Sunday, November 9, 2008

वो सर्द शामें और वो तन्हा धुन !

लंदन में सर्दी दस्तक देने लगी है. कई बार जाड़ों की ठिठुरती रातों में मफ़लर से मुँह कान ढँके, ठिठुरते हुए देर से घर लौटना और फिर घर के अंदर सेंट्रल हीटिंग की गर्माहट को महसूस करते हुए बिस्तर पर निढाल गिर जाना अच्छा लगता है. ऐसे में मुझे मालूम होता है कि आधी रात के वक़्त बीबीसी रेडियो फ़ोर पर सेलिंग बाइ की धुन सुनाई पड़ेगी. हाथ बढ़ा कर रेडियो खोलता हूँ.

पता नहीं कितने बरसों से रात के ठीक पौन बजे रेडियो फ़ोर के किसी अनुभवी और ठहरे हुए उदघोषक की गुरु-गंभीर आवाज़ बताती है कि शिपिंग फ़ोरकास्ट का प्रसारण होने वाला है लेकिन उससे पहले रॉनल्ड बिंज की कंपोज़ की गई धुन सेलिंग बाई.

सेलिंग बाई की इस धुन को मैं कई बार आँखें बंद करके सुनता हूँ. महसूस होता है जैसे आप किसी पाल वाली नाव में बैठे हों. दूर कहीं आकाश में चाँद चमकता सा दिखता है. समुद्र और आसमान का गहरा नीला रंग सियाह सा पड़ता हुआ लगता है और आप नहीं जानते कि हिलोरें लेते हुए अगाध समुद्र में वो दिशाहारा नाव पता नहीं आपको कहाँ ले जाएगी. आप आँखें बंद किए निश्चेष्ट पड़े रहते हैं.

जब शिपिंग फ़ोरकास्ट शुरू होता है तो तंद्रा टूटती है और आप को हठात याद आता है कि आप जिस मुल्क में रहते हैं वो दरअसर एक टापू है जिसके चारों ओर फैले विशाल समंदर में अँधेरे की छाती चीरते जहाज़ अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते जाते हैं और बिगड़ैल हवाओं का रुख़ भाँपने के लिए उन जहाज़ों के मल्लाह इसी शिपिंग फ़ोरकास्ट को सुनते हैं.

रेडियो सुनना एक तरह से इस मुल्क की संस्कृति का हिस्सा है. टेलीविज़न की अपनी जगह है और अख़बार पढ़ने वाले अपनी जगह. लेकिन मकान बनाने वाले मिस्त्री, पाइप और नल ठीक करने वाले प्लंबर एक रेडियो हमेशा अपने साथ रखते हैं और काम करते हुए अपने पसंद के प्रसारण सुनते हैं. पारंपरिक अँगरेज़ घरों में रेडियो रसोई घर में रखा रहता है जहाँ वो खाना बनाने वाले को बाहरी दुनिया से जोड़े रखता है.

रेडियो यहाँ सिर्फ़ गाना सुनने या पहेलियाँ हल करने वाले प्रोग्राम सुनने का ज़रिया ही नहीं है. राजनीति, समाज, इतिहास और साहित्य की गंभीर बहसें रेडियो पर होती हैं और लोग उनमें हिस्सा लेते हैं, अपनी राय और अपना ग़ुस्सा रेडियो पर ज़ाहिर करते हैं. पेंशन पाने वाले रिटायर्ड लोग परेशान है कि जाड़े कैसे कटेंगे क्योंकि बिजली और गैस के बिल सुरसा के मुँह की तरह फैलते जा रहे हैं. पर आमदनी उस अनुपात में नहीं बढ़ रही. आर्थिक संकट के जिस दौर से पश्चिमी देश इन दिनों गुज़र रहे हैं उसकी डरावनी झलक रेडियो में मिलती है.

इस समाज में अभी हाल तक बाज़ार ही सबका मंदिर-मस्जिद-गुरद्वारा और गिरजाघर बन गया था, जहाँ सिर्फ़ एक मंत्र सुनाई पड़ता था कि ख़रीदो-ख़रीदो, ज़रूरत न भी हो फिर भी ख़रीदो. एक ख़रीदो- दो मुफ़्त ले जाओ. जेब में पैसा नहीं है तो उधार ले जाओ. मकान नहीं है तो बैंक कर्ज़ देगा, कार नहीं है तो बैंक कर्ज़ देगा. जितना चाहिए उतना मिलेगा.

