Monday, November 4, 2013

हमारे उन्ने कलेजों में हाथ डाला है

(धीरेश सैनी को शुक्रिया कि उनके ब्लॉग पर लगी ताज़ा पोस्ट इस पोस्ट की प्रेरणा बनी. )

''एक गोष्ठी में एक थोड़े जी आए और एक अकादमी बना दिए गए कवि के बारे में बोले वह उन थोड़े से कवियों में हैं, जो इन दिनों अस्वस्थ चल रहे हैं. वह गोष्ठी कविता की अपेक्षा कवि के स्वास्थ्य पर गोष्ठित हो गई. फिर स्वास्थ्य से फिसलकर कवि की मिजाज पुरसी की ओर आ गई. थोड़े जी बोले कि उनका अस्वस्थ होना एक अफवाह है, क्योंकि उनके चेहरे पर हंसी व शरारत अब भी वैसी ही है. (क्या गजब 'फेस रीडिंग` है? जरा शरारतें भी गिना देते हुजूर). हमने जब थोड़े जी के बारे में उस थोड़ी सी शाम में मिलने वाले थोड़ों से सुना, तो लगा कि यार ये सवाल तो थोड़े जी से किसी ने पूछा ही नहीं कि भई थोड़े जी आप कविता करते हैं या बीमारी करते हैं? बीमारी करते हैं तो क्या वे बुजुर्ग चमचे आप के डाक्टर हैं जो दवा दे रहे हैं. लेकिन 'चमचई` में ऐसे सवाल पूछना मना है.”

'
ट्विटरा गायन, ट्विटरा वादन!
(दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान, 6 अक्टूबर)

व्यंग्य का यह महान टुकड़ा जनाब सुधीश पचौरी ने लिखा है. इसकी महानता इस बात में भी निहित है कि इसने इधर के समय में लोकप्रिय हुई एक नई व्यंग्य-विधा खुलाखेलफ़र्रूखाबादीवाद को नया आयाम बख्शा है और चीज़ों को इतनी ‘सफाई’ से दिखाते हुए छुपाने के प्रयास को दिखाया गया है.

अकादमी बना दिए गए कवि और कोई नहीं वीरेन डंगवाल हैं और बीमारी का नाम कैंसर है (पिछले छः माह से सतत जारी इलाज के एक और भयानक पीड़ादायक फ़ेज़ से वे अब भी गुड़गाँव में गुज़र रहे हैं) और गोष्ठी से आशय इसी साल ५ अगस्त को उनके जन्मदिन पर दोस्तों द्वारा आयोजित दोस्ताना शाम से है.

हिन्दी के बड़े संसार से मुझे मुझे कोई ख़ास अनुराग नहीं है, न सुधीश पचौरी को ऐसा ‘व्यंग्य’ लिखने में आए आनंद से कोई मतलब, पर वीरेन डंगवाल में मेरी जान बसती है. मेरी ही नहीं न जाने कितनों की बसती है. (आप मुझे उनका ‘चमचा’ कह सकने को भी स्वतंत्र है. ‘पालतू कुत्ता’ भी कह सकते हैं चाहें तो. लेकिन ख़बरदार ...)

आप के इस दो कौड़ी के व्यंग्य और मूर्खताभरे ‘सेन्स ऑफ़ ह्यूमर’ (मुझे शक है आपने इस चिड़िया का नाम भी सुना है) पर मैं अपनी घनघोर आपत्ति जताता हूँ.

और वीरेन दा के जानने वालों से निवेदन करता हूँ कि खुल कर इस बेवकूफी का जहाँ जिस प्लेटफ़ॉर्म पर हो सके, विरोध करें.

जो लोग वीरेन डंगवाल को न जानते हों उनके लिए (और सु.प. के लिए भी ) कबाड़खाने की एक पुरानी पोस्ट लगाई जा रही है –

---
बीमार पड़ें आपके दुश्मन वीरेनदा
 वीरेन डंगवाल का वैभव
-अनिल यादव

छोटे बेटे प्रफुल्ला के रिसेप्शन में एक अक्तूबर की रात, बरेली में मुलाकात हुई. 

उसी रंग की पैंट पर पेटी डाट कर, काले रंग की कमीज में वीरेन डंगवाल ने फार्मल लुक देने का आधे मन से भरपूर जतन कर रखा था. कमीज को इस्त्री के बाद दूसरे कपड़ो के ढेर में गुलाटियां खाने का भरपूर समय मिला था, इस लिए एक बांह कुछ ज्यादा ही छरहरी लग रही थी. भारी चेहरे के अनुपात में कंधे दुबले लगे और सोडियम लाइट की झक्क रोशनी में कुछ वर्ग सेंटीमीटर की एक छोटी चांद भी मुझे नजर आ गई. वरना मैं तो उनकी आनुवांशिकी पर चकित होते हुए अब तक यही सोचता आया था- जरा सोचो तो उनसे दस-पंद्रह साल छोटे लोग जेब में कंघी रखकर नास्टेल्जिया जीने लगे हैं. 

