Monday, May 5, 2014

उसको कितना होश था और मुझको कितना था सरूर


नशे में दया

-रघुवीर सहाय

मैं नशे में धुत था आधी रात के सुनसान में 
एक कविता बोलता जाता था अपनी जान में 

कुछ मिनट पहले किए थे बिल पे मैंने दस्तख़त
ख़ानसामा सोचता होगा कि यह सब है मुफ़्त

तुम जो चाहो खा लो पी लो और यह सिगरेट लो 
सुन के मुझको देखता था वह कि अपने पेट को?

फिर कहा रख कर के सिगरेट जेब में मेरे लिए
आज पी लूँगा इसे पर कल तो बीड़ी चाहिए

एक बंडल साठ पैसे का बहुत चल जाएगा
उसकी ठंडी नज़र कहती थी कि कल, कल आएगा

होश खो बैठे हो तुम कल की ख़बर तुमको नहीं
तुम जहाँ हो दर असल उस जगह पर तुम हो नहीं

कितने बच्चे हैं? कहाँ के हो? यहाँ घर है कहाँ?
चार हैं, बिजनौर का हूँ, घर है मस्जिद में मियाँ

कोरमा जो लिख दिया मैंने तुम्हारे वास्ते
ख़ुद वो खा लोगे कि ले जाओगे घर के वास्ते?

सुन के वो चुप हो गया और मुझको ये अच्छा लगा
लड़खड़ा कर मैं उठा और भाव यह मन में जगा

एक चटोरे को नहीं उस पर तरस खाने का हक़
उफ़ नशा कितना बड़ा सिखला गया मुझको सबक़

घर पे जाकर लिख के रख लूँगा जो मुझमें हो गया
सोच कर मैं घर तो पहुँचा पर पहुँचकर सो गया

उठ के वह कविता न आई अक़्ल पर आई ज़रूर
उसको कितना होश था और मुझको कितना था सरूर

पहले दर्जे से सिविल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा तक मैं कमाठीपुरा में रहा - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 2

(पिछली क़िस्त से आगे )


कमाठीपुरा

मेरा परिवार मूलतः काबुल का रहनेवाला था. वहीं मैं एक कट्टर मुस्लिम परिवार में जन्मा. मेरे वालदैन बेहद ग़रीब थे. खाने के लाले थे. मुझसे पहले मेरे तीन भाई और थे जो आठ साल साल के होते होते मर गए. जब मैं पैदा हुआ, मेरी माँ ने कहा “नहीं, ये जगह मेरे बेटे के लिये नहीं”. मेरी माँ को भय था कि काबुल की ज़मीन और वहाँ की आबोहवा उसके बच्चों के लिए मुफ़ीद नहीं थी. वह बोली, “मुझे यहाँ से कहीं और जाना होगा.” उन्हें पता ही नहीं था वे कहाँ जाते थे. बहरहाल वहाँ से निकल पड़े और पता नहीं कैसे अल्लाह जाने वे बम्बई पहुँच गए. अनजान जगह. अनजान मुल्क. अनजान शहर. जाने-मिलने को कोई जगह-लोग नहीं. पास में धेला नहीं. वे बंबई की सबसे बुरी झोपड़पट्टी कमाठीपुरा आ गये. इमारतें बनाने वाले सारे मजदूर वहाँ रहा करते थे. लेकिन यह बहुत खराब झोपड़पट्टी थी. सारे के सारे रंडीखाने वहाँ. आप किसी भी बुरी चीज़ के बारे में सोचिये, वो वहाँ थी. इसे एशिया की सबसे बुरी झोपड़पट्टी कहा जाता है. धारावी एक झोपड़पट्टी है पर कमाठीपुरा तो उससे भी ख़राब था. धारावी में सिर्फ झोपड़ों की कतारें हैं, पर यहाँ झोपड़े ही नहीं थे – वेश्याएं, अफ़ीम, गांजा, चरस सब कुछ था. अगर किसी ने अपनी ज़िन्दगी तबाह करनी हो तो उसे यहाँ जाना चाहिए. पहले दर्जे से सिविल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा तक मैं वहीं रहा.

