Wednesday, June 4, 2008

आज के दैनिक हिन्दुस्तान में कबाड़ख़ाना

आज के दैनिक हिन्दुस्तान में कबाड़ख़ाने पर रवीश कुमार का आलेख छपा है. देखिये:



(इमेज पर क्लिक करने से वह अपने वास्तविक साइज़ में नज़र आने लगेगी)

वैसे यह रहा लेख:


ज़िन्दगी के कबाड़ की कीमत

पेप्पोर रद्दी पेप्पोर चिल्लाते-चिल्लाते अशोक पांडे का यह ब्लॉग कबाड़वाद फैला रहा है. इस ब्लॉग पर जो भी आता है, उसका कबाड़ीवाला कहकर स्वागत किया जाता है. वीरेन डंगवाल हों या उदय प्रकाश, ये सब कबाड़ीवाले हैं

कबाड़ीवाले के शोर के बीच जब इस ब्लॉग पर पंडित छन्नूलाल मिश्र की राग यमन में गाई गंगा स्तुति सुनाई पड़ती है, तब लगता है कि कहीं आ गए हैं. कबाड़ीवाले के ठेले के पीछे चलते-चलते किसी खजाने का दरवाज़ा खुलने लगता है. इस ब्लॉग का पहले तो पता जान लीजिए - http//:kabaadkhaana.blogspot.com . इससे पहले कि आप कबाड़खाने में पंडित जसराज और पंडित छन्नूलाल मिश्र की तान से बेसुध हो जाएं एक और कबाड़ी सुन्दर चन्द ठाकुर की बेरोज़गारी पर लिखी कविता गूंजने लगती है. बेरोज़गारी पर अब न तो फ़िल्में बनती हैं न कोई कविता लिखी जाती है. एक बार एनडीटीवी इंडिया के एक इंटरव्यू में मनोज वाजपेयी से जब यह पूछा गया कि आप किस तरह के किरदार करना चाहेंगे, तो जवाब था - बेरोज़गारी, जिसे सबने भुला दिया है. मनोज वाजपेयी को एक बेरोज़गार की आत्मकथा बनती सुन्दर चंद ठाकुर की कविता पढ़नी चाहिये. जहां एक बेरोज़गार कह रहा है-

मैं क्यों चाहूंगा इस तरह मरना
राष्ट्रपति की रैली में सरेआम ज़हर पी कर
राष्ट्रपति मेरे पिता नहीं
राष्ट्रपति मेरी मां नहीं
ये बचाने नहीं आएंगे.

दर असल, यही मुश्किल और खूबी है कबाड़खाना की. आप जब कबाड़खाना की बात करेंगे तो बात कवियों, किताबों, गायकों, छायाकारों और उभरते लेखकों जिनकी रचनाएं छपने से पहले कबाड़ बनती रहती हैं, इन सब की करेंगे. कबाड़खाने का एक कोना है किताबों पर. पर्वतारोहण पर रेने दॉमाल की लिखी एक किताब 'माउन्ट एनालॉग' की चर्चा हो रही है तो कहीं जिम कॉर्बेट की 'माई इन्डिया' का पहला पन्ना परोस दिया गया है. लगता है कबाड़ीवाला अशोक पांडे अपने भीतर के पहाड़ों में उत्तराखण्ड की चोटियों से झांकने की कोशिश करते रहते हैं. जब भी पहाड़ से उतरते हैं कबाड़वाद का झंडा उठा लेते हैं. कबाड़वाद का बाकायदा एक संविधान है. कहते हैं दुनिया के सबसे खादू और बर्बादू देश अमेरिका की कोख में जन्मा है कबाड़वाद (फ़्रिगानिज़्म). कबाड़ीवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था में उत्पादित चीज़ों को कम से कम लेना चाहते हैं. फ़र्स्ट हैंड तो बिल्कुल नहीं. ये लोग प्राकृतिक संसाधनों सी उतना भर लेना चाहते हैं जितना कुदरत ने उनके लिये तय किया है. अब आप जान गए होंगे कि अशोक पांडे का कबाड़वाद सिर्फ़ 'पेप्पोर, रद्दी पेप्पोर' की आवाज़ के पीछे नहीं जाता है. इसीलिये वे एक आधिकारिक विज्ञापन भी छापते हैं. राही मासूम रज़ा की एक पंक्ति से -

