Monday, December 17, 2007

'ब्लॉग ब्लॉग है, और साहित्य साहित्य' उर्फ़ ऎसी भी क्या हड़बड़ी है

देखता हूँ पिछले कुछ दिनों से ब्लागिंग और साहित्य को ले कर तमाम तरह के वक्तव्य आ रहे हैं। कुछ दिन पहले किसी ब्लॉग पर बाकायदा किसी ने लिखा था कि पिछले कुछ दशकों से हिन्दी में कोई कुछ लिख ही नहीं रहा है। कोई कहता है ब्लॉग साहित्य से बड़ी चीज़ है। कोई कहता है साहित्य अजर अमर है।

हिन्दी कि सबसे बडी बदकिस्मती यही रही है कि लोगों में पढ़ने कि प्रवृत्ति धीरे धीरे लुप्त होती गयी है। माना कि हिन्दी के बड़े प्रकाशक अच्छी किताबों कि इतनी कम प्रतियां छापते हैं (चालीस करोड़ भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी के किसी 'बैस्टसेलर' की आज कल अमूमन ६०० कापी छपती हैं) कि लोगों तक उनका पहुँचना मुहाल होता है। लेकिन हिन्दी को बचाने का कार्य छोटे छोटे कस्बों से निकलने वाली पत्रिकाओं ने लगातार अपने स्तर पर जारी रखा है। इस समय हिन्दी में जितनी लघु पत्रिकाएँ निकल रही हैं, उतनी कभी नहीं निकलती थीं (आज के 'अमर उजाला' में मंगलेश डबराल का लेख देखें)। ये इन लघु पत्रिकाओं की देन है कि हिन्दी लेखकों की कई पीढियां एक साथ कार्यरत हैं। और यह कार्य इंटरनेट और ब्लॉग के आने से कई दशक पहले से चल रहा है।

साहित्य का इतिहास उठा कर देखें तो पाएंगे कि पहले केवल कविता थी। उस के बाद गद्य की बारी आयी। एक अरसे तक नाटक ही लिखे जाते रहे। कई सदियों बाद उपन्यास की उत्पत्ति हुई तो उस के लिए भी जगह बनी। फिर कहानियाँ, एकांकी और तमाम विधाएं आती गयीं और उन सब के लिए न सिर्फ जगह बनी, वे लोकप्रिय भी हुईं। जब क्रिस्टोफर मार्लो ने एलिज़ाबेथन समय के शास्त्रीय नाटकों के युग में मुक्त छंद (Blank Verse) का प्रयोग किया तो वह शुरू में लोगों को पचा ही नहीं। लेकिन उस के दस सालों के भीतर 'हैमलेट', 'मैकबेथ', 'किंग लीयर' जैसे नाटक भाषा-देश- भूगोल की सरहदें लाँघ कर अमर हो गए। रिपोर्ताज, यात्रावृत्त, ग़ज़ल, हाईकू, सौनेट ... कितनी कितनी विधाएं हैं।

अब ब्लॉग आया है तो जाहिर है वह भी अपनी जगह बनाएगा ही। लेकिन इस में किसी दूसरे फॉर्मेट से प्रतिद्वंद्विता की क्या ज़रूरत है। ब्लॉग ने मनचाही रचना करने की स्वतंत्रता बख्शी है तो अभी थोडे धैर्य के साथ इस औज़ार के गुण-दोषों को चीन्हे जाने की दरकार भी महसूस होती है।

हम लोगों ने जब कबाड़खाना शुरू किया तो जाहिर है हम ने इसे एक नया खिलौना जान कर काफी शरारतें भी कीं लेकिन धीरे धीरे एक ज़िम्मेदारी का अहसास होना शुरू हुआ और साथ ही नए नए आयाम भी खुले (जो अब भी खुल रहे हैं)। मुझे यकीन है ऐसा ही ब्लागिंग में मसरूफ तमाम मित्रों को भी लगा होगा।

सब से बड़ी चीज़ यह है कि ब्लॉग हमें एक ऐसा प्लेटफार्म मुहैय्या कराता है जहाँ हम अपनी पसन्द/ नापसंद सभी के साथ बाँट सकते हैं। हम अपनी मोहब्बत भी बाँट सकते हैं और नफरत भी। हम विनम्रता बाँट सकते हैं और विनयहीनता भी। हम एक दूसरे का तकनीकी ज्ञान भी बढ़ा सकते हैं (जैसा कि
श्री रवि रतलामी और कई अन्य लोग लगातार करते रहे हैं और जिस के लिए उन का आभार व्यक्त करने को शब्द कम पड़ जाएंगे)

फिलहाल हिन्दी हम सब का सरोकार है और होना ही चाहिऐ। 'निज देश' की उन्नति के लिए 'निज भाषा' की उन्नति की ज़रूरत को भारतेंदु जी एक सदी पहले रेखांकित कर चुके हैं। ब्लॉग ने इस के निमित्त एक अदभुत सुअवसर उपलब्ध कराया है। हिन्दी न सिर्फ अब भी महान अभिव्यक्ति का माध्यम है बल्कि वह ऐसा कर भी रही है।

पढिये साहित्य अकादमी पुरूस्कार से सम्मानित हो चुके, वीरेन डंगवाल के कविता संग्रह 'दुश्चक्र में सृष्टा' की शीर्षक कविता।


दुश्चक्र में सृष्टा



कमाल है तुम्हारी कारीगरी का भगवान,
क्या
-क्या बना दिया, बना दिया क्या से क्या!


