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Saturday, August 31, 2013

राहुल द्रविड़ में वह दूसरी बात है


वरिष्ठ पत्रकार कुमार प्रशांत का यह आलेख बीती २० अगस्त को ‘अमर उजाला’ के सम्पादकीय पन्ने पर छपा था. कबाड़ख़ाना के पाठकों के लिए इस ज़रूरी आर्टिकल को यहाँ लगा रहा हूँ –

राहुल द्रविड़ की सुनो!

राहुल द्रविड़ जब तक अपना बल्ला उठाए क्रिकेट मैदान में खडे़ थे, दुनिया भर के बॉलर उनकी सुनते थे! अब जब उन्होंने बल्ला धर दिया है और क्रिकेट के माध्यम से कई तरह के सवालों पर अपनी बात कहने लगे हैं, तो दुनिया उन्हें सुन रही है. वह जिस संजीदगी से खेलते थे, उसी संजीदगी से अपनी बातें भी कहते हैं. संजीदगी एक ऐसा गुण है, जिसके मुरीद कम ही होते हैं, लेकिन संजीदगी आपको ऐसी ताकत देती है कि कम ही आपको हलके में लेते हैं. इसलिए राहुल की संजीदगी को भले ही सचिन जैसा प्रचार नहीं मिला, लेकिन आज भी आंकड़े बताते हैं कि राहुल और सचिन एक ही स्तर के क्रिकेटर थे. राहुल शायद ज्यादा बड़े थे, क्योंकि उन्होंने टीम की हर जरूरत को पूरा करने में जिस तरह खुद को झोंक दिया, वैसा करने वाले खिलाड़ी गिनती के भी नहीं हैं हमारे यहां.

आज राहुल जिस भूमिका में दिखाई दे रहे हैं, वैसी भूमिका निभाते हमने दूसरे किसी खिलाड़ी को नहीं देखा. इसलिए जब उन्होंने कहा कि क्रिकेट के भारतीय प्रशासकों को भूलना नहीं चाहिए कि विश्वसनीयता खोकर वे रुपया भले ही कमा लें, क्रिकेट के लिए सम्मान नहीं कमा सकेंगे, तो सब ओर खामोशी छा गई. वह आगे बोले, ... और स्टेडियम में बैठा या टीवी/ रेडियो से चिपका हुआ यह जो आम दर्शक है हमारा, अगर उसने खिलाड़ियों-अधिकारियों पर से विश्वास खो दिया, तो न हम कहीं के रहेंगे और न क्रिकेट! राहुल की बात ठीक वैसे ही निशाने पर लगी, जैसे उनके लेग-कट लगते थे- दिखी भी नहीं और बॉल बाउंड्री पार!

राहुल ने जो कहा, उसका ताजा संदर्भ आईपीएल का वह सारा घपला है, जिसने हमें और सारे क्रिकेट को शर्मसार कर छोड़ा है. यह और भी ध्यान देने की बात है कि मैच-फिक्सिंग के सारे अपराधी आईपीएल की उसी टीम के थे, जिसकी कप्तानी राहुल द्रविड़ कर रहे थे. मतलब उन्होंने जो कहा, उसमें उनकी निजी पीड़ा भी शामिल है! राहुल की बातों का दूसरा संदर्भ था, हमारे क्रिकेट की सबसे बड़ी रसूख वाली संस्था बीसीसीआई के भीतर मची अंधेरगर्दी. भारतीय क्रिकेट टीम के मायावी कप्तान महेंद्र सिंह धोनी, बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन, उनके दामाद गुरुनाथ मैयप्पन और उनकी बंधुआ मजदूर सी कमेटी ने पिछले दिनों भारतीय क्रिकेट के साथ जैसा शर्मनाक व्यवहार किया, उसके बाद राहुल जैसे कद वाले किसी खिलाड़ी का कुछ कहना बहुत जरूरी था. मगर सचिन, सौरव या कुंबले ने इस पर कभी कुछ नहीं कहा. अच्छा या फिर बहुत अच्छा खिलाड़ी होना एक बात है और एक अच्छा, मजबूत इन्सान होना दूसरी बात. राहुल में यह दूसरी बात है.

जब लॉर्ड्स के क्रिकेट अधिकारियों ने अपने विशेष आख्यान के लिए राहुल को वहां बुलाया था, तब भी उन्होंने जो कुछ कहा था, उसका लब्बोलुआब यही था कि क्रिकेट को बाजारू बनाकर लोकप्रिय बनाने से अच्छा होगा कि हम इसे खेल ही रहने दें. हम जानते हैं कि कोई सुनील गावस्कर या रवि शास्त्री नहीं आएंगे राहुल द्रविड़ के समर्थन में, क्योंकि क्रिकेट हर बाजारू संस्करणों से पैसा कमाने की कला इन्हें आती है. लेकिन राहुल ने चुप्पी नहीं साधी और मैच फिक्सिंग के आरोपियों के खिलाफ सारी कार्रवाइयों में अधिकारियों का साथ दिया. उनकी टीम में यह सब हो रहा था और कप्तान राहुल को इसकी भनक तक नहीं लगी, यह उनकी विफलता थी. इसलिए राहुल ने उसकी जिम्मेदारी ली और अदालत में गवाही देने को भी तैयार रहे.

