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Tuesday, April 4, 2017

किशोरी अमोनकर के नाम में ही एक मंथरगति की नदी थी

किशोरी अमोनकर (11 अप्रैल 1931-3 अप्रैल 2017)
फ़ोटो: प्रसाद पवार 

किशोरी अमोनकर नहीं रहीं. वो उस्ताद अलादिया खां की शिष्या कुशल गायिका मोगूबाई कुर्डीकर की बेटी थीं. पिछले कई साल से उनको देख सुन ना पाने की वजह से मन इस बात के लिए तैयार था कि एक दिन उनके मरने की खबर से एक बार फिर उनकी याद ताज़ा हो जाएगी.

मैंने अपने बचपन में जब उन्हें पहली बार दूरदर्शन पर गाते हुए देखा तब शास्त्रीय संगीत में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी. वैसे भी दूसरे शास्त्रीय गायक जिस तरह मुंह टेढ़ा-मेढ़ा बनाया करते थे और अजीब-अजीब आवाजें निकालते थे, तब वो सब बहुत बेकार लगता था. जबकि किशोरी अमोनकर के नाम में ही एक मंथरगति की नदी थी.

लम्बोतरे चेहरे की लय नुकीली ठुड्डी पर आकर इस तरह का अवरोह लेती कि 'सहेला रे आ मिल गाएं' का हल्का सा आमंत्रण सैकड़ों मील दूर से झट बुला लाता. 'एक ही संग हुते जो तुम तो ... कहते हुए मुलायम जुल्फों के एक घने परदे से वो मुझे देखतीं और झट आसपास जुट रहे सुरों में उसे तलाशने लग जातीं .

ऐसा बहुत बरसों तक होता रहा और मैं मल्लिकार्जुन मंसूर, पंडित कुमार गन्धर्व, फैयाज़ खान साहब और भीमसेन जोशी की सीटों से गुज़रता हुआ उनकी बगल में बैठ गया. सफ़र लंबा चला और वो कहती रहीं घट घट में पंछी बोलता ... दुहराती रहीं बोलता. मैं हठ करता रहा कि कभी इस पर लम्बी बात करें और वो झिड़कती रहीं. यही मुझे उम्मीद थी और इसमें कोई शिकायत क्यों होती. मुझे उनके वो घाव मालूम थे जो उन्होंने फिल्मो के लिए गाकर कमाए थे; तो क्या, वो घाव तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के भी कभी नहीं भरे.

भरेंगे तो वो घाव भी नहीं जो आज रचनाविरोधी समय रच रहा है.

जाओ किशोरी जहां रहो शान्ति और सुख से रहो . हाँ हम कितने दिन तुम्हारा रचा मंथर जिद्दी और कलकल बहता संगीत बचा पाएंगे इसकी कोई गारंटी नहीं लेते.

-सैयद मोहम्मद इरफ़ान

Friday, January 6, 2017

ओम पुरी का एक पुराना इंटरव्यू

ओम पुरी नहीं रहे. दिल का दौरा पड़ने से आज उनकी मृत्यु हो गयी. सत्तर के दशक में भारतीय सिनेमा ने जो कलात्मक ऊंचाइयां देखीं, वहां तक पहुंचाने वाले सबसे बड़े अभिनेताओं को याद किया जाएगा तो खुरदरे चेचक के दागों से भरे बेहद मामूली सूरत वाले इस बेहतरीन अदाकार का नाम संबसे अगली पांत में आएगा. उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मैंने अभी-अभी पल्लवी जोशी द्वारा आज 'फ़र्स्ट पोस्ट' में कही गयी एक बात को फेसबुक पर पोस्ट किया था. उसी सन्दर्भ में मेरा ध्यान उनके 2011 के इस इंटरव्यू पर गया. 


फेसबुक की पोस्ट यह रही:

इस पूरे दरम्यान मेरा दिमाग धीमा पड़ता जा रहा था और सारे विचार बस एक ही जगह पर जाकर ठहर जा रहे थे - ओम जी के साथ मेरी पहली फिल्म सुष्मन की आंध्र प्रदेश के पोचमपल्ली में शूटिंग. श्याम बेनेगल ने इस फिल्म में मुझे ओम पुरी और शबाना आज़मी की समय से पहले वयस्क हो जाने वाली बेटी के रोल में कास्ट किया था. मैं सोलह की थी तब. हम सब हैदराबाद के एक होटल में रह रहे थे लेकिन ओम जी - जिन्होंने फिल्म में हथकरघा बुनकर की भूमिका निभाई थी - बुनकरों के साथ उनके गाँव पोचमपल्ली में ही रहे.

वहां ठीकठाक बाथरूम और गर्म पानी जैसी साधारण सुविधाएं भी नहीं थीं लेकिन ओम जी को एक बार भी वापस हैदराबाद लौटने का लालच नहीं आया. वे इस छोटे से गाँव में इसलिए रह रहे थे कि हथकरघे पर अभ्यास कर सकें - सुबह नौ बजे शूटिंग शुरू करने से पहले दो-तीन घंटे और हमारे पैकअप करने के बाद दो घंटे. फिल्म के समाप्त होते होते हर कोई ओम जी को चिढ़ाने लगा था. लोग उनसे कहते थे वे हथकरघे पर बुनकर बनने को अपना वैकल्पिक पेशा बना सकते थे - वे इसमें इस कदर पारंगत हो चुके थे! उन्होंने काले-सफ़ेद का एक डिज़ाइन बुनना शुरू किया था और फिल्म के समाप्त होने तक वे काफी बन चुके थे. उन्होंने अभिनेताओं की पूरी कास्ट को अपने हाथों से बुने कपड़े का एक-एक टुकड़ा तोहफे में दिया.

और अब यह इंटरव्यू:


फिल्म खापकरने का मकसद?
यही कि प्रेम करने वालों को मौत की सज़ा देने का हक किसी को नहीं है, चाहे मां-बाप ही क्यों न हों खापों का इतिहास रक्तरंजित नहीं रहा यह संख्या गौरवशाली अतीत व सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रही है

क्या किसी राजनीतिक दल को कठघरे में खड़ा करती है फिल्म?
एक दल नहीं, दो नहीं, चार नहीं और पांच भी नहीं हम सभी राजनीतिक दलों पर सवाल खड़े करते हैं जो ऐसी घटनाओं पर चुप्पी साध लेते हैं और इन घटनाक्रमों को अपरोक्ष रूप से बढ़ावा देते हैं क्योंकि ये बहुत बड़ा वोट बैंक है कमोबेश यही स्थिति पुलिस प्रशासन की उदासीनता की भी है, जिनकी आंखों के सामने ये हत्याएं हो जाती हैं

क्या फिल्म समस्या का हल देती है?
यह जिम्मेदारी हमारी नहीं है सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया है यहां तक कहा है कि दोषियों को मौत की सज़ा मिले इसे रोकना सरकार की जिम्मेदारी है पुलिस-प्रशासन को कानून का पालन करवाना है हम तो ये बताना चाहते हैं कि यह गलत है, इसके विरुद्ध जनमत बने

