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Thursday, January 7, 2010

साल २०१०: साहित्य में निजीकरण बढ़ेगा- मंगलेश डबराल

अशोक कुमार पाण्डेय युवा कवि हैं और कहानियां भी लिखते हैं. हमारी इस सीरीज को अब तक पढ़कर उन्होंने स्वागत योग्य टिप्पणी की है- 'आर्थिक क्षेत्र में तो यह सच ही है कि अभी कहीं कोई उम्मीद की किरण नहीं दिख रही. सामाजिक क्षेत्र में भी पुनरुत्थानवादी ताकतों के बरक्स कोई वैकल्पिक समाज निर्माण की तैयारी स्पष्ट नहीं दिखाई देती, पर कोशिशें पूरी ईमानदारी से हो रही हैं इसमें कोई दो राय नहीं. साहित्य में तो यही बहुत है कि पुरस्कार और मठाधीशों की जगह साहित्य बहस के केन्द्र में आये। आमीन!!!' उनकी इस सहभागिता का हम स्वागत करते हैं.
वैसे आज की प्रस्तुति में साहित्यकारों की बातें पढ़कर आपको ऐसा लगेगा कि आशाओं और निराशाओं के भंवर का सर बड़ी तेज़ी से चकरा रहा है-


आग्नेय (वरिष्ठ कवि): मैंने तो आँखें बंद कर रखी हैं और कान भी. निजी ज़िंदगी में जो चीज़ें हो रही हैं वही व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण होती हैं. जैसे कोई किसी से बहुत प्यार करता हो और वह दुनिया से चला जाए, या परिवार का कोई सदस्य विक्षिप्त हो जाए तो उसकी ज़िंदगी में भूचाल आ सकता है. अब सरकारें किसकी बनती हैं, राहुल गांधी पीएम बनेंगे या नहीं या अमेरिकी संस्कृति हमला कर रही है आदि सवाल मेरी ज़िंदगी में बहुत मायने नहीं रखते. देखना यह चाहिए कि एक व्यक्ति; एक नागरिक की ज़िंदगी में क्या हो रहा है. मनुष्य की यात्रा को विचारधारा के चश्मे से देखना संभव नहीं है...ठीक भी नहीं है.

टीएस इलियट ने कहा था कि आप किसी चीज़ की उम्मीद न करें क्योंकि वह उम्मीद किसी ग़लत चीज़ के लिए होगी. जैसे मैं कहूं कि दालों के भाव कम हो जाएँ या साग-सब्जी-फल वगैरह सस्ते हो जाएँ… तो यह उम्मीद करना भी ग़लत ही साबित होता है. अब जैसे जलवायु का संकट है… तो वह किसी ख़ास तरह के राष्ट्रों की साजिश नहीं है, बल्कि यह पूरी मानव सभ्यता का संकट है. ओबामा और मनमोहन सिंह मनुष्य ही हैं. ग्लोबल वार्मिंग को हम अमेरिका का संकट नहीं कह सकते.

अपनी पृथ्वी का भविष्य भी चमकीला नहीं है. मनुष्य जबसे इस पृथ्वी पर है उसने चींटियों, मधुमक्खियों, पशुओं यहाँ तक कि मछलियों की जगह भी छीन ली है. कोई इन जीव-जंतुओं से पूछे कि मनुष्य ने उनके साथ शुरू से ही क्या सुलूक किया है? वैसे भी माना जा रहा है कि चीजें अंत की तरफ बढ़ रही हैं. मेरा पूरा विश्वास है कि पृथ्वी पर जीवन का अंत होने वाला है और इसे कोई रोक नहीं सकता.
साहित्य में मुझे लग रहा है कि यह बड़े लेखन का दौर नहीं है. संगीत में भी बीथोवन और मोजार्ट अब कहाँ पैदा हो रहे हैं?