पढ़!

मैंने और लडकों को देखा जो काम पर जाया करते थे और अपने घर के खाने के लिए पैसा कम कर लाते थे. कभी कभी जब घर में खाने को कुछ नहीं होता था तो मैं सोचा करता था कि मुझे भी जाकर किसी वर्कशॉप, गैरेज या होटल में काम करना चाहिए. एक दिन मैं हारने ही वाला था जब मुझे अपने कंधे पर एक हाथ महसूस हुआ. मेरी माँ खड़ी थीं. वे बोलीं’ “मुझे पता है तू कहाँ जा रहा है. मैं जान सकती हूँ. तू कुछ लड़कों से बातें कर रहा था. तू दिन में दो या तीन रुपये कमाने वाला है. लेकिन तेरे कमाए दो-तीन रुपयों से इस घर की गरीबी नहीं मिटने वाली. सारी ज़िन्दगी तीन रुपया चार रुपया तू कमाता रहेगा. अगर तुझे इस घर की गरीबी उठानी है तो तुझे पढ़ना होगा.”


जिस तरीके से उसने मुझसे “पढ़!” कहा, उसने पारे की बूँद जैसा काम किया. वह मेरे सिर पर गिरी और मेरी नसों में जा मिली. मैं उसे अब भी महसूस कर सकता हूँ. मेरा सारा बदन कांपने लगा. और तब मैंने फैसला किया कि मैं अपनी माँ को कभी धोख़ा नहीं दूंगा. मैंने पढ़ना शुरू कर दिया. हमारे पास दो कमरे नहीं थे. गणित में बहुत सारे जोड़-भाग करने होते थे. इसके लिए मैं चॉक का डिब्बा खरीद लाता था. मेरे पास कागज़ नहीं होता था सो मैं कमरे के पूरे फर्श पर लिखाई करता था और फिर उसे मिटा देता. मेरी माँ रात भर एक कोने में बैठी रहती और मुझे पढ़ाई करता हुआ देखती. वह मुझे आधी रात को जगा देती “उठ, पढ़ाई शुरू कर!”

(जारी)

पिछली क़िस्त - 

स्टानिस्लाव्स्की, मैक्सिम गोर्की, चेखव और दोस्तोवस्की मेरे दूसरे अध्यापक थे


अब पता है, नहीं मिलेगा इंसाफ़ - फ़रीद ख़ाँ की कवितायेँ - 4


संघर्ष के स्मारक

अब नींद लेता हूँ भरपूर.  

लम्बे संघर्ष के बाद
अब पता है, नहीं मिलेगा इंसाफ़.

अब तो इतना ही काफ़ी है कि ये देह,
संघर्ष के स्मारक, बच जायें.
क्या पता कभी इनमें जान फुंक जाये.  

जगह मिली तो करवट ले लेंगे.  
तब तक चित चादर तान सोयेंगे.


ठंड बढ़ रही है और अलाव भी धुंध ही पैदा कर रहा है घना. 

Sunday, May 4, 2014

तुम हो सुबह और रोशनी


सेज़ारे पावेसे की कविता – पहली खेप

अपनी बयालीसवीं सालगिरह से कुल दो हफ्ते पहले २७ अगस्त 1950 को इतालवी कवि सेज़ारे पावेसे ने अपने शहर तूरिन के एक होटल में नींद की गोलियों की ओवरडोज़ खा ली. ल्यूको के साथ १९४७ में छपे अपने वार्तालापों की किताब के पहले पन्ने पर लिखे उसके सुसाइड नोट में कहा गया था – “मैं सबको माफ़ करता हूँ और हर किसी से माफ़ी मांगता हूँ. ओके? ज़्यादा गॉसिप मत करना.”

९ सितम्बर १९०८ को जन्मे सेज़ारे पावेसे कवि होने के साथ साथ अच्छे उपन्यासकार, आलोचक और अनुवादक थे. २०वीं सदी की इतालवी कविता पर उनका गहरा प्रभाव माना जाता है.

