Monday, July 24, 2017

कुकाट पाण्डे जी और अ थिंग ऑफ़ ब्यूटी


वे बूढ़े, खब्ती और चाटू थे और  हमारे मोहल्ले में स्थाई रूप से बसने की मंशा रखते थे. इस प्रयोजन से उन्होंने हमारी गली के एक खाली मकान को किराए पर ले रखा था. दो गली छोड़कर उनका एक प्लाट था जिस पर उन्होंने मकान बनाना था. मेरे मोहल्ले में बसने की आवश्यक अर्हता भी उनके पास थी यानी वे एक अवकाशप्राप्त अफसर भी थे. बीस साल की क्लर्की और बीस ही साल की छोटी-मोटी अफसरी करने के बाद जब वे बकौल उनके "हुड्ड प्लेन्स वालों के नगर" रायबरेली से रिटायर हुए तो मध्यवर्गीय पहाड़ी समुदाय द्वारा स्थापित की गयी नई परंपरा के प्रति सम्मान और अपनी संतति के प्रति कर्तव्यनिष्ठता दिखाते हुए उन्होंने हल्द्वानी का रुख किया था. "दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ" वाली मिर्ज़ा ग़ालिब की हिदायत को गाँठ बांधकर उन्होंने बेहद ईमानदारी से नौकरी की थी अर्थात रिश्वत का एक भी पैसा नहीं कमाया था. अपने इस गुण के चलते उन्हें अक्सर अपने दोनों बेरोज़गार बेटों के कोप का भाजन बनना पड़ता था कि पापा ने कुछ नहीं किया. बेटों के अनुराग के इस अतिरेक के चलते उनके बीच में स्थाई अबोला था. 

अंग्रेजों के ज़माने में उन्होंने बीए कर रखा था. अंग्रेज़ी में एमए सेकेण्ड ईयर कर रहे थे कि उनकी नौकरी लग गयी. किराए के घर में प्रवेश करते ही रसोई तक जमाये जाने से पहले उनके नाम की तख्ती घर के बाहर ठोकी गयी - "पं. धरणीधर पाण्डे, बीए, एमए (फ़र्स्ट ईयर, अंग्रेज़ी), अवकाशप्राप्त पी.सी.एस." इस तख्ती का ऐसा प्रताप रहा कि मोहल्ले में पहले से बसे दो-एक दर्ज़न उन्हीं जैसे अवकाशप्राप्त अफसरों  ने उन्हें तुरंत स्वीकार कर लिए जाने लायक मान लिया. घर आये मेहमानों को वे अक्सर आगरा, बिजनौर, नागथाट, बलिया, कानपुर और प्रतापगढ़ के अपने दफ्तरों के देसी सहकर्मियों के किस्से सुनाया करते थे. किस्से खासे दिलचस्प होते थे लेकिन उनकी बारम्बारता और उबाऊ विवरणों ने उन्हें मोहल्ले में ऐसी कीर्ति प्रदान की की महीने भर के बाद लोगों ने उनके घर की तरफ निकलना बंद कर दिया. इसी दरम्यान उन्हें कुकाट पाण्डे की उपाधि से भी सुशोभित किया जा चुका था.

उनका छोटा बेटा मनोज मेरा हमउम्र था और उससे नज़दीकी बनने में ज़्यादा देर नहीं लगी. नतीजतन मेरा उसके घर में आना-जाना शुरू हो गया. मनोज बीटेक की पढ़ाई बीच में छोड़ आया था और फिलहाल कुछ नहीं करता था. खूब लम्बी, घनी और अस्तव्यस्त रहने वाली दाढ़ी का स्वामी उनका बड़ा बेटा नीरज खैनी और हस्तमैथुन की मदद से सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा था. उसके गद्दे के नीचे खैनी की बेशुमार खाई-अधखाई पुड़ियों और 'डेबोनेयर' सरीखी मैग्जीनों लाजवाब संग्रह रहता था. मैंने खुद एमए अंग्रेज़ी में दाखिला ले रखा था और यही तथ्य इन लड़कों के पिता अर्थात बाप से मेरे पहले संवाद का सबब बना. 

मनोज के पिता अर्थात पंडित धरणीधर पाण्डे, बीए, एमए (फ़र्स्ट ईयर, अंग्रेज़ी), अवकाशप्राप्त पी.सी.एस उर्फ़ कुकाट पाण्डे से मेरा पहला सामना उन्हीं के घर में हुआ जब मैं नीरज के गद्दे के नीचे से चोरी की गयी डेबोनेयर की एक प्रति को कमीज़ के नीचे पेट में अड़ा कर बरामदे से बाहर निकल रहा था. 

