लोग मिलते हैं
बिछुड़ जाते हैं
दिन दोपहर शाम रात
आते हैं चले जाते हैं
मौसम भी कहां
गांठ में बंधते हैं
रिश्ते बातों-बातों में टूटा करते हैं
रास्ते हम ही
बदलते चलते हैं
अखबार की रोशनाई हर दिन
सुर्खियां बदल देती है
जिंदगी की प्याली
छूटती है हाथ से
टूट जाती है
फैलती हैं किरचें
बनते है घाव
फिर भर जाते हैं
अस्पताल में डॉक्टर बदलते हैं
डॉक्टर पर्चियां बदलते हैं
पर्चियों में दवाएं
खुराक बदलते हैं
कभी हम
डॉक्टर ही बदल लेते हैं
पर तुम न बदलना
दर्द,
साथ देना मेरा

5.  तेरी-मेरी चुप

चुप रहना गलत है
चुप बैठ जाना और भी गलत
चुप बैठना नहीं
चुप रहना नहीं
कहना है
कि हम सिर्फ वह नहीं
जिसे सर्जरी ने काटा
सिकाई ने जलाया
दवाओं ने मारा
चंद उत्पाती
अपनी आवारगी में, अपने अधूरेपन से
भले ही रुला लें दर्द के आंसू
करना है इस गुम-चुप अक्खड़-जिद्दी
कैंसर को हिलाने-मिटाने की कोशिश
बहुत रोशनी इकट्ठी करनी होगी
पर मीनारों में नहीं,
बनाने होंगे उस रोशनी के पुल
जो जोड़ते हों हर किरण को, हर तार को
उगानी हो भले ही हथेली पर दूब
या पूछना पड़े रात से
सुबह का पता
सूरज को जगाना होगा
लोगों को जिलाना होगा
ताकि जीता रहे सब कुछ
मरे वह जो आतंक है, स्याह है
बे-ओर-छोर है, बेलगाम है अब तक

6.  अपने-अपने हिस्से के जादू

मेरे हिस्से बहुत से जादू आए हैं
साइकिल सीखने के दौरान न गिरने से लेकर
कार से कभी टक्कर न करने तक
खिड़कियों-रोशनदानों-ऊंची चारदीवारियों से होकर
खपरैल की काई-फिसलन भरी छतों पर कूद-फांद से लेकर
पकी उम्र में हर छोटे पत्थर और असमतल रास्तों से ठोकरें खाकर लड़खड़ाने तक
कभी चोट न लगना जादू था

ऑस्टियोपोरोसिस से लेकर इस अनंत संक्रमण और रेडिएशन
से भंगुर हड्डियों के चूर होने की हर आशंका तक
इस ढांचे का संभले रहना जादू था
लगभग शून्य प्रतिरोधक क्षमता के साथ
शरीर में अगणित कीटाणुओं को पलते देखना
फिर भी संगीन सुनना और इत्मीनान से सो पाना
जादू ही तो था

भीतर की दुर्घटनाओं से लगातार निबटते संभलते आशंकित होते
बाहरी देह से परे हो जाना
लंबे अवकाशों बाद भी
उसके आवेगों को अपनी जगह सुरक्षित पड़ा पाना
देह की सुघटनाओं की कमी के बावजूद
प्रेम का लगातार गहराना फैलते जाना
जादू नहीं तो और क्या है

अतल दर्द में ऊब-डूब
और उबरने की अनवरत प्रयास-यात्राओं के बीच
हंसी के अमलिन प्रवाह का सतत बने रहना
यह भी जादू है जो मेरे हिस्से आया है

कई बार गुज़रना समय की अंधेरी सुरंगों से
सिर्फ एक स्पर्श के भरोसे
और हर बार रोशनी पा जाना
गाढ़े दलदल में तैर कर
मीथेन की जहरीली हवा में सांस लेकर भी
टिके रहना
रोशनी देख पाना
क्या कहेंगे आप इसे
जादू के सिवा!

किस्म-किस्म की जांच रपटों के बीच से
ठोस सपाट तथ्य उभर कर बाहर आता है आखिर
कि चमत्कार नहीं हुआ करते
अक्सर ऐसे हालात में
मैं समझती हूं कि
चमत्कार नहीं हुआ करते

पर अपनी-अपनी जादुओं की दुनिया से गुज़रते हुए
समझते हैं हम कि
जो कुछ नहीं समझ पाते
घटनीय की संभावना जो हम नहीं देख पाते
वह सब वक्त की मुट्ठी में बंद
पड़ा होता है अपनी बारी के इंतज़ार में

धीरे-धीरे खुल रहा है
यह जादू भी मेरे आगे

7.  दर्द

दर्द का कोई
वर्ग नहीं होता
प्रजाति नहीं होती
जाति नहीं होती
दर्द, बस दर्द होता है
एक-सा स्वाद सबको देता है
सब पर एक-सा असर करता है
चाहे नज़ाकत से करे
या पूरी शिद्दत से
कोई फर्क नहीं करता
हाथ या गहरे कहीं पीठ में
कसमसाते दांत मरोड़ खाते पेट या धकधकाते दिल में
आंख ही रोती है हर दर्द के लिए
सीना ही हिलकता है हर दर्द के लिए
दर्द उठता हो कहीं भी
साझा होता है पूरे आकार में
चाहना एक ही जगाता है सब में
कि बस ढीले हो जाएं बेतरह खिंचे तंतु
बंधनहीन हों मज्जा के गुच्छे
ढूंढता है शरीर
आराम की कोई मुद्रा
इत्मीनान की एक मुद्रा
जीवन दर्द की एक यात्रा है
सैकड़ों दर्द के पड़ावों से गुजरते हैं हम
जैसे पहाड़ों पर मील के पत्थर गिनते
पार करते ऊपर उठते हैं हम
दर्द की यह यात्रा
हर एक की अपनी है
अकेली है
कुव्वत है, काबिलियत है, चाहत है
कहते हैं, दर्द को दर्द से ही राहत है
याद आता है तो रहता है
भटका दो उसे, भुला दो उसे
उलझा दो उसे दुनिया के किसी शगल में
वह भोला रम जाता है उसी में
भुला देता है वह मुझे, मैं उसे
मगर फिर शाम होते-होते जहाज का पंछी
लौट आता है अपने ठौर
ज्यादा अधिकार के साथ
गहराता है, अंधेरे के साथ अथाह सागर सा
तभी कौंधता है एक मोती गुम होने से ठीक पहले
दर्द-रहित मिलती है एक झपकी
सबसे असावधान मुद्रा में
असतर्क, समर्पण की स्थिति में
वह छोटी झपकी
आंखें खुलती हैं और
दर्द से फिर एकाकार
सतर्कता की एक और मुद्रा
राहत पाने की एक और कोशिश
दर्द की एक और मुद्रा

