Sunday, November 15, 2009

अंतरंग संबंधों पर लेखन : अवधारणा और बाजार

आत्मकथा के आयाम में बहुत चितेरे होते हैं, जो पाठकों को आकर्षित करते हैं, किंतु उससे कहीं अधिक आकर्षित करते हैं समाज और निजी जिंदगी के प्रवाह में डूबते-उतराते रिश्ते। संबंधों की अंतरंगता हर किसी के जीवन के खास पहलू होते हैं। उन संबंधों की याद में लोग भावुक होते हैं, जिंदगी से तृष्णा व वितृष्णा होती है और फिर किसी हवा के झोंके के साथ उससे गाहे-बगाहे सामना भी करना पड़ता है।
पाश्चात्य संस्कृति में पति-पत्नी के रिश्ते की बुनियाद या हकीकत जो भी हो लेकिन भारतीय परिवेश में इसके मायने अहम हैं। साहित्य, फिल्म के अलावा राजनीति की चमचमाती जिंदगी में संबंधों की अपनी अहमियत है और अंतरंग प्रसंगों को चटखारे लेने की परंपरा भी नई नहीं है। यही कारण है कि पत्रकार नंदिता पुरी द्वारा लिखी गई किताब ‘अनलाइकली हीरो : द स्टोरी ऑफ ओमपुरी’ लोकार्पण होने के पहले ही सुर्खियां बटोर रही है और ओमपुरी के बयान के कारण विवादों की चपेट में है। किसी की जिंदगी के महत्वपूर्ण और पवित्र हिस्सों को सस्ते और चटखारे वाली गॉसिप में बदलना किसी विश्वासघात से कम नहीं है।

अब्दुल बिस्मिल्लाह, वरिष्ठ साहित्यकार : कई महिलाओं ने अंतरंग प्रसंगों पर लिखा है। चाहे अपने जीवन में आए पुरूषों से संबंधों को लेकर हो या पति को लेकर। माना जा रहा है कि यह काफी साहस का काम है, खासकर पति के क्रियाकलापों पर। अभी तक घर की महिलाएं उनके कारनामों पर टिप्पणी करने का साहस भी नहीं कर पाती थीं। भयभीत रहती थीं, लज्जा के साथ-साथ संकोच भी करती थीं। जब पढ़-लिखकर उनमें चेतना आईं तो वह बात कहने लगीं जिसे कहने में उन्हें संकोच होता था। साहस आया तो वह खुलकर कहने लगीं। वर्तमान दौर में बाजार इस कदर हावी है कि चीजों को माल बनाकर बेचना एकमात्र लक्ष्य हो गया है। इसमें मीडिया भी व्यापक तौर पर काम कर रहा है। ऐसी किताबें छपती हैं जो बाजार लुभाता है। हालांकि यह पूरी स्त्री जाति की कहानी नहीं है। स्त्रियों का एक वर्ग है जो यह काम कर रहा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि स्त्रियों पर व्यापक अत्याचार हुआ है। लेकिन ऐसे अनुभवों को शब्दों में पिरोने का काम गांव की स्त्रियां नहीं, महानगरों में रहने वाली स्त्रियां कर रही हैं। संस्कृत में ए क श्लोक है, ‘सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियं’। हमारी संस्कृति में यह बात रही है। इसलिए किसी के बारे में कुछ बोलने या लिखने के पहले इसका ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए । इसमें संदेह नहीं कि आत्मकथा या कहानी के जरिए अपनी या अपने पति की जिंदगी के अंतरंग प्रसंगों को लिखा जाना एक साहस का काम है। इसे नकारात्मक ढंग से न लेकर सकारात्मक ढंग से लिया जाना चाहिए । ए क स्त्री ने जो झेला है, भोगा है, वह लिख रही है। लेकिन सवाल यह है कि इसका साहित्यिक स्तर क्या है। आ॓मपुरी के मामले में बाजार एक बड़ा फैक्टर है। स्त्रियों द्वारा अंतरंग प्रसंगों को लिखा जाने का मामला इतना सरल नहीं है जितना समझा जा रहा है। यह आत्मकथा है तो साहित्यिक स्तर देखा जाना चाहिए ।

