Thursday, January 14, 2016

खिड़की में डायनासोर - रिचर्ड फ़ाइनमैन की बातें - 3

रिचर्ड फ़ाइनमैन
खिड़की में डायनासोर

हमारे घर में इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका रखा रहता था और जब मैं बहुत छोटा था, मेरे पिता मुझे अपनी गोदी में बिठाकर उसमें से पढ़कर सुनाया करते थे. और मान लीजिये हम उसमें डायनासोरों की बाबत पढ़ रहे होते – हो सकता है उसमें ब्रॉन्टोसॉरस या टिरेनोसॉरस के बारे में कुछ ऐसा लिखा हुआ होता – “वह पच्चीस फुट ऊंचा होता है जबकि उसका मुंह छः फुट चौड़ा.” पिताजी पढ़ना रोक दिया करते और कहते – “देखें इसका क्या मतलब हुआ. इसका मतलब हुआ कि अगर वह हमारे घर के आँगन में खड़ा हो जाए तो वह इतना ऊंचा होगा कि हमारी खिड़की में मुंह घुसाकर अन्दर देख सके. ना ना ठीकठाक ऐसे नहीं होता क्योंकि उसका सिर थोड़ा चौड़ा होता है. सो भीतर देखने के लिए उसे खिड़की तोड़नी पड़ती.” हम जो कुछ पढ़ा करते थे उसे जितना संभव था किसी न किसी वास्तविक चीज़ में बदल दिया जाता. इसीलिये मैंने ऐसा करना सीख लिया – मैं जिस चीज़ को भी पढ़ा करता मेरी कोशिश होती कि  यह जान सकूं कि वास्तव में उसका क्या मतलब है और वह क्या कह रही है. यह एक तरह का अनुवाद होता था सो जब मैं एक  लड़का ही था, मैं इनसाइक्लोपीडिया को अनुवाद करके पढ़ता था. मुझे यह सोचना बेहद रोचक और उत्तेजक लगता था कि इतने बड़े आकार के जीव भी कभी थे – मुझे इसके परिणाम से भय नहीं लगता था कि वे मेरे घर की खिड़की से भीतर घुसे आ रहे हैं – मुझे यह बेहद दिलचस्प लगता था कि वे सब मारे गए और किसी के नहीं मालूम तब ऐसा हुआ क्यों.

हम लोग कैट्सकिल माउन्टेन्स में जाया करते थे. हम न्यूयॉर्क में रहते थे और वहां के लोग गर्मियों में कैट्सकिल माउन्टेन्स जाते थे. वहां पर बड़ी तादाद में लोग होते थे लेकिन उनमें से सभी पितागण वहां से वापस न्यूयॉर्क चले जाया करते क्योंकि उन्हें सप्ताह भर काम करना होता था. वे वीकेन्ड पर लौटा करते. जब मेरे पिताजी वापस आते, वे मुझे जंगल में घुमाने ले जाया करते और जंगल में घटने वाली तमाम दिलचस्प चीज़ों के बारे में बताते. इस बारे में आपको मैं अभी बताता हूँ लेकिन हुआ क्या कि जब बाकी माँओं ने यह देखा तो ज़ाहिर है उन्हें यह शानदार लगा और उन्हें लगा कि बाकी पिताओं ने भी अपने बेटों को घुमाने को ले जाना चाहिए. सो उन्होंने इसके लिए कोशिशें कीं लेकिन शुरू में कोई फायदा न होता देखकर वे चाहने लगीं कि मेरे पिता सारे बच्चों को अपने साथ ले जाया करें. लेकिन मेरे पिता ऐसा करना नहीं चाहते थे क्योंकि मेरे साथ उनका एक विशेष सम्बन्ध था. हमारा सम्बन्ध बहुत निजी किस्म का था. सो आखिरकार अगले वीकेन्ड पर सारे पिताओं ने अपने बच्चों को जंगल घुमाने ले जाना पड़ा. 