इटली के कुएन्यो प्रांत के सान्तो स्तेफानो बेल्बो में उनका जन्म हुआ था. इसी गाँव में उनके पिता ने भी जन्म लिया था और बाद में उनका परिवार हर साल गर्मियों की छुट्टियां बिताने यहीं आया करता था. इसी गाँव में उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई जबकि तूरिन के  तमाम स्कूलों में उन्होंने आगे की पढ़ाई की. विश्विद्यालय के दिनों में उन्हें साहित्य के प्रति गहरा अनुराग हुआ और उन्होंने तूरिन विश्विद्यालय से अपनी ग्रेजुएट डिग्री के लिए वाल्ट व्हिटमैन की कविताओं पर शोधकार्य किया.
फासिस्ट-विरोधी हलकों में पावेसे का उठना-बैठना था. १९३५ में उन्हें गिरफ्तार कर उन पर पर मुकदमा चलाया गया क्योंकि उनके कब्ज़े से एक राजनैतिक बंदी के पत्र पुलिस को मिले थे.

वे १९३६ में रिहा होकर तूरिन पहुंचे और उसी साल उनका पहला कविता-संग्रह ‘हार्ड लेबर’ छपा. 8 सितम्बर के बाद उन्होंने अपनी बहन के साथ सेरालूना में शरण ली और युद्ध की समाप्ति पर इतालवी कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली.१९४५ में उन्होंने पार्टी के समाचारपत्र का प्रकाशन किया. इस बीच उनकी कई अन्य किताबें  छप कर आ चुकी थीं. यह क्रम १९४५ के बाद भी जारी रहा अलबत्ता वे हमेशा एक गहरे अवसाद में रहा करते थे जो अंततः उनकी मृत्यु का कारण बना.

प्रस्तुत हैं सेज़ारे पावेसे की कविता की एक बानगी-

तुम हमेशा लौट आती हो सुबह को*

भोर की मद्धम सांस
आती है तुम्हारे मुंह से
ख़ाली सड़कों के किनारों पर
तुम्हारी आँखों की सलेटी रोशनी,
भोर की मीठी बूँदें
अंधेरी पहाड़ियों पर.
तुम्हारे कदम और तुम्हारी सांस
भोर की हवा की मानिंद
नष्ट करती है मकानों को.
काँपता है शहर,
सांस छोड़ते हैं पत्थर –
तुम जीवन हो, एक जागना.

खो गया सितारा
भोर की उजास में
हवा की थरथराहट,
गर्मी, सांस-
ख़त्म हुई रात.

तुम हो सुबह और रोशनी.

(*यह कविता पावेसे ने अपनी प्रेमिका अमेरिकी अभिनेत्री कॉन्स्टेन्स डाउलिंग के लिए लिखी थी.)

बिल्लियाँ जान जाएँगी

फिर से गिरेगी बारिश
मीठे फुटपाथों पर,
एक हल्की बारिश
किसी सांस या पदचाप सरीखी.
हवा और भोर फिर से
खिलेंगे हौले से
तुम्हारे कदमों के तले
जब तुम दोबारा से प्रवेश करोगी
फूलों और देहरियों में
बिल्लियाँ जान जाएँगी.

और भी दिन होंगे
आवाजें होंगी और भी.
अकेली मुस्कराओगी तुम
बिल्लियाँ जान जाएँगी.
तुम सुनोगी प्राचीन शब्दों को,
क्लांत ख़ाली शब्द
बीते हुए दिनों के उत्सवों की
न पहनी गयी पोशाकों जैसे.

तुम भी बनाओगी भंगिमाएं,
जवाब तुम भी दोगी शब्दों से –
बहार की सूरत,
तुम भी बनाओगी भंगिमाएं.

बिल्लियाँ जान जाएँगी
ओ बहार की सूरत,
और हल्की बारिश
गुलाबी रत्न जैसी भोर
जो चीर कर रख देती है उसका दिल
जिसे अब तुम्हारी इच्छा नहीं होती
वे हैं उदास मुस्कराहट
तुम मुस्कराती हो अकेली.

और भी दिन होंगे
और आवाजें और जागना.
ओ बहार की सूरत

हम सहन करेंगे भोर को.