गले मिलते हुए पूर्वाभास हुआ कि आज की रात कई जटिल चीजें समझ में आने लायक सपाट हो सकती हैं क्योंकि ठीक उसी समय, सीने के दबाव से मेरी कमीज में लटके चश्मे की एक कमानी रेल की पटरी में परिवर्तित हो रही थी.

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. सुरापान भी हुआ, पंकज श्रीवास्तव के "छापक छैल छिउलिया" समेत गाने भी गाने गए, बहस की हांव-हांव भी थी. यहां तक कि एक बुल्गागिन कट दाढ़ी वाले अध्यापक ने एक दुबली किताब से उस मद्यमय शोर में अपनी कविता पढ़ने का असफल प्रयास भी किया. कुछ ऐसा लग रहा था कि शराब और दिमाग ने मिलकर ईवेन्ट मैनेजमेन्ट की कंपनी खोल ली है और यह उत्तेजना उसी के द्वारा प्रायोजित है. दिल उनकी सेवा शर्तों से उदास होकर, इस्तीफा देकर कहीं चला गया है. एक बात किसी ने कायदे की कही कि शराब पीने की सारी जगहें पता नहीं क्यों ऐसी ही उपेक्षित, अकेली, जरा भुतही क्यों होती हैं. यह भी हो सकता है कि पत्रकार बहुत थे जिनमें फेंकने की अद्भुत प्रतिभा होती है और लपेटना बिल्कुल नहीं जानते. लिहाजा उनकी हांव-हांव फर्श पर सिगरेट के टुकडों की तरह बस इत्ती सी देर चमकती है फिर बुहारे जाने के इंतजार करने लगती है. 

देर रात जब अधिकांश लोग खाना-वाना खा, गुलदस्ते-वस्ते दे, सौजन्य-वौजन्य ले....चले गए तब फिर वे नमूंदार हुए. मेटामार्फासिस घटित हो चुका था. अब वे उस तरह बोल रहे थे, जिस अंदाज (इसमें उष्मा काफी होती है. खूब, प्यारे, चूतिए, अद्भुत, अच्छा जैसे शब्द बार-बार आते हैं. बोलने वाले के बारे में खटका लगा रहता है कि क्या पता वह आल इंडिया रेडियो का निरा प्रस्तोता ही न निकले.) की नकल करने वाले बरेली से निकल कर देश भर में फैल गए हैं. इसे आगे बातचीत के वीरेन डंगवाल फर्मे के रूप में याद रखा जाने वाला है, मान लीजिए. 

कुर्सियों पर कोई तेरह चौदह छड़े थे, जिन्हें उनके पिताओं ने यहां न्यौता करने तो नहीं ही भेजा था. वे कविताओं की पंक्तियों के जरिए उनसे बात कर रहे थे. वे अपनी किसी बात की पीठ पर एक पंक्ति कहते थे- "यह कैसा समाज हमने रच डाला है, जो कुछ भी दमक रहा....काला है"- वीरेन डंगवाल वह पूरा पैराग्राफ सुनाते. फिर बात आगे बढ़ती थी. उनके दो-तीन काव्य संग्रह, मानों भावनाओं का ज्यादा सटीक भाष्य करने वाले किसी निरपेक्ष "थिसारस" की तरह इस्तेमाल किए जा रहे थे. इलाहाबाद से प्रेमप्रकाश और दीपक थे, जो हाथ से खंभाकार आकृति बनाते हुए कोई संदेश संप्रेषित करने के प्रयास में थे. दीपक ने असफलता को काफी ग्लैमराइज किया और रिसेप्शन की इकलौती सांस्कृतिक प्रस्तुति दी. वह खइके पान बनारस वाला गाने पर झमाझम नाचा और मैने उसका वीडियो बनाया. 

"चलो यार तुमने नाच कर मेरे पैसों का कुछ तो सदुपयोग किया," डा. डैन्ग ने जब यह कहा तो अचानक लगा कि इस अहंकार से गंधाते खड़ूस जमाने में इतने नौजवान, जो अपने रिश्तेदारों के यहां जाने में भी कन्नी काट जाते होंगे यहां क्यों आए और वे इस आदमी से इतनी सहजता से संवाद कैसे कर लेते हैं. थोड़े ही देर बाद पवित्र गुस्से से दीपक कह रहा था- "मैं हमेशा से नाचना चाहता था लेकिन घर वालों ने मुझे नहीं नाचने दिया. मैं हमेशा ऊपर से झेंपता और भीतर-भीतर नाचता रहता था. इसलिए आज खूब नाचा. 