मगर धोनी ने क्या किया? श्रीनिवासन-प्रकरण के तुरंत बाद चैंपियंस ट्रॉफी के लिए जाती भारतीय टीम की प्रेस कांफ्रेंस में वह गूंगे पुतले की तरह बैठे रहे! धोनी जितना नाम और नामा कमा लें और भारत के कप्तान बने रहें, लेकिन वह कभी इसलिए याद नहीं किए जाएंगे कि उन्होंने भारतीय क्रिकेट में नैतिकता के स्तर को संभालने का काम भी किया. राहुल को इसका श्रेय मिलेगा. वह जब यह कहते हैं कि क्रिकेट ने उन्हें बेहतर इन्सान बनाया, तब वह इसी तरफ हमारा ध्यान खींच रहे थे कि खेल का मतलब खुद्दारी से खेलना और जीना तथा खुद्दारी से खेले गए खेल के बाद का खेल खेलना भी होता है.
खेल में पैसा हो या पैसों का खेल हो? सवाल बहुत उलझ जाता है जब आप यह भूल जाते हैं कि खेल आनंद उठाने की आदमी की वह स्वाभाविक प्रवृत्ति है, जिसका कोई मोल नहीं. अनमोल है वह. आज हम जिसका मोल लगाते हैं, वह खेल नहीं, खेल से बनाया गया वह बाजार है, जो हर चीज की कीमत तो लगाता है, पर मूल्य किसी का भी नहीं जानता. इसलिए टूर द फ्रांस का आर्मस्ट्रांग इतनी जीतों के बाद बताता है कि उसका सारा कमाल उत्तेजक दवाओं के बल पर था. टाइगर वुड्स के पतन की जड़ भी राहुल द्रविड़ की बातों में खोजी जा सकती है. अभी फॉर्मूला वन के मालिक एक्लेस्टॉन को 4.4 करोड़ डॉलर की घूस खिलाने के आरोप में पकड़ा गया है. टेनिस की दुनिया की कितनी ही कहानियां हमने सुनी हैं. आईपीएल के साथ क्रिकेट के मैदान में कितने ऐसे लोग उतर आए हैं, जिनका खेल से नहीं, बल्कि उससे होने वाली कमाई से रिश्ता होता है. इस तरह खेल अपनी आत्मा खोते जाते हैं और अंतत: ड्रग्स, फिक्सिंग, बेईमानी, सेक्स और नशे की अंधेरी दुनिया में खो जाते हैं.

खेलों के व्यापार का यह भयावह चेहरा है, जिसकी तरफ राहुल द्रविड़ ने हमारा ध्यान खींचा है. हम राहुल के चेहरे में अपना चेहरा खोजें, तो शायद आदमी बनने के करीब पहुंच सकेंगे.

आज राहुल जिस भूमिका में दिखाई दे रहे हैं, वैसी भूमिका निभाते हमने दूसरे किसी खिलाड़ी को नहीं देखा. इसलिए जब उन्होंने कहा कि क्रिकेट के भारतीय प्रशासकों को भूलना नहीं चाहिए कि विश्वसनीयता खोकर वे रुपया भले ही कमा लें, क्रिकेट के लिए सम्मान नहीं कमा सकेंगे, तो सब ओर खामोशी छा गई.

Sunday, April 15, 2012

बस भात खाओ फुस्सैन मारो...


कल के अमर उजाला के हल्द्वानी से निकलने वाले संस्करण में स्थानीय संपादक जनाब सुनील शाह का ये लेख छपा है. मन में आया काश ऐसी बातें हफ्ते में एक बार ही सही देश के हर स्थानीय अखबार में छपा करतीं. आपसे बांटने का मन हुआ -




बस भात खाओ फुस्सैन मारो...

