Thursday, July 13, 2017

हल्द्वानी के किस्से - 5 - अठारह



(पिछली क़िस्त से आगे)

दस लाख से ऊपर घिसीपिटी कहावतों में समय के गुजरने को उसका पंख लगा कर उड़ना कहा गया है. करीब एक करोड़ से ऊपर कवियों ने आदमी को मिट्टी का पुतला बताया है. थोड़ा नेमड्रॉपिंग की जाय तो कबीरदास जी ने क्षणभंगुरता के दूसरे नाम अर्थात इस संसार की तुलना बूँद पड़ते ही घुल जाने वाली कागज़ की पुड़िया से की है और इसी फानी दुनिया को चचा ग़ालिब कहीं अत्फ़ाल का बाज़ीचा अर्थात बच्चों का खेल बताते हैं जिसमें होते हुए भी वे उसका तलबगार न बनने की हिदायत देते हैं और आगे बताते हैं कि भइये बाजार में आ तो गए हो पर खबरदार कहीं अपने को कोई खरीदार मती समझ लेना. 

तमाम किताबों और संगीत और ज्ञान और फ़लसफ़ी से भरी चीज़ों को उठाकर देखिये आपकी समझ में आ जाएगा कि भाषा वगैरह के आविष्कार के बाद से जिसकी समझ में जो आया है उसने समय और संसार नाम के इन दो ज़रूरी और किसी की समझ में न आ आनेवाले तत्वों के बारे में अपने-अपने ज्ञान की नुमाइश लगाने में कोई कसर-कमी नहीं छोड़ी है. फलस्वरूप पढ़-लिख गयों का बच्चा  होश संभालते ही इतने खौफ से भर जाता है कि उस स्तर के उतने बड़े काम नहीं कर पाता जितना करने की उसकी असल और पैदाइशी कूव्वत होती है. असफलताओं की बाइबिल लिख चुके जनाब मरफ़ी का भी कहना है कि दुनिया में हर आदमी आज इस होड़ में है कि मौका मिलते ही खुद को दोयम बनने और दूसरों को उससे भी गया गुजरा बनाने में लग लिया जाए ताकि दिमाग का कचूमर बना देने वाले टंटों से जीते जी सामना ही न हो.

माँ-बाप-मास्टर-रिश्तेदार-आमा-बड़बाज्यू-किताब-उचक्के-पिक्चर-गाने-दोस्त-रेडियो-पेड़-पड़ोसी-बाबा-मकान-भिखारी-मंत्री-पुजारी-दुकानदार-चोर-शहंशाह वगैरह सब उस बच्चे को बताते हैं कि बेटा तुम्हारे पास बखत बहुत कम है और जो दिख रहा है वह कल की सुबह से पहले-पहले भूसे या राख के ढेर में बदल जाने वाला है.

एक और कवि ने बताया है कि दुनिया के ये मेले कम कभी नहीं होंगे अलबत्ता यह अलग बात है कि उनकी मौज काटने को न तो वहां स्वयं कवि होगा न तुम. सो अभी जो मेला दिख रहा है उसका एक निर्लिप्त दौरा लगा कर आओ और औकात भर दूध-जलेबी सूत लो. ज़्यादा बादशाही करनी हो तो बच्चे के लिए गत्ते का लाल पन्नी वाला चश्मा खरीद लाओ. बस. इस से ज्यादा कुछ नहीं. दुनिया की रीत है कि लम्बी तान के सोये रहो और अपना और अपने परिवार का भला चाहते हो तो लड़की-फड़की के चक्कर में मत पड़ो और भगवद्भजन में मन को रमाने की कोशिश करो.

