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Monday, August 29, 2011
कब है बदला ये ज़माना, तू ज़माने को बदल
अहमद हुसैन - मोहम्मद हुसैन बन्धुओं से सुनिए हसरत जयपुरी साहब की यह मीठी रचना-
चल मेरे साथ ही चल ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल
इन समाजों के बनाये हुये बंधन से निकल, चल
हम वहाँ जाये जहाँ प्यार पे पहरे न लगें
दिल की दौलत पे जहाँ कोई लुटेरे न लगें
कब है बदला ये ज़माना, तू ज़माने को बदल, चल
प्यार सच्चा हो तो राहें भी निकल आती हैं
बिजलियाँ अर्श से ख़ुद रास्ता दिखलाती हैं
तू भी बिजली की तरह ग़म के अँधेरों से निकल, चल
अपने मिलने पे जहाँ कोई भी उँगली न उठे
अपनी चाहत पे जहाँ कोई दुश्मन न हँसे
छेड़ दे प्यार से तू साज़-ए-मोहब्बत-ए-ग़ज़ल, चल
पीछे मत देख न शामिल हो गुनाहगारों में
सामने देख कि मंज़िल है तेरी तारों में
बात बनती है अगर दिल में इरादे हों अटल, चल
(यहां से डाउनलोड करें - चल मेरे साथ ही चल)
Friday, April 30, 2010
Wednesday, September 3, 2008
गणेश उत्सव : दो सांगीतिक प्रस्तुतियां

कल तीज थी - हरतालिका तीज.पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी भाषी इलाके की स्त्रियों का यह खास त्योहार होता है-निर्जला व्रत. और आज है गणेश चतुर्थी. अनंत चतुर्दशी तक अहर्निश गणेश उत्सव चलता रहेगा और तमाम लोग इसे अपने-अपने तरीके से मनाते रहेंगे.महाराष्ट्र में इसकी गजब धूम होती है. अपन को आज सुबह से कई कवितायें और गीत याद आ रहे हैं.क्या करें ,त्योहार मनाने का यह अपना तरीका, अपना पूजापाठ है. आइये सुनते हैं दो सांगीतिक प्रस्तुतियां. पहली रचना तुलसीदास की जग प्रसिद्ध 'गाइये गणपति जगवंदन' है जिसे स्वर दिया है अहमद हुसैन - मोहम्मद हुसैन ने और दूसरी प्रस्तुति एक पारंपरिक विवाह गीत है जिसे शुभा मुदगल ने गाया है. तो आइये सुनें-
गाइये गणपति जगवंदन / अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन
नाचत हैं गणपति / शुभा मुदगल
( चित्र - जामिनी राय )
Monday, June 23, 2008
ज़ुल्फ़ बिखरा के निकले वो घर से
अपने अलबम 'गुलदस्ता' से पहली बार आम श्रोताओं का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने वाले अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन भाइयों ने १९५९ में कुल पांच रुपये के मेहनताने पर आकाशवाणी, जयपुर से अपने कैरियर का आग़ाज़ किया था. उस्ताद अफ़ज़ल हुसैन के इन दो सुयोग्य पुत्रों ने लगातार अपना रियाज़ जारी रखने के साथ साथ अपने संगीत में नये-नये प्रयोग भी किये हैं.
शुरू में अपनी ग़ज़लों के बहुत सीमित संख्याओं वाले अलबम रिलीज़ किये उन्होंने. इधर के क़रीब दो दशकों में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ़ लगातार ऊपर चढ़ता गया है. वे अब तक करीब साठ ग़ज़ल संग्रह दे चुके हैं.
इन्हीं बन्धुओं की आवाज़ों में पेश है उनके अलबम 'राहत' से बेकल उत्साही की एक ग़ज़ल.
रफ़ीकों और उस्तादों का मानना है कि बरसातों का मौसम इसे सुनने का सबसे उपयुक्त समय है:
शुरू में अपनी ग़ज़लों के बहुत सीमित संख्याओं वाले अलबम रिलीज़ किये उन्होंने. इधर के क़रीब दो दशकों में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ़ लगातार ऊपर चढ़ता गया है. वे अब तक करीब साठ ग़ज़ल संग्रह दे चुके हैं.
इन्हीं बन्धुओं की आवाज़ों में पेश है उनके अलबम 'राहत' से बेकल उत्साही की एक ग़ज़ल.
रफ़ीकों और उस्तादों का मानना है कि बरसातों का मौसम इसे सुनने का सबसे उपयुक्त समय है:
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