एक बार की बात, चंद्रमा बोला अपनी माँ से।
कुर्ता एक नाप का मेरी, माँ मुझको सिलवा दे।
नंगे तन बारहों मास मैं, यों ही घूमा करता।
गरमी, वर्षा, जाड़ा हरदम बड़े कष्ट से सहता।
माँ हँसकर बोली सिर पर रख हाथ चूमकर मुखड़ा।
बेटा, खूब समझती हूँ मैं तेरा सारा दुखड़ा।
लेकिन तू तो एक नाप में कभी नहीं रहता है।
पूरा कभी, कभी आधा बिल्कुल न कभी दिखता है।
आहा माँ, फिर तो हर दिन की मेरी नाप लिवा दे।
एक नहीं, पूरे पंद्रह तू कुरते मुझे सिला दे।
15 टिप्पणियां:
कवि का नाम कविता के साथ ही दें तो बेहतर है। पिछली कविता में नाम नहीं था।
uttam .
बहुत ही सुन्दर कविता, बचपन की याद हरी हो गयी।
बचपन से ही द्वारिका प्रसाद महेशवरी की कविताएँ पाठ्य पुस्तकों में पढ़ीं हैं!
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बाल साहित्य के इस पुरोधा को शत्-शत् नमन!
भावपूर्ण रचना के लिये बधाई !
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..
बहुत खूबसूरत ब्लॉग मिल गया, ढूँढने निकले थे। अब तो आते जाते रहेंगे।
BAHUT HI KHUBSURTI SE CHAAND KI ABHILASHA KA PRAKTYA..!
EK ABHILASHA HAMARI BHI HO JAYE, VISIT KARE-
www.sudhirmahajan.blogspot.com
ji hamne to hariodh ji ki yah kavita aise padhi thi-
hath kar baitha chand ek din mata se yah bola
silva do man un ka mota ek jhingola...
ji hamne to hariodh ji ki yah kavita aise padhi thi-
hath kar baitha chand ek din mata se yah bola
silva do man un ka mota ek jhingola...
behad pyari layatmak kavita.. saath hi bahut hi saral..aur chanda ke purane kisse kavitaon ko taaza karti hui. shukriya.
ओ सचमुच...बचपन में पढ़ी ये कविात तो बिलकुल भूल गई थी। ऐसा लगता है दिल भर आया शायद।
bahut sunder kavita bachpan me khoob gaga kar yad karte the.....
मेरी स्मृति में कुछ यूं है
हठ कर बैठा चांद एक दिन माता से यूं बोला
सिलवा दे मां मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला
सर-सर चलती हवा रात भर जाडे से मैं मरता हूं
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह से यात्रा पूरी करता हूं
नवीन भाई, आप की स्मृति सही कह रही है दिनकर की कविता "हठ कर बैठा चांद एक दिन माता से यूं बोला " के बारे में लेकिन यह वाली कविता तो द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की है लगभग वैसी ही , उसी बात को कहती हुई। अब सवाल यह है पहले किसने लिखा है। वैसे दिनकर की कविता भी 'कबाड़ख़ाना' पर अभी कुछ दिन पहले ही ( २५ अक्टूबर २०१० को)अशिक पांडे ने लगाई है जिसका लिंक यह रहा :
http://kabaadkhaana.blogspot.com/2010/10/blog-post_25.html
बाकी सब ठीक!
# अशिक पांडे को 'अशोक पांडे' पढ़ा जाय । हमसे भूल हो गई। हमका माफ़ी दैद्यो!
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