डरा हुआ मन बेमन जिसका बाजा रोज बजाता है


राष्ट्रगीत

- रघुवीर सहाय

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है.

मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है.

पूरब-पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,
उनके
तमगे कौन लगाता है.

कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है.


स्टानिस्लाव्स्की, मैक्सिम गोर्की, चेखव और दोस्तोवस्की मेरे दूसरे अध्यापक थे - कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार - 1

मनमोहन देसाई की फिल्मों पर एक किताब ‘मनमोहन देसाईज़ फिल्म्स – एनचांटमेंट ऑफ़ द माइंड’ लिख चुकीं कॉनी हाम ने पेरिस, ऑस्टिन और टैक्सस में अंग्रेज़ी अध्यापन का कार्य किया है. बॉलीवुड पर उनकी तीखी नज़र हमेशा रही है और एक ज़बरदस्त शोधार्थी के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किये हैं. उनकी आने वाली किताब का शीर्षक है – ‘शो मी योर वर्ड्स – द पावर ऑफ़ लैंग्वेज इन बॉलीवुड’.

कॉनी हाम ने फरवरी २००७ में अभिनेता कादर ख़ान का एक लंबा साक्षात्कार किया था. उसी का अनुवाद आज से कबाड़खाने के पाठकों के लिए पेश किया जाता है. एक्सक्लूसिव कबाड़ –


फिल्मों में कादर ख़ान के लम्बे करियर की शुरुआत १९७० के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में हुई थी. तब से अब तक वे ३०० से अधिक फिल्मों में काम कर चुके हैं. अपनी मुलायम आवाज़ और कुटिल मुस्कान की खूबियों से खलनायक के कई चरित्र निभाने के बाद वे अंततः कैरेक्टर और कॉमिक भूमिकाओं में अपने को स्थापित करने में सफल रहे. शब्दों के साथ उनके बर्ताव ने कई लोगों की दिलचस्पी को हवा दी है. मैं भी उनमें से एक हूँ. करीब ८० फिल्मों के डायलॉग्स लिख चुकने के बाद आज उनके नाम हिन्दी सिनेमा की कई यादगार पंक्तियाँ हैं. जब मैं मनमोहन देसाई वाली किताब पर काम कर रही थी, मुझे उम्मीद थी मैं कादर ख़ान से बात कर सकूंगी. मुझे पता था कि देसाई कादर ख़ान को अपनी सफलता का बड़ा हिस्सा मानते हैं. कादर ख़ान की भाषा को उन्होंने एक नाम भी दिया था.

“अगर मैं सड़कछाप डायलॉग्स का इस्तेमाल करता हूँ तो उसके पीछे मकसद यह रहता है कि वह आसानी से समझ में आ जाती है. मैंने जितने भी डायलॉग लेखकों के साथ काम किया है, कादर ख़ान उनमें सर्वश्रेष्ठ हैं. उन्हें बोलचाल के मुहाविरे का अच्छा ज्ञान है. मैंने उनसे बहुत सीखा है.”

कई वर्षों बाद जब मुझे कादर ख़ान से मिलने का सौभाग्य मिला तो मैंने कादर ख़ान के मुंह से ठीक ऐसी ही बातें मनमोहन देसाई के लिए सुनीं. ‘अमर, अकबर, एन्थनी’, ‘कुली’ और ऐसी तमाम फिल्मों की सफलता का सेहरा निर्देशक और लेखक की जुगलबंदी को जाता है – दोनों को ही दर्शकों के स्पीच पैटर्न्स और लय का पूरा अंदेशा रहता था. हिन्दी फिल्मों को सिर्फ देखा ही नहीं जाता. उन्हें सुना भी जाता है. यह दूसरी वाली बात ज़्यादा मार्के की है.
     