8.    संगीत

अचानक कहीं कोई गमक सुनाई पड़ती है
और लय बहती चली आती है पास
कानों में बज उठती है तरंग
और मन पूरा का पूरा उसमें घुल जाता है
एकाग्र हो जाता है
धीरे-धीरे और कुछ भी सुनाई नहीं देता
सिवाय उस संगीत लहरी के
जो सिर के ठीक ऊपर थिरक रही है
बंद आंखें खुलना नहीं चाहतीं
जैसे गहरी नींद हो
आस-पास दुनिया है
चलती है अपनी आवाजों के साथ
मगर मैं तरंगित हूं इस लय के साथ
छंद की तरह
जिसकी धुन पर
सिर अंगुलियां हाथ पैर
और धीरे-धीरे पूरा वजूद
झूम उठता है
बेखबर
अनजान
कि दुनिया
अपनी गति से चलती रहती है
बगल से गुज़रती हुई
देखती है अजीब नज़रों से
मैं अनोखी बैठी भीड़ में
मुझे अपनी लय, अपनी गति मिल गई
बाकी सब कुछ ठहर सा गया
अस्पताल के उस प्रतीक्षाकक्ष में

9.    चांदों के चेहरे

ज्यादातर दिन में कभी-कभार रात में भी
अनेक चांद विचरते हैं
यहां से वहां
या किसी प्रतीक्षाकक्ष में बैठे हुए धैर्य से
हर चांद का एक अदद चेहरा है चिकना चमकता सा
बच्चा-बूढ़ा स्त्री-पुरुष मोटा या पतला सा
चांद छुपा है
टोपी स्कार्फ गमछे या साड़ी के पल्लू से
कहीं कोई उघड़ा हुआ भी है बिंदास बेफिकर
चांद और उसके चेहरे का रंग
जैसे अभी-अभी कोयले या सीधी आंच का भभका लगा हो
न साबुन-पानी से साफ होता है न तेल-तारपीन से
हाथों पैरों के नील प़ड़े नाखून
जैसे हथौड़े से ठुकवा आए हों इत्मीनान से गिन-गिन कर
एक-एक को बिना नागा बिना कोताही
अस्पताल में
एक से दिखते लोग
अलग-अलग छिटके
कहीं भी पहचाने जाते हैं
आसानी से पकड़े जाते हैं
वही चिकने चमकते चेहरे
उम्मीद से रोशन सितारे आंखों में लिए
चांद के टुकड़े
चांद का उजास भले ही कभी कम हो जाए
भभकों से या आग से
ये तारे उसे बुझने नहीं देते
राह दिखाते हैं आगे की
हर स्कैन-रक्तजांच-रिपोर्ट से आगे
रजिस्ट्रेशन-रेडिएशन-जलन से आगे
अनिश्चितता-खर्च-कीमोथेरेपी से आगे
दर्द की छांव में बैठे ये यात्री
कभी मुस्कुराते अनजान सहयात्रियों से बातें करते
या अपने में डूबे हुए
फिर भी उत्सुक सब
अपने आस-पास की गतिविधियों के लिए सचेत
शायद कोई हलचल उनके लिए हो उनसे मुखातिब हो
जैसे उनके नाम की पुकार उस बड़े से प्रतीक्षाकक्ष में
बारी आते ही पिछले हर भाव का चोला उतार
वहीं प्रतीक्षाकक्ष की कुर्सी पर छोड़
चलते हैं सब उसी रोशनी में
पैरों में स्प्रिंग लगाए
जैसे कि अब हर मिनट की जल्दी उन्हें जल्द फारिग करेगी
अस्पताल से और इलाज से
अस्पताल और इलाज तक पहुंचने की देरी
भले ही लंबी रही हो

10.            मेरे बालों में उलझी मां

मां बहुत याद आती है
सबसे ज्यादा याद आता है
उनका मेरे बाल संवार देना
रोज-ब-रोज
बिना नागा

बहुत छोटी थी मैं तब
बाल छोटे रखने का शौक ठहरा
पर मां!
खुद चोटी गूंथती, रोज दो बार
घने, लंबे, भारी बाल
कभी उलझते कभी खिंचते
मैं खीझती, झींकती, रोती
पर सुलझने के बाद
चिकने बालों पर कंघी का सरकना
आह! बड़ा आनंद आता
मां की गोदी में बैठे-बैठे
जैसे नैया पार लग गई
फिर उन चिकने तेल सने बालों का चोटियों में गुंथना
लगता पहाड़ की चोटी पर बस पहुंचने को ही हैं
रिबन बंध जाने के बाद
मां का पूरे सिर को चोटियों के आखिरी सिरे तक
सहलाना थपकना
मानो आशीर्वाद है,
बाल अब कभी नहीं उलझेंगे
आशीर्वाद काम करता था-
अगली सुबह तक

किशोर होने पर ज्यादा ताकत आ गई
बालों में, शरीर में और बातों में
मां की गोद छोटी, बाल कटवाने की मेरी जिद बड़ी
और चोटियों की लंबाई मोटाई बड़ी
उलझन बड़ी
कटवाने दो इन्हें या खुद ही बना दो चोटियां
मुझसे न हो सकेगा ये भारी काम
आधी गोदी में आधी जमीन पर बैठी मैं
और बालों की उलझन-सुलझन से निबटती मां
हर दिन
साथ बैठी मौसी से कहती आश्वस्त, मुस्कुराती संतोषी मां
बड़ी हो गई फिर भी...
प्रेम जताने का तरीका है लड़की का, हँ हँ

