Wednesday, December 19, 2007

दुनिया भर के बहते हुए खून और पसीने में हमारा भी हिस्सा होना चाहिऐ

१६ जनवरी १९३९ को जन्मे श्री नरेश सक्सेना टेलीविज़न, रंगमंच और फिल्मों में अच्छा खासा काम कर चुके हैं। सन् २००० में साहित्य का 'पहल' सम्मान पा चुके सक्सेना जी का पहला कविता संग्रह २००१ में जाकर 'राजकमल' से छाप कर आया। यह अपनी तरह का अनूठा कविता-संग्रह है। इस के बारे में ज्यादा कुछ न कहते हुए सीधे सीधे आपको उन के रचनाकर्म से रू-ब-रू करना चाहता हूँ 'समुद्र पर हो रही है बारिश' नाम की इस किताब से पढिये कुछेक कवितायेँ:

हिस्सा

बह रहे पसीने में जो पानी है वह सूख जाएगा
लेकिन उस में कुछ नमक भी है
जो बच रहेगा

टपक रहे खून में जो पानी है वह सूख जाएगा
लेकिन उस में कुछ लोहा भी है
जो बच रहेगा

एक दिन नमक और लोहे की कमी का शिकार
तुम पाओगे खुद को और ढेर सारा
खरीद भी लोगे
लेकिन तब पाओगे कि अरे
हमें तो अब पानी भी रास नहीं आता
तब याद आएगा वह पानी जो
तुम्हारे देखते-देखते नमक और लोहे का
साथ छोड़ गया था

दुनिया के नमक और लोहे में हमारा भी हिस्सा है
तो फिर दुनिया भर के बहते हुए खून और पसीने में
हमारा भी हिस्सा होना चाहिऐ

लोहे की रेलिंग

थोडी सी आक्सीजन और थोडी सी नमी
वह छीन लेटी है हवा से
और पेंट की परत के नीचे छिप कर
एक खुफिया कारर्वाई की शुरुआत करती है

एक दिन अचानक
एक पपडी छिलके - सी उतरती है
और चुटकी भर भुरभुरा लाल चूरा
चुपके से धरती की तरफ
लगाता है छलाँग
(गुरुत्वाकर्षण इस में उसकी मदद करता है)

यह शिल्प और तकनीक के जब्दों से
छूटकर आज़ाद होने की
जी तोड़ कोशिश
यह घर लौटने की एक मासूम इच्छा

आखिर थोडी सी आक्सीजन और
थोडी सी नमी
तो हमें भी ज़रूरी है जिंदा रहने के लिए
बस थोडी सी आक्सीजन
और थोडी सी नमी
वह भी छीन लेती है हवा से।

पार

पुल पार करने से
पुल पार होता है
नदी पार नहीं होती

नदी पार नहीं होती नदी में धंसे बिना

नदी में धंसे बिना
पुल का अर्थ भी समझ में नहीं आता
नदी में धंसे बिना
पुल पार करने से
पुल पार नहीं होता
सिर्फ़ लोहा-लंगड़ पार होता है

कुछ भी नहीं होता पार
नदी में धंसे बिना
न पुल पार होता है
न नदी पार होती है

कुछ लोग

कुछ लोग पांवों से नहीं
दिमाग से चलते हैं
ये लोग
जूते तलाशते हैं

अपने दिमाग के नाप के।

समुद्र पर हो रही है बारिश

क्या करे समुद्र
क्या करे इतने सारे नमक का

कितनी नदियां आईं और कहां खो गईं
क्य पता
कितनी भाप बनाकर उड़ा दीं
इसका भी कोई हिसाब उसके पास नहीं
फ़िर भी संसार की सारी नदियां
धरती का सारा नमक लिये
उसी की तरफ़ दौड़ी चली आ रही हैं
तो क्या करे

कैसे पुकारे
मीठे पानी में रहने वाली मछलियों को
प्यासों को क्या मुंह दिखाए
कहां जाकर डूब मरे
खुद अपने आप पर बरस रहा है समुद्र
समुद्र पर हो रही है बारिश

नमक किसे नहीं चाहिये
लेकिन सबकी ज़रूरत का नमक वह
अकेला क्यों ढोए

क्या गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध
उस के उछाल की सज़ा है यह
या धरती से तीन गुना होने की प्रतिक्रिया

कोई नहीं जानता
उसकी प्राचीन स्मृतियों में नमक है या नहीं

नमक नहीं है उसके स्वप्न में
मुझे पता है
मैं बचपन से उसकी एक चम्मच चीनी
की इच्छा के बारे में सोचता हूं

पछाड़ें खा रहा है
मेरे तीन चौथाई शरीर में समुद्र

अभी - अभी बादल
अभी - अभी बर्फ़
अभी -अभी बर्फ़

अभी - अभी बादल।


सीढ़ी

मुझे एक सीढ़ी की तलाश है
सीढ़ी दीवार पर चढ़ने के लिए नहीं
बल्कि नींव में उतरने के लिए

मैं क़िले को जीतना नहीं
उसे ध्वस्त कर देना चाहता हूं।

दीमकें

दीमकों को
पढ़ना नहीं आता

वे चाट जाती हैं
पूरी
किताब।

छ्ह दिसम्बर

इतिहास के बहुत से भ्रमों में से
एक यह भी है
कि महमूद गज़नवी लौट गया था

लौटा नहीं था वह
यहीं था

सैकड़ों बरस बाद अचानक
वह प्रकट हुआ अयोध्या में

सोमनाथ में उसने किया था
अल्लाह का काम तमाम
इस बार उस का नारा था
जय श्रीराम ।

3 comments:

सचिन लुधियानवी said...

अच्छी कविताएं छांटी हैं मित्र आपने. एक कविता की कमी खल रही है जिसमें वे बची हुई जगह का जिक्र करते हैं. कि गिट्टियों ने जगह छोड दी है रेत के लिए/ रेत छोड देगी सीमेंट की जगह/ सीमेंट के बाद पानी की जगह बची रहेगी...... पंक्तियां इतनी बुरी नहीं है मुझे इसी तरह से याद है यह कविता. इसे पढवा सकें तो मजा आ जाए?
एक बात और: जहां तक मुझे याद आ रहा है कि "समुद्र पर हो रही है बारिश" उसी सन में आया था जब नरेश जी को "पहल सम्मान" मिला था. और उन्होंने पहल सम्मान जो कि हर कवि के गृह नगर में ही देने की परंपरा है को आगे बढाते हुए अपने मित्रों के शहर भोपाल में लिया था.

Vineeta Yashswi said...

Behtreen kvitayen hai

सतीश said...

लोहे की रेलिंग कविता ने ज्यादा प्रभावित किया, शेष भी अच्छे हैं।