Thursday, January 10, 2013

एक दिन पौ सी फटेंगी छोटे शहर की लड़कियाँ



छोटे शहर की लड़कियाँ

-लाल्टू

कितना बोलती हैं
मौका मिलते ही 
फव्वारों सी फूटती हैं
घर-बाहर की
कितनी उलझनें
कहानियाँ सुनाती हैं

फिर भी नहीं बोल पातीं
मन की बातें
छोटे शहर की लड़कियाँ

भूचाल हैं
सपनों में
लावा गर्म बहता
गहरी सुरंगों वाला आस्मान है
जिसमें से झाँक झाँक
टिमटिमाते तारे
कुछ कह जाते हैं

मुस्कराती हैं
तो रंग बिरंगी साड़ियाँ कमीज़ें 
सिमट आती हैं
होंठों तक

रोती हैं
तो बीच कमरे खड़े खड़े
जाने किन कोनों में दुबक जाती हैं
जहाँ उन्हें कोई नहीं पकड़ सकता

एक दिन 
क्या करुँ
आप ही बतलाइए
क्या करुँ
कहती कहती
उठ पड़ेंगी
मुट्ठियाँ भींच लेंगी
बरस पड़ेंगी कमज़ोर मर्दों पर
कभी नहीं हटेंगी

फिर सड़कों पर
छोटे शहर की लड़कियाँ
भागेंगी, सरपट दौड़ेंगी
सबको शर्म में डुबोकर
खिलखिलाकर हँसेंगी

एक दिन पौ सी फटेंगी
छोटे शहर की लड़कियाँ.

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

पढ़ रही है, बढ़ रही हैं, इतिहास गढ़ रही है, छोटे शहर की लड़कियाँ।

अनुपम दीक्षित said...

छोटे शहर की लड़कियों की तरह आपकी भी यह रचना संभावनाओं से भारी है। लिखते रहिए लाल्टू जी।

लाल्टू said...

शुक्रिया मेरे भाई,
छब्बीस साल पहले हरदा में आवास के दौरान यह कविता लिखी थी। खुशी कि यह आज भी पढ़ी जा रही है।
लाल्टू