Wednesday, February 4, 2009

वसंत आ गया है।

जिस स्थान पर बैठकर लिख रहा हूँ, उसके आस-पास कुछ थोड़े से पेड़ हैं। एक शिरीष है, जिस पर लम्बी-लम्बी सूखी छिम्मियाँ अभी लटकी हुई हैं। पत्ते कुछ झड़ गए हैं और कुछ झड़ने के रास्ते पर हैं। जरा-सी हवा चली नहीं कि अस्थिमालिकावाले उन्मत कापालिक भैरव की भांति खड-खड़ाकर झूम उठते हैं। "कुसुम जन्म ततो नव पल्लवा:" का कहीं नाम-गंध भी नहीं है। एक नीम है। जवान है, मगर कुछ अत्यन्त छोटी किसलायिकाओं के सिवा उमंग का कोई चिन्ह उसमें भी नहीं है। फिर भी यह बुरा मालूम नहीं होता। मसें भीगी हैं और आशा तो है ही। दो कृष्णचूडाएं हैं। स्वर्गीय कविवर रवींद्रनाथ के हाथ से लगी वृक्षावली में ये आखिरी हैं। इन्हें अभी शिशु ही कहना चाहिए। फूल तो उनमें कभी आए नहीं, पर वे अभी नादान हैं। भरे फागुन में इस प्रकार खड़ी हैं मानो आषाढ़ ही हो। नील मसृण पत्तियां और सूच्यग्र शिखान्त। दो-तीन अमरुद हैं, जो सूखे सावन भरे भादों कभी रंग नहीं बदलते- इस समय दो-चार श्वेद पुष्प इन पर विराजमान हैं; पर ऐसे फूल माघ में भी थे और जेठ में भी रहेंगे। जातीय पुष्पों का एक केदार है; पर इन पर ऎसी मुर्दनी छाई हुई है कि मुझे कवि-प्रसिद्धियों पर लिखे हुए एक लेख में संशोधन की आवश्यकता महसूस हुई है। एक मित्र ने अस्थान में मल्लिका का एक गुल्म भी लगा रखा है, जो किसी प्रकार बस जी रहा है। दो करबीर और एक कोविदार के झाड़ भी उन्हीं मित्र की कृपा के फल हैं, पर वे बुरी तरह चुप हैं। कहीं भी उल्लास नहीं, उमंग नहीं और उधर कवियों की दुनिया में हल्ला हो गया, प्रकृति रानी नया श्रृंगार कर रही है, और फिर जाने क्या-क्या। कवि के आश्रम में रहता हूँ। नितांत ठूंठ नहीं हूँ; पर भाग्य प्रसन्न न हो तो कोई क्या करे? दो कांचनार वृक्ष इस हिन्दी-भवन में हैं। एक ठीक मेरे दरवाजे पर और दूसरा मेरे पड़ोसी के। भाग्य की विडम्बना देखिये कि दोनों एक ही दिन के लगाए गए हैं। मेरावाला ज्यादा स्वस्थ और सबल है। पड़ोसीवाला कमजोर, मरियल। परन्तु इसमें फूल नहीं आए और वह कमबख्त कंधे पर से फूल पड़ा है। मरियल-सा पेड़ है, पर क्या मजाल कि आप उसमें फूल के सिवा और कुछ देखें! पत्ते हैं ही नहीं और टहनियां फूलों से ढक गई हैं। मैं रोज़ देखता हूँ कि हमारेवाले मियां कितने अग्रसर हुए? कल तीन फूल निकले थे। उसमें दो तो एक संथाल-बालिका तोड़कर ले गई। एक रह गया है। मुझे कांचनार फूल की ललाई बहुत भाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन फूलों की पकोड़ीयां भी बन सकती हैं। पर दुर्भाग्य देखिये कि इतना स्वस्थ पेड़ ऐसा सूना पड़ा हुआ है और वह कमजोर दुबला लहक उठा है। कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।
पढता-लिखता हूँ। यही पेशा है। सो दुनिया के बारे में पोथियों के सहारे ही थोड़ा-बहुत जानता हूँ। पढ़ा हूँ, हिन्दुस्तान के जवानों में कोई उमंग नहीं है, इत्यादि-इत्यादि। इधर देखता हूँ कि पेड़-पौधे और भी बुरे हैं। सारी दुनिया में हल्ला हो गया कि वसंत आ गया। पर इन कमबख्तों को ख़बर ही नहीं! कभी-कभी सोचता हूँ कि इनके पास तक संदेश पहुंचाने का क्या कोई साधन नहीं हो सकता? महुआ बदनाम है कि इसे सब के बाद वसंत का अनुभव होता है; पर जामुन कौन अच्छा है। वह तो और भी बाद में फूलता है। और कालिदास का लाड़ला यह कर्णिकार? आप जेठ में मौज में आते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि वसंत भागता-भागता चलता है। देश में नहीं, काल में। किसी का वसंत पन्द्रह दिन का है और किसी का नौ महीने का। मौजी है अमरुद। बारह महीने इसका वसंत ही वसंत है। हिन्दी-भवन के सामने गंधराज पुष्पों की पांत है। ये अजीब है, वर्षा में ये खिलते हैं, लेकिन ऋतु-विशेष के उतने कायल नहीं हैं। पानी पड़ गया तो आज भी फूल सकते हैं। कवियों की दुनिया में जिसकी कभी चर्चा नहीं हुई, ऐसी एक घास है - विष्णुकांता। हिन्दी-भवन के आँगन में बहुत है। कैसा मनोहर नाम है! फूल और भी मनोहर होते हैं। जरा-सा तो आकार होता है, पर बलिहारी है उस नील मदुर रूप की। बादल की बात छोडिये, जरा-सी पुरवैया बह गई तो इसका उल्लास देखिये। बरसात के समय तो इतनी खिलती है कि मत पूछिए। मैं सोचता हूँ कि इस नाचीज़ लता को संदेश कैसे पहुँचता है? थोड़ी दूर पर वह पलाश ऐसा फूला है कि ईर्ष्या होती है। मगर उसे किसने बताया कि वसंत आ गया है? मैं थोड़ा-थोड़ा समझता हूँ। वसंत आता नहीं ले आया जाता है। जो चाहे और जब चाहे अपने पर ले आ सकता है। वह मरियल कांचनार ले आया है। अपने मोटेराम तैयारी कर रहे हैं, और मैं?
मुझे बुखार आ रहा है। यह भी नियति का मजाक ही है। सारी दुनिया में हल्ला होने गया है कि वसंत आ rआहा है, और मेरे पास आया बुखार। अपने कांचनार की ओर देखता हूँ और सोचता हूँ, मेरी वजह से तो यह नहीं रुका है?