पति-पत्नी या किसी स्त्री के द्वारा किसी पुरूष या अपने पति के किसी स्त्री के साथ अंतरंग संबंधों को शब्दों को पिरोकर पन्नों में समेटने के मामले में जेहन में पहला नाम कमला दास का आता है। इन्होंने अपने दौर में ‘माई स्टोरी’ लिखकर न सिर्फ अंग्रेजी में बल्कि साहित्य जगत में एक बहस की शुरूआत की थी। इसके बाद अमृता प्रीतम में ‘रसीदी टिकट’ लिखा। कालांतर में अपने संबंधों और पब्लिक स्पेस के साथ-साथ जिंदगी की राहों पर मुश्किलों से रूबरू होने की कहानी तसलीमा नसरीन ने ‘द्विखंडिता’ के जरिए पेश किया। ऐसे ही समय में मन्नू भंडारी ने ‘एक कहानी यह भी’, प्रभा खेतान ने ‘अन्या से अनन्या तक’, मैत्रेयी पुष्पा ने ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ से स्त्रीवादिता के नए आयाम को जन्म दिया।
अनामिका, कवियित्री : कुछ घाव छोटे होते हैं और जब पछुवा चलती है तो गुमचोट या
गुमजोड़ों का दर्द उभरकर सामने आ जाता है। पश्चिम का प्रभाव बुरा नहीं होता क्योंकि
गांधीजी से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था खिड़कियां खुली रखी जानी चाहिए । इससे
प्रभावित लेखनी भी बुरी नहीं है। सामान्य तौर पर जब लड़कियां ससुराल जाती हैं तो कहा
जाता है कि दोनों घरों के सुख-दुख तुम्हें देखने हैं, मुंह सील कर रखना। पिटाई खाकर भी वह सब कुछ सहती है, खुद को भूल जाती है, कई दिक्कतों के साथ घर-गृहस्थी चलाते-चलाते वह खुद को हाशिये पर ला खड़ा करती हैं। स्त्री-पुरूष संबंधों में दो तकलीफें हैं, पहला कामना का सरप्लस मतलब यौनानुराग। हर स्त्री चाहती है कि उसका पुरूष जितेंद्रिय हो, लेकिन घर-गृहस्थी में फंसे होने के कारण स्त्री खुद पर ध्यान नहीं देती और पुरूष दूसरों के आकर्षण में रीझ जाता है। दूसरा है गुस्सा, बाहर का गुस्सा घर में उतारा जाता है। पुरूषों को बाहर में काफी कुछ झेलना होता है, इस कारण घर में स्त्री साफ्ट टारगेट बनती है। स्त्री-पुरूष की लड़ाई न तो दो वर्गों की लड़ाई है और न ही दो जातियों के बीच। यह गोरे-काले की भी लड़ाई नहीं है और न ही यहां सत्ता परिवर्तन का व्याकरण ही लागू होता है। स्त्री आंदोलन प्रतिशोध का आंदोलन नहीं है। परिवार में पीढ़ियों के बीच जेंडर का मुद्दा संवाद के जरिए सुलझाया जा सकता है। यहां भेड़-भेड़िये का रिश्ता नहीं है। तसलीमा नसरीन से लेकर मैत्रेयी पुष्पा ने वही लिखा है जो उसने पब्लिक स्फेयर में महसूस किया। जब वे किसी संपादक से मिलती है, गॉड फादर से मिलती है या किसी और से। प्रेम तो सबसे बड़ा लोकतांत्रिक स्पेयर है। यदि आप किसी स्त्री से पूछें तो वह यही कहेगी तो उसका शरीर तो ए कमात्र ढोल है जिसे वह जबर्दस्ती ढोने के लिए मजबूर हैं। यही कारण है कि पब्लिक स्पेयर में जाने से वह घबराती है कि पता नहीं क्यों होगा। जो स्त्रियां ऐसे लिख रही हैं उनका संवाद आने वाली पीढ़ियों से है, किशोरों से है, युवाओं से है। अंतरंग संबंधों को लेकर उनको शर्मिंदा करना ए क भाव होगा लेकिन इसके जरिए संदेश देने का काम कर रही हैं।
सामान्यतौर से लोग नकारात्मक उदाहरणों से सीखते हैं। यह इसलिए लिखा जा रहा है कि
आने वाली पीढ़ी अपनी मां, बहनों की तकलीफों को समझे। इसलिए संदर्भ सहित बातें रखी
जाती हैं। क्योंकि जाने-अनजाने लोग ऐसा करने से एक बार सोचें। यह लेखन आत्मनिरीक्षण का एक अवसर देता है।

