कुल्लू मे पिछले दिनो कौन सा बड़ा ईवेंट हुआ ? कोई पूछे तो एक सहज उत्तर होगा -- दशहरा ! अंतर्राष्ट्रीय लोक नृत्य उत्सव । श्री रघुनाथ भगवान जी की रथ यात्रा, राजा जी की पालकी और 365 देवताओं का उन्माद पूर्ण महा मिलन । सरकारी प्रदर्शनियाँ और गैर सरकारी वेराईटी शोज़. गगन चुम्बी हंडोले और भीमकाय *डॉम्ज़* । अचार से ले कर कार तक का कारोबार . शहरों से आये हज़ारों दुकानदार और गाँवों से उतरे लाखों किसान . छोटे मोटे उत्पादों के बड़े बड़े खरीददार और बड़े बड़े उत्पादों के छोटे मोटे खरीद दार . करोड़ों के वारे न्यारे , अरबों का घमासान ! सच पूछो तो इस कस्बानुमा पहाड़ी शहर के लिए दशहरा एक महत्वपूर्ण ईवेंट होता है. एक बड़ा नाटक , जिस का स्थानीय लोग साल भर बेसब्री से इंतज़ार करते हैं , और जिस की खुमार मे साल के बाक़ी बचे दिन आराम से गुज़ार लेते हैं । चींटी को *कण* , हाथी को *मण* ...........इस महा उत्सव मे जिस को जो चाहिए वो मिलता है.
लेकिन जैसा कि प्रायः हर *ग्रो* करते हुए शहर के साथ होता है , चन्द असंतुष्ट लोग यहाँ भी छूट ही जाते हैं जिन्हे उनकी मनचाही खुराक नही मिल पाती. मैं भी उन खब्ती लोगों मे से एक हूँ . अव्वल तो इस ड्रामे में शामिल होने आता ही नही ; गलती से आ भी जाता हूँ तो साल भर पछ्ताता रहता हूँ. और आज यह पोस्ट इस लिए लिख रहा हूँ कि आप सब से यह शेयर कर सकूँ कि इस बार मैं कुल्लू आ कर नहीं पछताया।
वह इस लिए कि ढाल पुर मैदान के एक कोने मे इस हाहाकारी महानाटक के ठीक समानंतर बहुत गुपचुप एक शदीद नाटक और चल रहा था। विजय दान देथा की चर्चित कहानी पर आधारित नाटक --" नागिन तेरा वंश बढ़े" । यह नाटक स्थानीय कॉलेज मे आयोजित तीस दिनो के एक हेक्टिक वर्कशॉप मे तय्यार नाटकों मे से एक था . कॉलेज लाईब्रेरी की रीडिंग रूम को अस्थायी थियेटर मे कंवर्ट किया गया था। प्रकाश और ध्वनि प्रभावों का इतना सटीक इस्तेमाल कुल्लू के दर्शकों ने शायद पहली बार देखा . दो चार स्पॉट लाईट्स थे, दो म्यूज़िक एकम्पनिस्ट ; जिन्हो ने हर्मोनियम , सारंगी , ढोलक, तबला , और सिंबल्ज़ जैसे अति साधारण वाद्यों प्रयोग का बेहद कलात्मकता के साथ किया । युवा अभिनेताओं की अनगढ़ता को इन *टूल्ज़* के माध्यम से बहुत नफासत के साथ कवर किया गया। कॉस्ट्यूम मे एथनिक कुल्लुवी और राजस्थानी चीज़ों का कंट्रास्ट जादुई प्रभाव दिखा रहा था . यही प्रयोग संवाद मे भी नज़र आया. यह लगभग एक प्रोफेशनल क़िस्म काम था। बहुत व्यवस्थित, अनुशासित , और फोकस्ड. बहुत अद्भुत........ और मेरे लिए बहुत बड़ा ईवेंट . एक पवित्र उत्सव जैसा ।
इस उत्सव के देवी देवता थे स्थानीय कॉलेज के 32 मेधावी छात्र अभिनेता .केन्द्रीय पात्र नागिन की भूमिका मे ज्योति ने बहुत परिपक्व काम किया । एक अमेच्योर कलाकार की हैसियत से निश्चित तौर पर *फ्लॉलेस्*. मंच पर उस की उपस्थिति दर्शक को अनायास ही बाँध कर रख देती थी। कथा वाचक की भूमिका मे राज और सेठानी की भूमिका मे आरती की आवाज़ प्रभाव शाली थी मेधा और सुमित के अभिनय को भी दर्शकों ने खूब सराहा।
इस अनुष्ठान के रघुनाथ जी थे - NCERT (CIET wing) से सम्बद्ध पटकथा लेखक व रंगकर्मी अवतार साहनी । उन्हों ने स्वयं ही मूल कथा का नाट्य रूपांतरण किया , सम्वाद और गीत लिखे, संगीत भी कम्पोज़ किया। गीतों मे पश्चिमी हिन्दी क्षेत्र की लोक भाषा और लोक संगीत पूरा पूरा आस्वाद था. और पूरे शो मे साहनी जी की पर्सनल इंवॉल्वमेंट अभिभूत करने वाली थी। उन्होने बताया कि कुल्लू मे टेलेंट की कमी नहीं . सम्भावनाए अपार हैं. अलबत्ता हिन्दी उच्चारण, लहजे, और डिक्शन के मामले मे उन्हे काफी मशक्कत करनी पड़ी।
राजा की पालकी मे मुझे स्थानीय कॉलेज की प्रवक्ता रंगकर्मी बहस नाट्य एवम कला मंच की संस्थापक डॉ उरसेम लता नज़र आईं। उन्होंने बताया कि बिना कॉलेज की प्राचार्य डॉ. धनेश्वरी शर्मा और उनके अन्य सहकर्मियों , सोम नेगी , राकेश राणा और विशेष रूप से पुस्तकालयाध्यक्ष श्री रतन ठाकुर के सकारात्मक रवैये के यह वर्कशॉप सफल नही हो सकता था .
...और इस मेले मे अथाह मानवीय सम्वेदनाओं का कारोबार हुआ।
...और गहन जीवनानुभवों और विचारों का लेन देन हुआ।
...और कुल्लू का दर्शक विजयदान देथा जैसे कथाकार के काम से परिचित हुआ।
...और कुल्लू शहर श्री साहनी को उन के इस सार्थक योगदान के लिए याद करेगा .