सो जब अगले सोमवार को वे सारे वापस अपनी काम पर चले गए और बच्चे मैदान में खेल रहे थे, एक बच्चे ने मुझसे कहा – “वो चिड़िया दिख रही है? किस तरह की चिड़िया है बताओ?” और मैंने जवाब दिया - “मुझे कतई नहीं मालूम ये किस तरह की चिड़िया है.” उसने कहा - “वो एक ब्राउन थ्रोटेड थ्रश है.” या ऐसा ही कुछ “तुम्हारे पापा तुम्हें कुछ नहीं बताते.” लेकिन बात इसके उलट थी - मेरे पिताजी ने मुझे बता रखा था. जब वे किसी चिड़िया को देखते तो कहते – “जानते हो ये कौन सी चिड़िया है? ये एक ब्राउन थ्रोटेड थ्रश है; लेकिन पुर्तगाली में यह एक ... है और इटैलियन में एक ...” वे कहते जाते “चीनी भाषा में यह एक ... है, जापानी में ... है” वगैरह वगैरह. “देखो” वे कहना जारी रखते “ अब जबकि जितनी भाषाओं में तुम चाहो इस चिड़िया का नाम जान सकते हो और जब तुम सारे नाम जान लोगे, तुम्हें उस चिड़िया के बारे  में कुछ भी पता नहीं होगा. तुम्हें केवल यह पता चलेगा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कैसे कैसे इंसान रहते हैं और वो इस चिड़िया को किस नाम से पुकारते हैं. अब ...” वे कहते “चलो चिड़िया को देखा जाए.”

उन्होंने मुझे चीज़ों को गौर से देखना सिखाया और एक दिन मैं एक खिलौने से खेल रहा था जिसे एक्सप्रेस वैगन कहते हैं – वो एक छोटी वैगन जैसी होती है जिसके चारों तरफ बच्चों के खेलने को एक रेलिंग जैसी लगी होती है. उसके भीतर एक गेंद होती है – यह बात मुझे याद है – सो उसमें एक गेंद थी; मैंने वैगन को खींचा और गेंद की गति में एक ख़ास बात पर गौर किया. सो मैं पिताजी के पास जाकर बोला – “पापा, मैंने कुछ देखा अहि. जब मैं वैगन को खींचता हूँ तो गेंद वैगन के पीछे की तरफ लुढ़क जाती है और जब मैं खींचते हुए अचानक रुक जाता हूँ तो वह वैगन के आगे की तरफ आ जाती है.” फिर मैंने कहा – “ऐसा क्यों होता है?” वे बोले “अब ये तो किसी को भी नहीं पता. सीधा सा नियम ये है कि चलती हुई चीज़ें चलती रहती हैं और खड़ी हुई चीज़ें खड़ी रहती हैं बशर्ते आप उन पर जोर न लगाओ..” और वे बोले – “चीज़ों की इस आदत को इनर्शिया यानी जड़ता कहते हैं और ये कोई नहीं जानता कि यह बात सच क्यों हैं.” अब यह बड़ी गहरी समझ है कि उन्होंने मुझे कोई नाम नहीं दिया, उन्हें किसी चीज़ को नाम देने और किसी चीज़ को समझने का अंतर मालूम था. यह बात मैंने बहुत जल्दी सीख ली थी. वे आगे बोले – “अगर तुम नज़दीक से देखोगे तो तो तुम पाओगे कि गेंद वैगन के पीछे की तरफ हड़बड़ी में नहीं जाती, बल्कि असल में तुम वैगन के पीछे के हिस्से को गेंद की उल्टी दिशा में खींच रहे हो. यह बात कि गेंद स्थिर खड़ी रहती है या असल बात यह है कि वह घर्षण की वजह से आगे की तरफ जाना शुरू करती है और पीछे को नहीं आती.” सो मैं भागकर अपनी नन्हीं वैगन के पास गया और मैंने गेंद को उसमें रखा और उसके नीचे से वैगन को खींचा और एक तरफ से देखने लगा – मैंने पाया कि वे बिलकुल सही कह रहे थे – जब मैंने वैगन को आगे की तरफ खींचा तो गेंद पीछे की तरफ गयी ही नहीं. वह वैगन के सापेक्ष पीछे की तरफ जा रही थी लेकिन साइडवॉक के सापेक्ष वह थोड़ा आगे को बढ़ गयी थी.  हुआ इतना कि वैगन उस तक पहुँच भर सकी. 

सो मेरे पिताजी ने मुझे इस तरह शिक्षित किया – इस तरह के उदाहरणों और चर्चाओं से. उनमें किसी किस्म का दबाव नहीं होता था. बस बेहद प्यारी और दिलचस्प बातचीतें होती थीं.


(जारी)

1 comment:

Mayank Saini said...


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