Saturday, September 5, 2009

कहाँ गए बंजारे

बंजारों के संगीत का मज़ा लेने के बाद हाल-फिलहाल इंतज़ार है अशोक भाई के उस आलेख का जो बंजारों
पर लिखने का उन्होंने वायदा किया है । जिन बुजुर्गों ने बंजारे देखे हैं वो कहते हैं की आज सभी घुमंतू कबीलों को बन्जारा कह दिया जाता है मगर वो बहुत अलग होते थे। कहते हैं दुनिया भर में फैले बंजारों की भाषा के शब्द आपस में मिलते जुलते हैं और रीति-रिवाज भी । ये भी सुनते हैं की उनकी पोशाक रंग -बिरंगी होती थी और कद-काठी लम्बी चौडी , औरतें अक्सर दो चोटियाँ बनाती थीं और उन्हें अक्सर गाते-बजाते और कलाबाज़ियां करते देखा जाता था और ऐसे किस्सों की कमी न थी जब किसी मनचले ने किसी बंजारन पर कोई फिकरा कसा और फ़िर उसकी लाश ही मिली । । बहरहाल , मैंने तो ऐसे बंजारे नहीं देखे मगर मेरे एक जानकार बुजुर्गवार का फरमाना है की १९७७ में आई' धरम-वीर ' के एक गाने में तमाम अतिरेक और लटके-झटकों के बावजूद बंजारों को ७० फीसदी देखा जा सकता है । क्या आपने देखे हैं बंजारे ?

4 comments:

नीरज गोस्वामी said...

राजस्थान के गाडिया लुहार बंजारे ही हैं...जगह जगह घूमते लोग, कहीं एक जगह नहीं टिकते...विदेशी जिप्सियों की तरह...पुरानी फिल्म "कारवां" बंजारों पर ही तो बनी थी...वैसे और भी कहीं फिल्में बनी जिनमें बंजारन और शेहरी बाबू का प्रेम दिखाया जाता रहा है....हेमंत कुमार जी के स्वर में गाया गीत :जनम से बंजारा हूँ बंधू...जनम जनम बंजारा...कहीं कोई घर न घाट न अंगनारा..." बंजारों को अच्छे से परिभाषित करता है..
नीरज

मुनीश ( munish ) said...

Thats the interesting part sir ! these ironsmiths are often mistaken for Banjaraas , but they are not those reveller nomads about whom we are going to read here shortly .

मुनीश ( munish ) said...

इस गाने के शुरू में स्पेनिश म्यूजिक का छोंक लगा कर आदमियों को फ्लेमिंगो डांसर वाले पतलून-बूट जो पहरा दिए गए हैं और जो बोलिवुडी ठुमके मारे गए हैं उन्हें निकाल कर बात कुछ समझी जा सकती है . गाने के बोल तो बिलकुल जिप्सी कोड ऑफ़ ऑनर बयान करते हैं !

वाणी गीत said...

स्कूल के दिनों में अपने कसबे में गौशाला के पास लगने वाले बंजारों के अस्थायी बसेरों में इनकी जिंदगियों को बहुत करीब से देखा है ...फक्कड़पने में भी तमाम विपरीत परिस्तिथियों के बीच जिदगी को बहुत मौज मस्ती से जीते हैं ये लोग ...