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Saturday, December 3, 2016
Monday, June 23, 2008
ज़ुल्फ़ बिखरा के निकले वो घर से
अपने अलबम 'गुलदस्ता' से पहली बार आम श्रोताओं का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने वाले अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन भाइयों ने १९५९ में कुल पांच रुपये के मेहनताने पर आकाशवाणी, जयपुर से अपने कैरियर का आग़ाज़ किया था. उस्ताद अफ़ज़ल हुसैन के इन दो सुयोग्य पुत्रों ने लगातार अपना रियाज़ जारी रखने के साथ साथ अपने संगीत में नये-नये प्रयोग भी किये हैं.
शुरू में अपनी ग़ज़लों के बहुत सीमित संख्याओं वाले अलबम रिलीज़ किये उन्होंने. इधर के क़रीब दो दशकों में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ़ लगातार ऊपर चढ़ता गया है. वे अब तक करीब साठ ग़ज़ल संग्रह दे चुके हैं.
इन्हीं बन्धुओं की आवाज़ों में पेश है उनके अलबम 'राहत' से बेकल उत्साही की एक ग़ज़ल.
रफ़ीकों और उस्तादों का मानना है कि बरसातों का मौसम इसे सुनने का सबसे उपयुक्त समय है:
शुरू में अपनी ग़ज़लों के बहुत सीमित संख्याओं वाले अलबम रिलीज़ किये उन्होंने. इधर के क़रीब दो दशकों में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ़ लगातार ऊपर चढ़ता गया है. वे अब तक करीब साठ ग़ज़ल संग्रह दे चुके हैं.
इन्हीं बन्धुओं की आवाज़ों में पेश है उनके अलबम 'राहत' से बेकल उत्साही की एक ग़ज़ल.
रफ़ीकों और उस्तादों का मानना है कि बरसातों का मौसम इसे सुनने का सबसे उपयुक्त समय है:
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