"संजुवा अपनी माँ को बता रहा था कि एमए इंग्लिश करते हो तुम सुना ..." उनके सवालिया स्वर में थोड़ी सी हिकारत भी सुनाई पड़ी कि बेटा तुम क्या खा के करोगे अंग्रेज़ी में एमए.

"जी अंकल" मुझे घबराहट हुई कि कहीं पेट में अड़ाई गयी मैगजीन खेल खराब न कर दे. मैंने सांस खींच कर पेट भीतर किया और बाहर निकलने को हुआ.

"बैठो दो मिनट ... जल्दी काहे की है! फ़र्स्ट ईयर तो मैंने भी किया था सन पैंतालीस में फिर जो है नौकरी लग गयी ..." उन्होंने सामने धरी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा.

मुझे बैठना पड़ा.

"कीट्स पढ़ लिया?"

"जी"

"बायरन?"

"जी वो कोर्स में नहीं है."

"कोर्स में नहीं है तो क्या ... बायरन के बिना कैसे एमए कर लोगे यार ... हैं? ... शैली पढ़ लिया?"

"जी अभी शुरू नहीं किया ..."

"अच्छा ..." कहकर उन्होंने एक लम्बी डकार ली और मटमैली हो चुकी बंडी से बमुश्किल ढँक पा रहे अपने स्थूल उदर पर हाथ फेरा और एक कुटिल निगाह मुझ पर डाली. मैंने गौर किया उनकी नाक पर एक बड़ा सा फोड़ेनुमा मस्सा था जिसकी ऊर्ध्वाधर बैलेंसिंग करने के लिए वे दक्षिण भारतीय शैली का रोली-चन्दन वाला टीका लगाया करते थे. "कीट्स के बारे में क्या जानते हो? ... कोर्स में क्या-क्या है?"

मैंने एकाध कविताओं के टाइटल बता दिए.

"हूँ ..." कुछ देर चुप रहकर उन्होंने कहना शुरू किया "ये जो कीट्स था ना बिचारा गज़ब जीनियस था. वैसे ही जीनियस हुए ठहरे बायरन और शैली भी. तो ... जीनियसों को जो है भगवान जल्दी अपने पास बुला लेता है. तीनों बिचारों को भी बुला लिया. बीस-बीस-पच्चीस-पच्चीस साल में मर गए हुए तीनों ..." उन्होंने लम्बी सांस भर कर छत की तरफ निगाह डाली और बोले "ज़रा सोचो कीट्स, बायरन और शैली सत्तर-अस्सी साल तक जिन्दे रहते तो कितनी किताबें लिख गए होते ... ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फॉर एभर ...आहा! ..." वे अपने आप में खो गए लगते थे "... क्या बात है साली ... ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फॉर एभर ...आहा! ... आहा! ..." उनका एकालाप अंततः उनके सन पैंतालीस में अंग्रेज़ी में फ़र्स्ट ईयर कर चुके होने पर निबटा.

मैं उनके अंग्रेज़ी ज्ञान से प्रभावित और आतंकित होकर बाहर निकला. मुझे लगा मनोज और नीरज बेवजह अपने पिताजी से इतना चिढ़े रहते हैं. उनसे दूसरी मुलाक़ात अगले ही दिन हुई. मनोज के मामा भी रिटायर होकर पिछले साल हल्द्वानी आकर बस गए थे और उनके घर आए हुए थे. जब मैं मनोज के साथ उसके कमरे की तरफ बढ़ रहा था तो अंकल ने मुझे रोक लिया और वहीं बिठाकर मेरा परिचय कराने लगे "आगे वो पंडिज्जी नहीं रहते? उन्हीं का लड़का है ये ... नैनीताल से एमए कर रहा है अंग्रेजी में ..."

उनकी बातों का बाधित सिलसिला शुरू हुआ तो पता चला कि हल्द्वानी के कूड़ा-प्रबंधन पर बहस चल रही थी. पंद्रह मिनट तक मामाजी ने अपने मोहल्ले की बेकाबू बढ़ती आबादी, उसके कूड़ा-निस्तारण की समस्या और नगरपालिका की अकर्मण्यता पर विचार व्यक्त किये. मैंने भी एकाध दफ़ा हाँ-हूँ की.