मंगलेश डबराल (वरिष्ठ कवि): साल २००९ के अंत में पीएम डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कांग्रेस के इंदिरा भवन का शिलान्यास करते हुए दिल्ली में कहा कि देश में आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, नक्सलवाद और क्षेत्रवाद- ये चार बड़ी चुनौतियां हैं. पीएम खुद यह भूल गए कि गरीबी एक बहुत बड़ी समस्या है. बाज़ारवाद के समर्थक पीएम को बढ़ती हुई गरीबी नहीं दिखाई देती. जब तक भारत अमेरिकापरस्ती नहीं छोड़ता है और बाज़ारवाद का साथ नहीं छोड़ता है...अगर भारत यह मान कर चल रहा है कि सारी समस्याओं का हल दमन के जरिये किया जा सकता है तो वह भ्रम है. पीएम द्वारा गिनाई गयी चार चुनौतियों से भी बड़ी चुनौती नव-उदारीकरण और भूमंडलीकरण है.


मेरा मानना है कि नए साल में लगभग यूरोपीय यूनियन की तर्ज़ पर एशियाई देशों की यूनियन बनाने की पहल होना चाहिए. इससे बहुत सारी समस्याएं हल हो जायेंगी.

साल २०१० में मुझे आशंका है कि साहित्य में निजीकरण और निगमीकरण का दौर चलेगा. संस्कृति के दूसरों हिस्सों में कार्पोरेटाईजेशन हो ही रहा है. चित्रकला में भी वे लोग घुस गए हैं. देखिये कि केन्द्रीय साहित्य अकादमी का जो 'रवीन्द्रनाथ ठाकुर पुरस्कार' है, इसकी धनराशि कोरिया की बहुराष्ट्रीय कंपनी सैमसंग देने जा रही है. यह पुरस्कार ८ भाषाओं में है. सोचिये कि कितने साहित्यकार इस धनराशि के लपेटे में आ जायेंगे. यह ख़तरे की घंटी है. लेखकों को सचेत हो जाना चाहिए. साहित्य में निजी पूंजी का प्रवेश बड़ा नुकसान पहुंचाएगा. इस बात की क्या गारंटी है कि कल को साहित्य अकादमी के मुख्य पुरस्कारों को कोई निजी कंपनी प्रायोजित नहीं करने लगेगी.

दूसरी बात यह है कि एक तरफ हम गांधी जी द्वारा उपयोग में लाई गयी कई चीज़ों को दुनिया भर में जगह-जगह से इकट्ठा करने की मुहिम छेड़े हुए हैं और दूसरी तरफ हम रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम का पुरस्कार बहुराष्ट्रीय निगम को सौंप रहे हैं.

साहित्य में वैचारिक और नैतिक गिरावट आती जा रही है. इसके बढ़ते जाने की आशंका है. साहित्य देश के साधारण जन से दूर जा रहा है. इसकी दिशा खाते-पीते मध्य-वर्ग की तरफ है. मुझे लगता है कि साहित्य को साधारण जन के निकट ही रहना चाहिए. एक उम्मीद यह भी है कि साल २०१० में महिला और दलित लेखन से कोई महत्वपूर्ण कृति आयेगी.


सुधा अरोड़ा (वरिष्ठ कथाकार): आज जैसी स्थितियां हैं उसमें बदलाव की गुंजाइश बहुत कम दिखाई दे रही है. आम जनता महंगाई की चक्की में पिस रही है...पूरा परिदृश्य ही काफी निराशाजनक है. राजनेताओं में जिस तरह भ्रष्टाचार पनपा हुआ है उसका कोई तोड़ नज़र नहीं आता. देश की बागडोर जिनके हाथ में है अगर वही भ्रष्ट हों तो आम जनता कितना भी बड़ा आन्दोलन क्यों न खड़ा कर ले, उससे क्या होगा...और आन्दोलन जनता खड़ा कैसे करेगी जबकि उसके ही जीने के लाले पड़े हुए हैं. न्याय-व्यवस्था का ढांचा चकनाचूर हो चुका है. अभी रुचिका का मामला ही देख लीजिये...

साहित्य जगत में भी मुझे निराशाजनक परिदृश्य दीखता है. जब लेखकों के अपने कोई नैतिक मूल्य नहीं हैं, जब उनमें ग़लत को ग़लत कहने का माद्दा नहीं है, सच सुनने-सुनाने का साहस नहीं है, सच्चाई के पक्ष में खड़े होने का दम नहीं है तो ऐसे लेखकों द्वारा रचे गए साहित्य से हम क्या उम्मीद करेंगे? लेखन में मैं कई बार मोहभंग की स्थिति से गुजर चुकी हूँ और आज भी समझ लीजिये कि वही दौर चल रहा है.