फिर प्रेम जो सिर चढ़ा
बालों से होता हुआ मां के हाथों को झुरझुरा गया
बालों का सिरा मेरी आंख में चुभा, बह गया
मगर प्रेम वहीं अटका रह गया
बालों में, आंखों के कोरों में
बालों का खिंचना मेरा, रोना-खीझना मां का

शादी के बाद पहले सावन में
केवड़े के पत्तों की वेणी चोटी के बीचो-बीच
मोगरे का मोटा-सा गोल गजरा सिर पर
और उसके बीचो-बीच
नगों-जड़ा बड़ा सा स्वर्णफूल
मां की शादी वाली नौ-गजी
मोरपंखी धर्मावरम धूपछांव साड़ी
लांगदार पहनावे की कौंध
अपनी नजरों से नजर उतारती
मां की आंखों का बादल

फिर मैं और बड़ी हुई और
ऑस्टियोपोरोसिस से मां की हड्डियां बूढ़ी
अबकी जब मैं बैठी मां के पास
जानते हुए कि नहीं बैठ पाऊंगी गोदी में अब कभी
मां ने पसार दिया अपना आंचल
जमीन पर
बोली- बैठ मेरी गोदी में, चोटी बना दूं तेरी
और बलाएं लेते मां के हाथ
सहलाते रहे मेरे सिर और बालों को आखिरी सिरे तक
मैं जानती हूं मां की गोदी कभी
छोटी कमजोर नाकाफी नहीं हो सकती
हमेशा खाली है मेरे बालों की उलझनों के लिए

कुछ बरस और बीते
मेरे लंबे बाल न रहे
और कुछ समय बाद
मां न रही
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* नोट- कैंसर के दवाओं से इलाज (कीमोथेरेपी) से बाल झड़ जाते हैं









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मैं अब खाली हो गया हूं. बिल्कुल खाली दिलीप मण्डल

मैं अब खाली हो गया हूं. बिल्कुल खाली.

मैं अपनी सबसे प्रिय दोस्त के लिए अब पानी नहीं उबालता. उसके साथ में बिथोवन की सिंफनी नहीं सुनता. मोजार्ट को भी नहीं सुनाता. उसे ऑक्सीजन मास्क नहीं लगाता. उसे नेबुलाइज नहीं करता. उसे नहलाता नहीं. उसके बालों में कंघी नहीं करता. उसे पॉल रॉबसन के ओल्ड मैन रिवर और कर्ली हेडेड बेबी जैसे गाने नहीं सुनाता. गीता दत्त के गाने भी नहीं सुनाता. उसे नित्य कर्म नहीं कराता. उसे कपड़े नहीं पहनाता. उसे ह्वील चेयर पर नहीं घुमाता. उसे अपनी गोद में नहीं सुलाता. उसे हॉस्पीटल नहीं ले जाता. उसे हर घंटे कुछ खिलाने या पिलाने की अक्सर असफल और कभी-कभी सफल होने वाली कोशिशें भी अब मैं नहीं करता. उसकी खांसने की हर आवाज पर उठ बैठने की जरूरत अब नहीं रही. मैं अब उसका बल्ड प्रेशर चेक नहीं करता. उसे पल्स ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर लगाने की भी जरूरत नहीं रही. मेरे पास अब कोई काम नहीं है. हर दिन नारियल पानी लाना नहीं है. फ्रेश जूस बनाना नहीं है. उसके लिए हर दिन लिम्फाप्रेस मशीन लगाने की जरूरत भी खत्म हुई.

यह सब करने में और उसके के साथ खड़े होने के लिए हमेशा जितने लोगों की जरूरत थी, उससे ज्यादा लोग मौजूद रहे. उसकी बहन गीता राव, मेरी बहन कल्याणी माझी और उसकी भाभी पद्मा राव से सीखना चाहिए कि ऐसे समय में अपने जीवन को कैसे किसी की जरूरत के मुताबिक ढाल लेना चाहिए. इस लिस्ट में मेरे बेट अरिंदम को छोड़कर आम तौर पर सिर्फ औरतें क्यों हैं? देश भर में फैली उसकी दोस्त मंडली ने इस मौके पर निजी प्राथमिकताओं को कई बार पीछे रख दिया.

यह अनुराधा के बारे में है, जो हमेशा और हर जगह, हर हाल में सिर्फ आर. अनुराधा थी. अनुराधा मंडल वह कभी नहीं थी. ठीक उसी तरह जैसे मैं कभी आर. दिलीप नहीं था. फेसबुक पर पता नहीं किस गलती या बेख्याली से यह अनुराधा मंडल नाम आ गया. अपनी स्वतंत्र सत्ता के लिए बला की हद तक जिद्दी आर. अनुराधा को अनुराधा मंडल कहना अन्याय है. ऐसा मत कीजिए.

कहीं पढ़ा था कि कुछ मौत चिड़िया के पंख की तरह हल्की होती है और कुछ मौत पहाड़ से भारी. अनुराधा की मृत्य पर सामूहिक शोक का जो दृश्य लोदी रोड शवदाह गृह और अन्यत्र दिखा, उससे यह तो स्पष्ट है कि अनुराधा ने हजारों लोगों के जीवन को सकारात्मक तरीके से छुआ था. वे कई तरह के लोग थे. वे कैंसर के मरीज थे जिनकी काउंसलिंग अनुराधा ने की थी, कैंसर मरीजों के रिश्तेदार थे, अनुराधा के सहकर्मी थे, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे, प्रोफेसर थे, पत्रकार, डॉक्टर, अन्य प्रोफेशनल, पड़ोसी और रिश्तेदार थे. कुछ तो वहां ऐसे भी थे, जो क्यों थे, इसकी जानकारी मुझे नहीं है. लेकिन वे अनुराधा के लिए दुखी थे. किसी महानगर में किसी की मौत को आप इस बात से भी आंक सकते हैं कि उससे कितने लोग दुखी हुए. यहां किसी के पास दुखी होने के लिए फालतू का समय नहीं है.

अनुराधा बनना कोई बड़ी बात नहीं है.

आप भी आर. अनुराधा हैं अगर आप अपनी जानलेवा बीमारी को अपनी ताकत बना लें और अपने जीवन से लोगों को जीने का सलीका बताएं. आप आर. अनुराधा हैं अगर आपको पता हो कि आपकी मौत के अब कुछ ही हफ्ते या महीने बचे हैं और ऐसे समय में आप पीएचडी के लिए प्रपोजल लिखें और उसके रेफरेंस जुटाने के लिए किताबें खरीदें और जेएनयू जाकर इंटरव्यू भी दे आएं. यह सब तब जबकि आपको पता हो कि आपकी पीएचडी पूरी नहीं होगी. ऐसे समय में अगर आप अपना दूसरा एमए कर लें, यूजीसी नेट परीक्षा निकाल लें और किताबें लिख लें, तो आप आर. अनुराधा हैं.

दरवाजे खड़ी निश्चित मौत से अगर आप ऐसी भिड़ंत कर सकते हैं तो आप हैं आर. अनुराधा.

जब फेफड़ा जवाब दे रहा हो और तब अगर आप कविताएं लिख रहें हैं तो आप बेशक आर. अनुराधा हैं. आप आर अनुराधा हैं अगर कैंसर के एडवांस स्टेज में होते हुए भी आप प्रतिभाशाली आदिवासी लड़कियों को लैपटॉप देने के लिए स्कॉलरशिप शुरू करते हैं और रांची जाकर बकायदा लैपटॉप बांट भी आते हैं. अगर आप सुरेंद्र प्रताप सिंह रचना संचयन जैसी मुश्किल किताब लिखने के लिए महीनों लाइब्रेरीज की धूल फांक सकते हैं तो आप आर अनुराधा हैं.

और हां, अगर आप कार चलाकर मुंबई से दिल्ली दो दिन से कम समय में आ सकते हैं तो आप आर अनुराधा हैं. थकती हुई हड्डियों के साथ अगर आप टेनिस खेलते हैं और स्वीमिंग करते हैं तो आप हैं आर अनुराधा. अगर महिला पत्रकारों का करियर के बीच में नौकरी छोड़ देना आपकी चिंताओं में हैं और यह आपके शोध का विषय है तो आप आर. अनुराधा हैं. अपना कष्ट भूल कर अगर कैंसर मरीजों की मदद करने के लिए आप अस्पतालों में उनके साथ समय बिता सकते हैं, उनको इलाज की उलझनों के बारे में समझा सकते हैं, उन मरीजों के लिए ब्लॉग और फेसबुक पेज बना और चला सकते हैं तो आप आर. अनुराधा हैं.

आप में से जो भी अनुराधा को जानता है, उसके लिए अनुराधा का अलग परिचय होगा. उसकी यादें आपके साथ होंगी. उन यादों की सकारात्मकता से ऊर्जा लीजिए.

अलविदा मेरी सबसे प्रिय दोस्त, मेरी मार्गदर्शक.

तुम्हारी मौत पहाड़ से भारी है.


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आर. अनुराधा का संक्षिप्त परिचय:

जन्मः 11 अक्टूबर 1967 को मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के बिलासपुर जिले में.

छह महीने की उम्र में परिवार जबलपुर आ गया. तब से लेकर नौकरी के लिए दिल्ली आकर बसने तक का जीवन वहीं बीता.

जीव विज्ञान में डिग्री. जबलपुर के रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और संचार में उपाधि, समाजशास्त्र और जनसंचार में स्नातकोत्तर उपाधियां. दिल्ली में बाल-पत्रिका चंपक में कुछ महीनों की उप-संपादकी के बाद टाइम्स प्रकाशन समूह में सामाजिक पत्रकारिता में प्रशिक्षण और स्नातकोत्तर डिप्लोमा. हिंदी अखबार दैनिक जागरण में कुछ महीने उप-संपादक. 1991 में भारतीय सूचना सेवा में प्रवेश. पत्र सूचना कार्यालय में लंबा समय बिताने और डीडी न्यूज में समाचार संपादक की भूमिका निभाने के बाद दिसंबर 2006 से प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार में संपादक.

बाल साहित्य, विज्ञान और समाज से जुड़े विविध विषयों पर बीसियों पुस्तकों का संपादन. कैंसर से अपनी पहली लड़ाई पर बहुचर्चित आत्मकथात्मक पुस्तक इंद्रधनुष के पीछे-पीछे : एक कैंसर विजेता की डायरी राधाकृष्ण प्रकाशन से 2005 में प्रकाशित. इसका गुजराती में अनुवाद साहित्य संगम प्रकाशन, सूरत से प्रकाशित. शीर्ष पत्रकार एसपी सिंह की रचनाओं के एकमात्र संकलन पत्रकारिता का महानायक सुरेंद्र प्रताप सिंह संचयन’ (राजकमल प्रकाशन, 2011)  का संपादन. नई मीडिया की आधुनिक प्रवृत्तियों पर पुस्तक न्यू मीडिया; इंटरनेट की भाषायी चुनौतियां और संभावनाएं (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2012)  का संपादन. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विशेष रूप से विज्ञान, समाज और महिलाओं से जुड़े विषयों पर सतत लेखन. कैंसर-जागरूकता के लिए कार्य हेतु उत्तर प्रदेशीय महिला मंच का हिंदप्रभा 2010 पुरस्कार और पिंक चेन सम्मान 2013 से सम्मानित.

14 जून 2014 को नई दिल्ली में देहांत.