क्या वास्तव में पति-पत्नी संबंध या जीवन के किसी मोड़ पर पर स्त्री या पर पुरूष से मुलाकात व संबंधों की यह विवेचना गंभीर साहित्य पर सवाल खड़ा नहीं करती? क्या समाज की नैतिकता इस कदर विलुप्त हो चुकी है कि साहित्यकारों व पत्रकारों को निजी जिंदगी के तमाम पहलुओं में बाजार दिखता है जिसे सार्वजनिक किए जाने के बाद ‘नेम’ व ‘फेम’ दोनों उनके कदम चूमती है? जो साहित्य कभी अच्छे मूल्य से समाज को रूबरू कराता था क्या उस समाज में मूल्य खत्म हो गए हैं, यह वह समाज ही नहीं है जो मूल्यों को जान सके? क्या पूंजीवाद इतना हावी हो गया है कि हर चीज बतौर माल बाजार में पेश आने लगी हैं? आरोप है कि नोबल पुरस्कार विजेता बी.एस. नायपाल ने अपनी पत्नी से जानबूझकर उनके वेश्यालयों में जाने की कहानी पाठकों के सामने लाने का काम किया था।
चाहे नेहरू-एडविना को लेकर किताब लिखे जाने का मामला हो, या बेनजीर-इमरान की जिंदगी को लेकर लिखे अंतरंग संबंध के किस्से, इनके सनसनीखेज खुलासे से चर्चा में आना लाजिमी है। चाहे प्रकाशक हो या लेखक, सालों मेहनत के बाद किताब को प्रकाशित करता है तो इस पूंजीवादी युग में वह इसका आर्थिक लाभ की चाहत भी रखता है। यही कारण है कि वर्ल्ड बुक फेयर से कुछेक समय पहले पत्रकार नंदिता पुरी ने इस किताब को पाठकों के सामने रख बाजार को देखते हुए विवाद जानबूझकर विवाद पैदा करने का काम किया है।
यही कारण है कि वर्तमान दौर में लेखन एक ऐसा व्यवसाय का रूप लेता जा रहा है जहां जीवन के मूल्य, अंतरंग संबंध गौण हो गए हैं। यही कारण है कि ‘सच का सामना’ में जिन अंतरंग संबंधों को लेकर सवाल किए जा रहे थे और जवाब देकर पैसे कमाए जा रहे थे, वहां नैतिकता, सामाजिकता और मर्यादा कोई मायने नहीं रखती थी बस मायने था तो पब्लिसिटी और पैसा। अंतरंग संबंधों का खुलासे करने के मामले में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि महानगरों में रहने वाली मुट्ठी भर स्त्रियां अपनी अभिशप्त जिंदगी को लोगों के सामने रखने का साहस कर रहीं हैं। वह भी तब जब पुरूषप्रधान समाज अपनी नंगई करने से बाज नहीं आता। पर्दे के पीछे और घर में हाड़तोड़ काम करने के बाद उसके शब्द लोगों को चटखारे लेकर पढ़ने के लिए आकर्षित करें, यह सामान्य बात नहीं है।

7 टिप्पणियां:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी November 15, 2009 8:42 PM  

