Friday, March 18, 2011

मयाड़ घाटी -- 10


“दम ले ले ;


उदयपुर पहुँचते हैं तो धूप जा चुकी है. माहौल एक दम सर्द सा है. बच्चे स्कूल से लौट रहे हैं. चौहान जी को हाथ का सहारा दे कर ट्रक से उतारता हूँ. उन की हथेलियाँ एक दम बरफ हो रहीं हैं. पैर भी ठीक से टिक नही रहे हैं. जब वो डाले के पीछे Horn * OK* Please लिखी जगह से घिसटते हुए उतर रहे थे तो उन के बायें पाँयचे पर एक गीला धब्बा नज़र आ रहा था. सह्गल जी मफलर में मुँह छिपाए खूब हँसे हैं. हो गया काम इस का तो. अरे नहीं सर, ठेले पर बरफ चिपका था. उस पर बैठने से भीग गया है.

मेरा मन है कि सब से पहले कुछ खा लिया जाय. लेकिन चौहान जी का विचार था कि पहले मन्दिर में माँ के दर्शन कर लिए जाएं. यहाँ प्रख्यात मृकुला मन्दिर है, जिस में लकड़ी की नक्काशी के अद्भुत नमूने हैं. महिषासुर मर्दिनी की बेशकीमती काँस्य प्रतिमा है. पुजारी जी ने इतिहास , पुराण , मिथक और दंतकथाओं की पंचमेल खिचड़ी हमे सुनाई. सब से पहले यहाँ केवल एक घर होता था पुजारियों का. यह परिवार काश्मीर से आ कर यहाँ बस गया था. माँ खुद बंगाल से आईं थीं. महिषासुर को यहीं मौत के घाट उतारा . आज पुजारियों के आठ परिवार बन गए हैं. उदय पुर गाँव में आज 70 के करीब घर हैं. सब इधर उधर से आ कर बसे हुए. ये संख्या बढ़ ही रही है. यहाँ उपमण्डल कार्यालय है. लेकिन बाज़ार में मात्र एक ही ढाबा है. मामू ढाबा. मामू को हम ने ताश की जुंडली से उठा कर लाया है. ताकि हमारे लिए भोजन बना सके. सुबह के भूखों ने खूब छक कर खाया है. इतना, कि रात को कुछ खाने की ज़रूरत ही न पड़े.

भोजन के बाद चाय पीते हुए सहगल जी ने गाईड का मशहूर गीत “मुसाफिर, जाएगा कहाँ” सुनाया है. सहगल जी बहुत अच्छा गाते हैं. जवानी में सब उन्हे कुन्दन लाल सह्गल पुकारते. इसी से यह तखल्लुस पड़ गया. वर्ना उन का असल नाम तो त्सेरिङ फुंत्सोग है ! “दम ले ले , घड़ी भर, यह छईंयाँ पाएगा कहाँ .. ओ मुसाफिर, ..... वहाँ कौन है तेरा ?” एक पुर सुकून संगीत ने मुझे उनींदा कर दिया है.

जब हम पुल पार कर पी डब्ल्यू डी रेस्ट हाऊस की तरफ सोने जा रहे थे तो सहगल जी ने मयाड़ घाटी का प्रवेश द्वार दिखाया. कल इसी नाले के अन्दर जाना है हमें. मैं उत्तेजित हूँ . चौहान जी आशंकित और सहगल साब उदासीन..... चौकी दार से एक हीटर माँग कर हम तापते रहे. वे लोग तो रज़ाई और हीटर की गरमाहट में जल्द ही बेसुध हो गए हैं. लेकिन मैं सोने से पहले दिन भर के अनुभव दर्ज कर लेना चाहता हूँ. बाहर असहज चुप्पी है. पिछवाड़े की झाड़ियों में एक लोमड़ी रात भर रोई है. मुझे कतई नींद् नहीं आ रही लेकिन अपने जूते - मोजे सुखा लिए हैं.

2 comments:

नीरज गोस्वामी said...

होली की हार्दिक शुभकामनाएं

नीरज

प्रवीण पाण्डेय said...

मुसाफिर जायेगा कहाँ..