क्या पचास साल पहले भी ऐसी खबरें आती थीं?
अखबार वाले जानते हैं कि पहले ऐसी घटनाएं नहीं होती थीं तो ऐसी खबरें भी नहीं आती थीं पहले खापों का स्वरूप लोकतांत्रिक व सामाजिक सरोकारों से जुड़ा था खापें मुगलों व विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ उठ खड़े होकर संघर्ष करती थीं लोगों को सुरक्षा देती थीं

फिल्म रिलीज होने पर कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है इसका विरोध हो रहा है?
ये जिम्मेदारी सरकार की है सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है उसका अनुपालन होना चाहिए जब राजा राममोहनराय ने सती-प्रथा के खिलाफ आंदोलन किया तब भी कुछ लोगों ने इसे अपनी परंपरा, प्रथा, विश्वास, संस्कार बताकर विरोध किया होगा लेकिन बाद में कानून बना और प्रथा खत्म हुई कितनी शर्म की बात है कि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में खबर छपती है कि खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताने वाले देश में प्रेम करने वालों को मौत की सज़ा मिलती है ऐसा अंधाकानून तो नहीं चलेगा

फिल्म केवल उत्तर भारत में रिलीज होगी या दक्षिण में भी?
यह फिल्म सारे देश में रिलीज होगी जैसे अन्य फिल्में दक्षिण में रिलीज होती हैं यदि जरूरत पड़ी तो इसे डब किया जाएगा


इसमें ओमकार चौधरी की पगड़ी हरे रंग की है, जो एक राजनीतिक दल की पहचान है?
यह हरा रंग मुसलमानों का है हमारी ड्रेस डिजाइनर मुस्लिम थी, उसकी पसंद है

आपने इस किरदार को निभाने के लिए कोई शोध किया?
किरदार को निभाने के लिए शोध की जरूरत नहीं होती यह काम डायरेक्टर का है हमें तो स्क्रिप्ट मिल जाती है उसमें इतिहास होता है अरे भाई! 35 साल हो गये फिल्में में काम करते हुए तकरीबन 250 फिल्में कर चुका हूं हर बार नया किरदार होता है कभी कोई ऐसा क्रॉफ्ट होता है तो उसके लिए सीखने की जरूरत होती है श्याम बेनेगल की फिल्म सुष्मनके लिए बुनकर का किरदार निभाना था मुझे बुनाई नहीं आती थी मैंने एक सप्ताह बुनना सीखा फिर मुझे करघे पर काम करने में मजा आया जब भी शूटिंग से फ्री होता हूं, बुनने बैठ जाता मैंने डेढ़ महीने में 40 मीटर कपड़ा बुना अर्धसत्यमें मैंने मोटरसाइकिल चलानी सीखी, मुझे नहीं आती थी लेकिन जहां तक पुलिस वाले का किरदार है तो हम उन्हें आम देखते हैं वे कैसे बैठते हैं, चलते हैं ढीला पुलिस वाला ढीला चलेगा, कड़क पुलिस वाला तनकर चलेगा

ऑनर किलिंग के पीछे गोत्र विवाद भी तो है?
हमें उससे कोई लेना-देना नहीं है लेकिन एक बात साफ है कि प्यार की सज़ा मौत नहीं हो सकती कसाब के बारे में सबको पता है वह अपराधी है संसद के हमलावरों को मौत की सज़ा मिली, मामला राष्ट्रपति के पास है उन्हें हम जान से नहीं मार सकते जब तक कानून न  कहे शादी करने पर आप कहो मार दो, जला दो, नदी में डाल दो, उन पर ट्रैक्टर चला दो. क्या जंगलराज है? शादी हो जाए, बच्चा हो जाए, फिर कहो राखी बांध लो? यह तो अन्याय है?

फिर समाधान क्या है?
बच्चों को पढ़ाओ-लिखाओ. उन्हें संस्कार दो. उन्हें समझाओ कि यह हमारी परंपरा में नहीं है यूं ही. बच्चों की जान ले लोगे?

अपने किरदार के बारे में बताएं?
वह रौबीला, दमदार और ऑनर किलिंग का समर्थक है कालांतर में उसका एनजीओ में काम करने वाला बेटा गांव आता है वह पढ़ा-लिखा और प्रगतिशील सोच का है उसका पिता से टकराव होता है बाद में उसकी इन्हीं रूढिय़ों के चलते हत्या हो जाती है इससे सरपंच को गहरा आघात लगता है लेकिन अपने को खोने के बाद उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है फिर वह ऐसी हत्याओं का मुखर विरोध करता है

फिल्म से कैसी उम्मीदे हैं?
मेरा मानना है कि फिल्म को देखे बिना कोई राय नहीं बनानी चाहिए जर्मनी में अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव में इसे अच्छा प्रतिसाद मिला है और पुरस्कार के लिए नामांकित हुई है हमारा मकसद एक बुराई के खिलाफ सशक्त जनमत बनाना है ताकि पुलिस-प्रशासन-पॉलिटीशियन की खतरनाक खामोशी विचलित न करे.

(अरुण नैथानी द्वारा लिया गया यह इंटरव्यू दैनिक ट्रिब्यून से साभार)


Monday, December 19, 2016

हमेशा खरे रहेंगे अनुपम मिश्र


अनुपम जी नहीं रहे. सुबह सुबह भाई पीयूष दइया का यह मैसेज आया. अफ़सोस कि भले लोग जिनकी वजह से बकौल वीरेनदा "ज़िंदगी में मानी पैदा होते हैं" लगातार घटते जा रहे हैं. अनुपम मिश्र जिस जगह को खाली कर गए हैं उसे भर पाना असंभव होगा.

उन्हें श्रद्धांजलि के तौर पर फिलहाल उनकी अद्भुत पुस्तक 'आज भी खरे हैं तालाब' से एक अंश. जल्द ही उन पर और उनके काम पर और भी.   


तालाब का लबालब भर जाना भी एक बड़ा उत्सव बन जाता. समाज के लिए इससे बड़ा और कौन सा प्रसंग होगा कि तालाब की अपरा चल निकलती है. भुज (कच्छ) के सबसे बड़े तालाब हमीरसर के घाट में बनी हाथी की एक मूर्ति अपरा चलने की सूचक है. जब जल इस मूर्ति को छू लेता तो पूरे शहर में खबर फैल जाती थी. शहर तालाब के घाटों पर आ जाता. कम पानी का इलाका इस घटना को एक त्योहार में बदल लेता. भुज के राजा घाट पर आते और पूरे शहर की उपस्थिति में तालाब की पूजा करते तथा पूरे भरे तालाब का आशीर्वाद लेकर लौटते. तालाब का पूरा भर जाना, सिर्फ एक घटना नहीं आनंद है, मंगल सूचक है, उत्सव है, महोत्सव है. वह प्रजा और राजा को घाट तक ले आता था.

पानी की तस्करी? सारा इंतजाम हो जाए पर यदि पानी की तस्करी न रोकी जाए तो अच्छा खासा तालाब देखते-ही-देखते सूख जाता है. वर्षा में लबालब भरा, शरद में साफ-सुथरे नीले रंग में डूबा, शिशिर में शीतल हुआ, बसंत में झूमा और फिर ग्रीष्म में? तपता सूरज तालाब का सारा पानी खींच लेगा. शायद तालाब के प्रसंग में ही सूरज का एक विचित्र नाम ' अंबु तस्कर ' रखा गया है. तस्कर हो सूरज जैसा और आगर यानी खजाना बिना पहरे के खुला पड़ा हो तो चोरी होने में क्या देरी?