अन्तरंगता बिकने के लिए तैयार हो जाती है तो बाजार में उसका दाम लगाने वाले मिल ही जाते हैं। यह आवरण ही है जो किसी चीज को कीमती बनाता है। आवरण हटाने की ही कीमत लगती है।

Mired Mirage November 15, 2009 9:20 PM  

अपने बारे में लिखना सही है किन्तु किन्हीं अन्य स्त्रियों से पति के सम्बन्धों के बारे में लिखना उन स्त्रियों व यदि पति असहमत हो तो उसके प्रति भी अन्याय है। अपनी अन्तरंग बातें जब कोई अपने साथी को बताता है तो यह सोचकर कि वे बाहर नहीं जाएँगी।
मैंने पुस्तक तो नहीं पढ़ी सो अधिक नहीं कह सकती।
घुघूती बासूती

MANOJ KUMAR November 16, 2009 8:54 AM  

इक्कीसवीं सदी में भी सामंती रूढ़ियों वाले पुरु-प्रधान समाज में नारी के लिए आत्माभिव्यक्ति में कितनी कठिनाई हो सकती है, यह सहज अनुमेय है। आपकी मान्यता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यह सामयिक प्रश्नों का उत्तर देने के साथ-साथ जीवन के शाश्वत मूल्यों से भी जुड़ी है। जीवन की सच्चाई को सच साबित करती एक बेहतरीन रचना के लिए बधाई।

लवली कुमारी / Lovely kumari November 16, 2009 10:15 AM  

लेखन के स्तर पर बाजारवाद हावी है ..बुरी स्थितियां है.

डॉ .अनुराग November 16, 2009 12:51 PM  

सच तो ये है के हम सब भी चटखारे ले ले कर उन्ही उधडी चीजो को पढ़ते है ...जिन्हें असामाजिक माना जाता है .वैसे भी भारतीय समाज में सेक्स एक टेबू की तरह है ..किसी ने भी जरा सा लिखा .शोर मच जाता है चाहे इशारो में ही क्यों न हो....हाँ तसलीमा नसरीन ओर खुशवंत सिंह जैसे लोग जरूर इसे इंटेंश्न्ली लिखते है जानते बूझते हुए के क्यों लिख रहे है .....लेकिन हम भी अक्सर अपने आदर्शो या सेलिब्रेटी के बारे में अक्सर ये भूल जाते है के वे भी मनुष्य है ...उनमे भी मानवीय गुण दोष है हमारे जैसे ....सार्वजनिक तौर पे हम किसी बात को नहीं स्वीकारते भले ही भीतर से हम जानते हो ये सच है ...जब गांधी अपने प्रयोगों के बारे में लिखते है तो हम वह वह कह कर तालिया बजाते है ..या उन पर चर्चा करने पर हमें चुप करा दिया जाता है ये कहकर के ख़बरदार वे महान है ....माना की आज हर चीज का बाजारीकरण है...प्रकाशक का अपना फायदा है .किताब बिकवाने का स्टंट .पर ओम पूरी को कितने लोगो ने घेरा है उसके बाद ....क्यों ?क्या मन्नू भंडारी ने गलत कहा सच कह कर .....हाँ प्रभा जरूर बेबस लगी पूरी किताब में जानते बूझते उस आदमी से जुडी रही असुरक्षा की भावना लेकर....वो आदर्श नहीं है....कुछ दिनों पहले सुधा अरोडा ने आलोक धन्वा को लेकर कुछ सवाल उठाये थे .....तो क्या हम रचनाकार को विभाजित करे व्यक्ति ओर रचनाकार में ....

मुनीश ( munish ) November 18, 2009 8:42 AM  

Your concerns are valid and appreciable , but my dear It makes more sense to watch 'Basic Instinct' again than to read all such cheap stuff as described here.Do u have copy of Om's Biography by the way ? I'll return it soon! :)

काजल कुमार Kajal Kumar November 21, 2009 11:31 AM  

नोटों की दुनिया है...
किताब बेचने को ये कुछ भी करेंगे
पहले का छपास रोग आज नोटास रोग हो गया है