
इन्दौर के प्रमुख दैनिक नईदुनिया में आज कुमार जी को उनकी 18वीं बरसी पर याद किया है जिसे क़लमबध्द किया है जीवनसिंह ठाकुर ने. लिखने पढ़ने वालों की बिरादरी में जीवनसिंह जी का नाम अपरिचित नहीं है. वे कुमारजी की कर्मस्थली देवास में ही रहते हैं और कुमारजी के निवास भानुकुल से बरसों से जुड़े है. मुझे लगा कि कुमारजी के मुरीदों तक यह शब्द-चित्र पहुँचना ही चाहिये इसलिये इसे जारी कर रहा हूँ.
मुझे ठंड की शाम और रात सदा से ही अच्छी लगती है। सूनी सड़कों पर घूमना बहुत ही सुकून भरा अहसास होता है। मौसम के ये अवसर मैंने कभी नहीं छोड़े और कभी छूट भी गए तो अफ़सोस का साया इतना घना होता है कि आने वाली रात के इंतज़ार में दॉंत कटकटाने लगते हैं। 11 जनवरी को भी उसी सर्द रात में घूम कर लौटा थाऔर 12 जनवरी की सुबह बेहद सर्द और बर्फ़बारी के साथ लौटी थी। 12 जनवरी 1992 की सुबह पंडित कुमार गंधर्व प्रभाती में या भैरवी के अंत में - प्रभाती की शुरूआत की बेला में एक स्थाई गुनगुनाहट देकर कहीं दूर चले गए थे। जहॉं से उन्हें कोई राग, कोई अलाप, कोई पुकार वापस नहीं ला सकती थी।
पूरे अठ्ठारह बरस हो गए हैं कुमार गंधर्व हमारे बीच नहीं हैं। हालॉंकि उस दिन भी जब उनके पार्थिव शरीर को कंधों पर लिए भारी मन-मस्तिष्क से ले जा रहे थे ऐसा लगा नहीं था कि यह अंतिम यात्रा है। हमें इसे सिर्फ़ यात्रा ही रहने देना चाहते थे। उस दिन अंतिम शब्द को अपने पास फटकने भी नहीं देना चाहते थे। लेकिन चाहने न चाहने के बीच कुदरत अपने नियम का पालन कर रही थी। हम सभी निहत्थे उस नियम को अपने तरीके से काम करते देख रहे थे। वापस लौटे तो भानुकूल के सन्नाटे में शांति तो थी लेकिन रिक्तता नहीं थी। जिस सच्चाई से हम रूबरू हुए थे वह सच्चाई भानुकूल के बाहर कहीं रह गई थी। ऐसा लगा कुमारजी वहीं कहीं है। वही झूला हल्का सा कंपकपाता हुआ। जैसे कुमारजी बस अभी-अभी उठ कर अंदर गए हों या बस आने ही वाले हों ... आज अठ्ठारह बरस गुजर चुके हैं, लेकिन भानुकूल में कभी लगा ही नहीं कि कुमारजी नहीं हैं। वही जीवंतता, वही उपस्थिति का अहसास, वही बालसुलभ भोली निर्दोष आवाज़ ... जैसे दूर से घुँघरुओं की रुनझुन-रुनझुन की तरह सुनाई देती है। कुमारजी कहीं गए नहीं वे इन्हीं हवाओं में इन्हीं शब्दों में उल्हास और उदासियों में ठहाकों और मुस्कुराहटों में हैं। इंसान चला जाता है कुछ घंटों में, कुछ दिन में उसे भुला दिया जाता है। या व़क़्त की गहरी धूल में दब जाता है। लेकिन कुमार गंधर्व यानी बाबा इन अठ्ठारह बरसों में लोगों में निरंतर जिज्ञासा बने रहे। कुमारजी जैसे काल पर विजय प्राप्त करके कालजयी हो गए हों। आज भी 12 जनवरी 2010 है, अठ्ठारह बरस का लम्बा फ़ासला है। हम जब भी भानुकूल गए झूला कभी खाली नहीं लगा। बहन कलापिनी (कुमारजी की बेटी) अंदर से आकर चाय का कप थमाती हैं तो भाई भुवनेश (कुमारजी का सुपौत्र) पानी का गिलास... फिर लगता है जैसे कोई भोली-सी आवाज़ में कह गया- बैठिये। मैं चौंक कर झूले की तरफ़ देखता हूँ, फिर अंदर उनके कमरे में जहॉं बिस्तर पर कुछ फूल पड़े हैं। ताई वसुंधरा (कुमारजी की जीवन और संगीत सहचरी) स्नेहिल हमारा हालचाल पूछती हैं। जो गया उसकी पीड़ा सालती तो है, लेकिन पीड़ा और पीड़ा के अहसास की क्यारियों में आँसुओं के नम, कोमल फूल खिले हैं। उन पर यादों की तितलियॉं बैठती है। कुछ गंध हवाओं में फैली हैऔर एक स्मृति का आँचल आसपास ममतालु लिपट जाता है कुमारजी यहीं हैं...यहीं है...।
(सुनिये कुमार जी की ये दो कालजयी रचनाएं:)
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो:
निरभय निरगुन गुण रे गाऊंगा: