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Saturday, June 13, 2015

ऐसी रातें भी हैं गुज़रीं मुझ पर : पाकिस्तान से आधुनिक कवितायेँ - 4


साए
मोहम्मद दीन तासीर 

ऐसी रातें भी कई गुज़री हैं
जब तेरी याद नहीं आई है
दर्द सीने में मचलता है मगर
लब से फ़रियाद नहीं आई है

हर गुनह सामने आ जाता है
जैसे तारीक चटानों की क़तार
न कोई हीला-ए-तेशा-कारी
न मदावा-ए-रिहाई न क़रार

ऐसी रातें भी हैं गुज़रीं मुझ पर
जब तेरी राहगुज़र के साए 
हर जगह चार तरफ़ थे छाये
कभी आये, कभी भागे
कभी भागे, कभी आये
तू न थी, तेरी तरह के साये
साए ही साए थे रक्साँ
मैं न था, मेरी तरह के साए 
साए ही साए थे लरजां लरजां
साए ही साए तेरी राहगुज़र के साए

ऐसी रातें भी कई गुज़री हैं
जब तेरी याद नहीं आई है

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अमृतसर ज़िले में १९०२ में जन्मे मोहम्मद दीन तासीर ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से एम.ए. और पीएचडी करने के बाद इस्लामिया कॉलेज, लाहौर में अध्यापन किया. वहीं वे प्रिंसिपल भी हुए. बाद में वे एम.ए.ओ. कॉलेज, अमृतसर के प्रिंसिपल हुए जिसके बाद उन्होंने सूचना और प्रसारण विभाग में नौकरी की. तासीर प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से थे लेकिन असल फितरत उनकी रोमांटिक की थी. इक़बाल और हफ़ीज़ जालंधरी का प्रभाव उनके कार्य पर साफ़ नज़र आता है. उनके कविता संचयन का शीर्षक था ‘आतिशकदा’. १९५० में इंतकाल हुआ.

Friday, June 12, 2015

सनमकदों में उजाले नहीं रहे कि जो थे : पाकिस्तान से आधुनिक कवितायेँ - 3

अमृतसर ज़िले में १९०२ में जन्मे मोहम्मद दीन तासीर ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से एम.ए. और पीएचडी करने के बाद इस्लामिया कॉलेज, लाहौर में अध्यापन किया. वहीं वे प्रिंसिपल भी हुए. बाद में वे एम.ए.ओ. कॉलेज, अमृतसर के प्रिंसिपल हुए जिसके बाद उन्होंने सूचना और प्रसारण विभाग में नौकरी की. तासीर प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से थे लेकिन असल फितरत उनकी रोमांटिक की थी. इक़बाल और हफ़ीज़ जालंधरी का प्रभाव उनके कार्य पर साफ़ नज़र आता है. उनके कविता संचयन का शीर्षक था ‘आतिशकदा’. १९५० में इंतकाल हुआ.


लन्दन की एक शाम
-   मोहम्मद दीन तासीर

ये रहगुज़र
ये ज़न-ओ-मर्द का हुजूम, ये शाम
फ़राज़-ए-कोह से जिस तरह नद्दियाँ सर पर
लिए हुए शफ़क़-आलूद बर्फ़ के पैकर
सफ़ेद झील की आगोश में सिमट जाएं
ये तुंद-गाम, सुबुक-सैर कारवाने-हयात
“न इब्तिदा की ख़बर है, न इंतिहा मालूम”
किधर से आए, किधर जा रहे हैं क्या मालूम-!

सुनहरी शाम
ये इरोज़ झिलमिलाता हुआ
बंधा हुआ है निशाना, खिंची हुई है कमां
किसे ये तीर लगेगा
कहाँ? यहाँ कि वहां-!

सुनहरी शाम
ये इरोज़ जगमगाता है
कोई हंसे, कोई रोये, ये मुस्कराता है
इसी मुकाम पे फिर लौट कर मैं आया हूँ
ये रहगुज़र, ये ज़न-ओ-मर्द का हुजूम, ये शाम
ये तुंद-गाम, सुबुक-सैर कारवाने-हयात
ये जौशे-रंग, ये तुग़याने-हुस्न के जलवे
यहीं के नूर से रौशन मेरी निगाहें हैं
ये शबाब की रौंदी हुई ये राहें हैं
वही मुक़ाम है लेकिन वही मुक़ाम नहीं
ये शाम तो है मगर वो सुनहरी शाम नहीं
वो रोब दाब नहीं
वो धूमधाम नहीं
वो मैं नहीं हूँ-     
कि उनका मैं अब गुलाम नहीं
सनमकदों में उजाले नहीं रहे कि जो थे
कि अब वो देखने वाले नहीं रहे कि जो थे


[ज़न-ओ-मर्द: स्त्री-पुरुष, फ़राज़-ए-कोह: पहाड़ की चोटी, शफ़क़-आलूद: ऊषा के रंग में रंगा हुआ, तुंद-गाम: तेज़ रफ़्तार, सुबुक-सैर: धीमा चलने वाला, कारवाने-हयात: ज़िन्दगी का कारवाँ, इरोज़: कामदेवता, जौशे-रंग: रंगों की तड़कभड़क, तुग़याने-हुस्न: सौन्दर्य का उफान,  सनमकदा: महबूब का घर]