इस साक्षात्कार में कादर ख़ान अपनी पृष्ठभूमि, फिल्मों में अपने प्रवेश, अपने काम के आयामों, अपनी अभिरुचियों और दीवानगियों की बाबत खुलकर बात कर रहे हैं. हालांकि फिल्मों में काम करने के लिए उन्होंने अध्यापन का काम छोड़ दिया था पर उनके भीतर का अध्यापक अब भी गतिशील है. आज वे तमाम शैक्षिक प्रोजेक्ट्स से जुड़े हुए हैं, ख़ास तौर पर मुस्लिम समाज के लिए. और इस साक्षात्कार के समय भी वे मेरे लिए एक अध्यापक बन गए थे – ग़ालिब की पंक्तियाँ समझाते हुए, यह दिखलाते हुए कि किस तरह मेटाफ़र और एनालजी की मारफ़त एक अभिनेता अपनी आवाज़ के उतार-चढ़ावों से विचारों में जीवन्तता पैदा कर सकता है.

मैं उत्तम बनर्जी की आभारी हूँ जिन्होंने हिन्दी-उर्दू लिप्यान्तरण में सहायता की और मैं कादर ख़ान की भी आभारी हूँ जिन्होंने मुझे अपने शब्दों से नवाज़ा.

रंगमंच से शुरुआत –

कादर ख़ान – रंगमंच ने मुझे बहुत मदद पहुंचाई. हाँ, मैंने ८-९ की उम्र से थियेटर में काम करना शुरू कर दिया था. देखिये, महबूब ख़ान की फिल्म ‘रोटी’ में एक बूढ़ा एक्टर थे. उनका नाम था अशरफ़ ख़ान. बड़े नामी कलाकार थे. वो एक नाटक तैयार कर रहे थे – वमाज़ अज़रा, ‘रोमियो जूलियट’ टाइप का नाटक था. एक नन्हे राजकुमार की ज़रुरत थी. वही मेन कैरेक्टर था. तो आठ या नौ साल के एक ऐसे लड़के को कहाँ खोजा जाए जो कोई चालीसेक पन्ने लिख सके और उन्हें एक लाइव ऑडीएन्स के सामने बोल सके?

उन दिनों मेरा परिवार बहुत गरीब था और हम झोपडपट्टी में रहा करते थे. माँ मुझे प्रार्थना करने के लिए मस्जिद भेजा करती थी. मैं वहाँ से भाग कर अकेला कब्रिस्तान चला आता और दो कब्रों के दरम्यान ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर बोला करता. शायद मैंने किसी को देखा होता था, मैं देखता था कि फलां आदमी ने काम अच्छा किया या इस में इस शख्स ने लफ्ज़ अच्छा बोला. तो मैं उसकी नकल किया करता ...और फिर वो एक डेढ़ घंटे बाद जब नमाज़ ख़तम होती थी, मैं अपने घर चला जाता. और माँ अक्सर मेरी चोरी पकड़ लेतीं. मैं चप्पल तो कभी नहीं पहनता था न! नंगे पैर रहता था. वो मुझे पकड़ लेती थीं क्योंकि आप मस्जिद में जा के वुजू करते हैं जबकि मेरे पैर देखकर वे कहतीं – “तुम्हारे पैर गंदे हैं. मतलब तुम मस्जिद गए ही नहीं.”

कॉनी हाम – तो आप खूब आंखमिचौली किया करते थे?
  
कादर ख़ान – क्या करें? रिवोल्यूशन बाई बर्थ होता है इन्सान के अन्दर. आदमी तो पैदा ही विद्रोही होता है. तो कुछ लोगों ने जाकर अशरफ़ ख़ान साहब से कहा कि एक लड़का है; वो रात को दो कब्रों के बीच अकेला बैठा रहता हैं और चीखता चिल्लाता रहता है. तो वे कई रातों तक मुझे देखते रहे और एक रात उन्होंने अपनी टॉर्च की रोशनी मुझ पर फेंक कर कहा -

“इधर आओ. तुम ये क्या बोलते रहते हो वहाँ बैठ के?”

“कुछ नहीं. ऐसे ही, जो अच्छा लगता है, बोलता हूँ मैं.”

उन्होंने मुझे घूर कर देखा. “ड्रामे में काम करोगे?”

मैंने पूछा -“ड्रामा क्या है?”

“जो तुम कर रहे हो, इसी को जोर जोर से बोला जाए, तो वो ड्रामा कहलाता है.”