कुमार अम्बुज (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'अतिक्रमण’): पेड़ों और फसलों के लिए धरती पर लगातार कम होती जगह. पानी की मुश्किल. साम्राज्यवादी, पूंजीवादी समाज का रचाव और फैलाव. विकास के जनविरोधी प्रस्ताव. प्रतिरोध और आन्दोलनों की अनुपस्थिति. ये कुछ चिंताएं हैं जिनसे अक्सर मैं इधर घिरा रहता हूँ. जैसे इन सब बातों के बीच एक तार जुड़ा है जो इन्हें एक साथ रखता है. इन पर अलग-अलग विचार किया जाना शायद संभव नहीं. इन पर एक साथ ही गौर करना जरूरी होगा. यह एक कुल चरित्र है और आफत है जो इस समय हमारे सामने रोज-रोज एक बड़े रूप में सामने आती जा रही है.


ऐसे में गुजरते वर्ष की एक रात बीतने भर से, किसी नयी सुबह में एक फैसलाकुन उम्मीद संभव नहीं. लेकिन प्रयास हों कि मध्यवर्ग में कुछ उपभोग वृत्ति कम हो, उसकी बाज़ार केन्द्रित आक्रामकता में कमी आये और वह मनुष्यता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही चीज़ों के प्रति अपना प्रतिरोधात्मक विवेक दिखा असके तो यह नए साल की उपलब्धि होगी. वह सूचना और ज्ञान से संचालित होने के साथ-साथ संवेदना और करुणा से भी चालित हो. फासिज्म के जितने लक्षण इटली और ख़ास तौर पर हिटलर की जर्मनी में दिखने लगे थे, वे सब आज हमारे देश में उपस्थित हैं. यही हमारे समय का प्रधान सांस्कृतिक लक्षण है. राजनीति से इसका सीधा गठजोड़ है और सामाजिक संबंधों को संस्कृति के नाम पर इसमें शामिल कर दिया गया है. राजनीति अप्रत्याशित भ्रष्टाचार के पराक्रमों का उदाहरण बन कर रह गयी है. नए साल में इन सब में अचानक कोई कमी आ सकेगी, ऐसी कोई आशा व्यर्थ है.

लेकिन मैं साहित्य से उम्मीद करता हूँ. यह ठीक है कि साहित्य अपनी भूमिका उतनी प्रखरता से नहीं निभा पा रहा है कि इस पतनशील और फासिस्ट समाज से लड़ने के लिए समुचित मार्गदर्शन और प्रेरणा दे सके. लेकिन साहित्य ही वह जगह होगी जहां से ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान संभव हो सकेगी और प्रतिरोध के कुछ उपाय भी दिखेंगे. साहित्य में, ख़ास तौर पर कहानी में, बीच-बीच में कलावाद का ज़ोर भी उठता दिखाई देता है, उसकी जगह जीवन के उत्स, संताप और स्वप्नशीलता के जीवंत तत्वों को देखने की आशा की जानी चाहिए. हिन्दी कहानी, कविता और उपन्यास जहां तक आ गए हैं, वहां से एक नए प्रस्थान एवं अग्रगामिता की शुभकामना भी है.
लेकिन सारी आशाएं अंततः सकर्मक क्रियाओं से ही फलीभूत हो सकती हैं इसलिए हम सबके नागरिक प्रयास भी जरूरी होंगे.

एकांत श्रीवास्तव (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'बीज से फूल तक'): मैं कामना करता हूँ कि यह जो असमान छूती मंहगाई है वह नीचे उतरे ताकि एक बहुत साधारण व्यक्ति अपनी जेब की हैसियत के अनुसार अपना ठीक-ठीक जीवनयापन कर सके. मगर उत्तर-पूंजीवाद में यह संभावना कम बनती दिखाई दे रही है.

मैं यह मानता हूँ कि वर्त्तमान साहित्य से ही भविष्य की भूमिका बनती है. मैं चाहूंगा कि भविष्य का साहित्य पाठकों के अधिक करीब हो और उसका रास्ता दिमाग के साथ-साथ दिल से होकर भी गुज़रे. जैसा कि डॉक्टर रामविलास शर्मा ने कहा है कि सिर्फ विचारबोध से साहित्य पैदा नहीं होता, उसके लिए भाव-बोध ज़रूरी है.