ऐसा नहीं था कि ज्ञान की ये सारी बातें गोदाम के हम बाशिंदों की समझ में नहीं आती थीं. दरअसल ये बातें इतनी सरल और सहज होती हैं कि उनके भरम में आने को कोई हंड्रेड परसेंट लाटा ही तैयार होता होगा इसीलिये दुनिया में मोहब्बतें हैं और मोहब्बतों की करोड़ों दास्तानें और दसियों करोड़ पिक्चरें हैं. इसीलिये नब्बू डीयर और परमौत हैं और इसी वास्ते उनकी असली-नकली कहानियों को आंखर देने को च्यां-च्यां-म्यां-म्यां टाइप के दस करोड़ मनहूस और डाड़मार गाने बनाए गए हैं.

यह ज्ञान मुझे बंबई जाकर आ रहा था जहाँ एक विज्ञापन एजेंसी में मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती और भरपूर खाद का वादा करने वाले जहरीले यूरिया जैसे विषयों पर घटिया कविताएं लिखकर, लोकल ट्रेन में एकाकी सफ़र करते हुए और डिनर के रूप में रम के साथ बड़ा-पाव को गले में ठूंसने जैसे नित्यकर्म करता हुआ मैं उसी जीवन से आजिज़ आ रहा था जिसे मैंने नब्बू डीयर, गिरधारी लम्बू और परमौत की संगत में गोदाम में सीखा था.

उधर परमौत ने अपना बिजनेस अच्छे से फैला दिया था. नज़दीक ही अवस्थित भीमताल नामक हिलस्टेशन में नई फैक्ट्रियां खुल रही थीं और प्लेन्स के अमीर लोग वहां ज़मीनें खरीदने लगे थे. वहां की आबादी में विस्फोट हो रहा था और खाने में डालने को सब को मसाले चाहिए होते थे. परमौत के जीवन में  हल्द्वानी-काठगोदाम और रुद्दरपुर के अलावा इसी तीसरे-चौथे स्थान का प्रवेश इस प्रेमकथा के नए चैप्टर के सृजन का बायस बना.

भीषण गर्मी के मई-जून के महीनों में परमौत ने भीमताल में अपनी एजेंसी कायम की और अब वहां आना-जाना उसके रूटीन में शुमार हो गया था. बिजनेस भी हो जाता था और हिलस्टेशन की रोज़ की सैर भी. सप्ताह में तीन दिन वह पहले हल्द्वानी निबटाता फिर काठगोदाम और उसके बाद भीमताल. झील के किनारे बैठकर भाभी के बनाए परांठों वगैरह का मज़ा काटते हुए जब-तब उसकी निगाह सैर के वास्ते आये रंगीन पोशाकधारी सैलानियों पर पड़ा करती जो नाव चलाने, टहलने और फोटू खेंचने जैसे निखिद्द कामों में लगे दिखाई देते. इन सैलानियों में नवविवाहित जोड़ों के देखना उसे सबसे सुखद लगता था. पिरिया को अपने साथ इस रूप में देखना उसे सबसे अधिक भाता था. सद्यःनिर्मित पति की बेमाप और पांयचे मुड़ी पतलून पहने, हाथ-पैरों पर ढेर सारी ताजी मेहंदी और उतनी ही चूड़ियां और आभूषण लादे, मांग में ढेर सारा सिन्दूर भरे बात-बात पर आँखें झुका कर शर्मा जाने वाली हर नवेली टूरिस्ट दुल्हन उसे पिरिया जैसी दिखाई देती. सिलवाने की छोड़ें हल्द्वानी में तो पिरिया के पतलून पहन सकने का स्कोप तो हो नहीं सकता था सो उसने तय किया था कि शादी तय होने के बाद वह पिरिया के भीमताल में पहनने के लिए उसी की नाप की पतलूनें दिल्ली से सिलवा कर लाएगा. ऐसे सुखद मौकों पर उसे अपनी कल्पना के गोदाम के एक कोने पर 'चाँद सी मैबूबा' गाता हुआ नब्बू डीयर दिखाई देता. उसे गोदाम की और हम सभों की बेतरह याद आती लेकिन फिर हाथ में धरी हिसाब वाली डायरी उसे चेतावनी सी देती हुई महसूस होती जिसके भीतर आगामी जीवन के नियम-निषेधों की लिस्ट बनी हुई थी. हम उसके लिए तकरीबन मर चुके थे लेकिन उसे ऐसा यकीन करने में मुश्किल होती थी.