“नहीं मैंने कभी किया नहीं ये.” मैं उनसे कह रहा था.

उन्होंने अपने आदमी से कहा कि मुझे अगले दिन शहर में उनके छोटे बंगले पर ले कर आये. मैं वहां गया. उन्होंने मेरी ट्रेनिंग शुरू की. और उनके मार्गनिर्देशन, प्यार और पितृवत स्नेह की बदौलत मैं महीने भर में रोल के लिए तैयार हो गया. डेढ़ महीने बाद नाटक का शो हुआ. दर्शकों ने खड़े होकर मुझे शाबासी दी. और तब एक बूढ़े सज्जन आदमी स्टेज पर आये और उन्होंने मुझे सौ रूपये का नोट दिया. वे बोले “इस उम्र में तुम्हारे लिए यह काफ़ी बड़ी रकम है. यह तुम्हारे लिए एक सर्टिफिकेट है. हमेशा याद रखना कि ये सर्टिफिकेट तुम्हें बहुत छोटी उम्र में दे दिया गया था. मेरी दुआएं तुम्हारे साथ हैं.” उन्होंने बस मेरे सिर पर हाथ रखा और फिर कहीं गायब हो गए. मुझे नहीं पता वो कौन थे. सौ रूपये का वो नोट कई सालों तक मेरे साथ रहा. लेकिन गरीबी में लोग सम्मान और ट्राफियां तक बेच देते हैं. मेरी भी ऐसी कुछ परिस्थिति बनी कि घर के लिए खाना लाने के लिए मुझे उस नोट को खर्च करना पड़ा.

फिर मैंने लिखना और निर्देशन करना शुरू किया. मैंने एक तकनीकी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की. मेरे प्रिंसिपल बहुत अच्छे आदमी थे. मुझे थियेटर करते हुए देखना उन्हें बहुत अच्छा लगता था. फिर मैं दूसरे कॉलेज में चला गया. वहां मैंने बहुत सारे नाटक किये. दो-तीन सालों में मैं कॉलेज के छात्रों के बीच इतना लोकप्रिय हो गया था कि बम्बई के लोग कहने लगे थे कि अगर किसी ने कादर ख़ान के नाटकों में काम नहीं किया तो वह बम्बई के किसी कॉलेज में नहीं गया. दूसरे कॉलेजों के छात्र आकर मेरे ऑटोग्राफ़ ले जाया करते थे. सो पॉपुलर तो मैं जीवन की काफ़ी शुरूआत में हो गया था.

फिर मैंने पढ़ाना शुरू किया. मूलतः मैं एक सिविल इंजीनियर था. मैं स्ट्रक्चर, हाईड्रौलिक्स, आरसीसी स्टील वगैरह के बारे में पढ़ाया करता था. लेकिन मेरी दिलचस्पी थियेटर में थी. स्टानिस्लाव्स्की, मैक्सिम गोर्की, चेखव और दोस्तोवस्की मेरे दूसरे अध्यापक थे. तो इस तरह दो हिस्सों में बंटी हुई ज़िन्दगी थी मेरी.

(जारी)