भोज समाप्त होने के बाद, खाली पंडाल के एक कोने में युवाओं के चेहरों में प्रतिबिम्बित यह वीरेन डंगवाल का वैभव था, जिसके आगे साहित्य अकादमी वगैरा तो घलुआ जैसी चीज लगती है. 

रात के कोई तीन के आसपास फिर उन्हीं लड़कों का घेरा, घर के सामने की सड़क पर था. अब जरा सी आत्ममुग्धता या उस जैसा कुछ और छलछला आया था. वीरेन डंगवाल बता रहे थे कि, "मैं एक जनवरी 2010 को इस दुनिया से चला जाऊंगा. मैं खूब आवारागर्दी करना चाहता हूं." 


मैने चिढ़कर एतराजनुमा मोर्चेबंदी की, "गुरू कहीं ऐसा तो नहीं है कि प्रगतिशीलता के चोले के भीतर सदा से कोई ज्योतिष की अंतर्धारा बहती हो जिसने आपके मरने की ये तारीख भी तय की हो."


जरा भी विचलित हुए बिना, उन्होंने उस तारीख को फौरन नौ दिन आगे तक टाल दिया, चलो दस जनवरी तक रह जाता हूं. मुझे भीतर तक एक डर झकझोर कर जा चुका था और फिर पलट रहा था.

इतने में रिक्शे पर सवार स्टेशन की तरफ जाते अशोक पांडे दिखे. मैंने लपक कर रिक्शे पर बैठते हुए नारा लगाया, एक जनवरी दो हजार दस मुर्दाबाद. 


अशोक ने दोहराया, एक जनवरी दो हजार दस मुर्दाबाद. हम सिगरेट लेने स्टेशन चले गए. 

4 comments:

मुनीश ( munish ) said...

मैं श्री वीरेन डंगवाल को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता लेकिन एक बार पुस्तक मेले में मुलाक़ात हुई कई साल पहले । उनकी कविताएँ यहाँ और कुछ अन्य जगहों पर भी पढ़ी हैं । उनके सरोकारों से हमेशा प्रभावित हुआ हूँ । उनकी ये पंक्तियाँ मुझे सदा ही याद रहती हैं--
इतने भले मत बन जाना साथी
कि जितना भला सर्कस का हाथी.

पाठक से एक दम जुड़ जाने का माद्दा कितनों के पास है आज ? वे आधुनिक कविता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं और उनके विषय में यदि कोई इस प्रकार की कटाक्षमय वाणी का प्रयोग करता है तो या तो वो कोई कुटिलता की हदों को पार कर गया अंसवेदनशीलता से भरपूर मनहूस फ़्रस्ट्रेटेड आदमी ही हो सकता है । आपकी नाराज़गी जायज़ है इस गंदी हरकत की मज़म्मत हर जगह होनी चाहिए क्योंकि यदि पढ़े लिखे लोग ही ऐसी बातें कैंसर से जूझ रहे एक प्रतिष्ठित कवि के बारे में कहेंगे तो हम और किस से अपेक्षा रखेंगे मानवीय संवेदनाओं की ? थूकता हूँ मैं ऐसी तथाकथित स्कॉलरशिप पर जिसे तहज़ीब नाम की चीज़ से वास्ता ही नहीं है ।

sanjay vyas said...

व्यंग्य के नाम पर श्री सुधीश पचौरी द्वारा लिखा गया ये टुकड़ा जिसे आपने उद्धृत किया है,एक बीमार भाषा में लिखा गया रुग्ण व्यंग बोध का नमूना है.शायद कोई खुन्नस है या हताशा जो सीधे न आकर इस तरह के रास्तों से सामने आती है जब आप सीधे सीधे उजागर नहीं करना चाहते खुद को.

पर ये नहीं बचेगा,बचा रहेगा तो 'वीरेन डंगवाल का वैभव' .

deepak said...

वीरेन दा इस कमजर्फी के खिलाफ हमारे पास तुम्हारी ऊर्जास्वित ऊर्ध्वमुखी प्राणाधारा है सुधीश पचौरी जैसे लोगों के लिए सिर्फ इतना ही की "तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे,/कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें/ पर चूहे आखिर चूहे हैं /जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पाएंगे.....

मुनीश ( munish ) said...

मुझे याद है कि एक दफ़ा एक कहानी लिखने वाले ने किसी योगाचार्य से ईनाम-शिनाम ले लिया था और किस क़दर धांधल-पाड़ मची थी यहाँ । राष्ट्रवाद और योग तो अच्छी बातें हैं या कम से कम इतनी खराब तो नहीं हैं कि जैसे एक खतरनाक बीमारी से जूझते सम्मानित कवि का मज़ाक उड़ाना । लेकिन फिर भी हिन्दी बिरादरी के मुँह में दही जमा है , मैं थूकता हूँ ऐसी बिरादरी पर भी आक्..थू ।