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Monday, October 8, 2012

एक आवाज़ पीछा करेगी


मख़दूम मोहिउद्दीन की एक नज़्म पढ़िए

लख्ते जिगर

मोहब्बत को तुम लाख फेंक आओ गहरे कुँए में
मगर एक आवाज़ पीछा करेगी
कभी चांदनी रात का गीत बन कर
कभी घुप अँधेरे की पगली हँसी बन के
पीछा करेगी

वो आवाज़ नाख्वास्ता तिफ़्लके-बेदर
एक दिन
सूलियों के सहारे
बनी-नौअ-इंसान का हादी बनी
फिर ख़ुदा बन गयी

कोई माँ
कई साल पहले
ज़माने के डर से
सर-ए-रहगुज़र
अपना लख्ते जिगर छोड़ आई
वो नाख्वास्ता तिफ़्लके-बेदर
एक दिन सूलियों के सहारे
बनी-नौअ-इंसान का हादी बना
फिर ख़ुदा बन गया

(नाख्वास्ता – अनिच्छित, तिफ़्लके-बेदर – बिना बाप का बच्चा, बनी-नौअ-इंसान – मानव जाति, हादी – रास्ता दिखाने वाला)

Monday, May 18, 2009

आप की याद आती रही रात भर

अपनी यह पसंदीदा ग़ज़ल १७ जनवरी २०००९ को 'कर्मनाशा' पर सुनवा चुका हूँ, एक बार फिर यहाँ पर । अपने दो प्रिय शायरों - फ़ैज़ और मखदूम की यह 'जुगलबंदी' अद्भुत है और बड़े कवियों के बड़प्पन का कालजयी उदाहरण भी। इसके बारे में कुछ और जानने के वास्ते यहाँ का फेरा लगा लें तो ठीक रहेगा, तो आइए सुनते है उस्ताद हामिद अली खान साहब के स्वर में - आप की याद आती रही रात भर...