Tuesday, September 10, 2013

तो वैसे दिल कूँ सादे दिलबराँ दिल कर नहीं गिनते


जो कुई हर रंग में अपने कूँ शामिल कर नहीं गिनते
हमन सब आक़िलाँ में उस कूँ आक़िल कर नहीं गिनते

मुदर्रिस मदरिसे में गर न बोले दर्स दर्शन का
तो उसकूँ आशिक़ाँ उस्‍ताद-ए-कामिल कर नहीं गिनते

ख़याल-ए-ख़ाम को जो कुई कि धोवे सफ़्ह-ए-दिल सूँ
तसव्‍वुफ़ के मतालिब कूँ वो मुश्किल कर नहीं गिनते

जो बिस्मिल नईं हुआ तेरी नयन की तेग़ सूँ बिस्मिल
शहीदाँ जग के उस बिस्मिल को बिस्मिल कर नहीं गिनते

पिरत के पंथ में जो कुई सफ़र करते हैं रात-ओ- दिन
वो दुनिया कूँ बग़ैर अज़ चाह-ए-बावल कर नहीं गिनते

नहीं जिस दिल में पी की याद की गर्मी की बेताबी
तो वैसे दिल कूँ सादे दिलबराँ दिल कर नहीं गिनते

रहे महरूम तेरी ज़ुल्फ़ के मुहरे सूँ वो दाइम
जो कुई तेरी नयन कूँ ज़हर-ए-क़ातिल कर नहीं गिनते

न पावे वो दुनिया में लज़्ज़त-ए-दीवानगी हरगि़ज
जो तुझ ज़ुल्‍फ़ाँ के हल्‍क़े कूँ सलासिल कर नहीं गिनते

बग़ैर अज़ मारिफ़त सब बात में गर कुई अछे कामिल
'वली' सब अहल-इरफ़ाँ उसकूँ कामिल कर नहीं गिनते


-‘वली’ दकनी

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