छिपकली को ही ले लो,
कैसे
पुरखों
की बेटी
छत पर उल्टा
सरपट भागती
छलती तुम्हारे ही बनाए अटूट नियम को।
फिर
वे पहाड़!

क्या
क्या थपोड़ कर नहीं बनाया गया उन्हें?

और
बगैर बिजली के चालू कर दी उनसे जो
नदियाँ
, वो?

सूंड
हाथी को भी दी और चींटी
को भी
एक ही सी कारआमद अपनी-अपनी जगह
हाँ
, हाथी की सूंड में दो छेद भी हैं
अलग से
शायद शोभा के वास्ते
वर्ना सांस तो कहीं से भी ली जा सकती थी
जैसे मछलियाँ ही ले लेती हैं गलफड़ों से।



अरे, कुत्ते की उस पतली गुलाबी जीभ का ही क्या कहना!
कैसी
रसीली और चिकनी टपकदार, सृष्टि के हर
स्वाद की मर्मज्ञ और दुम की तो बात ही अलग
गोया एक अदृश्य पंखे की मूठ
तुम्हारे ही मुखड़े पर झलती हुई।


आदमी बनाया, बनाया अंतड़ियों और रसायनों का क्या ही तंत्रजाल
और उसे दे दिया कैसा अलग सा दिमाग
ऊपर बताई हर चीज़ को आत्मसात करने वाला
पल-भर में ब्रह्माण्ड के आर-पार
और सोया तो बस सोया
सर्दी भर कीचड़ में मेढक सा



हाँ एक अंतहीन सूची है
भगवान
तुम्हारे कारनामों की, जो बखानी न जाए
जैसा कि कहा ही जाता है।

यह ज़रूर समझ में नहीं
आता
कि फिर क्यों बंद कर दिया
अपना इतना कामयाब
कारखाना? नहीं निकली कोई नदी पिछले चार-पांच सौ सालों से
जहाँ तक मैं जानता हूँ
न बना कोई पहाड़ या समुद्र
एकाध ज्वालामुखी ज़रूर फूटते दिखाई दे जाते हैं कभी-कभार।
बाढ़ेँ तो आयीं खैर भरपूर, काफी भूकंप
,
तूफ़ान खून से लबालब हत्याकांड अलबत्ता हुए खूब
खूब अकाल, युद्ध एक से एक तकनीकी चमत्कार
रह गई सिर्फ एक सी भूख, लगभग एक सी फौजी
वर्दियां जैसे
मनुष्य मात्र की एकता प्रमाणित करने के लिए
एक जैसी हुंकार, हाहाकार!
प्रार्थनाग्रृह ज़रूर उठाये गए एक से एक आलीशान!
मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से
वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार
ऊँगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून!
आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर
तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार?


अपना कारखाना बंद कर के
किस घोंसले में जा छिपे हो भगवान?
कौन - सा है वह सातवाँ आसमान?
हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान !!!

4 comments:

परमजीत बाली said...

एक अच्छॆ लेख के साथ एक अच्छी रचना प्रेषित करने के लिए आपका धन्यवाद।यह सच है कि कुछ भी हो ...खास कर हिन्दी ब्लोगरों के आने से हम जैसे लोग भी नेट से जुड़ सके है जो अग्रेजी नही जानते।और इस का श्रै जाता है उन तमाम रवि जी जैसे महानुभवों को जो हम जैसे हिन्दी भाषीयों की मदद कर रहे हैं।

Rajesh Joshi said...

वीरेन डंगवाल के बारे में कई बार कहा, लिखा, सुना, गुना, पढ़ा, समझा जा चुका है कि वो बड़े कवि हैं. फिर भी वो इतने साधारण हैं कि उनका साधारण होना उनकी कविता के बड़प्पन से बड़ा हो जाता है. यही कारण है कि कई बार हम भूल जाते हैं कि हमारे बीच एक ऐसा कवि है जो कई बार लोर्का के विस्तार को छूता है तो अनेक बार पाब्लो नेरुदा कि ऊंचाइयों तक पहुँच जाता है.

दुष्चक्र में सृष्टा कविता को फिर से पढ़ा .... कई बार पढ़ा. पहली पंक्ति में कैसा भोला बालक सा लगता है कवि और आख़िर तक कैसा रुद्र ! ऐसा की सृष्टा को भी डरा दे.

वीरेन दा, साधारण ही बने रहना... अज्ञेय न हो जाना.

munish said...

main to natmastak hoon , veeren da sa adhyatmik aj koi nahi. srishta sunta hai aison ki ye mera yaqeen hai.maine pehli baar padhi ye bahucharchit kavita. shukriya.

इरफ़ान said...

आप अभी कुछ ज़्यादा उम्मीद कर रहे हैं, स्वनामधारी चिंतकों के बारे में मैं पहले टूटी...में फटकू की फटफट में लिख चुका हूं.