सभी को पहले से पता रहता था, फिर भी नगर भर में ढिंढोरा पिटता था. राजा की तरफ से वर्ष के अंतिम दिन, फाल्‍गुन कृष्ण चौदस को नगर के सबसे बड़े तालाब घड़सीसर पर ल्हास खेलने का बुलावा है. उस दिन राजा, उनका पूरा परिवार, दरबार, सेना और पूरी प्रजा कुदाल, फावड़े, तगाड़‌ियाँ लेकर घड़सीसर पर जमा होती. राजा तालाब की मिट्टी काटकर पहली तगाड़ी भरता और उसे खुद उठाकर पाल पर डालता. बस गाजे- बाजे के साथ ल्हास शुरू. पूरी प्रजा का खाना-पीना दरबार की तरफ से होता. राजा और प्रजा सबके हाथ मिट्टी में सन जाते. राजा इतने तन्मय हो जाते कि उस दिन उनके कंधे से किसी का भी कंधा टकरा सकता था. जो दरबार में भी सुलभ नहीं, आज वही तालाब के दरवाजे पर मिट्टी ढो रहा है. राजा की सुरक्षा की व्यवस्था करने वाले उनके अंगरक्षक भी मिट्टी काट रहे हैं, मिट्टी डाल रहे हैं.


उपेक्षा की इस आँधी में कई तालाब फिर भी खड़े हैं. देश भर में कोई आठ से दस लाख तालाब आज भी भर रहे हैं और वरुण देवता का प्रसाद सुपात्रों के साथ-साथ कुपात्रों में भी बाँट रहे हैं. उनकी मजबूत बनक इसका एक कारण है, पर एकमात्र कारण नहीं. तब तो मजबूत पत्थर के बने पुराने किले खँडहरों में नहीं बदलते. कई तरफ से टूट चुके समाज में तालाबों की स्मृति अभी भी शेष है. स्मृति की यह मजबूती पत्थर की मजबूती से ज्यादा मजबूत है.

Friday, November 11, 2016

अपने कर्म एवं विचारों से वह पूरी तरह बौद्धिक श्रमिक थे

बीते माह की दस तारीख को पिथौरागढ़ में रहने वाले अद्वितीय मनीषी और कर्मठ विद्वान डॉ. राम सिंह नहीं रहे. इस महाप्रतिभा को याद कर रहे हैं कबाड़ी आशुतोष उपाध्याय -


डॉ. राम सिंह से मेरा परिचय उनके बड़े बेटे भरत (स्व. भारत बंधु) के मार्फ़त हुआ था. हाईस्कूल के आगे की पढ़ाई के लिए मैं 1978 में पिथौरागढ़ पहुंचा था और हमारा परिवार उनके करीब ही रहने लगा. यह संयोग ही था कि एक जैसी रुचियों के कारण हम दोनों के पिताओं की भी अच्छी छनने लगी. हमारे घर के बगल से गुजरने वाली सड़क पर कॉलेज से आते-जाते डॉ. राम सिंह लगभग रोज दिखाई पड़ते थे. वह अकसर खादी का कुर्ता और सफ़ेद धोती पहनते थे. होठों को ढके रहने वाली अधपकी मूंछें उनके चेहरे को और भी ज्यादा गंभीर बना देती थीं. जब उन्हें मैंने पहली बार देखा तो वे मुझे मुंशी प्रेमचंद जैसे लगे थे. वे हमारी किशोरावस्था के दिन थे, जब बेटे अपने पिताओं से थोड़ा दूरी बनाकर चलना पसंद करते हैं. तब मुझे कहाँ पता था कि इस गंभीर मुखमुद्रा के पीछे एक कोमल हृदय नटखट बच्चा भी रहता है.

उन दिनों डॉ. राम सिंह स्थानीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक थे. मेरी बड़ी दीदी उनकी विद्यार्थी थीं और उनके बारे में बताया करती थीं. उनकी कर्मठता के क़िस्से मशहूर थे. आस-पास के लोग कहते थे कि डॉ. राम सिंह ने अपना दो-मंजिला घर खुद अपने हाथों से बनाया है. पता नहीं इस क़िस्से में कितनी सच्चाई थी, मगर जब भी वह घर पर होते तो कठोर श्रम करते हुए उन्हें देखा जा सकता था. शहर में उनका लोहे का एक कारखाना था, जहां अलमारियां, बक्से, गेट, ग्रिल वगैरह बनते थे. कॉलेज के बाद वह सीधे अपने कारखाने पहुंचते और वहां का कामकाज देखते थे.

तब मैं विज्ञान का सामान्य विद्यार्थी था. साहित्य व इतिहास की ओर झुकाव पैदा होना अभी बाकी था. इसलिए डॉ. राम सिंह के व्यक्तित्व के अकादमिक व बौद्धिक आयामों तक दृष्टि नहीं पहुंचती थी. अलबत्ता हम बच्चों के बीच इस बात की चर्चा ज़रूर होती थी कि वह नास्तिक हैं और ईश्वर को नहीं मानते हैं. प्रगतिशील आन्दोलनों से अछूते दूर-दराज इलाके में रहने वाले हमारी उम्र के बच्चों के लिए तब नास्तिकता के मायने और महत्त्व को समझ पाना आसान न था. हमारे लिए यह घोर आश्चर्य की बात थी कि ईश्वर की सत्ता को कोई भला कैसे नकार सकता है!

यह बात बहुत देर से समझ में आई कि डॉ. राम सिंह की नास्तिकता प्रायोजित या चालू फैशन के हिसाब से दिखावे के लिए नहीं थी. मैंने उन्हें किसी की आस्था का मज़ाक उड़ाते हुए कभी नहीं देखा और न ही वह अपनी मान्यताओं का प्रचार करते थे. यह उनका निजी मामला था और वह इसे बड़ी सहजता से जीते व इसकी क़ीमत भी चुकाते थे. उनके बड़े बेटे और होनहार छोटी बेटी की सड़क दुर्घटनाओं में हुई असामयिक मृत्यु के बाद कुछ लोगों ने दबी जुबान में उनकी अनास्था को इसकी वजह बताया. कुछ लोगों ने इसे ईष्ट देवताओं की नाराजगी का परिणाम भी घोषित कर किया. एक पिता के लिए इससे कठिन समय और क्या हो सकता है! लेकिन वह अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता से कभी नहीं डिगे.

*****

डॉ. राम सिंह से मेरा व्यक्तिगत संसर्ग 1992 में उनके बड़े पुत्र भरत के देहांत के बाद शुरू हुआ. इस दौर में मुझे इतिहास सम्बन्धी उनके काम को समझने और उस पर चर्चा करने का भी मौका मिला. यद्यपि वह हिंदी के प्राध्यापक थे लेकिन इतिहास और पुरातत्व में उनकी गहरी दिलचस्पी थी. पुरातात्विक साक्ष्यों को सहेजने के कौशल में भी वह प्रवीण थे. कुमाऊं की पुरातात्विक धरोहरों के कई दुर्लभ प्रमाण मूल अथवा प्रतिकृति के रूप में उनके निजी संग्रह में मौजूद थे. बड़े जतन से उन्होंने न जाने कितने ताम्रपत्रों और शिलालेखों की नक़लें तैयार कीं और उनका अनुवाद किया. यह संग्रह उनके उम्र भर के परिश्रम का परिणाम था. शिलालेखों और ताम्रपत्रों की नक़लें दिखाते वक्त वह यह बताना नहीं भूलते थे कि कैसे उन्हें तैयार किया जाता है.