आपको यह गुमान कब से हुआ कि मैं एक बड़ा लेखक और आदमी हूँ - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 7

(पिछली क़िस्त से जारी)


लेकिन उस ज़माने में एक विभाजन रेखा थी. फिल्मों में दो बड़े आदमी थे: मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा. मैं प्रकाश मेहरा का साथ भी काम कर रहा था. मैंने उनके लिए ‘खून  पसीना’, ‘लावारिस’, और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ लिखीं. वह एक दूसरा ही राकेट था. अब ये दोनों लोगों में से क्या महानी है, जो उसकी फिल्म में काम  करेगा, इधर नहीं कर सकता, जो उधर करता है, इधर नहीं कर सकता. लेकिन वे मुझे आदेश नहीं दे सकते थे. “तुम यहाँ काम नहीं कर कर सकते,” अमिताभ बच्चन ने कहा “मेरे साथ आओ, जहाँ मैं काम करूंगा वहाँ तुम भी करोगे.” मनमोहन देसाई ने ‘रोटी’ बनाई. तब वे बोले “अब मैं प्रोड्यूसर बनना चाहता हूँ.” तब उन्होंने ‘अमर अकबर एन्थनी’ बनाई. उसके बाद ‘नसीब’ और ‘कुली’. प्रकाश मेहरा के यहाँ स्ट्रेट नरेशन्स होते थे जो डायलाग और परफोर्मेंस पर निर्भर करते थे. प्रकाश मेहरा साब एक अच्छे गीतकार भी थे.

दक्षिण की ओर

एक दिन मैं आर. के. स्टूडियो में शूट कर रहा था, जितेन्द्र मेरे पास आये और बोले “माफ़ करना लेकिन एक प्रोड्यूसर आपसे दो साल से मिलना चाह रहा है, लेकिन उसके पास आपसे मिलने की हिम्मत नहीं है.”

तब वह प्रोड्यूसर आया. मैंने पूछा “आपको यह गुमान कब से हुआ कि मैं एक बड़ा लेखक और आदमी हूँ? मैं एक साधारण इंसान हूँ.”

“नहीं सर, दरअसल मेरा भाई आपसे बात करना चाहता है.” सो मैंने उसके भाई हनुमंत राव से बात की जो पद्मालय का प्रोड्यूसर होने के साथ ही एक बड़े दिल वाला अच्छा आदमी निकला. उसने कहा “मैं कन्नड़ से हिन्दी में एक रीमेक बनाने की सोच रहा हूँ.” उसने मुझे स्क्रिप्ट थमाई.

“मैंने सुना है” मैं बोला “दक्षिण भारत में आप जब रीमेक बनाते हैं तो आप कदम दर कदम शब्द दर शब्द ओरिजिनल की कॉपी करते हैं. मैं वैसा नहीं कर सकता. मुझे इसे दुबारा लिखना होगा.”

“आपको जैसा करना हो कीजिये” उसने जवाब दिया.

मैंने वैसा ही किया और पूरी स्क्रिप्ट को रेकॉर्ड किया. जितेन्द्र वहाँ काम करते थे. हेमा मालिनी वहाँ काम करती थीं. और वह फिल्म थी ‘मेरी आवाज़ सुनो’. उस फिल्म के साथ मैंने दक्षिण भारत में प्रवेश किया. सेंसर बोर्ड सर फिल्म को कुछ दिक्कतें पेश आईं पर फिल्म पास हो गयी. जब कोई फिल्म बैन की जाती है उसे अच्छी पब्लिसिटी मिलती है. फिल्म सुपरहिट गयी. मुझे बेस्ट राइटर का इनाम मिला. इस तरह साउथ में मेरी एंट्री हुई.

तनाव: किरची किरची आईना

अब मैं तीन हिस्सों में बंट गया था – मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और दक्षिण भारत. दक्षिण में लोग समय के बड़े पाबन्द होते हैं. वे आपको पूरा पैसा देते हैं. सो मैं वहाँ काम कर रहा था. मैं यहाँ भी काम कर रहा था. यही मेरा जीवन था. लेकिन घर पर हमेशा एक तनाव रहता था, “तुम हमें ज़रा भी समय नहीं दे रहे.” मैं झोपड़पट्टी से आया था. मैंने अपनी बीवी और बच्चों को फ्लैट्स और बंगले और सब कुछ दिया था. लेकिन इन सब पर सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि मैं उन्हें समय नहीं दे पा रहा था. सो दो के बदले अब तीन तीन विभाजन रेखाएं थीं. मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा के बीच एक रेखा थी; मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और दक्षिण के बीच एक दूसरी रेखा थी जबकि मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और दक्षिण और घर के बीच एक तीसरी. और उस रेखा का अस्तित्व अब भी है. मैं टुकड़ों में बंट गया था. और अगर रोटी का एक टुकड़ा हिस्सों में बंट जाए तो उसे दुबारा जोड़कर एक नहीं बनाया जा सकता. ठीक जिस तरह एक आईना किर्चियों में टूट जाता है, मैं भी बिखर गया था. हालांकि इसका कोई अफ़सोस नहीं है. मैं जो भी हूँ, वो हूँ. मुझे पता है मैं अब भी मेहनत कर रहा हूँ. मेरे अपने लोग इस बात को अभी नहीं पहचानते पर एक दिन उन्हें मेरी याद आएगी. मेरे पिताजी बताया करते थे घर की खुशी, उसकी मोहब्बत और अपनेपन के बारे में ... कुछ बातें मेरे दादाजी की बाबत. उन्हें अपने परिवार से अलग होना पड़ा था. वही चीज़ें मेरे दादाजी के साथ घटीं वही पिताजी के साथ. परिवार का सम्बन्ध क्या होता है? परिवार के लिए वह एक गोंद का काम करता है. अगर वो चीज़ें नहीं हैं तो सब कुछ बिखर जाएगा.   


(जारी)

Friday, July 11, 2014

ज़ोहरा सहगल के लिए एक रीपोस्ट

कल ज़ोहरा सहगल नहीं रहीं. उन्हें श्रद्धांजलि प्रस्तुत करता हुआ मैं इस पुरानी पोस्ट को इस उम्मीद में लगा रहा हूँ कि दीपा इस किताब से कुछ और प्रेरक अंश यहाँ शीघ्र पोस्ट करेंगी.


ज़ोहरा सहगल को कौन नहीं जानता. अठानवे साल की आयु में २०१० में उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘क्लोज़ अप’ प्रकाशित की. हिन्दी के पाठकों के लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि इस पुस्तक का अनुवाद हमारी कबाड़न दीपा पाठक के किया है और ‘क़रीब से’ शीर्षक अनुवाद के रूप में इसे राजकमल प्रकाशन द्वारा छाप भी दिया गया है.

इस किताब के चंद शुरुआती हिस्से दीपा की मेहरबानी से यहाँ पेश किये जा रहे हैं.


