Wednesday, March 13, 2013

मुझे बिल्लियाँ क्यों याद आती है जब मैं कहता हूँ मार्च



?

-ओरहान वेली 


जब मैं कहता हूँ बंदरगाह
मुझे क्यों याद आते हैं मस्तूल
और पाल जब मैं कहता हूँ ऊंची लहरें?

मुझे बिल्लियाँ क्यों याद आती है जब मैं कहता हूँ मार्च
और अधिकार जब कहता हूँ कामगार?
बूढ़ा घटवार*
क्यों कर लेता है ईश्वर पर विश्वास
बिना एक भी बार सोचे?

और हवादार दिनों में
क्यों आती है बारिश तिरछी होकर?

(*घटवार – कुमाऊँनी बोली में चक्की पीसने वाले के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द.)

Tuesday, March 12, 2013

ओरहान वेली का "झांसा"



झाँसा


मैं उबर चुका एक पिछली मोहब्बत से:
अब खूबसूरत हैं सारी स्त्रियाँ,
बिलकुल नई मेरी कमीज़,
मैंने नहाया
और दाढ़ी बनाई.
अब शांति है
हवा में वसंत,
धूप.
मैं सड़क पर हूँ; लोग प्रसन्न हैं;
मैं भी प्रसन्न हूँ. 

Monday, March 11, 2013

तुम्हारे रास्ते में, तुम्हारा स्वागत करने हाज़िर होंगीं मछलियाँ




१३ अप्रैल १९१४ को इस्तांबूल के बेकोज़ इलाके जन्मे तुर्की कवि ओरहान वेली ने ओक्तेय रिफात और मेलिह सेवदेत के साथ कविता के गरीब आंदोलन की स्थापना की थी.
ओरहान वेली के पिता प्रेसीडेंशियल सिम्फनी ओर्केस्ट्रा के संचालक थे जबकि छोटा भाई अदनान वेली पत्रकारिता के क्षेत्र में जाना माना नाम था. १९५२ में छपी अदनान की जेल डायरी ‘द प्रिज़न फ़ाउन्टेन’ खासी चर्चित रही. ओरहान वेली ने स्कूली शिक्षा अंकारा गाज़ी हाईस्कूल से ग्रहण की. उसके बाद वे इस्तांबूल विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र का अध्ययन करने गए लेकिन १९३५ में उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी.     
१९४५ से १९४७ तक शिक्षा मंत्रालय ने उन्हें बतौर अनुवादक नौकरी पर रखा. बाद में उन्होंने फ्रीलांस पत्रकार और अनुवादक की हैसियत से काम जारी रखा. १९४९ में उन्होंने ‘याप्राक’ नाम की एक साहित्यिक पत्रिका के प्रकाशन में सहायता की. कुल छत्तीस साल की आयु में ब्रेन हैमरेज से उनका देहांत हुआ जब अत्यधिक नशे की हालत में वे एक गड्ढे में गिरे पाए गए थे.
गरीब आंदोलन समूह को तुर्की का पहला नया आंदोलन भी कहा गया. हाईस्कूल के समय से ही दोस्त रहे इन तीनों ने तत्कालीन तुर्की कविता और साहित्य की पारम्परिक और ह्रासोन्मुख शैली को त्याग कर साधारण जन की भाषा को अपना माध्यम बनाया. इसके अलावा उस समय लोकप्रियता हासिल कर रहे सर्रियलिस्ट तत्वों को भी उन्होंने अपनी कविता में समाहित किया.
ओरहान वेली को एक ऐसी कविता का पक्षधर माना जाता है जिसमें शैलीगत तत्वों और विशेषणों की अति न हो और जो शैली में मुक्त छंद के नज़दीक हो. उनका अद्वितीय स्वर और उनकी कविता के तल में अवस्थित संवेदनाओं की गहराई उन्हें तुर्की जनता और अकादमिक दायरों का लाड़ला कवि बनाए हुए है..


आज से उनकी कविताओं की सीरीज़


आज़ादी की ओर

भोर से पहले
जब समुद्र तब भी होगा बर्फ़ीला-सफ़ेद, तुम अपनी यात्रा पर निकल पड़ोगे;
पतवारों की जकड़ तुम्हारी हथेलियों पर,
और दिल में तुम्हारे मशक्कत और जोश,
तुम निकल पड़ोगे.
जालों के लुढ़कने और डोलने के बीच निकल पड़ोगे तुम.
तुम्हारे रास्ते में, तुम्हारा स्वागत करने हाज़िर होंगीं मछलियाँ
तुम्हें आह्लाद से भरती हुईं.
जब तुम अपने जालों को झकझोरोगे
परत-दर-परत समुद्र यात्रा करता आएगा तुम्हारे हाथों में.
जब खामोशी चली आएगी समुद्री पक्षियों की आत्माओं में,
चट्टानों की कब्रगाह में,
अकस्मात
क्षितिज पर मचेगी अफरातफरी :
दौड़ती आएंगीं जलपरियाँ और चिड़ियाँ ...
जश्न और उत्सव, सामूहिक रति और त्यौहार,
बारातें, स्वांग करने वाली मंडलियां, ऐश, इशरत ...
वाह वा!
अब किस का इंतज़ार कर हो यार, कूद जाओ समुद्र में!
भूल जाओ पीछे कौन तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है.
तुम्हं दीखता नहीं : आज़ादी तुहारे चरों तरफ़ है.
खुद ही बन जाओ पाल, पतवार, मछली, पानी
और जाओ, जहां तक जा सकते हो जाओ. 