स्थानीय इतिहास के साक्ष्यों के विश्लेषण की जैसी समझ डॉ. राम सिंह को थी, वैसी उनके समकालीन अन्य स्थानीय इतिहासकारों में कम ही दिखाई देती है. तथ्यों और मिथकों की उलझी हुई ऊन में से इतिहास के तर्कसम्मत रेशों को खींच निकालने का गज़ब का हुनर उनमें था. राग-भागों, पारंपरिक आख्यानों, वीर गाथाओं व जागरों के घने मिथकीय कुहासे के बीच वह वास्तविक इतिहास की धुंधली पगडंडियों को खोज निकालते थे. 'पहाड़' प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनकी चर्चित पुस्तक- 'राग-भाग काली कुमाऊँ'- में प्राचीन बाणासुर के किले के बारे में उनका यह विश्लेषण गौरतलब है:

"... 'कोट का पय्या' के आधार की प्राकृतिक संरचना ही ऐसी है कि उसे दुर्ग के रूप में विकसित करने का विचार इस उपत्यका में पहले-पहल बसने वाले महत्वाकांक्षी लोगों के मन में यहां प्रविष्ट होने के साथ ही आ गया होगा. इस प्रकार यह उतना ही प्राचीन हो सकता है, जितना इस उपत्यका की उपजाऊ द्रोणी में बसने वालों की बस्तियां. फलतः इनके साथ स्थानीय राग-भाग, पौराणिक कल्पनाओं और इतिहास का अद्भुत सम्मिश्रण हो गया है. कुछ पुरातन को गौरवान्वित करने की इच्छा से प्रेरित पढ़े-लिखे लोग इसे बाणासुर का किला कहने लगे हैं. प्रत्येक स्थान को किसी न किसी पुराण कथा से जोड़कर स्थानीय मूल स्वरूप व इतिहास को मिटा देने की प्रवृत्ति ने इसको बाणासुर का किला घोषित कर दिया है....."

'राग-भाग काली कुमाऊँ' उनकी वर्षों की मेहनत का परिणाम थी. काली कुमाऊँ (वर्तमान जिला चम्पावत) के गांव-गांव पैदल घूमकर वह वहां के बुजुर्गों से उनकी 'राग-भाग' पूछते और मौखिक परंपरा में मौज़ूद सदियों पुराने क़िस्सों को डायरी में नोट करते रहते थे. यह काम उन्होंने 1966 में शुरू किया था, जिसे आखिरकार सदी के अंत में जाकर पुस्तक का आकार दिया. इस काम के साथ-साथ वह लगातार ऐतिहासिक व पुरातात्विक दस्तावेजों को भी इकठ्ठा करते रहे. देखा जाय तो फोकलोर से जन इतिहास बीनने वाले डॉ. राम सिंह अपनी तरह के अनोखे सबाल्टर्न इतिहासकार थे.

ऐसा वह इसलिए कर पाए क्योंकि एक इतिहासकार से संस्कृति के प्रति जिस किस्म की अकादमिक तटस्थता की अपेक्षा की जाती है, वह उनमें कूट-कूट कर भरी थी. आचरण में खांटी पहाड़ी शख्सियत होने के बावजूद डॉ. राम सिंह संकीर्ण क्षेत्रीयतावाद से सर्वथा अछूते रहे. पहाड़ की संस्कृति, लोक और परम्पराओं के क्षरण का अनवरत रोना रोने वाले भावुक बुद्धिजीवियों की उत्तराखंड में कमी नहीं है. लेकिन इन बातों को लेकर डॉ. राम सिंह जैसी समझ कम ही लोगों में होगी. सांस्कृतिक बदलावों पर मैंने कभी भी उन्हें छाती पीटते नहीं देखा. वह मानते थे कि भौतिक जीवन में होने वाले बदलावों के बरक्स संस्कृति स्वाभाविक रूप से बदल जाती है. पिछले दो-तीन दशकों के दौरान हुए वैश्विक बदलावों ने हमारे दूर-दराज के गांवों को भी अपने आगोश में लिया है. हमारी आजीविका और रहन-सहन के तौर-तरीके बदल गए हैं. टेक्नोलॉजी ग्रामीण जीवन के अब तक अछूते हिस्सों तक पहुँच गयी है. ऐसे में भाषा-बोली और परम्पराओं का बदलना लाजमी है. डॉ. राम सिंह इतिहासकार के रूप में इन बातों को गहराई से समझते थे.

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छात्र जीवन में हम उनके बाहरी व्यक्तित्व को देखकर थोड़ा सहम जाते थे. धोती-कुर्ते में सजी लम्बी छरहरी शालीन काया और होंठों को ढकती हुई गहरी मूंछें. लेकिन तब हमें पता नहीं था कि इस गंभीर आवरण के पीछे एक बेहद मज़ाकपसंद किस्सागो छुपा बैठा है. उनकी स्पष्टवादिता और बातें करने का ठेठ सोर्याली अंदाज़ गज़ब का था. पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी वह यदाकदा लिखते थे. लेकिन ये लेख डॉ. राम सिंह के बजाय 'राम जनम परजा' के नाम से छपते थे. एक दिन मैंने उनसे इस तरह छद्म नाम से लिखने की वजह पूछी. उनके आमोदपूर्ण जवाब ने स्थानीय इतिहास को देखने की मेरी दृष्टि ही बदल डाली. वह कहते थे- राम उनका नाम है और यहां के अन्य पढ़े-लिखे लोगों की तरह वह राजवंशी नहीं है बल्कि जन्म-जन्मातरों से 'प्रजा' हैं. यानी उनके पिता और तमाम पूर्वज भी प्रजाजन ही थे. इसलिए वह राम जनम परजा के नाम से लिखते हैं.

उत्तराखंड के अधिकतर भद्रजन उनका मूल स्थान/पुरुष के बारे में पूछे जाने पर बड़े गर्व से बताते हैं कि उनका सम्बन्ध फलां राजा या राज पुरोहित के खानदान से है. मसलन पंडितजी कहेंगे कि वे फलां राजपुरोहितों के वंशज हैं और उनके पुरखे मुग़लों की प्रताड़ना से बचने के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल या राजस्थान से यहां आकर बसे थे. इसी तरह ठाकुर साहबान भी महाराणा प्रताप या किसी और राजपुरुष से अपना सम्बन्ध जोड़ने में देर नहीं लगाते. पहाड़ से पलायन कर गए श्रेष्ठियों का मन तो ऐसी बातों में और भी रमता है. ऊंची शिक्षा और अच्छी पोजीशन वाले उत्तराखंडी इन बातों पर खूब तवज्जो देते हैं. घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध, यानी बाहर से आने वाला श्रेष्ठ ही होता है, यह धारणा हमें अग्रेजों से मिली. इस तर्क के सहारे वे अपनी जातिगत श्रेष्ठता और शासन का औचित्य सिद्ध करते थे. 