"हूँ ... क्या होता है कूड़ा? हैं? ... क्या होता है कूड़ा? बताओ!" कुकाट अंकल ने वार्तालाप में निर्णायक तरीके से कूदते हुए कहना शुरू किया - "साला सब कुछ कूड़ा कर दिया है इस गवर्मेंट ने ... अरे एजूकेशन को ले लो ... वहां नहीं है कूड़ा ... बिचारे कीट्स, शैली, बायरन मर गए बीस-बीस-पच्चीस-पच्चीस साल की उमर में तब तो इंग्लैण्ड जैसे देश तक में इतना कूड़ा लिख गए लोग ... सोचो अगर सत्तर-अस्सी साल तक जिन्दे रहते बिचारे तो ... ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फॉर एभर ...आहा! "

इस निपट बेसिरपैर के तर्क और रिपीट कीट्स, शैली, बायरन ने मुझे सन पैंतालीस में एम ए फ़र्स्ट ईयर इंग्लिश कर चुके मनोज के बाप को लेकर अपने विचार बदलने को विवश किया. जैसे-तैसे बचकर भागा.

उसके बाद वे जहां भी मुझे देख लेते अपने पास बुला लेते. इंदिरा गांधी के मर्डर से हल्द्वानी में बरसातों में फैलने वाली पेचिश और कहाँ की जलेबी बेहतर होती है से विव रिचर्ड्स के कवर ड्राइव तक किसी भी विषय से तक पहुंचता हुआ आवारा वार्तालाप अंततः कीट्स, शैली और बायरन की अकाल मौतों के ज़िक्र से होता हुआ उनकी उसी कल्पना पर ठहरता कि इन जीनियस कवियों के सत्तर-अस्सी साल जी चुकने की स्थिति में दुनिया कैसी होती.

महीने-डेढ़ महीने के बाद इस चाट-कार्यक्रम से बचने का इकलौता उपाय मेरे पास यह बचा था कि या तो मैं उनके सामने पडूं ही नहीं और बदकिस्मती से ऐसा हो जाय तो उनके आगे हां-हूँ से आगे न बढूँ. लेकिन वे चाट के महासागर थे और किसी न किसी विषय के बहाने से कीट्स, शैली, बायरन और एम ए फ़र्स्ट ईयर इंग्लिश पर आकर थमते.

उनके अंग्रेज़ी ज्ञान से प्रभावित होकर एक दिन पड़ोस के एक सज्जन अपनी हाईस्कूल में पढ़ने वाली बेटी को लेकर उनके पास पहुंचे कि पाण्डे जी बच्ची इंग्लिश में कमज़ोर है, कभी पढ़ा दीजिएगा बिचारी को. उन्होंने ट्यूशन से होने वाली हानियों को लेकर इस पड़ोसी को लंबा लेक्चर दिया और बताया कि कीट्स, शैली, बायरन ने कभी ट्यूशन नहीं पढ़ा और अमर हो गए. पड़ोसी के जाते ही वे अपनी पत्नी से मुखातिब होकर बोले - "देख रही हो साले ठाकुरों के बच्चे भी कीट्स, शैली, बायरन पढ़ने के सपने देखने लग गए अब! ... ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फॉर एभर ...आहा!"

पंडित धरणीधर पाण्डे, बीए, एमए (फ़र्स्ट ईयर, अंग्रेज़ी), अवकाशप्राप्त पी.सी.एस का अपना अस्तित्व इन तीन युवा अँगरेज़ कवियों के जल्दी मर जाने से ऐसा ओतप्रोत था कि उनके घर में अक्सर घटने वाले के हर अनिष्ट के लिए इन्हीं को ज़िम्मेदार माना जा सकता था.

