Tuesday, August 27, 2013

एक मर्लिन मुनरो ऐसी भी – ४

(पिछली क़िस्त से आगे)


आपको पता है न कई सारे लोग होते हैं जिन्हें कई सारी ऐसी सनकभरी दिक्कतें होती हैं जिनके बारे में वे किसी को पता लगने देने की हिम्मत नहीं कर सकते. लेकिन मेरी एक परेशानी नज़र आनी शुरू हो गयी है – मैं देर से पहुँचती हूँ. मेरा ख़याल है लोग सोचते हैं कि मेरा देर से आना किसी किस्म की अराजकता है जबकि मैं समझती हूँ यह अराजकता का उलटा है. मुझे यह भी महसूस होता है कि मैं इस विशाल अमरीकी दौड़ में शामिल नहीं हूँ – आपने चलते जाना है और आपने जल्दी जल्दी जाना है अलबत्ता ऐसा करने का कोई तार्किक कारण नहीं. असली बात यह है कि चाहती हूँ कि एक अच्छी परफौरमेंस देने के लिए या अपनी काबिलियत के हिसाब से श्रेष्ठतम देने की कोशिश करने के इए वहां पहुंचूं. पर वहां बहुत से लोग समय पर पहुँच जाते हैं और कुछ नहीं करते, मैंने उन्हें ऐसा करते हुए देखा है, और आप जानते हैं सारे लोग साथ बैठकर गपबाजी करते रहते हैं और अपने सामजिक जीवन के बारे में बातें. गेबल ने मेरे बारे में कहा था “जब वह वहां होती है, वहां होती है. वह सारी की सारी वहां होती है. वह वहां काम करने को आती है!”  
   
मुझे बड़ा सम्मानित महसूस हुआ जब मुझे मेडिसन स्क्वायर गार्डन में राष्ट्रपति के जन्मदिन की रैली में हिस्सा लेने को बुलाया गया. और जब मैं “हैप्पी बर्थडे” गाने पहुँची तो एक अजीब सा सन्नाटा छा गया, जैसे मैं स्लिप भर पहन के आई होऊं जिस से मेरा बदन दिख रहा हो. मैंने सोचा “हे भगवान, अगर मेरी आवाज़ नहीं निकली तो क्या होगा.”

लोगों में पसरने वाला इस तरह का सन्नाटा मुझे ऊष्मा देता है. यह एक तरह का आलिंगन होता है. भगवान् कसम तब आप सोचते हैं अगर इन सारे लोगों के लिए मेरे द्वारा किया जाने वाला यह आख़िरी काम होने वाला होना हो तो मैं इस गीत को गाऊंगी. क्योंकि मुझे याद है जब मैं माइक्रोफोन की तरफ मुड़ी तो मैंने पहले ऊपर निगाह डाली और फिर वापस तो मैंने सोचा “मैं वहां होऊँगी ऊपर छत के पास उनमें से एक रैफ्टर के पास, इस जगह आने केलिए दो डॉलर देने के बाद.”  बाद में एक तरह का भोज था.मैं अपने पूर्व ससुर इजाडोर मिलर के साथ थी. सो मुझे लगता है जब मैं राष्ट्रपति से मिली तो मैंने कोई गलत हरकत कर दी हो. बजाय यह कहने के कि “आप कैसे हैं?” मैंने सिर्फ इतना कहा “ये मेरे पूर्व ससुर हैं - इजाडोर मिलर.” वे यहाँ एक आप्रवासी की हैसियत से आये थे और मैंने सोचा कि वह उनके जीवन की सबसे बड़ी घटना होगी. वे करीब ७५-८० साल के हैं और मुझे लगा यह एक ऐसी चीज़ होगी जिसे वे अपने नाती-पोतों को सुनाएंगे और ऐसी ही तमाम बातें. मैंने कहना चाहिए थे “आप कैसे हैं मिस्टर प्रेसीडेंट?” लेकिन मैं अपना गाना गा चुकी थी औ मेरा ख़याल है किसी ने भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया.

प्रसिद्धि अपने साथ एक ख़ास तरह का बोझ के कर आती है, जिसके बारे में अभी और इसी जगह पर कुछ बता सकती हूँ. मुझे किसी ग्लैमरस या सैक्सी चीज़ हो जाने के बोझ से कोई गुरेज़ नहीं पर उसके साथ जो और चीज़ें आती हैं वे हो सकती हैं बोझ. मेरा मानना है कि सौन्दर्य और स्त्रैणता आयु से परे होती हैं और उन्हें बनाया नहीं जा सकता और हालांकि निर्माता मेरी बात पसंद नहीं करेंगे – ग्लैमर का उत्पादन नहीं किया जा सकता. वास्तविक ग्लैमर कभी नहीं; उसकी बुनियाद स्त्रैणता में होती है. मेरा मानना है कि सेक्सुअलिटी तभी आकर्षक हो सकती है जब वह नैसर्गिक और स्वतःस्फूर्त हो. इस बात को समझने में उनमें अधिकाँश असली मुद्दा भूल जाते हैं. और एक और बात जो मैं कहना चाहूंगी – भगवान् का शुक्र है हम सब सैक्सुअल प्राणियों के तौर पर जन्म लेते हैं, लेकिन बहुत दुःख की बात है कि इतने सारे लोग इस नैसर्गिक तोहफे से नफरत करते हैं और उसे कुचल देते हैं. कला, वास्तविक कला, सारी चीज़ें इसी से आती है.