मोपेड का स्थान स्कूटर ने ले लिया था. इस स्कूटर को भी टीन के बक्से वगैरह फिट कर गोदाम का रूप दे दिया गया था. भीमताल से वह गाने गुनगुनाता, पिरिया के ख्यालों  से अटा हुआ और प्रफुल्लित लौटा करता.

उस दिन भी कोई तीन-साढ़े तीन बजे वह भीमताल से वापस लौटकर हल्द्वानी में प्रविष्ट हुआ था. सूरज अभी खासा रौद्र था और धूप की चिलचिल और लू के थपेड़ों की वजह से सड़कें करीब-करीब वीरान पड़ी हुई थीं. तिकोनिया से थोड़ा पहले पड़ने वाले बनवारी चाट भण्डार में रुक कर उसने लस्सी पी और पिछ्ला हिसाब बराबर किया. बनवारी उसका पुराना क्लायंट था और इसी पुरानी जान-पहचान का नतीज़ा का था कि हाल ही में उसने अपनी मोपेड कौड़ियों के दाम पर उसे बेच रखी थी. बनवारी उसे मोपेड की बाबत एक-दो बातें बताना चाह रहा था लेकिन परमौत सुनने के मूड में नहीं था. वह तिकोनिया पीडबुलडी के दफ्तर के सामने पहुँच गया था. उसने पिरिया को देखा.

रोड पर खड़े पाकड़ के एक बड़े पेड़ के नीचे एक बूढ़ा मोची अपनी दुकान लगाता था. एकाध बार परमौत ने भी उसकी सेवाएँ ली थीं. मोची कुशल था और ऐसी गर्मी में भी दुकान खोले था. इसी दुकान के आगे पीला-नारंगी छाता लगाए, हल्की आसमानी रंगत वाला सलवार सूट पहने पिरिया खड़ी थी. और थोड़ा सा परेशान दिखती हुई बार-बार घड़ी पर निगाहें डालती जाती थी. परमौत को एकबारगी काठ मार गया. कोई भी इतना खूबसूरत कैसे हो सकता था! मतलब इतना ज़्यादा खूबसूरत!

वह सड़क के उस तरफ था. होश में आते ही उसने हलके से ब्रेक मारे. उसकी पिरिया लू और धूप के बीच परेशान और अकेली खड़ी थी जबकि वह खुद स्कूटर पर सवार था. और स्कूटर भी कैसा कि जिस पर किसी को बिठाया नहीं जा सकता था. समय, संयोग और भाग्य ने उसे यह एक मौका दिया था जब वह जीवन में पहली बार अपनी पिरिया के साथ अकेला हो सकता था और इस मौके को पाने और खोने, दोनों का मतलब उस पल परमौत की समझ में आ गया और उसी मोशन में उसने स्कूटर को वापस बनवारी की दुकान की तरफ मोड़ लिया. बनवारी से मोपेड की चाभी लेने, रूमाल गीला कर अपने चेहरे को भरसक प्रेजेंटेबल बनाने, वापस पाकड़ के पेड़ पर पहुँच मोपेड रोकने में परमौत ने बमुश्किल दो से तीन मिनट का समय लगाया. पिरिया अब भी वहीं थी और उसी पोज़ में खड़ी थी और पहले से ज़्यादा परेशान नज़र आती हुई मोची से कुछ कह रही थी.

हल्की आवाज़ के साथ मोपेड रुकी तो पिरिया ने परमौत को देखा. परमौत को पहचानने में उसे दो-चार पल लगे. परमौत मुंह खोले उसे देख रहा था और उसके सूखे हलक से किसी भी तरह के शब्द नहीं निकल पा रहे थे. उसकी  वाणी को लकवा मार गया था.

"अरे आप तो हमारी क्लास में पढ़ते थे ना?"

परमौत के मुंह से हां-हूँ जैसा कुछ निकला.

