Wednesday, June 19, 2013

उत्तराखंड में आई आपदा - तय होनी चाहिए जवाबदेही भी


उत्तराखंड में आई आपदा के बहाने कुछ खरी-खरी

-पुरुषोत्तम शर्मा

उत्तराखंड में आई भयानक आपदा की पूरी तस्वीर अभी आनी बाकी है . अब तक जो भी तस्वीरें और रिपोर्ट सामने आ रही हैं वह चारधाम यात्रा स्थलों और मार्गों से जुड़ी हैं . जिन 75 हजार लोगों के फंसे होने और कुछ सौ के मरने या लापता होने की खबरें हैं वह भी तीर्थ यात्रियों से सम्बंधित एक अनुमान मात्र ही है . इस तबाही में स्थानीय लोगों व स्थानीय गाँवों का जो नुकसान हुआ है अब तक न तो उसकी सुध लेने का किसी को समय है और न ही राज्य सरकार के आपदा प्रबंध की योजना में ही ऐसा दिख रहा है . तबाही का मंजर बता रहा है कि मौतों का आंकड़ा हजारों में है. मगर हमारा कानून तो बरामद लाश को ही मृत मानता है . अब उस अलकनंदा , भागीरथी और गौरी के रौद्र रूप से कौन उन हजारों लाशों को खोज ला पाएगा ताकि हमारा कानून उन्हें मृत बता सके.
 
जरूर हमारी सेना और आई टी बी पी के जवान इस रेस्क्यू आपरेशन को जी जान से चला रहे हैं और उनकी प्राथमिकता रास्तों में फंसे यात्रियों का जीवन बचाना और रास्तों को खोलना है ताकि राहत दल और राहत सामग्री प्रभावित क्षेत्रों तक पहुँच सके. मगर जितने बड़े पैमाने पर तबाही हुई है उसमें इस तरह से कई जगहों तक पहुँचने में महीनों लग सकते हैं, ऐसे में यात्रा मार्गों के साथ ही तबाह हुए दूरस्थ गावों तक तत्काल राशन, दवाएं, कपड़े और तिरपाल समय पर पहुचाने के लिए राहत में लगे हेलीकॉप्टरों की संख्या दो गुना से ज्यादा करनी चाहिए ताकि सेना जल्द से जल्द सभी पीड़ितों तक राहत व बचाव अभियान चला सके. यह जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि ज्यादातर जगहों पर लोग राशन व दवा के बिना जिन्दगी बचाने के लिए असहाय पड़े हैं.

इस आपदा को प्रकृति की मार कह कर हम अपनी राज्य सरकार की अपराधिक गैर जिम्मेदारियों पर पर्दा नहीं डाल सकते. मौसम विज्ञान की आधुनिक तकनीक के इस युग में हम पूर्वानुमान के आधार पर जानमाल के इतने बड़े नुकसानों को कम कर सकते हैं. इस बार तबाही से पूर्व ही मौसम विभाग ने पर्वतीय क्षेत्र में पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने और मानसून के एक सप्ताह पूर्व ही पहुँचने की भविष्यवाणी कर दी थी. जाहिर है जब एक तरफ पश्चिमी विक्षोभ और दूसरी तरफ मानसून एक साथ सक्रिय है तो भारी बारिश या बादल फटने जैसी स्थिति का पैदा होना सामान्य बात है. ऐसे में एक दिन पूर्व ही चारधाम यात्रा को रोक देना और संवेदनशील स्थानों से लोगों को सुरक्षित जगहों तक लौट आने का अलर्ट जारी हो जाना चाहिए था. मगर ऐसा नहीं हुआ और हमेशा की तरह यह निर्लज्ज व जन हत्यारी सरकार और उसकी नौकरशाही आपदा की फसल काटने के लिए अब तत्पर दिख रहे हैं.
 
प्राकृतिक आपदा के प्रति उत्तराखंड राज्य सरकार कितनी संवेदनशील है इसके दो उदाहरण आपको बता दूँ. केन्द्र सरकार के मौसम विज्ञान विभाग ने मौसम की पूर्व जानकारियाँ एकत्र करने के लिए राज्य में दो रडार स्थापित करने के लिये मसूरी और नैनीताल में जमीन की मांग की थी मगर तीन साल से यह जमीन मौसम विज्ञान विभाग को नहीं मिली है. दूसरा उदाहरण सन् 2010 तक राज्य में आपदा से प्रभावित 243 गावों को विस्थापित कर पुनर्वास के लिए चुना गया था जिनकी संख्या सन् 2013 मार्च तक बढ़ कर 550 हो गई. मगर अब तक मात्र एक गाँव छातीखाल (रुद्रप्रयाग) का ही अधूरा पुनर्वास हुआ है. राज्य बनने के बाद सिर्फ जमीनों को ही खुर्दबुर्द कर रही उत्तराखंड की सरकारें विस्थापितों के पुनर्वास के लिए जमीन न मिलने का रोना रो रही हैं . जबकि इसी बीच यह सरकारें पूंजीपतियों , बिल्डरों , धार्मिक व सामाजिक संस्थाओंनौकरशाहों और नेताओं को राज्य की लगभग एक लाख हेक्टेयर बेशकीमती जमीन लुटा चुकी है.

पहाड़ में जितनी बड़ी बाढ़ आती है नदियाँ उतनी ही गहरी होती जाती हैं. इस बात की पुष्टि उन नदियों से की जा सकती है जहाँ अभी विद्युत परियोजना नहीं बनी हैं. आज अगर इस आपदा के बाद नदी किनारे आठ से दस फुट गाद या मलवा पट गया है तो यह सुरंग आधरित विद्युत परियोजनाओं द्वारा नियम विरुद्ध नदी में गिराए गए मलवे के कारण है. अपने अति मुनाफे के लिए उनके द्वारा किये गए इस अपराध से नदी किनारे हुई इस तबाही की कीमत इन विद्युत कंपनियों से वसूली जानी चहिये. पर्यटकों को प्रकृति के और करीब ले जाकर धन कमाने और इसके लिए नदियों, पहाड़ों, जंगलों व सड़कों को सत्ता के संरक्षण में कब्जाने की जो होड़ उत्तराखंड में मची है उसके बाद इन भवनों को नदी में समाते देखना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. सत्ता के संरक्षण में चल रहे इस गोरखधंधे से हो रहे इस जानमाल के नुकसान को रोकने की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. 

( लेखक अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव हैं.)

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