ज़ोहरा सहगल-उर्फ मुमताज़ के खानदान का लेखाजोखा
नवाब नजीब-उद-दौला (1708-1770) के खानदानी

नजीबाबाद के आखिरी हुक्मरान नवाब जलालुद्दीन खान 1857 की बग़ावत के दौरान अंग्रेज़ों की गोली से मारे गए  थे. उनकी विधवा बेगम, दो जवान बेटे और दो कमउम्र बेटियां बैलगाड़ी में छुप कर मुरादाबाद पहुंचे, जहां बेगम के भाई फौज में कमांडर थे.

बाद में बड़ा बेटा अज़िमुद्दीन खान रामपुर के जवान नवाब के रीजेंट के साथ-साथ वहां की फौज के जनरल बन गए. कई सालों बाद उनकी पोती असकरी बेगम की शादी रामपुर नवाब के वारिस राज़ा अली खान से हुई और उन्हें राफत ज़ामानी बेगम की पदवी दी गई.

छोटा बेटा, साहेबज़ादा हमिद्दुज़ार खान को देश की कई रियासतों का रीजेंट बनाया गया. उनकी छोटी बहन जाफरी बेगम की शादी रामपुर के एक इज़्जतदार और अमीर आदमी अताउल्लाह खान से हुई. उनके सबसे छोटे बेटे मुमताज़ुल्लाह खान ने अपनी रिश्ते की बहन साहेबज़ादा हमिद्दुज़फर खान की बेटी नातिका बेगम से शादी की. उनके सात बच्चे हुए जिनमें से ज़ोहरा सहगल तीसरे नंबर की संतान थीं.

जलालुद्दीन खान की सबसे बड़ी बेटी ज़ुबैदा बेगम (?) की शादी लोहारू के नवाब से हुई, जिनकी बहुत सारी बेटियां पैदा हुई, जिनकी बाद में अलग-अलग नवाबों से शादियां हुईं जैसे मालेर कोटला, पटौदी और फखरुद्दीन अली अहमद का रंगून खानदान.
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1919 -1929
बचपन और लाहौर

जीवनः खुद के साथ अंतहीन बातचीत; होश के आलम में चुप और पागलपन में सुनाई देने वाली

कोई अपने बारे में किताब क्यों लिखता है? सबसे बड़ी वजह तो यह कि इंसान मरने के बाद जीवन से अपनी पकड़ छूटने की कल्पना से डरता है . ऐसे में आत्मकथा उसे मरने के बाद भी अपने होने के भ्रम को बनाए रखने का जरिया लगता है. मुझे लगता है कि यह एक तरह की आत्ममुग्धता है, भला किसे परवाह है तुम्हारी भावनाओं की, तुम्हारे संघर्ष की, तुम्हारे सुख या दुख की? हां, शायद तुम्हारे बच्चों के लिए उनकी कुछ अहमियत हो. हालांकि वो भी दिल से तुम्हें प्यार करने और तुम्हारी देखभाल करने के बावजूद कभी-कभी ऐसा अहसास दिलाते हैं जैसे तुम उनकी जिंदगी से जुड़ा एक फालतू हिस्सा हो और तुम्हारे हटने से उन्हें राहत मिलेगी...पता नहीं पर मुझे ऐसा लगता है!

मेरे लिए इस किताब को लिखने की खास वजह एक ऐसा काम हाथ में लेना था जिसमें मैं खुद को डुबा सकूं, साथ ही मैं अपनी जिंदगी जो कुछ हुआ उन सब बातों को पूरी तरह से भूल जाने से पहले ही लिख डालना चाहती थी. इसमें से बहुत सारी बातें बहुत पुरानी हैं, ऐसा लगता है वो सब किसी और जन्म में घटा था, इसके बावजूद कुछ यादें इतनी जीवंत हैं जैसे लगता है कल ही की बात हो.


मैं 27 अप्रैल, 1912 में संयुक्त भारतीय प्रांत, जो अब उत्तर प्रदेश कहलाता है, में सहारनपुर में पैदा हुई. मेरे पिता एक पठान सरदार, मौलवी गुलाम जिलानी खान साहेब के वंशज थे. मौलवी साहेब  की नस्लीय जड़ें अफगानिस्तान के अब्दुल राशिद नाम के एक यहूदी से जुड़ी थीं, जिन्होंने 631 ईसवीं सन् में मुस्लिम धर्म अपना लिया. 1760 में गुलाम जिलानी, जो एक विद्वान और प्रसिद्ध योद्धा थे, दिल्ली में अहमद शाह के दरबार में आए जहां उन्हें बहुत सम्मान दिया गया. बाद में वे अन्य रोहिला सेनापतियों के साथ सेना में शामिल हुए. उन्हें नवाब फैजुल्लाह खान की सेना की कमान सौंप दी गई. नवाब साहब के साथ वे कोसी नदी के किनारे बसे 'रामपुरा' नाम के एक गांव में पहुंचे. इस तरह से रामपुर शहर और राज्य के रूप में विकसित हुआ. गुलाम जिलानी और बाकी ग्यारह रिसालदारों को यहां जमीन आवंटित की गई. मेरी मां के दादा जी नवाब जलालुद्दीन खान थे, जो नवाब ज़ेब्ते खान के पोते थे. नवाब ज़ेब्ते खान नजीबाबाद के संस्थापक और नवाब नजीबुद्दौला के बेटे और उत्तराधिकारी थे. मुझे अचरज होता है यह सोच कर कि हमारे पूर्वजों के जीवन का हम पर कितना प्रभाव पड़ता है, कभी सोचती हूं कि मेरे पूर्वज के व्यक्तित्व में जुड़े विद्वता और साहसिक  गुणों का का मेरे जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है.

मेरे पिता ने युवावस्था में ही रामपुर छोड़ दिया. मेरी पैदाइश के दौरान वह ब्रिटिश प्रोविंसियल सर्विस में कनिष्ठ अधिकारी थे. (एक बहुत हास्यास्पद सी बात यह थी कि बाद के वर्षों में अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें नौकरी में अच्छे प्रदर्शन के लिए खान साहेब का दर्ज़ा दिया, जबकि नवाबी खानदान से जुड़े होने के चलते यह तमगा तो जन्म के साथ ही उनके नाम से जुड़ा था.)