ईश्वर है या नहीं। इसका ठोस जवाब किसी के पास नहीं। लेकिन एक और सवाल है जो इसका जवाब है - सरकार है या नहीं। जो जवाब ईश्वर के होने या न होने का है, वही जवाब सरकार पर सवाल का है। दोनों नीली छतरी के इस या उस पार रहते हैं। कभी किरपा कर दी तो रियाया (यानि भक्तजन ) धन्य। ये भक्त या रियाया हमेशा दुखी ही रहते हैं, रुऊंटे हैं, कलपते रहते हैं। रोते-रोते आए हैं रोते-रोते जाएंगे। तूने ये नहीं दिया, तूने ये नहीं किया। पानी दे दो, गैस दे दो, बिजली दे दो, बच्चों को पढ़ा दो, फोड़े- फुंसी पक रहे हैं, डाक साब चीरा लगा दो।

जेब हमेशा खाली रहती है और पेट पीठ पर ही लगा रहता है, कभी भरता ही नहीं। चाहिए तारे, पेट में कुछ नहीं प्यारे। पीपली लाइव का नत्था याद है। नेताजी कहते हैं - बेटा इस देश में कुछ फ्री में नहीं मिलता। सरकार कैसे दे देगी। एक लाख रुपए मिलेंगे, लेकिन मरना पड़ेगा।

अरे रियाया कोई धंधा कर ले। स्कूल का चोखा है, कापी किताब ही बेच ले। काफी कट है। हर सीजन में लाखों बचते हैं। कोई महंगाई का रोना रोकर गिड़गिड़ाए तो और जोर से रोना शुरू कर देना- बचता ही क्या है, मिलता ही क्या है। तिजोरी कौन चेक कर रहा है। वैसे अब तो ये चढ़ दौड़ते हैं, लेना है तो लो नहीं तो आगे बढ़ो। सरकार कहती है कि मुक्त मंडी में ग्राहक का बाजार है वस्तु का नहीं पर, यहां तो फल वाला भी आगे बढ़ लो कहता है।

हां कुछ नहीं तो प्लाट काटो। नेता, अभिनेता, इल्लू, पिल्लू, जुल्मी, यानि हर दूसरा प्लाट काट रहा है। पहाड़ क्या प्लेन्स क्या। कौन-कौन ये धंधा कर रहा है और कौन-कौन खरीद रहा है अगर सुनोगे तो छोटे-मोटे स्विस बैंक सा पिटारा खुल जाएगा। अदने सा अदना अफसर रिजार्ट बनाने की औकात रखता है। छोड़ो सब चलता है।

सरकारी जमीन पर कब्जा भी कर सकते हो। फिक्र नहीं, अपने अब्बा ही की है। मोमो, चाउमिन एक्सपर्ट बन जाओ। कौन पूछ रहा है। हमारे पेट में इतना तेजाब है,  सब गल जाएगा। जिन पर तेजाब कम है उनके लिए सरकार ने ठेके खुलवा दिए हैं। मर मरा भी गए तो क्या फर्क। ऊधमसिंह नगर में सौ दिन में 118 लोग मर चुके हैं। एक और मर जाएगा। घर वाले भी तेरहवीं के बाद भूल जाते हैं। जो मर गया सो तर गया। अरे हां याद आया यहां तो सरकार मरने परभी कुछ नहीं दे रही। अच्छा हुआ नत्था ऊधमसिंह नगर में नहीं था।

फटे में पैर देने की आदत है तो पत्रकार बन जाओ। सड़क क्यों नहीं बनी, नहर नहीं ढकी, डाक्टर साब मर्ज पर नजर रखो जेब पर नहीं, इलाज क्यों नहीं हो रहा, कूड़ा क्यों नहीं उठ रहा। हर काम के लिए पूरा सरकारी अमला है। नहीं करता काम तो तुम क्यों दुबले हुए जा रहे हो। सरकार उसको तनखा दे तो देती ही है। पर माया तो ऊपरी की है। तनख्वाह के लिए तो गुल्लक है। ऊपरी इतनी माया भी है कि बैंक ही खोल दे।

कुछ और काम भी हैं। बड़ी तेजी से नमो नारायण आते हैं। गाड़ी- बंगला एक से बढ़कर एक, एक के बाद एक। कोई नहीं पूछता कहां से आया। कुछ दिन पहले तक तो चप्पलें चटकाता था।

वैसे चिंता न करो ऊपर वाला सब देख रहा है। बस थोड़ा कारपोरेट कल्चर आ गया है। काम का बंटवारा हो गया है । अलग अलग ठेके हैं, पहले आओ-पाओ भी है। जैसा रिश्ता वैसी मुंह दिखाई। कमीशन एजेंट भी हैं। पहले उनके पास जाओ, फिर ऊपर और ऊपर। तब भी बच गए तो सीधे ऊपर।

अच्छा रिरियाना बंद करो। तुम्हारे बस का कुछ है नहीं। आदि काल से चला आ रहा है, अनादि तक चलेगा। भात है न। तो मियां भात खाओ फुस्सैन मारो। कहीं ऐसा न हो ये भात भी मिलना बंद हो जाए।