Thursday, March 7, 2013

बिना आवाज़ किए चीखती देहें



देहें

-अन्ना कामीएन्स्का

प्रेतों की तरह अदृश्य होती हैं देहें
नजर आना बंद कर देती हैं
उन्हें छू नहीं सकते, वे अनुपस्थित
बाथटबों में पाई जातीं
ग़श खातीं सड़कों पर
झूलती हुईं स्ट्रेचरों पर
हाथों में एक फोटोग्राफ के साथ विदा लेती हुईं
एक घड़ी सगाई की एक अंगूठी एक छतरी से मुक्त होती हुईं
सुहागरात के दिन जैसी सुन्दर
विवस्त्र
इस दफा वास्तव में वफादार
खामोशी कीं दोस्त
यानी उन चीज़ों की जो ख़ुद
एक सपने के बगल वाले दरवाज़े से
वापस लौट रही हैं
अचानक हर जगह मौजूद
बिना आवाज़ किए चीखती हुईं
सांत्वना के परे किसी भी लालसा में

Tuesday, March 5, 2013

एक भोर इतनी चमकीली बनाना लगे अब बची बहीं कोई यातना



एक प्रार्थना जिसका जवाब ज़रूर मिलेगा

-अन्ना कामीएन्स्का

ईश्वर मुझे सहन करने देना बहुत सारा
और फिर मर जाने देना

मुझे इजाज़त देना खामोशियों से होकर गुजरने की
किसी भी चीज़ को मेरे साथ लगे मत रहने देना,  भय को भी नहीं

दुनिया को चलते देने रहना जैसे यह चलती रही है
समुन्दर को चूमते रहने देना किनारा

घास को हरा बने रहने देना
ताकि एक नन्हे मेंढक को उसमें शरण मिल सके

जिसमें धंसा सके कोई अपना चेहरा
और जी भर रो सके

एक भोर इतनी चमकीली बनाना
लगे अब बची बहीं कोई यातना

बन जाने देना मेरी कविता को एक खिड़की का कांच
जिस पर अपना सिर पटकती है एक आवारा मक्खी

Saturday, March 2, 2013

लोन चाहिए फेसबुकिये को


प्यार करने के वास्ते कितनी हड़बड़ी की मैंने



अन्ना कामीएन्सका की कवितायेँ – २

ख़ाली जगहें

        लोगों को प्यार करने को जल्दी जल्दी चलो भाई”
                                        -यान त्वार्दोव्स्की

मैं किसी को प्यार कर ही नहीं पाई
अलबत्ता दौड़भाग बहुत की मैंने
ऐसा था जैसे मैंने फ़क़त ख़ाली जगहों से प्यार करना हो
बगैर आलिंगन के झूलती आस्तीनें
टोपी जिसे उसके सिर ने त्याग दिया हो
एक आरामकुर्सी जिसे खुद उठकर कमरे के बाहर निकल जाना चाहिए
किताबें जिन्हें अब कोई नहीं छूता
एक कंघा जिस पर छूटा रह गया एक चांदी बाल
पलंग जिनसे बड़े हो जाते हैं शिशु
गैरज़रूरी चीज़ों से भरी दराजें
सिरे पर चबाया गया पाइप
नंगे पाँव निकल गए एक पैर के
आकार के लिए बनाए गए जूते
फ़ोन का रिसीवर जहां आवाज़ें बन जाती हैं चुप्पियाँ
प्यार करने के वास्ते कितनी हड़बड़ी की मैंने
और ज़ाहिर है मैं प्यार कर ही नहीं सकी.


एक हस्पताल में

कोई खड़ा नहीं है
उस बूढ़ी औरत की बगल में
मर रही है जो एक गलियारे में

कितने ही दिन हो गए
छत को ताकती हुई वह
उँगलियों से कुछ लिख लिखती रहती है हवा में

न कोई आंसू हैं न  विलाप
न हाथों का ऐंठना
ड्यूटी पर तैनात नहीं पर्याप्त संख्या में फ़रिश्ते

कुछ मृत्युएँ होती हैं विनम्र और शांत
जैसे किसी भरी हुई ट्राम में
किसी ने त्याग दिया हो इस जगह को.





Friday, March 1, 2013

फेसबुक के कार्टून







बड़ी मज़ेदार बात है, चिड़िया ने कहा



अन्ना कामीएन्सका की कवितायेँ – १

अन्ना कामीएन्स्का (१२ अप्रैल १९२०- १० मई १९८६) नामी पोलिश कवयित्री, लेखिका, अनुवादक और साहित्य आलोचक थीं जिन्होंने बच्चों और किशोरों के लिए भी कई पुस्तकें लिखीं.