मैं अपने परिवार में तीसरे नंबर की संतान थी, अब क्योंकि भारतीय किसी भी और देश के मुकाबले सबसे ज्यादा रंगभेदी होते हैं,  मैं घरवालों की काफी चहेती थी सिर्फ इस वजह से कि मेरा रंग मेरे बड़े भाई और बहन के मुकाबले थोड़ा गोरा था. हालांकि मुझे लगता है कि मुझसे छोटे दो भाई-बहन के आने के साथ ही मेरी कद्र कम हो गई क्योंकि दोनों का रंग एंग्लो-इंडियन की तरह गोरा था. मेरी छोटी बहन की तो बचपन में घुंघराली सुनहरी लटें भी थी, जैसे अक्सर पठानों में होती हैं.

मेरी सबसे पुरानी याद अपने ऊपर छाए नीले आसमान की है, हांफने की आवाज के साथ-साथ बहुत धीमी गति के साथ आसमान के इस टुकड़े का फ्रेम बदलता जा रहा था. साथ में थी पसीने की गंध और मेरी पीठ किसी कठोर सतह पर टिकी थी. मैंने अपने पिता से जब यह बात की तो उन्होंने अंदाज़ा लगाया कि शायद यह 1914  में नैनीताल जाते समय की बात होगी, जब मुझे एक कुली कंधे पर बंधी बेंत की टोकरी में ले गया. उन दिनों बसें नहीं चला करती थी. आपको पहले तांगे या घोड़ा गाड़ी पर चढ़ाई करनी पड़ती थी, यात्रा का अंतिम हिस्सा घोड़े की पीठ पर करना होता था. बच्चे बेंत की टोकरियों पर बैठा कर ले जाए जाते थे.


(जारी)

इस उल्लू के पठ्ठे को सब्जेक्ट समझ में आया है और ये उल्लू का पठ्ठा लिख के भी लाया है - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 6

(जारी)

कॉनी हाम – तो वह कौन सा लम्हा था जब आप अध्यापन और लेखन अभिनय से अचानक सिनेमा में पहुंच गए?

कादर ख़ान – फिल्म इंडस्ट्री के लोग नियमित रूप से थियेटर देखने आया करते थे. तो उन्होंने मेरा नाम सुना. उन्होंने मुझे थियेटर के स्टेज पर देखा. उन्होंने मेरी एक्टिंग देखी, मेरा लेखन देखा और मेरा निर्देशन भी. उन्होंने कहना शुरू किया “यह बेवकूफ फिल्म इंडस्ट्री में क्यों नहीं आ रहा? इसमें प्रतिभा है. इसे फिल्म इंडस्ट्री में होना ही चाहिए.” जब मुझे ‘लोकल ट्रेन’ के लिए एक अवार्ड मिला तो अगले दिन एक निर्माता, कुछ निर्देशक और लेखक मेरे पास आकर बोले “आप फ़िल्में ज्वाइन क्यों नहीं करते?” मेरे लिए यह एक लतीफे जैसा था. “आप ने एक लेखक होना चाहिए, आपने एक अभिनेता होना चाहिए. आप कुछ भी कर सकते हैं क्योंकि आपको सब कुछ आता है.” मैंने फिल्मों में जाने के बारे में कभी नहीं सोचा था क्योंकि उन दिनों फिल्मों को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था. एक निर्माता रमेश बहल ने कहा कि वो एक फिल्म बनाने जा रहे हैं ‘जवानी दीवानी’ (१९७२).

“मैं चाहता हूँ आप इसके डायलॉग्स लिखें.”

मैंने जवाब दिया “मुझे नहीं आता डायलॉग लिखना.”

उन्होंने कहा “आप जो कुछ अपने नाटकों के लिए लिखते हैं, उसी को फिल्मों में डायलॉग्स कहा जाता है.
सो मैं वहाँ गया और उन्होंने मुझे एक मौका दिया. उन्होंने कहा कि वे अगले हफ्ते से शूटिंग शुरू करना चाहते हैं. मेरे पास रहने की जगह नहीं थी. सो मैं क्रॉस मैदान चला गया जहां लोग फुटबॉल खेलते हैं. मैं एक कोने में बैठा रहा और फुटबॉल मुझे लगती रही. चार घंटे में मैंने स्क्रिप्ट लिख ली.

कॉनी हाम: उर्दू में?

कादर ख़ान: उर्दू में. मैं गया वापस. तो मुझे देखकर वे बौरा से गए. “ये उल्लू के पठ्ठे को वो सीन समझ में नहीं आया.”  

मैं उनके होंठ पढ़ सकता था. वे मेरे बारे में बुरी बातें कह रहे थे. और मैं बोला “इस उल्लू के पठ्ठे को सब्जेक्ट समझ में आया है, ये उल्लू का पठ्ठा लिख के लाया है.”

“क्या! इतनी जल्दी! आज ही!”

“मेरी लाइफ ऐसी ही है. जो डिसाइड करता हूँ, उसी दिन कर देता हूँ. आज ही फैसला हो जाए. अगर आपने मुझे लेना है तो ठीक वरना मुझे जाने दीजिये क्योंकि मेरे स्टूडेंट्स मेरा इंतज़ार कर रहे हैं.”

