Thursday, June 20, 2013

शुतुरमुर्ग - मिलोश मात्सोउरेक की बाल कथाएँ - ४



शुतुरमुर्ग

शुतुरमुर्ग की टांगें निहायत लम्बी होती हैं और वह जब भी मुसीबत को आते देखता है, बड़े बड़े डग भरता हुआ भाग लेता है. शुतुरमुर्ग तेज़ दौड़ सकता है, सचमुच बहुत तेज़, पर बाज़ दफा बदनसीबी की टांगें शुतुरमुर्ग की टांगों से भी लम्बी होती हैं, बदनसीबियाँ भी कई किस्म की होती हैं, कुछ की टांगें छोटी और भारी भरकम होती हैं, और कुछ की पतली और लंबी, और इस बाद वाली श्रेणी से शुतुरमुर्ग भी नहीं बच सकता.

जब शुतुरमुर्ग पाता है कि पीछा करती अपनी बदनसीबी से वह जीत नहीं पाएगा तो वह जल्दी से इधर उधर नजर दौडाता है, और जहां भी रेत का ढेर दिखाई देता है, वहां पहुंचकर उसमें अपना सर गड़ा देता है. और इस दुनिया में बहुत रेत है, चरों तरफ़ रेत ही रेत है, इतनी रेत है जितनी कि रेत, जिसका एक अफसोसनाक नतीज़ा यह है कि शुतुरमुर्ग को अक्सर याद ही नहीं रह पाता कि किस जगह रेत के किस ढेर में उसमे अपना सर गाड़ा था.

तुम ऐसे शुतुरमुर्ग को आसानी से पहचान सकते हो क्योंकि वह बिना सर का इधर उधर भटकता हुआ, बिना खाए पिए, बिना सोये, रेत के ढेर को पैरों से टटोलता दिखाई देगा, और उसकी ये सारी कोशिश बेकार है क्योंकि ज़ाहिर है वह अपनी खोपड़ी का इस्तेमाल नहीं कर रहा.

इधर उसका सर रेत के अपने ढेर में घुसा हुआ बहुत खुश है, फूला नहीं समा रहा, अपने आप को शाबाशी देता हुआ कि देखो मैंने बदनसीबी को पीछे छोड़ दिया न, मैं जीत गया, मैं ज़्यादा चतुर निकला, ज़्यादा अक्लमंद निकला. उसे कोई आभास ही नहीं कि बाहर तारों-भरे आसमान के नीचे क्या हो रहा है, उसे खबर ही नहीं कि उसका शुतुरमुर्ग बयावान में भटकता है, अभागा शुतुरमुर्ग जो अपनी बदनसीबी से बच न पाया.

(अनुवाद – असद ज़ैदी, ‘जलसा’ – ३ से साभार)

2 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आज के शुतुरमुर्ग तो हम ही हैं

प्रवीण पाण्डेय said...

हमें लगा, हमारी बात हो रही है।