"फिर आपने आना जो क्यों बंद कर दिया होगा हो अचानक से. आप मल्लब हल्द्वानी में रहते हो या कहीं बाहर चले गए हुए ... मल्लब ...?"

पिरिया को उसके कम्प्यूटर क्लास में आने और वहां आना अचानक बंद कर देने की तफसीलें पिरिया जानती थी. पिरिया की इतनी सी बात से परमौत के भीतर आत्मविश्वास लौटा और उसने झूठ बोला दिया - "घर में काम बहुत ज्यादे होता था ना. कम्पूटर के लिए टैम निकलना मुस्किल पड़ रा था. तो ... बस ऐसे ई ..."

परमौत ने देखा मोची की निगाहें उन दोनों पर थीं और उसने पिरिया की चप्पल नीचे रख दी थी. परमौत को अपनी ओर देखता वह थोड़ा सा झेंप गया और पिरिया से बोला - "मेमसाब जा को सुलोचन से चिपका दूं या कील माद्दूं? बेसे सुलोचन से जादा पक्का चिपकेगा ..."

"अरे भैया जो करना है जल्दी करो ... मुजको क्लास के लिए देर हो रई ... इम्त्यान बी है आज ..." पिरिया एक पल को परमौत को भूल कर फिर से घड़ी को तकने लगी.

"अरे आज इम्त्यान है तुमारा? पैले नी बताया ..." परमौत ने हिम्मत जुटाते हुए कहा और मोची से मुखातिब होकर बरेली वाली हिन्दी में बोला - "भौत सयाना ना बनो वस्ताद ... जित्ता मैडम कै री हैं बो कद्दो जल्दी से पेले. आई समन्में? के ना आ रई? और जे कील कौन ठोका करे है चप्पल में ... सुलोचन लगाओ सुलोचन ..."

इसके बाद उसने अभिभावकों वाली पोज़ बनाकर पिरिया से कहा - "मैं छोड़ दूंगा गाड़ी से तुमको. अबी भौत टैम बाकी है चार बजने में ..."

"ना ना आप इतनी मुस्किल मत करो अपने लिए ... मैं रिक्से से चली जाऊंगी ... गरम गजब्बी हो रहा कहा बाब्बा हो ..."

"अब यहाँ ऐसे घाम में जो मिल रा रिक्सा तुमको ... मैं छोड़ दूंगा ... उसी तरफ जा रा मैं वैसे बी ..."

परमौत ने पिरिया के मुंह से "हां-ना" जैसा कुछ सुना और उसे उसकी सहमति समझ कर मोची को डायरेक्शन देने लगा - "अब ये सुलोचन लगा रिये हो कि बादाम का तेल वस्ताद ... और जे उंगली घुस पागी इत्ते से में ... जरा तमीज से करो ... हाँ नईं तो ... "

परमौत ने अचानक पाया कि पिरिया एकटक उसे देखे जा रही है. वह थोड़ा असहज होकर बोला - "आजकल हर कोई शॉर्टकट के चक्कर में रैता है ना इसलिए बताना पड़ता है ..."

अब पिरिया ने मोची के हाथों को और परमौत ने चोर निगाहों से पुराने अखबार पर धरे पिरिया के नंगे पाँव को देखना शुरू किया. पिरिया के पैर दुनिया के सबसे खूबसूरत पैर थे. पिरिया ने उनके नाखूनों पर सुनहरी रंगत वाली नेलपॉलिश लगा रखी थी. परमौत के भीतर एक मीठा सा दर्द उभरना शुरू हो गया. मोहब्बत के इस अचानक हुए हमले से उबरने की कोशिश करने की चेष्टा करते हुए परमौत ने पिरिया से पूछा - "हुआ क्या था? और वो बी ऐसे गरम में ..."

"अरे कुच्छ नईं ... वो ज़रा सैण्डिल की हील में से कील बुड़ री थी अचानक से ..." उसने झुक कर अखबार में धरा पैर उठाकर अपने हाथों से थाम कर उठाया और तलुवे को टेढ़ा मोड़कर उसे दिखाते हुए कहा - "खून जैसा निकल गया कहा ... स्स्स ..."