.......(जारी

Tuesday, January 5, 2010

वर्ष २०१०: साहित्यकारों की राय- 'दिन नहीं बदलेगा, तारीख़ बदल जायेगी'

नए साल के मौके पर बतौर कर्मकांड जीवन के चकमक क्षेत्रों के जगमगाते लोगों से यह जानने की कोशिश की जाती है कि उनकी क्या-क्या उम्मीदें हैं. हमने तय किया कि इस बारे में धूल-धूसरित हिन्दी जगत के नए-पुराने रचनाकर्मियों को टटोला जाए और पता किया जाए कि उनकी आशंकाएँ-कुशंकाएँ क्या हैं. सो, अमल यह हुआ कि बातचीत होती गयी और क्रम बनता गया. यह बातचीत विजयशंकर चतुर्वेदी ने की है. अब विनती यह है कि साहित्य की हर विधा से जुड़े लोग शामिल होकर यह कारवां आगे ले जाएँ.


आबिद सुरती (पेंटर, कार्टूनिस्ट, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार): नए साल में मैं देखना चाहूंगा कि अपनी संस्कृति को कैसे सुरक्षित रखा जाए. यह जो वैश्वीकरण आगे बढ़ रहा है वह सब कुछ तहस-नहस किये डाल रहा है. यह अमेरिकी संस्कृति है जो पूरी दुनिया पर छाती जा रही है और सब कुछ खाती जा रही है. यह हर हाल में रुकना चाहिए.

मैं मानता और कहता हूँ कि भारतीय संस्कृति दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है और अमेरिकी संस्कृति दुनिया में सबसे घटिया है. आज के बच्चे टिफिन में नूडल्स लेकर स्कूल जाते हैं, जिनमें कोई पौष्टिकता नहीं होती कोई विटामिन नहीं होता. हमारी संस्कृति में माँ बाजरे की रोटी पर घी चुपड़ कर देती थी. अमेरिकी संस्कृति जहां भी जाती है, वायरस की तरह वहां की लोक-संस्कृति को चट कर जाती है.

चित्रकारिता जगत में नया साल खुशियाँ लेकर आयेगा. आज हुसैन, रज़ा, सुजा, गायतोंडे आदि की पेंटिंग्स लाखों-करोड़ों में बिकती हैं. इस दुनिया का विस्तार हो रहा है. आज एनीमेशन आ गया है, कार्टून चैनल्स हैं, कार्टून फ़िल्में बनती हैं...इससे सैकड़ों नए-नए कलाकारों को खपने की जगह मिलती है. पहले स्थान बहुत सीमित था. आज के दौर को आप कार्टूनिस्टों का स्वर्णयुग कह सकते हैं. साल २०१० में पेंटर भी अच्छा काम और दाम पायेंगे.'

प्रोफेसर कमला प्रसाद (आलोचक, सम्पादक 'वसुधा'): मैं इस व्यवस्था में लगातार ह्रास देखता हूँ और इसीके बढ़ते जाने की आशंका है क्योंकि इसमें जैसे-जैसे गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ेगी, देश में पैसे का कब्ज़ा बढ़ेगा. चुनाव में, राजनीति में पैसे का कब्ज़ा बढ़ेगा. अमरीकी दोस्ती सघन होगी तो आतंकवाद, नस्लवाद, क्षेत्रवाद बढ़ेगा. हर समस्या का निदान क़ानून-व्यवस्था की समस्या माना जाएगा. नक्सलवाद की समस्या के लिए सेना की तरफ देखा जाएगा...तब हम क्या उम्मीद कर सकते हैं...साल २०१० में...२०११ में और उसके आगे के वर्षों में भी...



जबसे यह भूमंडलीकरण का राज आया है तबसे विकास की थोथी चर्चा होती है. समता की बात नहीं होती...तो ऐसे में कैसा जनतंत्र? रूसो ने कहा है कि ऐसे किसी जनतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती जिसमें समता न हो...आज हमारे देश के हर आदमी के अवचेतन में अज्ञात भय और अमूर्त गुस्सा व्याप्त है. यह जनतंत्र के चरित्र का सबसे घातक पहलू है.

