Monday, October 1, 2012

और अब फौजी भाइयों के लिए ...


जब छोटा था तो बड़े भैया (ताउजी के लड़के) को अलग अलग दौर से गुजरते देखा | जहाँ एक तरफ उन्हें सैनिक फिल्म के "कितनी हसरत है हमें, तुमसे दिल लगाने की " गाते हुए देखा , साल दो साल बीतते न बीतते उन्हें "धरती हमरा गढ़वाल की" पे आते हुए भी देखा | कमोबेश यही हालत मामाओं की भी थी | जिसे मैं बेवकूफी और निम्न-जीवों के कार्यक्रम समझता था | थोड़ा बड़ा हुआ तो यह समझने लगा कि प्रवासी पक्षियों को कुछ कुछ दिनों में खुद (नराई , याद) का दौरा चढ़ने लगता है, जिससे में अछूता हूँ और रहूँगा | अभी बढती उम्र में ही हूँ , इसलिए कई सारी गलतियाँ करूँगा ये भी मुझे पता ही है | कई ऐसे लोगों और लेखों से प्रभावित होऊंगा जिन्हें एक वक़्त बीत जाने के बाद मैं सिरे से नकार भी सकता हूँ , फिर से अपना भी सकता हूँ | उन्हीं में से एक पर्यावरण का भी है | मैं भी बहुत कहता हूँ , पेड़ बचाओ , पेड़ बचाओ | कई रोज़ पहले इसे ही बड़ा मुद्दा समझता था | 

तीन चार साल से अनजान परदेस में रह कर अब कुछ और महसूस करता हूँ | ऐसा नहीं कि पुणे में मुझे कुछ तकलीफ है , और आपका महान देश विविधताओं से भरा हुआ किंतु एकता के सूत्र में बंधा नहीं है | और ऐसा तो बिलकुल नहीं कि मुझे इस शहर ने कभी दुत्कारा या भगाया हो | लेकिन दिल के किसी कोने में अब ये चीज शिद्दत से महसूस होने लगी है कि काश ये सब मेरे घर के पास होता | ऋषिकेश से भी कोई दस घंटे की थकान भी पहाड़ी यात्रा करने के बाद मेरा गाँव आता है(नाम की जरुरत नहीं पड़ेगी), और उसमें आते हैं वो लोग , जिनके पास नौकरी के नाम पे या तो पंडिताई करके एम पी और पंजाब हरियाणा भागने का सुअवसर होता था, या फिर फौज में भर्ती होने का | नौकरी के इस अभाव को हम लोग पंडिताई के आडम्बर से , और देशसेवा के छद्म उपमानों से ढकने की बेहद सफल कोशिश करते हैं | एक जगह फ़ालतू का पैसा है, दूजी जगह दारु बहुत है | सूरज अस्त, पहाड़ी मस्त | हम ठग लोग भोले भाले दुनिया वालों को बेवकूफ बनाकर, बिना मेहनत किये पैसा कमाते है | 

अभी हमारे पास एक और पेशा बहुतायत में आया है , होटल में जॉब करने का | बहुत आसान पैसा है | कहीं से होटल मैनेजमेंट का कोर्स करो, किसी सिफारिश से किसी तीन -चार -पाँच स्टार वाले होटल में लग जाओ (यह पूरी तरह सुनिश्चित है कि आपका कोई चचा मामा वहाँ पहले से होगा |) और विदेश जाने का रास्ता ढूंढो | पहाड़ बेहद तरक्की पर हैं , कई लोग विदेश में हैं | आजकल बाबा रामदेव के सौजन्य से योगा(योग नहीं प्लीज़) करके विदेशियों को जाकर सिखाने का  धंधा भी खूब चल निकला है | पुणे में बैठकर कभी अचानक कोई समाचार उत्तराखंड का हाथ लग जाता है तो पता चलता है कि सरकार ने ये बना दिया वो बना दिया | प्रदेश ऐसा कुछ हो गया कि मेरे वापस जाने पर शायद मुझे पता भी न चले कि मैं पहुँचा हूँ , या अभी कुछ और दूर है | लेकिन हफ्ते हफ्ते वही फ़ोन आते हैं, राजू चाइना गया, चंदू जापान गया, सीश्पाल ले गया अपने होटल में | अर बेटा त्वे कति मिलदी | 
  
[खूबसूरती का ठेका अकेले मेरे देश ने नहीं उठा रखा,
 केप ऑफ गुड होप , साउथ अफ्रीका ]
आज यह सब इसलिए याद नहीं कर रहा हूँ कि मुझे खुद लग रही है | न ही मुझे उत्तराखंड नवनिर्माण सेना में कोई दिलचस्पी है | बस ऐसे ही दिमाग में आ गया | हर जगह की अपनी स्पेशलटी है , अगर उत्तराखंड में आई टी कंपनीस आएँगी तो क्या बेंगलोर को देवभूमि ? लोग पेड़ बचाओ करते हैं, कहते हैं कि सब अच्छा होना चाहिए | बाँध बनने से नुक्सान हैं, जंगल में आग बहुत लग रही, पहाड़ से पलायन रुके, पर्यावरण बचाओ, अबे साला पर्यावरण बचाने का हमने ठेका ले रखा है क्या ? हमारे पास क्या सिर्फ पर्यावरण ही है क्या ? हम क्या खाएं | घर पर कुछ खाने को हैं नहीं , बाहर कुछ खाने जाओ तो उन्हें जरूरत नहीं | टूरिस्म बढाओ , अपने घर की बारे में बात करता हूँ तो अपने आप आवाज कुछ सीखे सिखाये गाइड जैसी हो जाती है | जहाँ मेरा कॉलेज है न पौड़ी में, वहाँ दिसंबर में बर्फ गिरती थी , आह बादल नीचे की तरफ दिखते थे , सिरीनगर की तरफ | और पहाड़ के टॉप पे हम | जाना है यार किसी दिन तुम लोगों के यहाँ , अभी इस गर्मियों में मम्मी पापा के साथ एक टूर ऋषिकेश , हरिद्वार का लगाने वाला हूँ मैं | ऐसा ही है न वो ? हरिद्वार कहीं से उत्तराखंड नहीं है लेकिन हाँ में गर्दन हिला देता हूँ मैं | उन लोगों को हरिद्वार की कोई जरूरत नहीं, और बाकी पहाड़ की तो बिलकुल नहीं | "अभी तक मराठी तो आही गयी होगी तुम्हें , मेरे ख़याल से अगर तुम कहीं रह रहे हो पाँच साल से ऊपर तो तुम्हें वहाँ की लेंगुएज आनी चाहिए |" और मुझे याद आता है कि मोबाइल में "धरती हमरा गढ़वाल की" मैंने बहुत दिन से सुना नहीं है |

(बहुत सारी बातें छूट गयी हैं , बेहतर है उन्हें छूटा ही रहने दिया जाए | और आइये अब फौजी भाइयों के लिए हमारे कार्यक्रम के तहत यह गाना ... )


1 comment:

Darshan said...

माना कि लिखने कि आजादी है ..माना कि गलती मेरी ही है कि मैने पढ़ डाला ... frustration लौटता सा दिखा ... कबाड़खाने को कबाड़ बाना डाला..