औपनिवेशिक शासन-प्रशासन का हिस्सा बनने वाले पहली पीढ़ी के स्थानीय समुदायों को भी यह तर्क खूब जंचा. उन्होंने खुद को आप्रवासी (और इसलिए श्रेष्ठ) और अपने कमजोर व गरीब सहोदरों को कमतर श्रेणी का स्थानीय बताना शुरू किया. धीरे-धीरे इस धारणा को इतिहास बताकर पेश किया जाने लगा. कालांतर में स्वघोषित इतिहासकारों ने योजनाबद्ध ढंग से इस धारणा को आगे बढ़ाया और अब यह इतनी रूढ़ हो चली है कि आम पर्वतवासी इसे अपनी ऐतिहासिक विरासत मानते हैं.

डॉ. राम सिंह प्रभुत्वशाली जातियों के 'बाहरी' होने की अवधारणा को पूरी तरह अतार्कित और अविश्वसनीय मानते थे. उनके मुताबिक़ ऐसा कोई भी ऐतिहासिक साक्ष्य (प्राचीन शिलालेख, दानपात्र, ताम्रपत्र, बही आदि) उपलब्ध नहीं है जो अतीत के किसी ख़ास कालखंड में बाहरी समुदायों (पड़ोसी नेपाल को छोड़कर) के यहां आ बसने की पुष्टि करता हो. उनका कहना था, अगर ऐसा होता तो खुद को बाहरी बताने वाली कथित ऊंची जातियों के लोग कमतर समझे जाने वाले स्थानीय खस समुदायों के रीति-रिवाजों, पूजा पद्धतियों और भाषा बोली को कतई नहीं अपनाते. यदि वे शासक थे तो उनके सामने पिछड़ी स्थानीय संस्कृति को अपनाने की कोई मजबूरी भी नहीं थी. वे अपनी कथित श्रेष्ठ संस्कृति को बचाए रख सकते थे. आखिर क्यों उन्होंने उन जातियों की भाषा-बोली को अपनाया और उनके अवैदिक देवी-देवताओं और भूत-प्रेतों को अपना आराध्य मानना शुरू किया, जिन्हें वे आज भी हीन मानते हैं? मुग़ल प्रताड़ना (ख़ास तौर पर औरंगजेब कालीन जबरिया धर्मांतरण) से पहाड़ों पर आकर बसने की बात तो और भी हास्यास्पद है. ऐसा होता तो वास्तव में ज्यादा प्रताड़ना झेलने वाले राजधानी दिल्ली के नज़दीकी इलाकों- जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड, रामपुर, मुरादाबाद आदि से आकर लोग यहां बसते! लेकिन कोई भी इन इलाकों को अपने पूर्वजों की मातृभूमि नहीं बताता है बल्कि गैर-मुग़ल शासित दूर-दराज राज्यों का मूलवासी होने का दावा किया जाता है.

उत्तराखण्ड का अतीत हमेशा से पिछड़ा नहीं रहा. खास तौर पर कत्यूरी काल स्थापत्य और अन्य विधाओं में अपेक्षाकृत उन्नत प्रतीत होता है. लगभग इसी दौर तक हिमालयवासी धातुशोधन सीख चुके थे. प्रख्यात पुरातत्वविद प्रो. डी.पी. अग्रवाल के अनुसार इस काल में गंगा-यमुना के मैदानी राज्यों को लोहा और तांबा हिमालयी इलाकों से ही भेजा जाता था. पहाड़ के लोग दूसरी शताब्दी से जलशक्ति का यांत्रिक इस्तेमाल करने लगे थे. आज घराट (पनचक्की) हमें तकनीकी दृष्टि से जरूर मामूली लग सकता है, लेकिन दूसरी शताब्दी के हिसाब से इसे एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि कहा जाएगा. कत्यूरी काल के मंदिर स्थापत्य के लिहाज से परवर्ती चंदकाल से कहीं ज्यादा उन्नत हैं. यह दौर शानदार काष्ठकला का भी रहा है. यदि कथित सभी श्रेष्ठ जातियां चन्द सदियों पहले बाहर से आकर बसीं तो ज्ञान-विज्ञान की इस समृद्ध विरासत के असली वारिस कौन हैं?

डॉ. राम सिंह यह भी मानते थे कि उत्तराखंड में ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था ने अपेक्षाकृत बाद में पैठ बनाई. वह इसे शंकराचार्य के आगमन से जोड़ते थे. उनकी दलील थी कि यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं पर जमी वर्ण व्यवस्था की धूल को अगर झाड़-पोंछ दिया जाय तो भाईचारे पर आधारित पुरातन आदिवासी संस्कृति को बड़ी आसानी से पहचाना जा सकता है. अगर ऐसा न होता तो दलितों को देवताओं के आवाहन की जिम्मेदारी कैसे मिलती? जागर गायक के रूप में वास्तव में वे आज भी पुजारी की भूमिका ही तो निभाते हैं. सनातन ब्राह्मण संस्कृति में क्या इसकी कल्पना भी की जा सकती है?

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डॉ. राम सिंह ने इतिहास के नाम पर फैलाई जाने वाली वैमनस्यपूर्ण भ्रांतियों के निवारण का भी प्रयास किया. कुमाऊं में मनाये जाने वाले 'खतडुआ' त्योहार के बारे में व्यापक रूप से प्रचलित है कि यह गढ़वाल के राजा पर कुमाऊं के राजा की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. डॉ. राम सिंह कहते थे कि पहले तो गढ़वाल की राज वंशावली में खतड़ सिंह नाम का कोई राजा नहीं हुआ. दूसरे, गढ़वाल के राजवंश के साथ कुमाऊं के राजवंश के सम्बन्ध पूरी तरह शत्रुवत कभी नहीं थे बल्कि उतार-चढ़ाव भरे थे. कभी दोस्ती तो कभी प्यार और कभी रिश्तेदारी भी. लगभग ऐसे ही सम्बन्ध कुमाऊं और डोटी (पश्चिमी नेपाल) के बीच भी थे. गौरतलब है कि खतडुआ कुमाऊं में ही नहीं पश्चिमी नेपाल में भी मनाया जाता है, जिनका गढ़वाल के राजा की हार-जीत से कोई नाता नहीं. डॉ. राम सिंह के मुताबिक़ खतडुआ शुद्ध खेतिहर त्योहार है, जिसके साथ औपनिवेशिक काल में किसी कथित इतिहासकार ने हार-जीत की यह कथा जोड़ दी.

