Tuesday, December 22, 2009

मैंने अभी तक प्रेम से सुन्दर कुछ भी नहीं देखा


इधर कुछ दिनों या कुछ महीनों से बहुत सारी प्रेम कविताओं को पढ़ा है। यह क्रम अब भी जारी है। उम्मीद है कि 'जिन्दगी की धूप में घना साया' की तलाश करते हुए यह क्रम आगे भी चलता ही रहेगा। हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया में विश्व कविता के अथाह समुद्र से एक बूँद या उससे कम भी कोशिश के एक हस्तक्षेप के रूप में अपनी पसंदीदा कविताओं से आपको रू - ब -रू करवाना और कुछ - कुछ साझा करने की कड़ी में आज प्रस्तुत है ज़िबा शिराज़ी की एक कविता का अनुवाद :





स्वप्न
/ ज़िबा शिराज़ी*



एक रात मैंने सपना देखा -
कि मैं बादलों के बीच विचर रही हूँ
कि मैं आसमान में दौड़ लगा रही हूँ
कि मैं एक अकेली मुस्कुराहट के लिए दो सितारे तोड़ लाई हूँ
मैंने चाँद के घर में छिटकी चाँदनी देखी
और यूँ ही चहलकदमी करते हुए मैं पहुँच गई सूर्य तक।

मैंने बादलों की छाँव में बरसती बारिश देखी
और छू लिया आकाशगंगा का छोर
मैंने सब कुछ देख लिया
और नाप ले लिया अनंत व्योम का।

किन्तु मैंने अभी तक
प्रेम से सुन्दर कुछ भी नहीं देखा
भाग्य की कृपा है कि मैं स्वर्ग की सैर कर आई
और स्वयं से प्रश्न किया-' वह कौन है जिसने हमें ढाला है?'
कौन है वह जो लिखता ही जाता है मनुष्यता कथायें
और हमें सिखलाए जा रहा है कि अच्छा क्या है, बुरा क्या?

अब जबकि मैं
स्वर्ग के रहवासियों के साथ कर आई हूँ संवाद
और सुनकर आई हूँ हजारों जिन्दगियों का कथासार
सब यही कहते हैं कि चलता ही रहता है जीवन
तब भी
जब दिन होते हैं बुरे
और तब भी जब दिवस होते हैं प्रसन्नता से परिपूर्ण।
स्वप्नों का क्या कहा जाय
वे तो होते हैं मात्र स्वप्न
और जीवन चलता ही रहता है अविराम
एक दिन जल की तलाश में भटकते - भटकते
मरीचिका - सा चुक जाता है जीवन राग।

जब से खुली है नींद
विचारों का पीछा किए जा रही हूँ
जिसको भी देखा है ; जिससे भी हुआ है संवाद
उन सभी के लिए लाई हूँ एक समाचार।

मैं तुम्हारे कानों में फुसफुसाकर
जो सुना है, वही कुछ कहना चाहती हूँ
इसलिए
सारे प्रेमियों के लिए यही है छोटा -सा संदेश -
कि 'आई लव यू' कहने से
आज तक कभी नहीं हुई है किसी की मौत।

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* ज़िबा शिराज़ी : एक कवि , एक गीतकार एक गायिका। ईरान में जन्म , अमरीका में निवास। उनकी कुछ और कविताओं के अनुवाद जल्द ही। ** चित्र: गूगल सर्च से साभार

7 comments:

परमजीत बाली said...

बढ़िया रचना प्रेषित की है।आभार।

डॉ महेश सिन्हा said...

शीर्षक पढ़ने के बाद और कुछ नहीं बच जाता पढ़ने के लिए ()()() तालियाँ

शरद कोकास said...

कविता पढते हुए स्वप्न देखना है या स्वप्न देखते हुए कविता पढना है समझ मे नही आ रहा है ..।अनुवाद कुछ और लिरिकल होता तो ज़्यादा आनन्द आता ।

वन्दना said...

sach kaha........prem se sundar kuch nhi hai kyunki prem hi khuda hai aur khuda ka doosra roop prem hi hai to usse sundar aur kya ho sakta hai.

शायदा said...

सुंदर कविता, सुंदर अनुवाद।

शायदा said...

सुंदर कविता, सुंदर अनुवाद।

निर्मला कपिला said...

वाह बहुत सुन्दर कविता । अनुवाद के लिये धन्यवाद्