ये सैक्स सिम्बल वाली बात मेरी समझ में कभी ठीक से नहीं आयी. मैंने हमेशा सोचा था कि सिम्बल वे चीज़ें होती हैं जिनके साथ आप मिल कर संघर्ष करते हैं! यही दिक्कत है. सैक्स सिम्बल एक चीज़ बन जाती है. और मुझे चीज़ में बदल जाने से नफरत है. लेकिन अगर मुझे किसी का सिम्बल होना ही है तो वह सैक्स हो बजाय उन चीज़ों के जिनके सिम्बल्स बनाए जा चुके हैं! ये लडकियां जो मर्लिन मुनरो होना चाहती हैं, मुझे लगता है स्टूडियोज उन्हें इसके लिए तैयार करते हैं या यह विचार खुद ही उनके भीतर आ जाता है. मगर उनमें वो बात है ही नहीं. आप इस बात पर खूब बकबक कर सकते हैं कि उनके पास या तो वह पृष्ठभूमि नहीं है या अग्रभूमि. लेकिन मेरा मतलब बीच से है – जहां आप जिंदा रहते हैं.

मेरे सारे सौतेले बच्चों को मेरी ख्याति का बोझा उठाना पडा. कभी कभी वे मेरे बारे में अजीबोगरीब बातें पढ़ा करते थे और मुझे चिंता होती थी कहीं उन्हें चोट तो नहीं पहुंचेगी. मैं उनसे कहती थी : मुझसे इन चीज़ों को मत छिपाओ. मैं चाहूंगी तुम सीधे मुझसे बात करो और मैं तुम्हारे सवालों का जवाब दूंगी.

मैं चाहती थी कि वे अपने जीवन के अलावा के जीवन को भी जानें. मिसाल के लिए मैं उन्हें बताया करती थी कि मैं एक महीने में पांच सेंट की नौकरी कर चुकी थी, कि मैंने एक सौ तश्तरियां साफ़ कीं. और मेरे सौतेले बच्चे कहा करते “एक सौ तश्तरियां!” मैं कहती “इतना ही नहीं उसके पहले मैं उन्हें रगड़ कर उनकी गंदगी अलग करती थी. मैं उन्हें धोती थी फिर पानी में खंगालती थी और उन्हें ड्रायर में रखा करती. भगवान का शुक्र है मैंने उन्हें सुखाना नहीं होता था.” 

मुझे खुश रहने की कभी आदत नहीं रही सो मैंने कभी भी नहीं सोचा कि उसने बने ही रहना है. देखिये, एक औसत अमेरिकी बच्चे की तुलना में मेरी परवरिश काफी अलग तरह की रही थी, क्योंकि औसत अमेरिकी बच्चे को इस तरह पाला जाता है कि वह खुश रहने की उम्मीद करे. यानी – सफल, खुश और समय का पाबन्द. तो भी अपनी प्रसिद्धि के कारण उस समय तक मैं तब तक मिले सबसे बेहतरीन दो पुरुषों से मिल सकी और उनसे विवाह कर सकी.

मुझे नहीं मालूम था कि लोग मेरे खिलाफ हो जाएंगे. कम से कम अपने आप तो नहीं. मुझे लोगों से प्यार है. मुझे “जनता” से डर लगता है. लेकिन लोगों पर मैं यकीन करती हूँ. हो सकता है उन पर प्रेस का प्रभाव पड़ता हो या जब स्टूडियोज से तमाम तरह की कहानियाँ बाहर भेजी जानी शुरू कर दी जाती हैं. लेकिन मैं मानती हूँ कि जब लोग सिनेमा देखने जाते हीन, वे अपना फैसला खुद करते हैं. हम मनुष्य बहुत अजीब प्राणी होते हैं, और तब भी अपने लिए सोचने के अधिकार को आरक्षित रखते हैं.

एक बार जब यह सोच लिया गया कि मुझे ख़त्म हो जाना है, मेरा अंत आ गया था. जब मि. मिलर पर कांग्रेस की अवमानना का मुकदमा चल रहा था एक कारपोरेशन के एक्जीक्यूटिव ने कहा या तो वह कुछ लोगों के नाम फंसा देगा या मैं उसे कुछ नाम बतलाऊँ. या मुझे ख़त्म हो जाना था. मैंने कहा “मैं अपने पति की स्थिति का आदर करती हूँ और पूरी तरह उनके साथ खड़ी रहूँगी.” ऐसा ही कोर्ट ने भी किया. “ख़त्म” उन्होंने कहा “अब तुम्हारा कोई नामभी नहीं लेगा.”


ख़त्म हो चुकना एक तरह की राहत जैसा होता है. आपको सब दोबारा शुरू करना होता है. लेकिन मुझे लगता है कि आप हमेशा अपनी क्षमता जितना बेहतरीन कर पाते हैं. फिलहाल मैं अपने काम में और चंद लोगों, जिन पर में सचमुच भरोसा कर सकती हूँ, के साथ चंद संबंधों में निवास करती हूँ. प्रसिद्धि चली जाएगी, और वह कितनी देर मेरे साथ रही. अगर वह चली जाती है, मुझे पहले से पता था वह बेठिकाना होती है. तो वह कम से कम ऐसी चीज़ तो है जिसे मैंने अनुभव किया, मगर ये वो जगह नहीं जहां मैं रहती हूँ.  

1 comment:

anil yadav said...

बहुत दुःख की बात है कि इतने सारे लोग इस नैसर्गिक तोहफे से नफरत करते हैं और उसे कुचल देते हैं. कला, वास्तविक कला, सारी चीज़ें इसी से आती है.