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डॉ. राम सिंह का जन्म माता श्रीमती पार्वती देवी और पिता श्री मोहन सिंह के घर पिथौरागढ़ के निकट कफलानी (गैना) गांव में 17 जुलाई 1937 को हुआ था. उनकी स्कूली शिक्षा पिथौरागढ़ के विद्यालयों में पूरी हुई. आगे की पढ़ाई के लिए वह लखनऊ विश्वविद्यालय चले आये. हिंदी में एम.ए. करने के बाद उन्होंने पीएच.डी. में प्रवेश लिया. उनका शोध प्रबंध कुमाऊं की कृषि एवं ग्रामोद्योग शब्दावली के भाषाशास्त्रीय अध्ययन पर केन्द्रित था. शिया डिग्री कॉलेज लखनऊ से एक शिक्षक के रूप में उन्होंने अपना पेशेवर जीवन शुरू किया. बाद में विभिन्न राजकीय विद्यालयों में प्रवक्ता, रीडर व विभागाध्यक्ष रहने के बाद वह 1997 में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए. उत्तराखंड के मशहूर खोजी पं. नैनसिंह की यात्राओं पर डॉ. राम सिंह ने "पं. नैन सिंह का यात्रा साहित्य" नामक पुस्तक लिखी. अनेक ऐतिहासिक व पुरातात्विक अध्ययनों के अलावा उन्होंने जागरों का संग्रह 'भारत गाथा' भी तैयार किया, जो अब तक अप्रकाशित है.

अपने अंतिम वर्षों में अल्जाइमर्स की बीमारी के कारण डॉ. राम सिंह की याददाश्त कमजोर हो गयी थी. जीवन पर्यंत वह बड़े जतन से उत्तराखंड के ऐतिहासिक साक्ष्यों का संग्रह व संरक्षण करते रहे. पिछले दो-तीन दशकों में उत्तराखंड विकास की जिस राह पर आगे बढ़ा है, उसमें इन साक्ष्यों के बड़े स्तर पर मटियामेट होने का सिलसिला शुरू हुआ. इस लिहाज से डॉ. राम सिंह का काम बड़े महत्त्व का है. उन्होंने न सिर्फ ऐतिहासिक साक्ष्यों को संजोया बल्कि एक इतिहास दृष्टि भी हमें दी. वे एक कर्मयोगी की तरह चुपचाप अपना काम करते रहे मगर अपने काम का ढोल नहीं पीटा. अपने कर्म एवं विचारों से वह पूरी तरह बौद्धिक श्रमिक थे. वह सचमुच प्रजाजन थे और सत्ता संरचनाओं से हमेशा दूरी बनाकर रखते थे. उनकी बौद्धिकता भी इसीलिए सहज, श्रमसाध्य और आतंकविहीन थी. एक समाज के बतौर अपने कर्मवीरों को याद रखने व उन्हें यथोचित सम्मान देने के मामले में हमारा रिकॉर्ड ख़ास अच्छा नहीं है. डॉ. डी.डी. पन्त जैसे वैज्ञानिक और शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' जैसे लोक कवि इस उपेक्षा के ज्वलंत उदाहरण हैं. डॉ. राम सिंह भी इस दुर्लभ मणि शृंखला की एक और कड़ी हैं.


डॉ. राम सिंह शारीरिक श्रम को सर्वोपरि मानने वाले जाति-भेदविहीन और समतावादी राज्य के हिमायती थे. वह कहते थे कि अतीत में इन्हीं मूल्यों के आधार पर हिमालय के कठिन भूगोल में हमारे पुरखों का बसना संभव हो पाया था. आज जब हम इन मूल्यों को नज़रअंदाज़ करने का खामियाजा भुगत रहे हैं, डॉ. राम सिंह और उनका इतिहास बोध अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करते नज़र आते हैं.

Friday, July 29, 2016

महाश्वेता देवी का जाना

महाश्वेता देवी (14 जनवरी 1926 - 28 जुलाई 2016)

वैसा फटकारने वाला अब किसी को कहां मिलेगा
-शिवप्रसाद जोशी

2015 की छायाएं रेंगती हुई 2016 में चली आईं और अब वे और ऊपर उठने लगी हैं. हत्याएं और हमले जारी हैं और इन्हीं समयों के बीच वे आवाज़ें भी सदा के लिए हमें छोड़ जा रही हैं जिनकी बुलंदियों ने बर्बरता को उचक कर हमारी गर्दन पर बैठने की जुर्रत करने से रोके रखा था. भारतीय जनमानस की एक ऐसी ही बुलंदी थीं महाश्वेता देवी जिनकी आवाज़ ही अब वंचितों की लड़ाई का सबब है.

कहने को महाश्वेता देवी बांग्ला आदिवासी समुदायों के बीच ही सक्रिय रहीं लेकिन वो सक्रियता इनकी सार्वभौम और उतनी प्रभावशाली थी कि वो आज़ाद भारत के चुनिंदा सार्वजनिक बुद्धिजीवियों में एक और उनमें इस समय सबसे वरिष्ठ थीं. उनका निधन सिर्फ़ साहित्य या संस्कृति का नुकसान नहीं है, उनकी उम्र हो चली थी, वो नब्बे साल की थीं, काफ़ी समय से बीमार थीं. उन्हें अवश्यंभाविता का पता था, बस नुकसान ये हुआ है कि उनका जाना ऐसे समय में हुआ है जब चारों ओर विकरालताओं का बोलबाला है और गरीबों, वंचितों को मारने सब दौड़े जा रहे हैं, उन्हें रोकने वाली माई नहीं होगी. ऐसी शख्सियत होना आसान नहीं. नुकसान ये है कि लोग और अकेले हुए हैं. दबे कुचलों को खदेड़ने की कार्रवाई बेतहाशा हो जाएगी.

वैसा फटकारने वाला अब किसी को कहां मिलेगा जैसा बंगाल के पूर्व सत्ताधारी वामपंथियों को महाश्वेता देवी के रूप में मिला. इस फटकार से उन्होंने क्या ग्रहण किया ये एक अलग शोचनीय कथा है, लेकिन उन्हें नींद से जगाने का प्रयत्न करते हुए सबसे पहले बाहर निकलने वालों में महाश्वेता भी थीं. वो आगे थीं.

2006 में फ्रांकफ़ुर्ट पुस्तक मेले में अपने मशहूर उद्घाटन भाषण में महाश्वेता देवी ने कहा था:  “1980 के दशक से, सबसे ज़्यादा वंचित और हाशिए में धकेले गए अपने लोगों के रोज़मर्रा के अन्याय और शोषण के बारे में मुखर रही हूं. ये आदिवासी हैं, भूमिहीन देहाती ग़रीब जो आगे चलकर नगरों में भटकते हुए मज़दूर और फुटपाथों के बाशिंदे बन जाते हैं. अख़बारों मे रिपोर्टों के ज़रिए, याचिकाओं के ज़रिए, अदालती मामलों, अधिकारियों को चिट्ठियों, एक्टिविस्ट संगठनों में भागीदारी के ज़रिए और अपनी पत्रिका 'बोर्तिका' के ज़रिए जिसमें वंचित लोग अपनी दास्तान सुनाते हैं, और सबसे आख़िर में अपने फ़िक्शन के ज़रिए मैंने भारत की आबादी के इस उपेक्षित तबके की कठोर हक़ीक़त को राष्ट्र के संज्ञान में लाने का बीड़ा उठाया है. उनके विस्मृत और अदृश्य इतिहास को मैंने राष्ट्र के आधिकारिक इतिहास में शामिल कराने का बीड़ा उठाया है. मैं बार बार ये कहती आई हूं कि हमारी आज़ादी नकली थी. वंचितों के लिए कोई आज़ादी नहीं आई, वे अब भी अपने बुनियादी अधिकारों से महरूम हैं.

Sunday, July 24, 2016

नीलाभ को आख़िरी सलाम

नीलाभ नहीं रहे.