परमौत की निगाह पिरिया के दाएं पैर के संगमरमरी तलुवे से चिपक गयी. हील चुभने से सुई की नोंक के बराबर एक लाल फुंसी जैसी उभर आई थी. तलुवा देखने के चक्कर में दोनों काफी नज़दीक आ गए और एक पल के हजारवें हिस्से के लिए परमौत ने पिरिया की भीनी-भीनी आभिजात्यभरी खुशबू सूंघी. उसी मीठे दर्द के फिर से उभरने ने परमौत को वापस धरती पर ला खड़ा किया.

पिरिया ने चप्पल पहनी, मोची को पेमेंट किया और "चलें फिर ..." कहकर परमौत के मोपेड को स्टैंड से उतारने का इंतज़ार करने लगी.

अगले कुल जमा आठ-नौ मिनट का अंतराल परमौत की तब तक जी गयी ज़िंदगी से सबसे मूल्यवान और अविस्मरणीय समय बन गया था. उसे मालूम नहीं था कि इन मिनटों की एक-एक डिटेल कितने गहरे उसके अस्तित्व के सबसे भीतरी और सबसे गुप्त ठिकानों पर काबिज़ होती जा रही थी. इन मिनटों में सारी कायनात में केवल परमौत था और उसकी मोपेड पर बैठी पिरिया थी. हल्द्वानी की सारी सड़कें वीरान हो चुकी थीं. सारे लोग या तो गायब हो चुके थे या मर गए थे. चालीस डिग्री की गर्मी पहाड़ी बयार में तब्दील हो गयी थी और पिरिया की नशीली खुशबू का आवरण परमौत की आत्मा को अपने सम्मोहनकारी घेरे में गिरफ्तार कर चुका था.

"थैंक्यू हाँ ..." कम्प्यूटर क्लास पहुँच कर पिरिया ने मोपेड पर बैठे बैठे ही कहा - "आपका नाम प्रमोद है ना ...?"

"हाँ हाँ परमौत ही है ... और तुमारा नाम क्या हुआ ...?"

"ल्लै ... अब आपको मेरा नाम बी पता नईं हुआ. क्लाश में नहीं आओगे तो ऐसा ही होने वाला हुआ. प्रिया जोसी हुई मैं वैसे ... अच्छा थैंक्यू हाँ ..." पिरिया ने "... ओईजा ... इजा वे ..." कहते हुए अपना घायल पैर धरती पर धरा और नकली लचकती हुई क्लास की तरफ जाने लगी.

किसी मन्त्र से बद्ध सम्मोहित हिरन जैसा परमौत पिरिया को जाता हुआ देख रहा था कि वह अचानक मुड़ी और उसने अपनी सुन्दर दन्तपांती को खोलकर "बा...ई ... " कहा और जीने की सीढ़ियों पर अदृश्य हो गयी.

परमौत जैसे मौसम की पहली सौंधी बारिश में भीग रहा था. उसे हाल में घटी ऐतिहासिक घटना का भान हुआ तो वह झेंपता सा आसपास देखने लगा. उसे मोपेड की साइड में गिरा हुआ पिरिया का रूमाल नज़र आया. उसने झटपट किसी चोर की तरह उसे जेब के हवाले किया. मोपेड स्टार्ट कर वह जैसे ही थोड़ी सी सुरक्षित टेरिटरी में आया उसने एक हाथ से रूमाल निकाला और उससे आ रही पसीने और परफ्यूम की मिलीजुली गंध को भरपूर सूंघा. उसका मन अपनी गोदाम मंडली को गले से लगाकर जोर से चिल्लाने का हुआ - "आत्तो पाल्टी होगी!"

(जारी)

2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

:) पाल्टी । बढ़िया ।

Nivedita Bhavsar said...

Enter your comment...behadddd pyaari... bade dino baad parhna naseeb hui hai....