तब मैंने अपना सब्जेक्ट उन्हें पढ़कर सुनाया और सीन भी. वे उछल पड़े. बोले “फिर से!” मैंने तीन या चार बार सुनाया. उन्होंने उसे रेकॉर्ड किया. और तीन दिन के अन्दर शूटिंग शुरू हो गयी. इस तरह मेरी स्क्रिप्ट ने फिल्म की सूरत ली. शेड्यूल के हिसाब से फिल्म दस दिन में शुरू होनी थी पर स्क्रिप्ट फाइनल होने के कारण वह तीन दिन में शुरू हो गयी. शूटिंग के इन दिनों में मुझे अतिरिक्त पब्लिसिटी मिली. इंडस्ट्री में अफवाह गर्म थी कि एक नया राइटर आया है जो बहुत आमफहम ज़बान लिखता है. और जिस तरह से वह सीन को नरेट करता है, अभिनेता के लिए परफॉर्म करना मुश्किल पड़ता है. पहली फिल्म के लिए मुझे 1500 रूपये मिले, जो उस ज़माने के हिसाब से बड़ी रकम थी क्योंकि मैंने उसके पहले पांच सौ का नोट भी नहीं देखा था. सात हफ्ते के बाद मैं अपनी संस्था में वापस जाने को तैयार था जब किसी ने आकर मुझसे कहा “मैं एक प्रोड्यूसर हूँ और एक फिल्म बनाने के बारे में सोच रहा हूँ. मेरी फिल्म का नाम है ‘खेल खेल में’. ये रहा स्क्रीनप्ले और मैं चाहता हूँ आप इसके डायलॉग्स लिखें.” उसने मुझे एक खासा मोटा लिफाफा थमाया. उसमें दस हज़ार से ज़्यादा रुपये थे. मैंने स्क्रिप्ट पूरी की. तब मुझे एक ऑफर और मिला.
      
मनमोहन देसाई का खेतवाड़ी वाला घर: कादर खान की पाठशाला

चार या छः महीने बाद मुझे मनमोहन देसाई ने बुलवाया. वे ‘रोटी’ फिल्म बना रहे थे. वे उर्दू लेखकों से बुरी तरह चट चुके थे. उन्होंने कहा “मुझे इस ज़बान से नफरत है. ये राइटर तमाम मुहावरे, लोकोक्तियों और उपमाओं का इस्तेमाल करना जानते हैं बस. मुझे अपनी रोज़मर्रा की ज़बान चाहिए. कोई लिख नहीं सकता.”

तो प्रोड्यूसर ने कहा “कादर खान को ट्राई क्यों नहीं करते?”

“एक और मुसलमान. मैं ऊब चुका हूँ उनसे. और तुम एक और नया लेकर आ रहे हो.” वे मुझसे मिले और बोले “देखो मियाँ, मैं बहुत स्ट्रेट बोलता हूँ. तुम्हारी स्टोरी पसंद आयेगी तुम्हारा डायलाग अच्छा लगेगा तो ठीक है वरना धक्के मार कर बाहर निकाल दूंगा.” पिछले छः या आठ महीनों में किसी ने मुझसे ऐसे बात की थी. “अगर अच्छा लगा तो मैं तेरे को लेके गणपति की तरह नाचूँगा.”

उन्होंने मुझे पूरा क्लाइमैक्स नरेट किया. वे खेतवाड़ी में रहते थे. वह मेरी पाठशाला था. दो या तीन दिन बाद मैं वहाँ गया तो वे गली के छोकरों के साथ क्रिकेट खेल रहे थे. उन्होंने मुझे देखा और बोले “क्या है?”

“सब्जेक्ट और सीन सुनाने आया हूँ.”  

“सुनाने मतलब? लिख के लाया?” उन्होंने क्रिकेट खेलना छोड़ा और मुझसे बोले “चल झटपट.”

वे मुझे अन्दर ले गए. पहली बार. इतना बड़ा इंसान. पहले यूं होता था कि सारा क्रू और डायरेक्टर वगैरह से मेरी अच्छी ट्यूनिंग रहती थी. किसी बड़े प्रोड्यूसर के सामने सीन सुनाने का यह मेरा पहला मौका था. जो भी हो, मेरे भीतर के अभिनेता ने मेरी बहुत मदद की. सो इसी वजह से अभिनेता, लेखक और अध्यापक इन तीनों के बीच हमेशा ट्यूनिंग बनी रहती थी. अभिनेता ने मेरी बहुत मदद की. तब राइटर ने अभिनेता की मदद करना शुरू किया. मैंने सीन सुनाया तो वे उछल पड़े. “दुबारा! फिर से सुनाओ!” उन्होंने चिल्लाना शुरू किया “जीवन!” जीवन उनकी पत्नी का नाम था. “इधर आ!”

“कायको बुलाया है?” उन्होंने पूछा.

“सुनो ये क्या लिख के लाया है.”

मैंने फिर दोहराया. उन्होंने रोना शुरू कर दिया. “ये आदमी ऐसे सीन के लिए छः महीने से मर रहा है. तुमने उस से कहीं ज़्यादा कर दिखाया है.

वे बोले “फिर से!” मैंने पूरा एपीसोड करीब दस बार सुनाया. मुझे पता नहीं थे कि उन्होंने टेप पर सब कुछ रेकॉर्ड कर लिया था. फिर वे अन्दर के कमरे में गए. वे एक छोटा पैनासोनिक टीवी लेकर आये. बोले “ये मेरी ओर से तोहफा है.” फिर उन्होंने मुझे सोने का एक कड़ा और पच्चीस हज़ार रुपये दिए. “मेरी तरफ से एक यादगार.” इतने बड़े आदमी थे वो. अगर उन्हें कोई अच्छा लगता था तो उसे दिल से प्यार करते थे. वे कंजूस आदमी नहीं थे. बड़े दिलेर इंसान थे. उन्होंने तमाम लेखकों और निर्देशकों को फोन लगाया और बोले “अब तुम सब चेत जाओ. एक आदमी आ गया है जो तुम्हारी इंडस्ट्री पर राज करने जा रहा है.” वे थोडा सनकी भी थे. उन्होंने लेखकों से कहा “अपनी कलमें फेंक दो. तुम्हें लिखना नहीं आता.” मुझसे बोले “लिखने के लिए तुम्हें कितना मिलता है?”

मैंने कहा “पच्चीस हज़ार.”


वे बोले “अब तुम्हारा रेट एक लाख होगा.” इस तरह मैं एक लाख पाने वाला लेखक बना. मुझे जैसे पहली मंजिल से सौवीं मंजिल पर पहुंचा दिया गया. सौवें माले से मैंने उड़ान भरी. वहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था. मेरे बगैर वे कोई फिल्म बना ही नहीं पाते थे. मुझे स्क्रीनप्ले पर बहसों, कहानी और गीतों तक हर चीज़ में वे अपने साथ बिठाते थे.

(जारी)