लेकिन अब सरकार और सरकार के मंत्री कहते हैं कि ये नीति ही ग़लत है. पत्रिकाओं में लेख छप रहे हैं जिसमें महिलाओं से कहा जा रहा है कि उतने की कपड़े ख़रीदें, जितनी ज़रूरत हो. दूसरों को क़र्ज़ देने वाले बैंक अब ख़ुद मोहताज़ हो रहे हैं. जिस तरह अमरीका से लेकर ब्रिटेन तक की सरकारें अपने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर रही हैं उसे देखकर सिर्फ़ सत्तर के दशक के उन दिनों को याद किया जा सकता है जब भारत में इंदिरा गाँधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था और सबने मान लिया कि भारत भी समाजवादी देशों की श्रेणी में आ गया है.

अर्थशास्त्री और विश्लेषक 1930 के दशक को याद कर रहे हैं – जिसे तीसा की महान मंदी भी कहा जाता है. कहते हैं उस ज़माने में करेंसी नोट बेकार हो गए थे. उनकी कोई क़ीमत ही नहीं बची थी. जर्मनी में लोग जाड़ों में पानी गरम करने के लिए नोटों के बंडल के बंडल जलाने लगे थे क्योंकि उतने पैसों से आग जलाने के लिए ईंधन तक नहीं ख़रीदा जा सकता था.

कितनी दिसचस्प बात है कि अब खुले बाज़ार और पूँजीवादी अमरीका के आम लोग कार्ल मार्क्स को याद करने लगे हैं. वो कहते हैं कि कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में कहा था कि एक दौर आता है जब पूँजीवाद पूरी तरह विकसित होकर समाजवाद में बदल जाता है. अमरीका में यही हो रहा है – ये समाजवाद ही तो है.

खुले बाज़ार, चमकते-दमकते मॉल्स, बड़ी बड़ी महँगी कारों और आलीशान बंगलों का इंद्रधनुषी सपना आज इतना बदरंग, इतना भूरा-सलेटी सा क्यों दिख रहा है? खुले बाज़ार के पुजारी आज अपने ही देवताओं पर फूल की जगह पत्थर क्यों बरसाने लगे हैं? आज फिर से बाज़ार के पंडितों को राज्य और राज्य के नियम क़ानूनों क्यों याद आ रहे हैं? ऐसा लगता है कि इन सवालों का पूरा जवाब किसी के पास नहीं है.

हो सकता है कि जिसे विश्लेषक पूँजीवाद का संकट बता रहे हों, वो कुछ महीनों में एक बुरे सपने की तरह भुला दिया जाए. लेकिन फ़िलहाल तो लंदन की सड़कों के किनारे कतार से खड़े चिनार के पेड़ पतझड़ की आशंका से घिरे हुए हैं. कुछ ही दिन में उनके पत्ते पीले पड़ेंगे और फिर टूट टूट कर गिरने लगेंगे. कुछ ही दिनों में लोग अपने गरम कपड़े निकाल लेंगे – दस्ताने, ओवरकोट, ऊनी टोपियाँ और मफ़लर.

कहते हैं कि इस बार ब्रिटेन की सर्दियाँ ज़्यादा कष्टकारी हो सकती हैं. और ऐसी कष्टकारी सर्दियों में रात गए घर लौटने पर सेलिंग बाइ की धुन कुछ तो सुकून पहुँचाएगी.

(सेलिंग बाइ की धुन इस पोस्ट पर लगाने की ज़िम्मेदारी अशोक पांडे की.)

12 comments:

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" said...

ek achchhi jankari yukt post "" वो सर्द शामें और वो तन्हा धुन ! "" ke bahane pdhne ko mili.
aapka
vijay tiwari "kislay "

Ek ziddi dhun said...

हमारे यहां के हरामखोर तो अभी भी बेशर्मी पर उतारू हैं। केंद्र में कम्युनिस्टों का दखल नहीं होता तो बीमा, बैंक आद क्षेत्र में खुला विदेशी निवेश हो चुका होता और अमेरिका का असर यहां कैसा भयानक दिखाई देता। यहां की सर्द रातों में पता नहीं आम आदमी के लिए कोई सुकून की धुन होगी या नहीं

hem pandey said...

अमेरिकी मंदी का शायद एक फायदा भारत को मिले कि लोग 'ऋणम कृत्वा घृतं पिबेत' से कुछ उदासीन हों |

Rajesh Joshi said...

