Thursday, October 4, 2012

मंटो के मीराजी -१




सआदत हसन मंटो के इस संस्मरण को मैं कभी भूल नहीं सका. उर्दू के जिन नामी शायर मीराजी की याद में लिखा गया यह संस्मरण आप के वास्ते पेश है, उनकी एक ग़ज़ल नगरी नगरी फिरा मुसाफिर घर का रस्ता भूल गया" को अपने अलबम हसीन लम्हेमें गुलाम अली ने गाया था.

तीन गोले

हसन बिल्डिंग के फ़्लैट नम्बर एक में तीन गोले मेरे सामने मेज़ पर पड़े थे. मैं गौर से उनकी तरफ देख रहा था और मीराजी की बातें सुन रहा था. इस शख्स को पहली बार मैंने यहीं देखा. गालिबन सन चालीस था. बंबे छोड़कर मुझे देहली आए कोई ज्यादा अरसा नहीं गुजरा था. मुझे याद नहीं कि वह फ़्लैट नम्बर एक वालों का दोस्त थे, या ऐसे ही चला आया था. लेकिन मुझे इतना याद है कि उसने यह कहा था कि उसको रेडियो स्टेशन से पता चला था कि मैं निकल्सन रोड पर हसन बिल्डिंग में रहता हूँ.

इस मुलाक़ात से क़ब्ल मेरे और उसके दरम्यान मामूली से ख़त-ओ-किताबत हो चुकी थी. मैं बंबई में था, जब उसने अदबी दुनियाके लिए मुझसे एक अफ़साना तलब किया था. मैंने उसकी ख्वाहिश के मुताबिक़ अफ़साना भेज दिया, लेकिन साथ ही यह भी लिख दिया कि उसका मुआवजा मुझे ज़रूर मिलना चाहिए. इसके जवाब में उसने एक ख़त लिखा: मैं अफ़साना वापस भेज रहा हूँ इसलिए कि अदबी दुनियाके मालिक मुफ्तखोर किस्म के आदमी हैं.” – अफ़साने का नाम मौसम की शरारतथा. इस पर उसने एतिराज़ किया था कि उस सरारत का मौजूं से कोई ताल्लुक नहीं, इसलिए उसे तब्दील कर दिया गया जाए. मैंने इसके जवाब में उसको लिखा: मौसम की शरारत ही इस अफसाने का मौजूं है. मुझे हैरत है यह तुम्हें क्यों नज़र न आई.मीराजी का दूसरा ख़त आया जिसमें उसने अपनी गलती तस्लीम कर ली और अपनी हैरत का इज़हार किया कि मौसम की शरारत में वह मौसम की शरारतमैं क्यों देख न सका.      

मीराजी की लिखाई बहुत साफ़ और वाज़े थी. मोटे ख़त के निब से निकले हुए बड़े सही निशस्त के हुरूफ़, तिकोन की सी आसानी से बने हुए, हर जोड़ नुमायाँ मैं इस से बहुत मुतास्सिर हुआ था. लेकिन अजीब बात यह है कि मुझ इस में मौलाना हामिद अली खान मुदीर हुमायूँकी खत्ताती की झलक नज़र आई. यह हल्की सी मगर काफी मरई मुमासलत-ओ-मुशाबहत अपने अन्दर क्या गहराई रखती है इसके मुताल्लिक मैं अब भी गौर करता हूँ तो मुझे कोई ऐसा शोशा या नुक्ता सुझाई नहीं देता जिस पर मैं किसी मुफूज़े की बुनियादें खड़ी कर सकूं.

हसन बिल्डिंग के फ़्लैट नंबर एक में तीन गोले मेरे सामने पड़े हुए थे और मीराजी लम-तड़ंगे और गोल-मटोल शेर कहने वाला शाइर मुझसे बड़े सही क़द-ओ-क़ामत और बड़ी सही नोक-पलक की बातें कर रहा था, जो मेरे अफसानों के मुताल्लिक थीं. वह तारीफ कर रहा था, न तन्कीस. एक मुख़्तसर सा तब्सिरा था एक सरसरी सी तनक़ीद थी मगर उस से पता चलता था कि मीराजी के दिमाग में मकड़ी के जाले नहीं. उसकी बातों में उलझाव नहीं था, और यह चीज़ मेरे लिए बाइस-इ-हैरत थी, इस लिए कि उसकी अक्सर नज्में इबहाम और उलझाव की वजह से हमेशा मेरी फहम से बालातर रही थीं. लेकिन शक्ल-ओ-सूरत और वज़ा-क़ता के एतिबार से वह बिलकुल ऐसा ही था, जैसा उसका बेकाफ़िया मुब्हम क़लाम.

नून मीम राशिद बेकाफ़िया शाइरी का इमाम माना जाता है. उसको देखने का इत्तिफ़ाक़ भी देहली में ही हुआ था. उसका क़लाम मेरी समझ में आ जाता था सुर उसको एक नज़र देखने से उसकी शक्ल-सूरत भी मेरी समझ में आ गयी थी. चुनांचे मैंने एक बार रेडियो स्टेशन के बरामदे में पड़ी हुई बगैर मडगार्डों की साइकिल देख कर उस से अज-राहे-मज़ाक कहा था लो, यह तुम हो और तुम्हारी शायरी.लेकिन मीराजी को देख कर मेरे जेहन में सिवाय उसकी मुब्हम नज्मों के और कोई सूरत नहीं बनती थी.

मेरे सामने मेज़ पर तीन गोले पड़े थे. तीन आहनी गोले, सिगरेट की पन्नियों में लिपटे हुए. दो बड़े एक छोटा मैंने मीराजी की तरफ देखा. उसकी आँखें चमक रही थीं और उनके ऊपर उसका बड़ा भूरे बालों से अटा हुआ सर यह भी तीन गोले थे. दो छोटे-छोटे और एक बड़ा. मैंने यह मुमासलत महसूस की तो उसका रद्द-ए-अमल मेरे होठों पर मुस्कराहट से नमूदार हुआ मीराजी दूसरे का रद्द-ए-अमल ताड़ने में बड़ा होशियार था. उसने फौरन ही अपनी शुरू की हुई अधूरी बात छोड़कर मुझ से पूछा क्यों भईया, किस बात पर मुस्कराए?”

मैंने मेज़ पर पड़े हुए उन तीन गोलों की तरफ इशारा किया. अब मीराजी की बारी थी. उस के पतले पतले होंठ महीन-महीन भूरी मूंछों के नीचे गोल-गोल अंदाज़ में मुस्कराए.

उसके गले में मोटे-मोटे गोल मनकों की माला थी जिसका सिर्फ बालाई हिस्सा कमीज़ के खुले हुए कालर से नज़र आता था मैंने सोचा : इस इंसान ने अपनी क्या हैबत-ए-कज़ाई बना रखी है लम्बे लम्बे गलीज़ बाल जो गर्दन से नीचे लटकते थे फ्रेंच कट सी दाढी, मैल से भरे हुए नाखून सर्दियों के दिन थे. ऐसा मालूम होता था महीनों से उसके बदन ने पानी की शकल नहीं देखी.

यह उस ज़माने की बात है जब शायर, अदीब और एडीटर आम तौर पर लांड्री में नंगे बैठ कर डबल रेट पर अपने कपड़े धुलवाया करते थे और बड़ी मैली कुचैली ज़िन्दगी बसर करते थे मैंने सोचा, शायर मीराजी भी उसी किस्म का शायर और एडीटर है लेकिन उसकी गिलाज़त उसके लम्बे बाल उसकी फ्रेंच कट दाढी गली की माला और वह तीन आहनी गोले, मआशी हालात के मजहर मालून नहीं होते थे. उनमें एक दरवेशानापण था, एक किस्म की राहिबयत जब मैंने राहिबयत के मुताल्लिक सोचा तो मेरा दिमाग रूस के दीवाने राहिब रास्पोटीन की तरफ चला गया. मैंने कहीं पढ़ा था कि वह बहुत गिलाज़त का उसको कोई अहसास ही नहीं था. उसके नाखूनों में भी हर वक़्त में भी हर वक़्त मैल भरा रहता था. खाना खाने के बाद उसकी उंगलियाँ लिथड़ी होती थी. जब उसे उनकी सफाई मतलूब होती तो वह उंगलियाँ पास बैठी शहजादियों और रईसज़ादियों की तरफ बढ़ा देता. जो उनकी तमाम आलूदगी अपनी ज़बान से चाट लेती थी.


(जारी)         

2 comments:

Ek ziddi dhun said...

मंटो के संस्मरणों की वो छोटी सी किताब मुज़फ़्फ़रनगर में पढ़ी थी। उसे पढ़ने में जितना मजा आया था, कम ही आता है। एक तो मंटो उस जमाने में ले जाते थे, दूसरे उनके बहुत से पात्रों में और खुद उनके कहने के अंदाज में भी एक किस्म की खिलंदडी थी और कई बार लफंगई भी। मीराजी की बात सबसे अलग थी, वो और वो तीन गोले बरसों तक पीछा करते रहे। आखिर एक दिन करनाल से दिल्ली आकर दोबारा यह किताब खरीदनी पड़ी और सबसे पहले मीराजी पढ़े गए। अब अगरतला में तो वह किताब मिलने से रही तो कबाड़खाने का शुक्रिया।

RSTV said...

बहुत शानदार.