Saturday, February 27, 2010

गप्प: बदरी काका - भाग छः

(पिछली किस्त से जारी)

कुछ दिनों बाद गोपाल के पास ऎसी खबर थी जिस से उसे लगा था कि वह एक बार तो बदरी काका को उन्नीस साबित कर पाएगा।

"कका इस दफा अल्मोड़ा में ऐसा आदमी आ रहा है जिस का तुम ने नाम नहीं सुना होगा।"

"हूँ ..." गहरी सांस लेकर काका बोले "यार मैं हुआ बुड्ढा आदमी। दुनिया में कितने तो लोग ठहरे। फिर भी कौन है?"

"कका एक देश है रूस। वहाँ का राजा आ रहा है। यहाँ दुनिया भर के पुलिस वाले और तम्माम सी आई डी वाले आ गए हैं अभी से। क्या नाम बता रहे थे उसका कामरेड गोबर्धन ज्यू ... कुछ माइकलगोबर होबर जैसा कह रहे थे ... अजीबी टाइप नाम होने वाले हुए ये विदेशी लोगों के। ... अगले हफ्ते आ रहा है बल। चलोगे देखने?"

"रहा तू बोकिये का बोकिया ही रे गोपालौ। अरे गोबर नहीं मिखाइल गोर्बाचेव नाम है उस का। उस के खुड़ बुबू आये ठहरे एक बार कसारदेवी। यहाँ आये तो एक नेपाली बामण की घरवाली के चक्कर में फंस गए। फिर मार नेपाल तिब्बत कहॉ कहॉ जा के उनका पोता रूस लौट सका बताते हैं। ये जो गोर्बू आ रहा है ना इस साले की खोपडी में जो लाल निशान है, उसी नेपाली औरत की निशानी हुई। शिबजी ने शाप दिया हुआ कि जा तेरे खानदान में सब की खोपडी में लाल निशान बना रहे। काठमांडू से आगे बताते हैं एक पूरा गाँव है लाल निशान वाली खोपडी वालों का। चलो गोर्बुआ के बहाने रूस के हाल चाल मिल जायेंगे।"

गोपाल को काटो तो ख़ून नहीं। उसे पक्का यकीन था की काका मिखाइल गोर्बाचेव को लेकर बंडल फेंक रहे थे। ब्रह्मास्त्र की तरह आये मिखाइल गोर्बाचेव के आगमन की घटना के इस तरह फिस्स हो जाने का ख़तरा हो जाने के कारण उसकी बुद्धि एक पल को भ्रष्ट हो गई और कोई साठेक सालों का दबा हुआ ग़ुस्सा और खीझ एक साथ बाहर आये।

"कका, आज तक तुम्हारी हर बात मानी है। लेकिन ये तो तुम बिल्कुल गप्प मार रहे हो। तुमको अल्मोड़ा से बाहर निकले मेरे देखते देखते तो साठ साल हो गए। तुम कहॉ से पहचानोगे इतनी दूर रहने वाले को। चलो कका आज तुमसे शर्त लगाता हूँ। पहचानना तो छोडो वो गोबरिया ने तुम्हारी तरफ एक बार देख भी लिया तो अपना मकान बेच बाच के सारे पैसे तुम्हारे हाथ में धर के हिमालय चल दूंगा। ... लगते हो शर्त ...? है हिम्मत? ..."

काका बहुत देर तक शांति से सुनते रहे फिर बोले "गोपालौ मुझे पता है तुझे ग़ुस्सा आ रहा है लेकिन जो तू कह रहा है उस पर दुबारा से सोच ले..."

"सोचना कुछ नहीं है कका। अब तो आर या पार ... नरसों को हो जाएगा फैसला।"

आखिरकार मिखाइल गोर्बाचेव के आने की तारीख आ ही गयी। सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतज़ाम थे और हैलिकोप्टर से सौ गज आगे पीछे किसी को भी जाने की इजाज़त नहीं थी। मिखाइल गोर्बाचेव हैलिकोप्टर से उतरे और पचास हजार की भीड़ को चीरते हुए अपनी सिक्योरिटी को तोड़ते हुए सीधे बदरी काका के पास पहुंचे और "खाखा ... माइ डियर खाखा ..." कहते हुए उनके गले लग गए।

निराशा में सिर झुकाए गोपाल आगे का दृश्य देखने को नहीं रूक सका।

(अगली किस्त में समापन )

3 comments:

चंदन कुमार झा said...

भारी विप्पति में पर गया गोपाल । अगली कड़ी में देखते है क्या होता है ।

abcd said...

काठमांडू से आगे बताते हैं एक पूरा गाँव है लाल निशान वाली खोपडी वालों का.....:-))))))

शान्दार..

बोरोन मोन्शोजन की गप्प कथाओ के टक्कर की हो गयी है ये गप्प कथा !!

abcd said...

एक चीज़ बुरी है इस पोस्ट मे..

(अगली किस्त में समापन )