मोहल्ले में आये छः माह बीतने के बाद भी उनके घर का निर्माण शुरू ही नहीं हो पा रहा था क्योंकि जब-जब नक़्शे की बात चलती कुकाट अंकल कहते - "अरे इस साली सभ्यता ने दीवारें बहुत बना दी हैं. मेरा घर जो है ऐसा होगा कि उसमें बस एक बड़ा हॉल बनाया जाएगा और कुछ नहीं. सोने के लिए इसी हॉल में सबके अपने-अपने हिस्से होंगे, अपनी-अपनी खाट होगी और बाकी टाइम सब लोग खुशी-ग़मी एक साथ करेंगे. अरे बातचीत भी कोई चीज होती है ... है कि नहीं! ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी इज अ जॉय फॉर एभर ...आहा! ..." इधर वे घर आये किसी अभागे मेहमान को अपना घर-दर्शन चटा रहे होते उधर इन बातों को हज़ारवीं  दफा सुन रही पत्नी रसोई में बर्तनों को और नीरज अपने कमरे की किताबों को फर्श पर पटकना शुरू कर देते. अंततः कीट्स, शैली, बायरन और एम ए फ़र्स्ट ईयर इंग्लिश जैसे विषयों पर पीएचडी कर चुकने के बाद ही दुबारा उस घर की तरफ फूटी आँख न करने का संकल्प लिए पड़ोसी अपने घर वापस लौट पाता था.

मनोज को बंगलौर में नौकरी मिल गयी तो वह चला गया. मैंने भी ज़्यादातर समय हल्द्वानी के बाहर बिताना शुरू कर दिया. स्मृति के कोनों में गहरे धंसे बैठे धरणीधर पाण्डे कुछ दिन भयाक्रांत करते रहे फिर अदृश्य हो गए. बाद में पता चला वे हमारी गली छोड़ कर अपने प्लाट वाली गली के किसी खाली मकान में चले गए थे. सुनकर जान बची सो लाखों पाए टाइप की फीलिंग आई.

बीस-पच्चीस साल तक उनकी कोई खबर नहीं थी. तीन साल पहले मनोज हल्द्वानी में टकरा गया. उसने बताया कुछ साल पहले उसके पिताजी गुज़र गए और माँ पिछली बरसातों में भगवान की प्यारी हुईं.  नीरज ने दिल्ली में एक एक्सपोर्ट हाउस में नौकरी कर ली थी और खुद मनोज अमेरिका सेटल हो गया था. पिताजी का ज़िक्र चलने पर वह थोड़ा सा उदास हुआ लेकिन उसकी उदासी में मौजूद गहरी खीझ की तलछट का अहसास हो जाता था. उसने आगे बताया कि वह पिताजी द्वारा बनाए गए मकान का सौदा तय करने की नीयत से हल्द्वानी आया है और हफ्ते भर में अमेरिका लौट जाएगा. मैंने घर की बाबत उन दिनों होने वाले वाद-विवादों को याद करते हुए उस से थोड़ी मसखरी करने की कोशिश की तो फटते हुए उसने कहा - "बाप थे तो हमारे बड़े खूसट यार ... चल तुझे दिखा के लाता हूँ उनका ताजमहल."

वर्षों से खाली पड़े दिख रहे घर के गेट के बाहर वही पुरानी तख्ती लगी थी. घर का प्रवेशद्वार किसी गैरेज के गेट जैसा चौड़ा और ऊंचा था. दरवाज़ा खोला गया तो पंडित धरणीधर पाण्डे, बीए, एमए (फ़र्स्ट ईयर, अंग्रेज़ी), अवकाशप्राप्त पी.सी.एस के सपनों का घर सामने था - बिल्कुल जैसा वे चाहते थे वैसा. एक विशाल हॉल था जिसकी दीवारों पर तमाम खूँटियाँ ठुकी हुई थीं. ताले लगे चार बड़े-बड़े संदूक थे जिनमें घर का सामान भरा हुआ था. दीवारों से लगाकर चार तखत खड़े  किये गए थे. एक कोना देख कर मुझे दिलचस्पी हुई. वह मंदिर था और उसे ज़रा भी डिस्टर्ब नहीं किया गया था.

मैं मंदिर के विवरणों को देखने झुका तो मनोज कह रहा था - "एक सरदार से बात फाइनल हो गयी है. अपना गोदाम बनाने वाला है वो यहाँ ... हत्या कटेगी साली!"

मंदिर में प्रतिष्ठित देवी-देवताओं के असंख्य कैलेंडरों, चित्रों, सस्ती मूर्तियों, पूजा-पाठ के सामान के बीच एक तरफ धूल से ढंके फ्रेम में अक्षत-पिठ्या लगे हुए कुकाट पाण्डे जी की फोटो लगी थी. दूसरी तरफ तीन ऐसे ही अक्षत-पिठ्या लगे हुए फ्रेम और थे जिनमें कीट्स, शैली और बायरन प्रतिष्ठित थे. 

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

क्या बात है । उम्दा।

raj upreti said...

Wow beautiful story, heart touching.

raj upreti said...

Wow beautiful story, heart touching.