Wednesday, March 7, 2012

फिल्मों का क्रेज़ और वो ज़माना - 3

(पिछली किस्त से आगे)


सिनेमा की टिकटों के लिए खिड़की खुलने से काफी पहले ही लम्बी क़तार लग जाया करती थी. टिकट क्लर्क सरकारी बाबुओं की तरह कुछ देर से आकर आसन ग्रहण करता और बड़े इत्मीनान से टिकटों की गड्डियों पर तीन जगह मोहर लगाता था. उस वक़्त हम पर उसका बड़ा रुआब पड़ता था. वह भी खुद को किसी तहसीलदार से कम क्या ही समझता होगा. टिकट खिड़की के छोटे से छेद से टिकटार्थियों की तीन-चार कलाइयां अंदर घुसी रहतीं. टिकट के लिए अक्सर मारपीट हो जाया करती थी. बुकिंग क्लर्क से अगर आपकी सेटिंग है तो वह आपको ऐसी जगह टिकट दे सकता था जहां बगल में लडकियां बैठी हों. टिकटों की कालाबाजारी भी हुआ करती. तब के कई टिकट ब्लैक करने वाले आज कहाँ के कहाँ हैं. सब धंधे हैं. तब उनका धंधा टिकटों की कालाबाजारी था आज जो है वह मान्यताप्राप्त है, जिसमें पैसा और इज्ज़त है.

कभी कभार सरकार को लगता कि यार यह फिल्म तो समाज को कोई सन्देश भी दे रही है, मनोरंजन के साथ साथ दुर्घटनावश ही सही. तो वह फिल्म करमुक्त कर दी जाती. मतलब कि टिकट का दाम कुछ कम. सबसे अगली क्लास का टिकट डेढ़-पौने दो रुपये का. ऐसे में हम काफी खुश होते. मशक्कत कम करनी पड़ती थी. कई बार तो सेकेण्ड क्लास का टिकट भी हमारी पहुँच में आ जाता था. उमराव जान, दूल्हा बिकता है और गांधी जैसी फ़िल्में टैक्स फ्री थीं. यूँ तो बच्चों का पिक्चर देखना बुरा माना जाता है लेकिन कभी-कभी शिक्षा विभाग के अधिकारियों और अध्यापकों को लगता था कि यह पिक्चर बच्चों को भी देखनी चाहिए. अध्यापक सर्वज्ञाता होता है और शिक्षा विभाग का अधिकारी तो त्रिकालदर्शी होता है. तो उनको जो लगता होगा ठीक ही लगता होगा. तो जब उन्हें ऐसा लगता तो वे बच्चों को सूचित कर देते. बच्चे घर से पैसे मांग लाते टिकट के मूल दाम से शायद कुछ कम. अध्यापकों के नेतृत्व में बच्चों का जुलूस सिनेमा हॉल जा पहुँचता. बच्चे अगली कतारों में बिठा दिए जाते. मास्टर लोग काफी पीछे बालकनी में. बुद्धू बच्चे जिस तरह सबसे पीछे यानी बालकनी में बैठते हैं.

कम ही लोगों को पता होगा कि पैसे अगर कम हों तो "डबलिंग" पद्धति से भी पिक्चर देखी जाती थी. आविष्कार की पैदाइश का आरोप आवश्यकता पर लगता आया है इसलिए डबलिंग की खोज हुई. डबलिंग मतलब कि एक सीट पर बैठकर दो लोग फिल्म देखते. एक के पास टिकट के पूरे पैसे दूसरे के पास लगभग आधे. एक टिकट लिया जाता, आधे पैसे गेटकीपर को बतौर सुविधाशुल्क दिए जाते कि माई-बाप हमें  डबलिंग कर लेने दे.  तू हमारी सीट पर एक ही आदमी को देखना. डबलिंग के लिए लाजिमी था कि दोनों दोस्त हों. अनजान आदमी के साथ यह पद्धति कारगर नहीं हो सकती थी और यह सब फटीचर क्लास में ही हो सकता था, बालकनी वगैरह में नहीं. डबलिंग के लिए अगर पैसे न हों तो खुजली मिटाने का एक और तरीका था. हॉल के बाहर दरवाज़े से कान सटाकर भीतर चल रही पिक्चर की आवाजें सुन्ना. जैसे भूखा आदमी दूर से खाना तो देखे पर खा न पाए. यह तरीका अपने को कभी पसंद नहीं आया. क्योंकि एक तो किसी भी चीज़ के लिए अपने को एक हद से नीचे गिराना ठीक नहीं, दूसरे फिल्म देखने की चीज़ है सुनने की नहीं.

(जारी)

1 comment:

Sonal Rastogi said...

filmo kaa diwanapan :-)