तिवारी जी, चाहता तो मैं था कि आप सेलिंग बाई भी सुनते. लेकिन अशोक पांडे सुषुप्तावस्था को प्राप्त हो गए हैं और मेरी चिट्ठी को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. मैंने उनसे कहा था कि सेलिंग बाई को अपलोड कर दें. पर उन्होंने नहीं किया. ज़िद्दी साहब, इस हफ़्ते आउटलुक पत्रिका ने आपकी ही बात पर कवर स्टोरी की है. ख़ास तौर पर अर्थशास्त्री पटनायक का इंटरव्यू दमदार है. और पांडेय जी, चार्वाक के बावजूद जिस समाज में क़र्ज़ लेने को नामोशी और बदनामी का बायस समझा जाता रहा हो, वहाँ अब भी बहुत आशा बाक़ी है. गुरचरण दास जैसे अमरीका और पूँजी के दलाल चारणगान करें तो करते रहें. टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

sidheshwer said...

राजेश बाबू,
बहुत दिनों के बाद कुछ ठंडक पहुंचाई.अशोक बाबू का 'शिश्टम आजकल खराब चल्लिया हैगा'

एस. बी. सिंह said...

भाई जोशी जी कहते हैं की यदि एक झूठ हजार बार बोला जाए तो वह सच लगाने लगता है। यही बाजारवाद के बारे में भी सच है। जिन लोगों नें बाज़ार को ही सर्वशक्तिमान मान कर कभी किसी की परवाह नहीं की, वाही अब जब उनका ताश का महल ढह गया है, मदद के लिए सरकार-सरकार कर रहे हैं। और उन्हें करदाताओं के पैसे से उबारने के लिए बड़े बड़े पैकेज दिए जा रहे हैं. आज इस उद्दाम भोगवाद के अर्थशास्त्री लगता है वैश्वीकरण और बाजारवाद की दारू के नशे में किसी नाली में पड़े हैं। खैर यह अंत तो एक दिन होना ही था। आइए सुनते हैं सेलिंग बाई इस पते पर -

http://www.box.net/shared/rfv8vyy0sf

vimal verma said...

क्या बात है राजेशजी,सेलिंग बाई अगर अशोक जी नहीं सुनवा पाये तो कम से मेल तो कर दीजिये,हम वाकई सुनना चाहते थे...आपने वहां लंदन की सर्दी की बात करते- करते ठंडे पड़ रहे बाज़ार पर भी बढिया लिखा है...अब यहां भी उसका असर तो दिख ही रहा है,स्टॉक एक्चेंज का बुरा हाल है...अब लेग शेयर बाज़ार के गिरते भाव से आतंकित हैं....और चमचमाते मॉल जो है उन्होंने अपने एस्केलेटर को बीच बीच में बन्द करके पैसा बचाने मेंलग गये हैं मॉल का हाल ये हैं कि लोग वहां ठंडी हवा लेते हैं,और दाम देख के चले आते है,वैसे अच्छा लिखा है, लिखते रहियेगा....

वीरेन डंगवाल said...

rajesh bhaiya,ek khuddar barhai(carpentar,yaar)ki tarah chool se chool milate huye ache gadya me tumne samajhdar baaten ki hain jinhe age barahaya jana chahiye shayad.
ye tamasha to abhi shuru hi hua hai.

Rajesh Joshi said...

वीरेन दा,

आपने प्रमोशन कर दिया. कबाड़ी को बढ़ई का दर्जा दे दिया. सच तो ये है कि उतनी अच्छी बढ़ईगिरि मुझे आती नहीं है. अपना ई-मेल भेजिएगा तो अलग से मेल लिखूँगा, वरना यहाँ लिखा आत्मश्लाघा की श्रेणी में आ सकता है. पाँच-छह दिसंबर को पिथौरागढ़ तो पहुँचेंगे ही आप?

एस. बी. सिंह ने सेलिंग बाई का लिंक लगाया. हो सकता है कुछ लोग सुन पाए हों. धन्यवाद. और विमल भाई लगातार लिखने के लिए मुझे ख़ुद को ही हंटर लगाने पड़ेंगे.

आशीष said...

daju,
baaki baat to sub sahi hai par tumhari post se yeh achraj bhari baat patta chalii ki england mein plumber or raaj mistry bhi english ke prograam sunte hain!!

आशीष said...

daju,
baaki baat to sub sahi hai par tumhari post se yeh achraj bhari baat patta chalii ki england mein plumber or raaj mistry bhi english ke prograam sunte hain!!

Ashok Pande said...

उम्दा, विचारणीय आलेख, जोसी जी!

हां, सिद्धेश्वर ने आपको सूचित कर ही दिया था कि मेरा शिश्टम फ़ैल हो रिया था. अब आज चालू हुआ है तो ट्वीन लगा दी गई है.

जायदै रेगूलर रहेंगे तो अच्छा लगेगा.