हम ख़ून-ए-जिगर लेकर बाज़ार में आये हैं
क्या दाम लगाएंगे लफ़्ज़ों की दुकां वाले

महंगाई के मारे हम भारत के उपभोक्ता लोगों को दूसरे तरह से आईना दिखाने का नाम है कबाड़वाद. भारत में फ़्रिगानिज़्म यानी कबाड़वाद आधिकारिक तौर पर भले ही न फैला हो, लेकिन करोड़ों भारतीय आज भी किसी के छोड़े हुए कपड़े, जूते और बक्से का इस्तेमाल करते हैं. घरों में बड़े भाई की कमीज़ छोटा भाई पहनता है. पुरानी दिल्ली के चोर बाज़ार में हमने कई लोगों को हवाई जहाज़ की कटलरी खरीदते देखा है. चोर बाज़ार ही तो कबाड़वाद है. प्रकृति को उत्पादन और उपभोग की मार से बचाने का एक वाद. कबाड़ख़ाना को देखकर लगता है कि हिन्दी में अभी कितना कुछ किया जा सकता है. आईडिया की तलाश में मर रहे कवियों, संपादकों, प्रकाशकों और न्यूज़ चैनल के रिपोर्टरों को यहां आकर घूमना चाहिये. कबाड़ीवाले के पास बहुत कुछ है. हिन्दी के कबाड़ियों की दुकान नहीं है यह ब्लॉग. यहां आपको मैक्सिको की एक आवाज़ भी सुनाई देती है. आना गाब्रीएल की आवाज़. दुनिया भर में घूमने वाले अशोक पांडे आना का एक मशहूर गाना पेश करते हैं - लूना. इसी के साथ यह भी बताते हैं कि जिस तरह हिन्दी फ़िल्मों में एक खास तरह की रूमानियत बरकरार है, उसी तरह लातीनी गानों में भी प्रेम, वफ़ा और ज़फ़ा आदि बने रहते हैं. अशोक हिन्दी के ब्लॉग पाठकों का परिचय पॉप जगत के कुछ बेहतरीन गीतों और गायकों से भी कराते हैं. गानों के अनुवाद करते हैं. गायक का परिचय देते हैं. हम सब मशहूर पॉप गायक हूलियो इगलेसियास को नहीं जानते होंगे. सिर्फ़ इतना जानते हैं कि पॉप संगीत को बिना सुने-समझे भी गरियाया जाता है.

कबाड़ीवाले का यह ठेला पता नहीं कहां-कहां से माल लेकर आ गया है. ऐसा रेंज वाकई कबाड़ी के ठेले में ही मिलेगा. कप के टूटे टुकड़े से लेकर आधी बची चॉकलेट और वो खिलौना भी, जिससे अब भी खेला जा सकता है.

10 comments:

Arun Aditya said...

अशोक पण्डे जी और सभी श्रेष्ठ कबाडियों को बधाई। और भी कबाड़ जुटाते रहो, लुटाते रहो।

deepak sanguri said...

achaha hai ,bahut achaha...

abhi or kabad aana baki hai..

shukrea kabadeooo....

Priyankar said...

कबाड़खाना अविभाजित पुश्तैनी घर का वह तलघर है जहां हम बेखुदी में बार-बार जाना चाहते हैं अपनी स्मृतियों के थान उतनने.

sanjay patel said...

अशोक भाई,
कबाड़ख़ना के मोतियों की चमक अब दुनिया जहान तक पहुँचने लगी है. साधुवाद रवीशभाई को इस बेहतरीन रिपोर्ताज के लिये. अशोक भाई आप जैसे दर्दी रेखांकित हों या न हों काम तो करते ही रहेंगे लेकिन यदि कोई हौसलाअफ़ज़ाई कर देता है तो काम करने की स्पीड बढ़ जाती है. बधाई.

yunus said...

अशोक जी बधाई ।
बहुत सही है । हौसलाअफ़ज़ाई होगी ।
मुबारक हो जी ।

Geet Chaturvedi said...

बधाई हो आपको. यह हमारा पसंदीदा ठिकाना है. ऐसा लगता है कई बार कि कबाड़खाना ब्‍लॉग दुनिया का सम है.

ajay kumar jha said...

aadarniya ashok jee,
bade kabaadee ko ek chinddi kabaadee kaa pranaam. aaj isee aalekh kee wajah se ya pata nahin kis kaaran se mein aapke is lokpriya chitthe ke samnaam wale apne ek chitthe ko naya naam de raha hoon . raddee kee tokree, maksad sirf itnaa ki kabaadkhaa sirf ek hee achhaa lag rahaa hai fir meri to bas tokree hai. aashaa hai aapkaa aashirwaad saath rahegaa. aapko mubaarakbaad aur shubhkaamnaayein.

बाल किशन said...

बहुत खूब.
रवीश कुमार जी को बधाई.
बहुत सही लिखा उन्होंने.
और कबाड़ख़ाना को उन्नत भविष्य के लिए शुभकामनाएं.

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

हिन्दी ब्लॉग की हैसियत पर प्रिंट मीडिया में छिड़ी एक बहस में अपन ने अपना तर्क मजबूत बनाने के लिए जिन ब्लोगों के नाम गिनाए थे उनमें 'कबाड़खाना' भी था. अब यह ख़ुद प्रिंट मीडिया में जगह पा रहा है तो फिलहाल इससे बढ़कर खुशी की बात और क्या हो सकती है. कबाड़खाना के सभी कबाडियों को हार्दिक शुभकामनाएं!

इरफान said...

लुफ़्त आया बाऊजी.