ऐसी परिस्थितियों में उम्मीद की किरण हमारी जागरूक युवा पीढ़ी है और जो जागरूक मीडिया वाले लगातार विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक बातें जनता के सामने रखते चलते हैं, उनसे भी आने वाले समय में उम्मीद बंधती है. यह मीडिया बड़ी-बड़ी साजिशों को विफल करके नई उम्मीदों को जन्म देता है. अगले साल उन्हीं उम्मीदों के विस्तार की आशा करता हूँ. जनता में सामूहिक भाव-बोध आने वाले समय में सामाजिक परिवर्त्तन का कारक बनेगा. मैं अब भी मानता हूँ कि कला और संस्कृति का क्षेत्र तथा माध्यम अग्रगामी है और यही परिवर्त्तन की राह दिखाएगा.


निदा फाज़ली (मशहूर शायर): मुझे कोई उम्मीद नहीं है. पिछला साल अपने दुखों के साथ चला जाता है और नया साल अपने ग़मों के साथ आता है. मेरा एक शेर है-


'रात के बाद नए दिन की सहर आयेगी

दिन नहीं बदलेगा, तारीख़ बदल जायेगी.'


...सो कैलेण्डर बदलता है, कैलेण्डर के बाहर का माहौल नहीं बदलता. वह २००९ हो, २०१० हो या कोई और साल हो... बाहर की फिजायें, हवाएं, सदायें जस की तस रहती हैं.

बहुत बड़ी बात यह है कि भाजपा ने इंडिया शाइनिंग का नारा दिया था, कांग्रेस इंडिया इज शाइनिंग कह रही है...लेकिन जिस देश में नंदीग्राम हो, सिंगूर हो, भिंड हो, मुरैना हो, मोतिहारी हो... और ऐसे ही अनेक अंधेरों के क्षेत्र फैले हुए हों जो देश की आबादी के तीन चौथाई से ज्यादा हैं...वहां बहुत उम्मीद क्या करना...बस इन्हीं लोगों के लिए भूख है... मंहगाई है...महामारियां हैं...२००९ में भी थीं और क्या आप कह सकते हैं कि २०१० में नहीं रहेंगी?



आज़ादी से अब तक... और ब्रिटिश राज में तथा उसके पहले से भी आम आदमी का शोषण हमारी तहजीब की पहचान रहा है...पुराने युग में भी था...२०१० में भी रहेगा. नए साल के लिए मेरा कोई सुझाव नहीं है... बस इतना कहता हूँ कि भगवान ने इंसान को बनाया तो शैतान को भी नहीं मारा...रामकथा में दिलचस्पी रावण के कारनामों के चलते कायम रहती है...यही २०१० में होगा...इक़बाल का एक शेर है-


'गर तुझे फ़ुरसत मयस्सर हो तो पूछ अल्लाह से

क़िस्सा-ए-आदम को रंगीं कर गया किसका लहू.'


फ़िल्मी गीत-संगीत एक व्यापार है और व्यापार चलता रहता है. एक बात गौर करने लायक है और वो यह कि पहले फिल्मों की दुनिया में प्रवेश पाने के लिए जो पासपोर्ट मिलता था वह इस आधार पर मिलता था कि आपने कितनी बढ़िया शायरी की है, आप कितने जहीन हैं, आपकी कितनी किताबें छप चुकी हैं. शैलेन्द्र, साहिर, राजा मेंहदी अली खाँ, भारत व्यास आदि गीतकार यही पासपोर्ट लेकर दाखिल हुए थे. आज हालत यह है कि अगर आपमें ये विशेषताएं हैं तो आपको बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा. वजह यह है कि जैसा लिखवाने वाला वैसा ही लिखने वाला.

नए साल के लिए मैं अपना एक दोहा पाठकों को भेंट करना चाहता हूँ-


'किरकिट, नेता, एक्टर, हर महफ़िल की शान

स्कूलों में क़ैद है, ग़ालिब का दीवान.'


नई नस्ल के लिए मेरा यही सन्देश होगा कि वे स्कूलों में क़ैद ऐसे कई गालिबों को आज़ाद कराएं और उनका नेताओं, एक्टरों और क्रिकेटरों से ज्यादा सम्मान करें. शुक्रिया...धन्यवाद!"