नीलाभ से मेरी पहली मुलाकात १९८८ की गर्मियों में हुई थी. मैं नैनीताल में एम. ए. का छात्र था. नैनीताल के नाट्य-समूह 'युगमंच' के निमंत्रण पर वे 'दस्ता' नाम की टीम लेकर आए थे. तल्लीताल रिक्शा स्टैंड पर उनका यह दस्ता डफली की थाप पर गा रहा था -'लिखने वालों को मेरा सलाम, पढ़ने वालों को मेरा सलाम.' इस दस्ते में पंकज श्रीवास्तव भी थे और इरफ़ान भी और के.के. पांडे भी - ये सारे आज मेरे सबसे अन्तरंग दोस्तों में शुमार हैं.

 इस पहली - पूरी मुलाकात पर एक लम्बी पोस्ट कभी फिर.

जो सबसे गहरा क्षण अब तक जेहन में बैठा हुआ है वो ये है कि हम दोनों रिक्शे में बैठकर मल्लीताल की तरफ़ जा रहे थे जहां रामलीला मैदान पर कोई आयोजन था. दस्ता की टीम ने एक शो करना था. हम नैनीताल बैंक बिल्डिंग के पास थे जब पता नहीं किस रौ में नीलाभ जी ने मुझे मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर सुनाया -

उस बज़्म में मुझको नहीं बनती हया किये
बैठा रहा अगरचे इशारे हुआ किए


इत्तफ़ाकन मुझे इस ग़ज़ल का एक और शेर याद था -

सोहबत में गैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू
देने लगा है बोसे बिग़ैर इल्तिज़ा किये


मेरे ख़्याल से यह एक दीर्घकालिक सम्बन्ध की बुनियाद बना पाने को काफ़ी था. यह सम्बन्ध उनके यूं चले जाने से ख़त्म तो नहीं हुआ हां एक टीस ज़रूर भीतर गहरे तक पैठ गयी है. जब कबाड़खाने पर जैज़ पर लिखी उनकी सीरीज़ छप रही थी, वे बहुत उत्साहित होकर उसके प्रकाशन की योजना मेरे साथ बनाना शुरू कर चुके थे. मुझे उन्होंने इस किताब की डिज़ाइन का "ठेका" दे दिया था. सोचता हूँ अब उस ठेके का क्या होगा.

पिछले साल से अब तक तक तीन ऐसे कवि हिन्दी ने खोये हैं जिनके साथ युवतर पीढ़ी के गहरे और अर्थपूर्ण सम्बन्ध रहे और जिसे वे अपने रचनाकर्म और जीवनशैली से सदैव प्रेरणा देते रहे. वीरेन डंगवाल और पंकज सिंह के बाद अब नीलाभ का जाना हिन्दी साहित्य के संसार का और भी अधूरा और मनहूस रह जाना है.

अभी अभी मैंने किसी वेबसाइट पर मंगलेश डबराल का कथन पढ़ा है कि नीलाभ इस मायने में अपनी तरह के अमूल्य हिन्दी कवि/लेखक थे जिनकी चार-चार भाषाओं - उर्दू, हिन्दी, अंग्रेज़ी और पंजाबी - पर गहरी पकड़ थी. उनका साहित्यिक काम बहुत विषद है. उन्होंने बहुत सारे अनुवाद किये और ढेरों कविताएं लिखीं. नीलाभ का मोर्चा नाम से उनका एक ब्लॉग था जिस पर वे लगातार सक्रिय रहा करते थे.  

नीलाभ एक बेबाक, मीठे मगर तुर्शज़बान आदमी थे और ज़ाहिर है चाहे-अनचाहे ऐसे आदमी को अपना दुश्मन माननेवाले भी काफी बन जाया करते हैं. इसीलिये विवादों ने उनका दामन कभी नहीं छोड़ा. कल वे खुद उन सारों का दामन छोड़ कर चले गए. आप बहुत याद आयेंगे दद्दा!      

कबाड़खाने की श्रद्धांजलि.
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बांगला कवि सुकांत भट्टाचार्य की इस कविता का नीलाभ ने मूल से अनुवाद किया था.


इस नवान्न में

इस हेमन्त में धान की कटाई होगी
फिर ख़ाली खलिहान से फ़सल की बाढ़ आयेगी
पौष के उत्सव में प्राणों के कोलाहल से भरेगा श्मशान-सा नीरव गाँव
फिर भी इस हाथ से हंसिया उठाते रुलाई छूटती है
हलकी हवा में बीती हुई यादों को भूलना कठिन है
पिछले हेमन्त में मर गया है भाई, छोड़ गयी है बहन,
राहों-मैदानों में, मड़ई में मरे हैं इतने परिजन,
अपने हाथों से खेत में धान बोना,
व्यर्थ ही धूल में लुटाया है सोना,
किसी के भी घर धान उठाने का शुभ क्षण नहीं आया -
फ़सल के अत्यन्त घनिष्ठ हैं मेरे-तुम्हारे खेत।
इस बार तेज़ नयी हवा में
जययात्रा की ध्वनि तैरती हुई आती है,
पीछे मृत्यु की क्षति का ख़ामोश बयान -
इस हेमन्त में फ़सलें पूछती हैं : कहाँ हैं अपने जन ?
वे क्या सिर्फ़ छिपे रहेंगे,
अक्षमता की गलानि को ढँकेंगे,
प्राणों के बदले किया है जिन्होंने विरोध का उच्चारण ?
इस नवान्न में क्या वंचितों को नहीं मिलेगा निमन्त्रण?

Saturday, July 23, 2016

मोहम्मद शाहिद को श्रद्धांजलि

बहुत दिनों से मेल-अखबार वगैरह से दूर रहने के बाद आज अग्रज कवि संजय चतुर्वेदी की मेल से पता लगा मोहम्मद शाहिद नहीं रहे.


भारतीय शैली की शास्त्रीय हॉकी के अंतिम स्तम्भों में गिने जाने वाले शाहिद को मैंने एक दफ़ा अपने लड़कपन में खेलते हुए देखा था. सन बयासी या चौरासी की बात है जब वे लखनऊ में एक एग्जीबीशन मैच खेल रहे थे. उस मैच में ज़फर इकबाल भी खेले थे और वरिष्ठ हो चुके अजितपाल सिंह भी. 

तकरीबन मैदान की लाइन पर खड़े होकर मोहम्मद शाहिद के तिलिस्मी खेल को देखने की सिहरन अब तक याद है. कुल छप्पन साल की कम आयु में मल्टिपल ऑर्गन फेलियर के कारण इस दुनिया को विदा कह गए इस खिलाड़ी को जिसने भी अस्सी के दशक में खेलते देखा होगा उनकी ड्रिब्लिंग को कभी नहीं भूल सकता. 1980 के मॉस्को ओलिम्पिक में गोल्ड मैडल जीतने वाली भारतीय टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे थे मोहम्मद शाहिद. स्पेन के खिलाफ खेले गए फाइनल में, जिसे भारत ने 4-3 से जीता था, में विनिंग गोल उन्होंने ही किया था.  अपनी जन्मस्थली बनारस के अलावा कोई और शहर उन्हें आकर्षित न कर सका और किसी 'बड़ी' जगह न जाने की उनकी जिद ने उन्हें धीमे-धीमे मुख्यधारा और देश के सरोकारों से दूर कर दिया. अंततः शराब ने उनकी जान ली.

टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ने उन्हें हॉकी का बिस्मिल्लाह खान कहा है और संजय जी ने अपनी मेल में जो लिखा है उसे पोस्ट कर रहा हूँ. श्रद्धांजलि -

न हन्यते हन्यमाने शरीरे !

मोहम्मद शाहिद हॉकी के महानतम संगीतकारों में से एक थे. इनसाइड लेफ़्टविंगर के तौर पर उनके मूवमेंट्स असाधारण रूप से प्रवाहमान और निर्बाध होते थे. वे 80 के दशक के हमारे हीरो थे.

हमारी दुआ आप तक पंहुचे, शाहिद भाई! पुराने कपड़े छोड़कर आप नए संगीत में प्रवेश करें, देर सबेर हम भी आपको नए वाद्यों के साथ देखेंगे. 

सुर के आगे मैदान रहै पुर में सिरीमान रहै न रहै
बानी में सबद की चोट उठै काया में पिरान रहै न रहै

Thursday, March 24, 2016

योहान क्रायफ़ को विदा

अलविदा महानायक!
कैसर से लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद सर्वकालीन महानतम खिलाड़ियों में गिने जाने वाली डच फुटबॉलर योहान क्रायफ़ का आज देहांत हो गया. वे 68 साल के थे. मैंने अपने स्कूली दिनों में उनका एक पोस्टर अपने कमरे में लम्बे समय तक लगाए रखा था.
पिछले साल फुटबॉल पर दुनिया का सबसे सुन्दर गद्य लिखने वाले एडुआर्दो गालेआनो का भी देहान्त हुआ था. क्रायफ़ के ज़माने की डच फुटबॉल टीम और खुद क्रायफ़ के बारे में गालेआनो ने यह लिखा था -
"एक ब्राजीलियन पत्रकार ने उसे तरतीबवार बेतरतीबीका नाम दिया. नीदरलैंड्स के पास संगीत था और उसके तमाम सुरों को एक साथ लयबद्धता के साथ ले कर चलने का काम जिस आदमी ने किया वह था योहान क्रायफ़. एक ओर्केस्ट्रा को कंडक्ट करने के साथ ही अपना वाद्य बजाता हुआ वह किसी भी दूसरे से ज़्यादा मेहनत किया करता था.
इस दुबले-पतले, अतीव फुर्तीले शख्स को अयाक्स के रोस्टर में तभी जगह मिल गयी थी जब वह एक बच्चा ही था: जब उसकी माँ क्लब के शराबखाने में वेट्रेस का काम किया करती थी, वह मैदान से बाहर चली जाने वाली गेंदों को इकठ्ठा करने का काम किया करता या खिलाड़ियों के जूते चमकाता या कोनों में झंडे लगाया करता. उसने वे सारे काम किये जो उससे करने को कहा गया. वह खेलना चाहता था पर वे उसे यह कहकर खेलने नहीं देते थे किउसका शरीर बहुत कमज़ोर था और उसकी इच्छाशक्ति बहुत मज़बूत. जब उन्होंने आखिरकार उसे एक मौक़ा दिया, उसने उस मौके को थामा और अपने हाथों से कभी निकलने नहीं दिया. अभी वह लड़का ही था जब उसने अपना पहला मैच खेला था. उसने ज़बरदस्त खेला, एक गोल किया और एक घूंसे से रेफरी को धराशाई कर दिया.
उस रात के बाद उसने एक तूफानी, मेहनती और प्रतिभावान खिलाड़ी के रूप में अपनी पहचान बनाए रखी. दो दशकों के दरम्यान उसने नीदरलैंड्स और स्पेन में बाईस चैम्पियनशिप जीतीं. उसने 37 की उम्र में रिटायरमेंट लिया; जब उसने अपना आखिरी गोल स्कोर किया, भीड़ ने उसे अपने कन्धों पर बिठाकर स्टेडियम से उसके घर तक पहुंचाया था."

Saturday, February 6, 2016

अलविदा सुधीर तैलंग


जाने-माने कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग नहीं रहे. 26 फ़रवरी को वे 56 साल के हो गए होते. आज दोपहर साढ़े बजे उनका देहांत हुआ. वे कैंसर से पीड़ित थे. हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ़ इण्डिया और इन्डियन एक्सप्रेस समेट उन्होंने देश के सारे बड़े अखबारों के लिए काम किया था. 

यह बहुत बड़ी क्षति है. उन पर एक विस्तृत रपट कल लगाई जाएगी.

कबाड़खाने की श्रद्धांजलि.








Wednesday, February 3, 2016

इंतज़ार हुसैन का निधन

इंतज़ार हुसैन को पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि पूरे उर्दू साहित्य में मौजूदा दौर के अहम कहानीकारों में से एक माना जाता है. उन्होंने मंगलवार को लाहौर में अंतिम सांस ली, जहां कई दिनों से एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. उन्हें निमोनिया और बुख़ार था. उनको बुधवार को सुपुर्दे ख़ाक किया जाएगा.
इंतज़ार हुसैन का जन्म 21 दिसंबर 1925 को बुलंदशहर ज़िले के डिवाई में हुआ था. विभाजन के बाद वे पाकिस्तान जाकर लाहौर में रहने लगे थे. उन्होंने उर्दू और अंग्रेज़ी साहित्य में एमए की डिग्रियां हासिल की थीं. उन्होंने उर्दू के नामी अखबारों और पत्रिकाओं में काम किया था. अपने समय को ईमानदारी के साथ दर्ज करने वाले इस लेखक ने पांच उपन्यास और सात कहानी-संग्रहों की रचना की.   
उनकी कहानियों का पहला संग्रह 'गली कूचे' 1953 में प्रकाशित हुआ था. इसके अलावा उन्होंने कई अनुवाद किए और यात्रा संस्मरण भी लिखे. उनके उर्दू कॉलम भी किताब की शक्ल में प्रकाशित हुए थे और वो अंग्रेजी में भी कॉलम लिखते थे. उनके एक उपन्यास और चार कहानी संग्रहों का अंग्रेजी में अनुवाद हुआ.
वो पहले पाकिस्तानी थे जो 2013 में अंतरराष्ट्रीय बुकर प्राइज के लिए शॉर्टलिस्ट हुए.
कबाड़खाने की श्रद्धांजलि.

देखिये कबाड़ी इरफ़ान का लिया इंतज़ार हुसैन का एक पुराना साक्षात्कार -

 

Tuesday, January 12, 2016

ग्राउंड कंट्रोल टू मेजर टॉम - अलविदा डेविड बोवी


1970 और 1980 के दशकों में एक कल्ट और आइकोन की हैसियत रखने वाले गायक, गीतकार, मल्टी-इंस्ट्रूमेंटलिस्ट, रेकॉर्ड प्रोड्यूसर, म्युज़िक अरेन्जर, चित्रकार और अभिनेता डेविड बोवी (जन्म 8 जनवरी 1947) बीती 10 जनवरी को नहीं रहे.

लोकप्रिय संगीत में चार दशकों तक लगातार उनकी उपस्थिति दर्ज होती रही.

श्रद्धांजलि.