....आज अपनी पसंदीदा अलबम 'सुनहरे वरक़' से यह ग़ज़ल आप सबकी सेवा में। आइए इसे सुनें ...... गुनें..... और मन ही मन कुछ बुनें....

ग़ज़ब किया, तेरे वादे पे ऐतबार किया.
तमाम रात क़यामत का इन्तज़ार किया
तमाम रात क़यामत का इन्तज़ार किया
हँसा -हँसा के शबे-वस्ल अश्क-बार किया,
तसल्लियाँ मुझे दे-दे के बेकरार किया।
हम ऐसे मह्वे-नजारा न थे जो होश आता,
मगर तुम्हारे तग़ाफ़ुल ने होशियार किया।
फ़साना-ए-शबे-ग़म उन को एक कहानी थी,
कुछ ऐतबार किया कुछ ना-ऐतबार किया।
शब्द : दाग़ देहलवी
संगीत : खय्याम
स्वर : कविता कॄष्णमूर्ति