एक बार जान-बूझकर चीख़ना होगा ज़िंदा रहने के लिये दर्शकदीर्घा में से



फ़िल्म के बाद चीख़

- रघुवीर सहाय

इस ख़ुशबू के साथ जुड़ी हुई
है एक घटिया फ़िल्म की दास्ताँ
रंगीन फ़िल्म की
ऊबे अँधेरे में
खड़े हुए बाहर निकलने से पहले बंद होते हुए
कमरे में
एक बार
भीड़ में
जान-बूझ
कर चीख़
ना होगा
जिंदा रहने के लिए
भौंचक बैठी हुई रह जाएँ
पीली कन्याएँ
सीली चाचियों के पास
टिकी रहे क्षण-भर को पेट पर
यौवन के एक महान क्षण की मरोड़
फ़िर साँस छोड़ कर चले
जनता
सुथन्ना सम्हालती
सारी जाति एक झूठ को पीकर
एक हो गयी फ़िल्म के बाद
एक शर्म को पीकर युद्ध के बाद
सारी जाति एक
इस हाथ को देखो
जिसमे हथियार नहीं
और अपनी घुटन को समझो, मत
घुटन को समझो अपनी
कि भाषा कोरे वादों से
वायदों से भ्रष्ट हो चुकी है सबकी
न सही यह कविता
यह मेरे हाथ की छटपटाहट सही
यह कि मैं घोर उजाले में खोजता हूँ
आग
जब कि हर अभिव्यक्ति
व्यक्ति नहीं
अभिव्यक्ति
जली हुई लकड़ी है न कोयला न राख
क्रोध, नक्कू क्रोध, कातर क्रोध
तुमने किस औरत पर उतारा क्रोध
वह जो दिखलाती है पैर पीठ और फ़िर
भी किसी वस्तु का विज्ञापन नहीं है
मूर्ख, धर्मयुग में अस्तुरा बेचती है वह
कुछ नहीं देती है बिस्तर में बीस बरस के मेरे
अपमान का जवाब
हर साल एक और नौजवान घूँसा
दिखाता है मेज़ पर पटकता है
बूढों की बोली में खोखले इरादे दोहराता है
हाँ हमसे हुई जो ग़लती सो हुई
कहकर एक बूढा उठ
एक सपाट एक विराट एक खुर्राट समुदाय को
सिर नवाता है

हर पांच साल बाद निर्वाचन
जड़ से बदल देता है साहित्य अकादमी
औरत वही रहती है वही जाति
या तो अश्लील पर हंसती है या तो सिद्धान्त पर
सेना का नाम सुन देशप्रेम के मारे
मेजें बजाते हैं
सभासद भद भद कोई नहीं हो सकती
राष्ट्र की
संसद एक मंदिर है जहाँ किसी को द्रोही कहा नहीं
जा सकता
दूधपिये मुँहपोंछे आ बैठे जीवनदानी गोंद-
दानी सदस्य तोंद सम्मुख धर
बोले कविता में देशप्रेम लाना हरियाली प्रेम लाना
आइसक्रीम लाना है
भोला चेहरा बोला
आत्मा नें नकली जबड़ेवाला मुँह खोला
दस मंत्री बेईमान और कोई अपराध सिद्ध नहीं
काल रोग का फल है अकाल अनावृष्टि का
यह भारत एक महागद्दा है प्रेम का
ओढने-बिछाने को, धारण कर
धोती महीन सदानंद पसरा हुआ
दौड़े जाते हैं डरे लदेफंदे भारतीय
रेलगाड़ी की तरफ़
थकी हुई औरत के बड़े दाँत
बाहर गिराते हैं उसकी बची-खुची शक्ति
उसकी बच्ची अभी तीस साल तक
अधेड़ होने के तीसरे दर्जे में
मातृभूमि के सम्मान का सामान ढ़ोती हुई
जगह ढूँढती रहे
चश्मा लगाए हुए एक सिलाई-मशीन
कंधे उठाये हुए

वे भागे जाते हैं जैसे बमबारी के
बाद भागे जाते हों नगर-निगम की
सड़ांध लिये-दिये दूसरे शहर को
अलग-अलग वंश के वीर्य के सूखे
अंडकोष बाँध .
भोंपू ने कहा
पांच बजकर ग्यारह मिनट सत्रह डाउन नौ
नंबर लेटफारम
सिर उठा देखा विज्ञापन में फ़िल्म के लड़की
मोटाती हुई चढ़ी प्राणनाथ के सिर उसे
कहीं नहीं जाना है.
पाँच दल आपस में समझौता किये हुए
बड़े-बड़े लटके हुए स्तन हिलाते हुए
जाँघ ठोंक एक बहुत दूर देश की विदेश नीति पर
हौंकते डौंकते मुँह नोच लेते हैं
अपने मतदाता का

एक बार जान-बूझकर चीख़ना होगा
ज़िंदा रहने के लिये
दर्शकदीर्घा में से
रंगीन फ़िल्म की घटिया कहानी की
सस्ती शायरी के शेर
संसद-सदस्यों से सुन
चुकने के बाद.