उनका जन्म क्रस्निसटो में हुआ था और बचपन में वे लंबे समय तक अपने दादा-दादी के साथ रहीं. पिता के असमय हुए देहांत के कारण घर की परवरिश का ज़िम्मा माँ पर पड़ा. अन्ना के अपनी पहली कवितायेँ १४ वर्ष की आयु में रचीं. १९३७ में उन्होंने वारसा के पेडागोगिकल स्कूल में पढ़ना शुरू किया लेकिन नाजी समय में उन्हें वापस लौटना पड़ा. लुब्लिन के एक कालेज से ग्रेजुएट होने के बाद उन्होंने शास्त्रीय दर्शनशास्त्र पढ़ना शुरू किया – शुरू में लुब्लिन की कैथोलिक यूनिवर्सिटी में और उसके बाद लोड्ज यूनिवर्सिटी में.

अन्ना सांस्कृतिक साप्ताहिक पत्रिका “कंट्री” से जुडी रहीं जिसका उन्होंने १९४६ से १९५३ तक संपादन किया. “न्यू कल्चर” नामक एक और साप्ताहिक का संपादन उन्होंने १९५० से १९६३ तक किया. १९४८ में उन्होंने कवि, अनुवादक यान स्पीवाक से शादी की. उनके दो बेटे हुए जिन्होंने कालांतर में पोलैंड के साहित्यिक और शैक्षिक संसार में खासा नाम कमाया.

अन्ना और यान ने मिलकर रूसी कविता और नाटकों के अनुवादों पर काम किया और कई किताबों का संपादन भी. १९६७ में यान को कैसर हो गया और उसी साल २२ दिसंबर को उनका देहांत हो गया. अन्ना ने अपना ध्यान ईसाई दर्शन की तरफ मोड़ दिया जिसका असर उनकी बाद की कविताओं में मिलता है. वारसा में १० मई १९८६ को उनका स्वर्गवास हुआ.

उन्होंने कविताओं की पन्द्रह किताबें लिखने के अलावा स्लाविक, हिब्रू, लैटिन और फ्रेंच से कई ग्रंथों का अनुवाद किया. उनकी कविताओं में तार्किकता और धार्मिक विश्वास के दरम्यान होने वाले अंतरसंघर्ष दर्ज है. वे अकेलेपन और अनिश्चितता को सीधे संवेदनाहीन तरीके से संबोधित करती हैं. प्रेम, दुःख और प्रेम की कामना जैसे विषयों का अनुसंधान करती हुई उनकी कविता फिर भी एक खामोश ह्यूमर नज़र आता है. उनकी कविताओं में यहूदी संस्कृति और नाज़ी आक्रमण के कारण उस के ऊपर हुए अत्याचारों और नुकसान की झलक भी नज़र आती है. उनका शुमार पोलैंड के बड़े साहित्यकारों में किया जाता है.
भाषा को लेकर उनके भीतर खासी सजगता थी और एक जगह उन्होंने कहा है – “शब्दों से सबसे ज़्यादा भय उन्हें लगना चाहिए जो उनका भार पहचानते हैं - लेखककवि और वे जिनके लिए शब्द ही यथार्थ है”

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मज़ेदार

कैसा होता है आदमियों जैसा होना
मुझसे चिड़िया ने पूछा
मैं ख़ुद नहीं जानती
यह अनंत तक पहुँचते हुए भी
अपनी त्वचा के भीतर क़ैद रहना है
अमरता को छूते हुए
समय के अपने टुकड़े का बंदी होना
हताशापूर्ण ढंग से अनिश्चित होना
और असहायपूर्ण ढंग से उम्मीदभरा
पाले की सुई होना
और होना मुठ्ठीभर गर्मी
सांस लेना हवा में
और निश्शब्द घुटते जाना
राख से बने हुए एक घोंसले के साथ
लपटों में जलना
रोटी खाना
और भूख को भरते जाना
आदमियों जैसा होना बिना प्यार के मरना
और मौत के ज़रिये प्यार करना होता है.
बड़ी मज़ेदार बात है चिड़िया ने कहा
और सहज उड़ती गयी ऊपर आकाश में 


शब्दकोष

फूंस में सुइयों की तरह दफ़न
कितनी कवितायेँ सोती हैं शब्दकोशों में
गुस्से के कसे हुए जालों में लिपटे हुए धरे
कितने कवि अभी पैदा नहीं हुए हैं
कितनी कोमल आत्मस्वीकृतियाँ
कितने अपमान
कितने सारे झूठ

और कौन से अनखोजे
मनुष्यहीन
रेगिस्तान खामोशियों के


फ़र्क

मुझे बताओ क्या फ़र्क होता है
उम्मीद और इंतज़ार में
क्योंकि मेरे दिल को मालूम नहीं
वह लगातार काटता जाता है अपने को इंतज़ार के कांच से
और लगातार खोता जाता है उम्मीद के कोहरे में