अब सुधिजन मुझे ये बताएं कि ये किसने लिखा है। चाहें तो हिन्दी का टेस्ट ही समझ लें और जबतक उत्तर ढूंढ रहे हों तबतक ये दादरा सुनिए बेग़म अख़्तर की आवाज़ में।

8 comments:

naveen kumar naithani said...

vasant aata nahin le aayaa jaata hai.
kyaa khoob .phool hazaaree ke bare mauke par khilaaye hain.

Jan Sevak said...

साउन्ड्स लाइक हिंदी, यार... इज़न्ट इट? मैं गलत हो सकता हूँ बिकज़ यू नो पढ़ने में तो अच्छा लगा पर दीज़ डेज़ कौन अंडरस्टैंड करता है ऐसी लैंग्वेज.

शिरीष, किसलियकाओं, कृष्णचूड़ाएँ, फागुन, आषाढ़, जेठ, मसृण, सूच्यग्र, कोविदार, गुल्म, कर्णिकार एटसेटरा, एटसेटरा.... ओह माई गॉश !! व्हाट लवली हिंदी यार.

कौन है ये राइटर, भई? निराला टिराला टाइप लगता है. इसे हैप्पी बर्थ डे कहना ही पड़ेगा !!

ravindra vyas said...

बहुत खूब।

Ek ziddi dhun said...

lalit nibandh ke maahir to Hajaari baba the...baad mein vidyavinash bhi is vidha ka kabaada karte rahe...main to padhna shuru kiya aur tum par fida hone laga ki vaah re rustam ek laalitya se bujha teer bhi chhupa rakha tha tarkash mein

महेन said...

जनसेवक जी,
यह हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने लिखा था. आपकी मंशा पता नहीं क्या थी मगर मुझे आपकी टिपण्णी पर आपत्ति सी हुई.

धीरेश बाबू,
उम्मीद है तंदुरुस्त होगे. विद्यानिवास बाबा के कारनामे नवभारत टाईम्स के दिनों में देखे थे. विद्यानिवास इस विधा का कबाड़ा करते रहे का मतलब हजारी बाबा ने भी कबाड़ा किया?

Jan Sevak said...

ओहो, फिर सब गलत हो गया. आपत्तिजनक तो कुछ भी नहीं लिखना चाहता था. लेकिन जिन लोगों को हिंदी के बारे में पुरानी बहसों की जानकारी है वो मेरी टिप्पणी पढ़कर आपत्ति नहीं करेंगे. मुझसे गलती ये हुई कि मैं समझ बैठा कि पुरानी बहसों से आप वाकिफ़ रहे होंगे. इसीलिए वो हिंग्लिश तनिक व्यंग्य में लिखी गई थी भाई. क्षमादान, क्षमादान !!

महेन said...

मैंने कहा था "आपत्ति सी हुई". आपत्ति हुई ऐसा नहीं कहा क्योंकि मुझे नहीं पता था आप किस मूड में कह रहे हैं. यूं नो आई कांट सी यूअर फेस ;)

दीपा पाठक said...

बहुत उम्दा पोस्ट महेन जी। द्विवेदी जी की शुद्ध हिंदी और उस पर इतना रोचक विवरण। आनंद आ गया। बने रहें।