Tuesday, September 14, 2010

यानी है मांझा खूब मंझा उनकी डोर का - अन्तिम

(पिछली किस्त से जारी)

मांझा बन कर, घिर्रियों में लिपट कर बेचे जाने को तैयार है. आखिरी फ़ोटो सारा काम निबट जाने के बाद ख़ाली पड़े मांझा बनाने की वीरान पड़ी कार्यस्थली की है.



















उम्मीद है यह दुर्लभ चित्र श्रृंखला आप लोगों को पसन्द आई होगी. अब रोहित एक दूसरे प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर चुके हैं जिसकी बानगी इन्शा अल्लाह आपको जल्द देखने को मिलेगी.

5 comments:

Syed Ali Hamid said...

तसवीरें देख कर मज़ा आया, पुरानी यादें ताज़ा हो गई ! मैंने बचपन में बहुत पतंग उड़ाई है !

ओशो रजनीश said...

बढ़िया प्रस्तुति .... आभार

हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं

एक बार पढ़कर अपनी राय दे :-
(आप कभी सोचा है कि यंत्र क्या होता है ..... ?)
http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html

abcd said...

पहले फ़ोटू की ही तरह हमारा भी दिल बान्ध लिया मन्झे ने ......

मुनीश ( munish ) said...

khooooob ! vaah !

दीपा पाठक said...

बहुत सुंदर चित्र श्रृंखला। इससे पहले पक्षी वाली सिरीज भी बहुत बढ़िया थी। रोहित बहुत अच्छे फोटोग्राफर होने के साथ-साथ चित्रों के जरिए अच्छी कहानी कहना भी जानते हैं।