Saturday, August 23, 2014

ओ मेरे गीत के बाशिन्दो: पानी पर भरोसा रखो

मेरे पास मर जाने को अभिशप्त आदमी की बुद्धिमत्ता है

-महमूद दरवेश

मेरे पास मर जाने को अभिशप्त आदमी की बुद्धिमत्ता है
मेरे पास किसी चीज़ पर अधिकार नहीं सो कोई भी चीज़ मुझ पर अधिकार नहीं कर सकती
और मैंने अपने ख़ून से लिखी है अपनी वसीयत:
" मेरे गीत के बाशिन्दो: पानी पर भरोसा रखो"
और मैं सोता हूं आने वाले अपने कल से बिंधा हुआ और ...
मैंने सपना देखा कि धरती का दिल बड़ा है
उसके नक़्शे से,
उसके आईनों और फांसी के मेरे तख़्तों से
अधिक स्पष्ट.
मैं एक सफ़ेद बादल में खो गया जो मुझे ऊपर उठा ले गया
जैसे कि मैं कोई हूपी था
और ख़ुद हवा मेरे पंख.
भोर के वक़्त, रात के पहरुए ने
मुझे मेरे सपने, मेरी भाषा से जगाया:
तुम जियोगे एक और मौत
सो सुधार लो अपनी आख़िरी वसीयत,
फांसी दिए जाने का वक़्त टाल दिया गया है दुबारा से.
मैंने पूछा: कब तक के लिए?
उसने कहा: थोड़ा और मरने तक इन्तज़ार करो.
मैंने कहा: "मेरे पास किसी चीज़ पर अधिकार नहीं सो कोई भी चीज़ मुझ पर अधिकार नहीं कर सकती
और मैंने अपने ख़ून से लिखी है अपनी वसीयत:
" मेरे गीत के बाशिन्दो: पानी पर भरोसा रखो"

---


हूपी - एक रंगबिरंगी चिड़िया जो पंखों के बने अपने विशिष्ट "ताज" के लिए जानी जाती है

No comments: