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Monday, January 18, 2010

साल २०१०: वित्तीय साम्राज्यवादी खून-ख़राबा बढ़ेगा- त्रिनेत्र जोशी

पिछली कड़ी में वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा की बातें पढ़कर काफी हलचल मची. नीरज पासवान जी ने तो मुझे भी लपेटे में ले लिया और लिखा- 'आलोक धन्वा जी ने हिंदी के महान लेखकों की सूची गिनाई है उसमें एक भी महिला महान बनती हुई नहीं दिखी. महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर उषा प्रियंवदा और कात्यायिनी तक. लगता है पुरुष ही महान हुआ करते हैं. फिर अगर विजयशंकर चतुर्वेदी पोस्ट लिखेंगे तो स्त्री के बारे में सोच भी कौन सकता है? आप लोग महान बनाने का कारखाना चलाते रहिए और बोतल बंद द्रव सरकारी खर्चे पर पीते रहिए. ज़िंदाबाद!'

हम पासवान जी को अपने खर्चे पर धन्यवाद देते हैं और अनुरोध करते हैं कि वह सुनी-सुनायी बातों पर अपनी राय न बनाएं:)... और हाँ, अगली कड़ी इस श्रृंखला की आख़िरी कड़ी होगी.

त्रिनेत्र जोशी (वरिष्ठ कवि, अनुवादक):साल २०१० में जो राजनीति है वह एशिया और अफ्रीका केन्द्रित अधिक हो जायेगी. इसलिए कि एशिया तो अभी विकासशील राष्ट्रों की पांत में आगे है. ख़ास तौर पर भारत-चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया. अफ्रीका इस सदी के उत्तरार्द्ध में विकासशीलों की दौड़ में शामिल होगा. इससे एक क़िस्म का जो ग्लोबल बाज़ार बना है उसके चलते इन देशों में विकसित देशों का हस्तक्षेप और बढ़ेगा; यानी जिसे वित्तीय सामाज्यवाद कहते हैं. इसमें पूंजीवादी तौर-तरीकों से काम होता है, सेना भेजने की ज़रूरत नहीं पड़ती. शायद इसीलिये लेनिन ने कहा था-'साम्राज्यवाद पूंजीवाद का सर्वोत्तम मंच है.'

साल २०१० में बाज़ारों के लिए मारामारी अधिक बढ़ेगी, जिसका अर्थ यह है कि विकासमान और अल्प विकसित देशों में वित्तीय साम्राज्यवादी खून-ख़राबा बढ़ेगा और पूंजीवादी तौर-तरीके समाज पर हावी होंगे. इसमें कई विकासशील और अल्प विकसित देश साम्राज्यवादी लूट-खसोट का अड्डा बनेंगे और हो सकता है यह साम्राज्यवाद कई नए किस्म के इराक़ खड़े कर दे. लेकिन उम्मीद इस बात पर है कि एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासमान देश इस अचानक आक्रमण से टक्कर लेंगे और इकतरफा विश्व में शक्ति संतुलन कायम कर पायेंगे. लेकिन इसमें भारत-चीन और ब्राज़ील जैसे देशों की रणनीतिक एकता, एक महत्वपूर्ण मुकाम होगी. जैसे कि आसार हैं आपसी प्रतिद्वंद्विता के बावजूद भारत और चीन एक दूसरे के निकट आने को मजबूर होंगे जिससे निश्चय ही रणनीतिक परिदृश्य बदलेगा.

जहां तक साहित्य का सवाल है, पश्चिमी हवाएं उसकी शैली पर यहाँ तक कि विषय-वस्तु पर भी अपना असर बढ़ाएंगी और साहित्य बाज़ारवाद में अपनी भूमिका निभाने को विवश सा लगेगा. इसका एकमात्र विकल्प यह है कि विकासशील देश और अल्प विकसित देशों के लेखक समाज के प्रति अपनी संवेदनात्मक प्रतिबद्धता बढ़ायें क्योंकि देश-काल के हिसाब से इस 'अग्रगामिता' के शिकार विकासशील और अल्प विकसित देशों या राष्ट्रों के समाज ही होंगे. हालांकि यह एक उम्मीद भर है. इसके बिना साहित्य अपनी बुनियादी भूमिका को सुरक्षित रख पाए, यह अनिश्चित है. लेकिन इस ओर साहित्य प्रवृत्त हो इसकी अपेक्षा करना शोषक और शोषित के बीच शोषित का पक्ष लेने की एक अनिवार्य ज़रुरत है.

यही वजह है कि साहित्यकारों के बीच संवादहीनता बढ़ रही है और मीडिया हर प्राकृतिक कोमल भाव को एक सनसनी में बदल रहा है जिसके भीतर अधिकाँश लोग सादिस्तिक आनंद पा रहे हैं. यह एक पतनशील समाज की पहली पहचान है. अगर साहित्यकार सचमुच साहित्यकार रहना चाहते हैं तो उन्हें इस संवेदनशील परिदृश्य से दो-दो हाथ करना होंगे अन्यथा जो निराशाजनक परिदृश्य है वह और भी गहन हो जाएगा.

इस सबके बावजूद कहना यह है कि न समय रुकता है, न दमन कम होता है- फिर भी यह उक्ति काफी मायने रखती है कि जहां दमन है वहां प्रतिरोध भी अवश्यम्भावी है. इसी उम्मीद के साथ हमें २०१० का आगाज़ करना चाहिए और समय रहते अपनी भूमिका तय कर लेना चाहिए.


विवेक रंजन श्रीवास्तव (कवि-व्यंग्यकार-नाटककार): सैद्धांतिक और बौद्धिक स्तर पर हम किसी से कम नहीं हैं, वैश्विक मंदी के दौर में भी भारत ने स्वयं को बचाए रखा, २००९ में जो खोया जो पाया वह सब सामने है ही. मेरी कामना है कि वर्ष 2010 में हम कुछ ऐसा कर दिखाएं जिससे मंहगाई नियंत्रित हो जिससे मेरे प्रथम व्यंग्य संग्रह का किरदार 'रामभरोसे', जो महात्मा गाँधी का अंतिम व्यक्ति है, चैन की रोटी खा सके, उसे प्यास बुझाने को पानी खरीदना न पड़े. पड़ोसी देशो की कूटनीति पर हमें विजय मिले, कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन भर नहीं बल्कि कुछ ऐसी नीतिगत खेल व्यवस्था हो कि हम पदक तालिकाओ में भी नजर आयें.

यह तो था मेरा कवि-नाटककार वाला अवतार. अब व्यंग्यकार के चोले में प्रवेश करता हूँ. एक व्यंग्यकार होने के नाते मेरी नए वर्ष से कुछ मांगें इस प्रकार हैं-

1.वात्स्यायन (कामसूत्र वाले) पुरस्कारों की स्थापना हो

जब से हमारे एक प्रदेश के ८६ वर्षीय (अब पूर्व और अभूतपूर्व हो चुके) महामहिम जी पर केंद्रित शयन शैया पर निर्मित फिल्म (पता नहीं 'असल या नकल') का प्रसारण एक टी वी चैनल पर हुआ है, जरूरत हो चली है कि वात्स्यायन पुरस्कारों की स्थापना हो ही जाए. वानप्रस्थ की जर्जर परम्परा और जरावस्था को चुनौती देते कथित प्रकरण से कई बुजुर्गों को इन सद्प्रयासों से नई उर्जा मिलेगी और उनमें साहस का संचार होगा. प्राचीन समय से हमारे ॠषि-मुनि और आज के वैज्ञानिक चिर युवा बने रहने की जिस अनंत खोज में लगे रहे हैं, उस दिशा में यह एक सार्थक, रात्रि-स्मरणीय एवं अनुकरणीय उदाहरण होगा!

2.आतंकवाद के रचनात्मक पहलू पर ध्यान दिया जाए

कभी बेचारे आतंकवादियों के दृष्टिकोण से भी तो सोचिये. कितनी मुश्किलों में रहते हैं वे! गुमनामी के अंधेरों में, संपूर्ण डेडिकेशन के साथ अपने मकसद के लिये जान हथेली पर रखकर, घर-परिवार छोड़ जंगलों में प्रशिक्षण प्राप्त कर, भारी जुगाड़ करके श्रेष्ठतम अस्त्र-शस्त्र जुटाना खाने का काम नहीं है. पल दो पल के धमाके के लिये सारा जीवन होम कर देना कोई इन जांबांजों से सीखे! आत्मघात का जो उदाहरण हमारे आतंकवादी भाई प्रस्तुत कर रहे हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है. अपने मिशन के पक्के दृढ़प्रतिज्ञ हमारे आतंकी भाई जो हरकतें कर रहे हैं वे वीरता के उदाहरण बन सकती हैं. जरूरत बस इतनी है कि कोई आपके जैसा महान लेखक या ब्लॉगर उन पर अपनी सकारात्मक कलम चला दे.

3.भ्रष्टाचार को नैतिक समर्थन मिले

सरवाइवल आफ फिटेस्ट के सिद्धांत को ध्यान में रखें, तो हम सहज ही समझ सकते हैं कि तमाम कोशिशों के बावजूद जिस तरह से भ्रष्टाचार दिन दूनी रात चौगुनी गति से फल फूल रहा है, उसे देखते हुये मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि विश्वगुरु भारत को भ्रष्टाचार के पक्ष में खुलकर सामने आ जाना चाहिये. हमें दुनिया को भ्रष्टाचार के लाभ बताना चाहिये. पारदर्शिता का समय है, विज्ञापन बालायें और फिल्मी नायिकायें पूर्ण पारदर्शी होती जा रही हैं. पारदर्शिता के ऐसे युग में भ्रष्टाचार को स्वीकारने में ही भलाई है और हर नस्ल के भ्रष्टाचारियों की मलाई ही मलाई है.

Thursday, January 14, 2010

साल २०१०: हिंसा के विरुद्ध जनता और बुद्धिजीवियों की व्यापक एकजुटता हो- आलोक धन्वा


मौजूदा श्रृंखला में अब तक ज्यादातर साहित्यकारों ने अपनी राय संक्षिप्त रूप में दी है लेकिन आज जब हिन्दी के वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा से बात हुई तो उन्होंने हमें वस्तुस्थिति को विस्तार में समझाना उचित समझा. सो आज सिर्फ और सिर्फ आलोक धन्वा-- विजयशंकर

मैं यह चाहता हूँ कि राष्ट्र की जो धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतें हैं वे साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुट हों. जितने भी वामपंथी संगठन हैं उनको भी इस मोर्चे में शामिल होना चाहिए. उन्हंं आपसी मतभेद स्थगित करके अपना एक व्यापक संयुक्त मोर्चा बनाना चाहिए क्योंकि राष्ट्र के सामने साम्प्रदायिक ताकतें आतंकवाद और दूसरी कई शक्लों में हमारी राष्ट्रीय एकता को तहस-नहस कर रही हैं. हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता, हमारी धर्मंनिरपेक्ष साझा-संस्कृति और हमारी लोकतांत्रिक उपलब्धियां ; आज सब भयावह चुनौतियों और ख़तरों से घिरी हैं. भारत को फिर से साम्राज्यवाद का नया उपनिवेश बनाने की साजिश रची जा रही है.


राजनीति और संस्कृति, दोनों क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने नए बाज़ार तैयार कर रही हैं...अब भारत का पूंजीपति वर्ग भी उस राष्ट्रीय चरित्र से वंचित हो रहा है जो भारत के स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गांधी के नेतृत्व में उसने हासिल किया था. हमारा भारतीय समाज बाहर के हमलों की अपेक्षा अन्दर के हमलों से बहुत ज्यादा टूट रहा है. अलगाववाद की सुनियोजित साजिशें हमारे संघीय स्वरूप के ताने-बाने को नष्ट कर रही हैं.

हमारा सांस्कृतिक परिदृश्य भी संतोषजनक नहीं है. इस क्षेत्र में भी रचना विरोधी घात-प्रतिघात का माहौल विभिन्न माध्यमों के जरिये बनाया जा रहा है. हमारी जो प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाएं हैं उनमें भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हस्तक्षेप शुरू हो चुका है. इसका सबसे ताज़ा उदाहरण साहित्य अकादमी के भीतर घुसपैठ करके सैमसंग कंपनी के द्वारा 'रवीन्द्रनाथ ठाकुर पुरस्कार' दिए जाने की घोषणा है.

इस सबके बावजूद जनता के सुख-दुःख के लिए सार्थक लेखन करने वाले साहित्यकारों की भी हमारे देश में कमी नहीं है. यह देखना सुखद है कि भारत के बेहद संकटपूर्ण माहौल में बहुमत जनता अपनी स्वाभाविक मानवीय सृजन-शक्ति के साथ सक्रिय है. नए वर्ष के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं, साथ ही मैं यह चाहता हूँ कि आधुनिक भारत का जो गौरवशाली और संघर्षमय अतीत रहा है, हम उससे हमेशा प्रेरित होते रहें.

बीसवीं सदी एक महान सदी थी. देश और विदेश दोनों जगहों पर आज़ादी की बड़ी लड़ाइयां लड़ी गयीं. कई देशों ने उपनिवेशवाद से मुक्ति हासिल की जिनमें भारत भी शामिल है. फ़ासीवादी विरोधी युद्ध में विश्व भर की शांतिप्रिय और लोकतांत्रिक ताकतों ने मानवीय उत्कर्ष के नए महाकाव्य रचे.


बीसवीं सदी में एक ऐसी घटना घटी जो मानव इतिहास में कभी नहीं घटी थी. रूस में पहली बार मजदूरों और किसानों ने अपनी सत्ता कायम की जिसका प्रभाव पूरी दुनिया के लोकतंत्र पर पड़ा. बीसवीं सदी वैज्ञानिक विचारधाराओं की सदी थी. यह वही सदी थी जिसमें एक ओर लेनिन काम कर रहे थे तो दूसरी ओर महात्मा गांधी भी सक्रिय थे...एक ओर वर्टरैंड रसेल जैसे बड़े मानवतावादी दार्शनिक थे वहीं मैक्जिम गोर्की जैसे मजदूरों के बीच से आनेवाले लेखक थे. यह सदी नाज़िम हिकमत, पाब्लो नेरूदा, बर्तोल्त ब्रेख्त की सदी थी...साथ ही वह हमारे स्वाधीन भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक नेता प्रेमचंद और महाकवि निराला की भी सदी थी. हमारे स्वाधीन भारत की जो ज्ञान-संपदा है उसे जितना भारतीय बुद्धिजीवियों ने समृद्ध किया उतना ही विश्व के दूसरे बुद्धिजीवियों ने भी समृद्ध किया.


ज्ञान एक विश्वजनीन प्रक्रिया है, उसमें देशी-विदेशी का विभाजन छद्म है. अल्बेयर कामू, फ्रेंज़ काफ़्का और ज्यां पॉल सार्त्र जैसे बड़े लेखकों ने पूंजीवादी चिंतन प्रणाली को और उसकी सत्ता के तमाम अदृश्य यातना-गृहों को न सिर्फ उजागर किया बल्कि पूंजीवादी सत्ता को कटघरे में खड़ा करके उससे लगातार जिरह की. इससे लोकतंत्र के नए पाठ सामने आये.

बीसवीं सदी में हमारे देश में जहां राहुल सांकृत्यायन, रामचंद्र शुक्ल, फैज़ अहमद फैज़, फ़िराक गोरखपुरी, मक़दूम, रामविलास शर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, नामवर सिंह जैसे बड़े साहित्य चिन्तक सक्रिय थे वहीं बांग्ला में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शरतचंद्र, काज़ी नज़रुल इस्लाम, विभूतिभूषण बन्दोपाध्याय, माणिक बंदोपाध्याय, जीवनानंद दास, सुभाष मुखोपाध्याय, सुकांत भट्टाचार्य जैसी विभूतियाँ सक्रिय थीं. इसी तरह पश्चिम और दक्षिण भारत में भी बड़े चिन्तक जनता के बीच काम कर रहे थे.

यहाँ नाम गिनाना मेरा उद्देश्य नहीं है बल्कि दरअसल मैं बीसवीं सदी के उस महान कारवां की मात्र कुछ झांकियां प्रस्तुत कर रहा हूँ क्योंकि आज हमारे बीच देश और विदेश दोनों जगहों पर ऐसे बुद्धिजीवी मंच पर सामने आ रहे हैं जो फिर से मध्ययुग के अर्द्धबर्बर समाज को कायम करना चाहते हैं. बाबरी मस्जिद के ध्वंस और गुजरात का भयावह नरसंहार, कश्मीर और पंजाब में हजारों निर्दोष लोकतांत्रिक नागरिकों का क़त्लेआम, ईराक़ और अफगानिस्तान पर निरंतर हमले...ये सारी घटनाएँ उसी मध्ययुगीन अर्द्धबर्बर सोच को सामने रखती हैं. यह एक ऐसा भयानक समय है जहां ज्ञान से पलायन की प्रवृत्ति बढ़ रही है.

ओसामा बिन लादेन और हमारे हिन्दू तालिबान लालकृष्ण आडवाणी, नरेंद्र मोदी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया, आरएसएस के मोहन भागवत, इनके बीच कोई बुनियादी फर्क़ नहीं है. ये न हिन्दू हैं न मुसलमान, बल्कि ये उसी मध्ययुगीन अर्द्धबर्बर सोच के कारिंदे हैं.

कोसी की बाढ़ से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए जब मेधा पाटकर पटना आयीं तो एक पत्रकार वार्ता में पिछले वर्ष मैंने कहा कि जिसको प्राकृतिक आपदा कहते हैं दरअसल वह मानव-निर्मित आपदा है और पर्यावरण का मुद्दा भी लोकतंत्र का ही मुद्दा है. जो ताकतें नैसर्गिक सुषमा और प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रही हैं वही ताकतें प्रेमचंद के देश में हज़ारों किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर रही हैं.

आज शिक्षण संस्थाओं में भी एक ऐसी प्रतियोगिता जारी है जहां हमारे प्रतिभाशाली नौजवानों में लगातार भय, आत्महीनता और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. हमारी शिक्षा-प्रणाली का उद्देश्य एक ज्यादा मानवीय और संवेदनशील मानव समाज बनाना नहीं बल्कि नए बाज़ार के लिए ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा मुहैया कराना हो गया है. तो क्या २१ वीं सदी की शुरुआत आत्महत्याओं की सदी की शुरुआत है?

मैंने मेधा पाटकर से यह बात भी कही थी कि पर्यावरण के मुद्दे को पूरे समाज के दूसरे मुद्दों से जोड़कर देखा जाना चाहिए जो कि वैज्ञानिक सोच का एक नैतिक आधार है. जो आज हमारे जंगलों को काट रहा है वही आदिवासियों को भी ख़त्म करना चाह रहा है. शत्रुता, भय और हिंसा से आक्रान्त ऐसा सामाजिक परिदृश्य आधुनिक मानव सभ्यता में जल्दी दिखाई नहीं देता जहां सत्य और न्याय के लिए प्रतिरोध करनेवाली ताक़तें भी विसर्जन का शिकार होती जा रही हैं.

चूंकि मैं एक कवि हूँ इसलिए मैं अपने कवि भाइयों से, साथियों से यह विनम्र आग्रह करना चाहता हूँ कि हमारे बीच जो विरासत आचार्य शिवपूजन सहाय, यशपाल, रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, रांगेय राघव, परसाई, भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा, रेणु, धूमिल, श्रीलाल शुक्ल,राजकमल चौधरी,विजयदान देथा, अमरकांत, मोहन राकेश, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह,मलय, सोमदत्त, ज्ञानरंजन, विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे, ऋतुराज, विजेंद्र, कुमार विकल, नरेश सक्सेना, देवताले जैसे कई बड़े साहित्यकारों ने हमें सौंपी है, हम उसे कैसे आगे बढ़ायें...उसके प्रति अपना दायित्व-बोध कैसे निभाएं.

हमारे साथ भी जो लोग लिख रहे हैं वे कम प्रतिभाशाली नहीं हैं. अब हमारे बाद दो पीढ़ियाँ आ चुकी है कवियों की...उनसे भी मैं बेहद प्रभावित हूँ.

इस नए वर्ष में मेरी अपेक्षा यह रहेगी कि हम न्याय के पक्ष में ज्यादा से ज्यादा काम करें...हर तरह की हिंसा के विरुद्ध सार्थक संवाद शुरू करें...लोकतंत्र और समाजवाद की बेहद जटिल चुनौतियों से जूझने की, सृजन करने की दिशा में सक्रिय हों.

मुझे याद आता है कि २००७ में जब हम लोगों ने पटना में शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की जन्म शताब्दी के लिए समारोह समिति तैयार की उस मोर्चे में ४० से ज्यादा धर्मंनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक जन-संगठन शामिल थे. जब हमने शुरुआत की तो हमें यह पता नहीं था कि भगत सिंह जन्म शताब्दी के समारोहों में वर्ष भर तक जनता की इतनी व्यापक हिस्सेदारी होगी. भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खान, रामप्रसाद बिस्मिल, जैसे हमारे महान शहीद देश भक्तों की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती चली गयी. मेरे लिए यह एक ऐसा अनुभव था जिससे मैं बेहद अभिभूत हुआ. यह भारतीय समाज के जीवंत और कृतज्ञ होने का एक उज्जवल उदाहरण था.

इन समारोहों ने यह जाहिर किया कि स्वाधीनता की चेतना को ख़त्म नहीं किया जा सकता. मनुष्य स्वाधीनता के पथ पर अपने सतत संघर्ष से जितनी यात्रा कर चुका है वहां से वह पीछे नहीं जाएगा. वह आगे ही जाएगा.धन्यवाद!

Tuesday, January 12, 2010

साल २०१०: जब रचना न हो पा रही हो तब अनुवाद हो- डंगवाल

साहित्यकारों की राय वाली पिछली कड़ी में साथी कवि निलय उपाध्याय की बात पढ़कर हमारे प्रिय गौतम राजरिशी हिल उठे हैं. उन्होंने लिखा है- 'निलय जी के शब्दों ने झकझोर दिया है जैसे पूरे वजूद को...एक सकते की सी हालत में हूँ.' वहीं भाई अमिताभ श्रीवास्तव कहते हैं - 'इन चीज़ों को कबाड़ तो नहीं कहा जा सकता...बेहतरीन!'
हमारा कहना है कि हर चीज़ की किस्मत में कबाड़ होना लिखा है और हर कबाड़ बेकार नहीं होता... और आज की कड़ी में भी साहित्यकारों की राय को हम कबाड़ नहीं, हीरा समझ कर प्रस्तुत कर रहे हैं:)-

वीरेन डंगवाल (वरिष्ठ कवि):

हालिया वर्षों में हमारा महादेश कई सारे आशातीत परिवर्तनों से रूबरू हुआ है. कुछ तब्दीलियों को समाज ने अच्छे से आत्मसात कर पाने में सफलता प्राप्त की है. मिसाल के तौर पर सूचना क्रान्ति ने समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर जो प्रभाव डाला है उसके सारे धनात्मक परिणामों ने अभी अपने आप को पूरी तरह प्रकट करना बाकी है. सभी धरातलों पर मूल्य बदल रहे हैं और मुझे लगता है कि आने वाले साल में यह क्रम और भी तेज़ी से चलता ही रहना है. मैं चाहता हूं कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों में ह्रासोन्मुखता कम हो क्योंकि प्रत्यक्षतः सामाजिक और नैतिक मूल्य ही बाक़ी सारी चीज़ों को तय करते हैं.

साहित्य के क्षेत्र में; खासतौर पर हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में हमारे रचनाकारों को अधिक कर्मठ होने की ज़रूरत है. हमारे यहां 'बातें ज़्यादा और काम कम’ पर अधिक तवज्जो दी जाती रही है. फ़िज़ूल के सम्मेलन, पुरस्कार, विमोचन, गुटबाज़ी के चलते हिन्दी का जो नुकसान हुआ है, उसकी थोड़ी बहुत ही सही, भरपाई कर पाने के लिए कर्मठता सबसे ज़रूरी गुण है. जब रचना न हो पा रही तो अनुवाद किया जाना चाहिये. अनुवाद के मामले में हिन्दी अन्य तमाम भाषाओं से बेहद पिछड़ी हुई है. स्तरीय अनुवादों की भीषण कमी है. जब तक साहित्यकार स्वयं अनुवाद नहीं करते, स्थिति जस की तस बनी रहनी है. इसके अलावा हिन्दी के हर साहित्यकार को कम्प्यूटर का न्यूनतम ज्ञान प्राप्त करने का जतन करना चाहिये. समय के साथ बने रहने के लिये यह एक ज़रूरी औज़ार है. हिन्दी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में जैसा क्रान्तिकारी कार्य हुआ है, उसे एक मिसाल के तौर पर देखे जाने की ज़रूरत है.


प्रत्यक्षा सिन्हा (कथाकार, कहानी-संग्रह 'जंगल का जादू तिल तिल'):

मानवीय गुण अमानवीय गुणों पर भारी पड़ें, सँभावनायें हर क्षेत्र में बनी रहें, सपने देखने का भोलापन बरकरार रहे.

सामाजिक राजनीतिक स्तर में प्रतिबद्धता और उत्तरदायित्व बढ़े, सांस्कृतिक स्तर पर कुछ तोड़फोड़ की उम्मीद रखती हूँ, बने बनाये खाँचों के बाहर, अनदेखे रास्तों पर चलने का दीवानापन दिखे- ऐसी आकांक्षा है.

साहित्यजगत से बहुत भोली उम्मीदें हैं... मन की बेचैनियों का ईमानदार प्रतिवर्तन हो, कुछ अपनी अंतरतम दुनिया में मगन, एक्सर्टर्नल्स की परवाह किये बगैर अपनी रचनात्मकता में धूनी रमायें लोगों का कुनबा हो, अच्छा गंभीर सार्थक लेखन हो, कुछ बच्चे सा भोला उत्साह इन सब को स्फूर्ति देता रहे...बस इतना, इतना ही...


हरेप्रकाश उपाध्याय (कवि, प्रथम कविता संग्रह 'खिलाड़ी दोस्त और अन्य कवितायें'):

मेरी वर्ष २०१० से पहली उम्मीद तो यही है कि लोग २००९ से सबक लेंगे.

कोई राठौर किसी रुचिका पर हाथ डालने से पहले कम से कम १० बार सोचेगा. कोई नारायण दत्त राजभवन की मर्यादा के बारे में ज्यादा संवेदनशील रहेगा. यानी सत्ता के जोश में लोग होश नहीं खोएंगे आदि, इत्यादि...

बाकी एकदम से तो यह नहीं लगता कि सचमुच का कोई बदलाव एकायक आ जाएगा नए साल में. अदालतें थोड़ी सुस्ती कम करें और बिजली गाँवों में चली जाए...लोग देश में निर्भय होकर कहीं भी आयें-जाएँ...यह सब हो तो कितना अच्छा, पर हो पायेगा क्या?

साहित्य जगत में यह हो कि सम्पादक लोगों का यह भरम टूटे कि साहित्य उनका हरम है...कोई सम्पादक किसी लेखक को अपमानित नहीं करे... नामवर लोग झूठ नहीं बोलें और लोगों का भरोसा बना रहने दें साहित्य पर. चौकी और चौके के जो अलग-अलग मानक हैं वे मिट जाएँ...सुधीशों की बकवास से मुक्ति मिले हिन्दी साहित्य को.

इस साल लेखकों को लिखने के लिए पुरस्कार थोड़ा कम मिलें...थोड़ी सजा मिले ताकि प्रसंग का धुंधलका साफ हो सके.

Wednesday, January 6, 2010

वर्ष २०१०: 'शब्दों के गढ़ों और मठों से बाहर आयें साहित्यकार'

आबिद सुरती, प्रोफ़ेसर कमला प्रसाद और निदा फाज़ली की नए साल पर दी गयी राय को लेकर हमें मिली प्रीतेश बारहठ की टिप्पणी उत्साहित करती है. उन्होंने लिखा है- 'मेरा मानना यह है कि प्रतिभाशाली लोग थोड़े में छलकते नहीं हैं, उनकी दृष्टि हमेशा गहरी और व्यापक होती है इसलिये किसी साहित्यकार का नववर्ष के उत्सवों में नाचना तो संभव नहीं है, इनसे सूखे आशावाद के नाम पर गाना भी नहीं गवाया जा सकता है. लेकिन इस बहाने इन्हें कुरेदकर आप जो राह पूछ रहे हैं वही श्रेष्ठ है, क्योंकि चुप्पी टूटेगी तो बदलाव की आशा भी जागेगी, तब तारीख़ के साथ शायद दिन भी बदले.' आज प्रस्तुत हैं यह रायशुमारी-


लीलाधर जगूड़ी (वरिष्ठ कवि): एक उम्मीद तो यही है कि साल २००९ में जो काम नहीं कर सका वे २०१० में जरूर कर सकूंगा. दूसरी उम्मीद यह करता हूँ कि साल २०१० साल २००९ की पुनरावृत्ति न हो. मैं चाहता हूँ की खेती-बाड़ी और बागवानी संबंधी उत्पादनों के बारे में भारत में एक नयी शुरुआत हो. राष्ट्रीयता के बारे में विचारों को लेकर बदलाव आना चाहिए. अब अपनी-अपनी अंतरराष्ट्रीयता न हो बल्कि सबकी एक जैसी अंतरराष्ट्रीयता हो तो अच्छा होगा. हम राष्ट्रों के नागरिक होते हुए भी विश्व नागरिकता की और बढ़ सकें तो संयुक्त राष्ट्र संघ को वीजा जारी करने का अधिकार मिल जाएगा...वरना काहे का संयुक्त राष्ट्र संघ?

साहित्य जगत में इस समय मुझे दो ख़तरे स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं जो २००९ ने पैदा नहीं किये लेकिन २००९ में वे पुख्ता अवश्य हुए हैं. एक तो कविता के प्रति लगावाहीनता की बात जाहिर की गयी है जो एक अभिशाप से कम नहीं है. कवियों को कविता की ताकत और उसकी लोकप्रियता के बारे में फिर से सोचना चाहिए. दूसरा खतरा यह है कि गद्य को कविता की शक्ति से वंचित किया जा रहा है. यह गद्य के लिए शुभ लक्षण नहीं है. साहित्य अपनी तमाम विधाओं में आगे बढ़ता हुआ नहीं दिख रहा है. उम्मीद है कि २०१० में निबंधों और नाटकों की एक नयी शुरुआत होगी ताकि गद्य में काव्य-गुण बचा रह सके.


चंद्रकांत देवताले (वरिष्ठ कवि): जो उम्मीदें १९५० में थीं वे निरंतर कम होती जा रही हैं. भले ही लोग मुझे निराशावादी होने के कटघरे में खड़ा कर दें, इस देश की वास्तविक जनता के लिए मुझे २०१० में कोई उम्मीद नज़र नहीं आती. यह सारा तमाशा अर्थशास्त्र का हो रहा है और ज़िंदगी की बुनियादी समस्याएं नेपथ्य में ढंकी हुई हैं.

भविष्य में मैं चाहूंगा कि शिक्षा के सामान अवसर हों. जो शिक्षा अमीर आदमी के बेटे-बेटियों को मिलती है वही इस देश के गरीब आदमी के बच्चों को मिलना चाहिए. स्वास्थ्य सुविधाएं, स्वच्छता की सुविधाएं गाँवों, दलित बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में...सब जगह एक जैसी होना चाहिए. जनता के प्रतिनिधि, वे चाहे संसद में हों या विधानसभाओं में...यदि वे सदन का बहिष्कार करते हैं तो राष्ट्रीय संवैधानिक शपथ की अवमानना के आरोप में उन पर मुक़दमा चलाया जाए और उनकी सदस्यता समाप्त की जाए. न्याय-प्रणाली का जो अन्याय गरीब, कमज़ोर और असमर्थ लोग भुगत रहे हैं, वह तुरंत समाप्त होना चाहिए. यह सपना पूरा होना बहुत कठिन है, इसलिए मुझे अधिक उम्मीद नज़र नहीं आती.

साहित्य बिरादरी से मैं यही अपेक्षा करूंगा कि वे शब्दों के गढ़ों और मठों से बाहर आयें तथा जितना संभव हो, अपना प्रतिरोध सड़क पर दर्ज़ कराएं.

पंकज बिष्ट (कथाकार-उपन्यासकार): मैं उम्मीद करता हूँ कि हमारे शासक वर्ग में बेहतर समझ जाग्रत होगी. दूसरी ओर मैं देश की आम जनता से भी उम्मीद करता हूँ कि अगले वर्षों में वह अपने अधिकारों के प्रति अधिक सचेत होगी और अपने साथी नागरिकों के प्रति एक न्यायिक दृष्टिकोण अपनाएगी.

देश की आर्थिक नीतियों से जो वर्ग सबसे ज्यादा लाभान्वित है, उसे यह समझना चाहिए कि यह सब किसकी कीमत पर हो रहा है. लोग विस्थापित हो रहे हैं, उनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं. अगर विकास इस कीमत पर हो रहा है तो चेत जाना चाहिए. अगर लोगों को जीने के अधिकार नहीं मिलेंगे तो जो तथाकथित आर्थिक सफलताएं इस राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में नज़र आ रही हैं, वे ज्यादा दिन नहीं टिकेंगी.

हिन्दी साहित्य के सम्बन्ध में मैं यह चाहता हूँ कि इसकी सरकारों पर निर्भरता घटे. सबसे बड़ी बात मैं यह देखना चाहूंगा कि सरकार द्वारा हो रही पुस्तकों की थोक खरीद बंद हो. इस प्रवृत्ति ने पूरे हिन्दी साहित्य को ख़त्म कर दिया है. अगर हमें अपने साहित्य को बचाना है तो हमारी पुस्तकों का वास्तविक ख़रीदार पाठक-वर्ग तैयार करना होगा.


डॉक्टर विजय बहादुर सिंह (आलोचक, सम्पादक 'वागर्थ'): साल २०१० में लगता है कि लोगों का क्षोभ और ग़ुस्सा बढ़ेगा. न्याय की आकांक्षा ज्यादा प्रबल होगी. जनतांत्रिक संस्थाएं और उसकी जो प्रक्रिया है, उनकी नैतिक उपस्थिति पर लोग संदेह से भरते चले जायेंगे.

सोच रहा हूँ कि आज़ादी के बाद से समाज का लोप हुआ है और सत्ता समाजभक्षी ताक़त के रूप में सामने आयी है. मजबूर होकर लोगों को इस समाज को ज़िन्दा करना होगा ताकि सरकारें समाज के गर्भ से ही पैदा हो सकें. अगर ऐसा होगा तभी कुछ उम्मीद की जा सकती है.

साहित्य से मैं हमेशा यह कामना करता हूँ कि वह लोगों के संघर्ष की क्षमता को और अधिक उद्दीप्त करे. वह लोकचित्त के अधिक करीब आये. ऐसा तभी संभव है जब रचनाकार अपने ज़मीनी यथार्थ को अपनी स्वाधीन आँखों से देखने का सामर्थ्य प्रदर्शित करेगा.


राजेश जोशी (वरिष्ठ कवि): इच्छा तो होती है कि देश में बहुत सारी जो चीज़ें बरसों से अनसुलझी पड़ी हैं उन्हें सुलझाया जाए. उम्मीद है कि आतंकवाद के खिलाफ़ जो लम्बी लड़ाई चल रही है, उसका सकारात्मक हल २०१० में निकलेगा और दुनिया से इस तरह की हिंसा समाप्त होगी. हम कामना करते हैं कि विकास के रास्ते पर देश इस ढंग से चले कि बेकारी, गरीबी और हर तरह की असमानता दूर हो. रोज़गार के नए-नए अवसर पैदा हों.

एक बात गौर करने लायक है कि सांस्कृतिक स्तर पर साल २००९ बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण गुज़रा है. पूरे साल व्यर्थ की उठापटक चलती रही है, संगठनों एवं साहित्यकारों को लेकर विवाद हुए हैं. ज्यादा सृजनात्मक कार्य नहीं हुआ. अकादमियां भी निरर्थक ढंग के विवादों में घिर गयी हैं. इस पर सरकारों को गंभीरता से सोचना चाहिए और इसे सुधारना भी चाहिए. अकादमियां सृजन और कला से जुड़ी होती है इसलिए उन्हें संचालित करने की जिम्मेदारी इसी क्षेत्र से जुड़े लोगों को सौपना चाहिए. मेरा यह भी कहना है कि जिस तरह दिल्ली साहित्य अकादमी का अध्यक्ष अशोक चक्रधर को बनाया गया वह ठीक नहीं हुआ. दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित एक समझदार राजनीतिज्ञ हैं लेकिन इस मामले में उनकी हठधर्मिता गैरवाजिब थी. चक्रधर मेरे मित्र हैं, पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं लेकिन वह हिन्दी काव्य-मंचों के लोकप्रिय कवि हैं. हिन्दी साहित्य अकादमी एक गंभीर साहित्यिक संस्थान है. उसमें किसी गंभीर साहित्यकर्मी को लाना चाहिए था.

.......(जारी)

Tuesday, January 5, 2010

वर्ष २०१०: साहित्यकारों की राय- 'दिन नहीं बदलेगा, तारीख़ बदल जायेगी'

नए साल के मौके पर बतौर कर्मकांड जीवन के चकमक क्षेत्रों के जगमगाते लोगों से यह जानने की कोशिश की जाती है कि उनकी क्या-क्या उम्मीदें हैं. हमने तय किया कि इस बारे में धूल-धूसरित हिन्दी जगत के नए-पुराने रचनाकर्मियों को टटोला जाए और पता किया जाए कि उनकी आशंकाएँ-कुशंकाएँ क्या हैं. सो, अमल यह हुआ कि बातचीत होती गयी और क्रम बनता गया. यह बातचीत विजयशंकर चतुर्वेदी ने की है. अब विनती यह है कि साहित्य की हर विधा से जुड़े लोग शामिल होकर यह कारवां आगे ले जाएँ.


आबिद सुरती (पेंटर, कार्टूनिस्ट, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार): नए साल में मैं देखना चाहूंगा कि अपनी संस्कृति को कैसे सुरक्षित रखा जाए. यह जो वैश्वीकरण आगे बढ़ रहा है वह सब कुछ तहस-नहस किये डाल रहा है. यह अमेरिकी संस्कृति है जो पूरी दुनिया पर छाती जा रही है और सब कुछ खाती जा रही है. यह हर हाल में रुकना चाहिए.

मैं मानता और कहता हूँ कि भारतीय संस्कृति दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है और अमेरिकी संस्कृति दुनिया में सबसे घटिया है. आज के बच्चे टिफिन में नूडल्स लेकर स्कूल जाते हैं, जिनमें कोई पौष्टिकता नहीं होती कोई विटामिन नहीं होता. हमारी संस्कृति में माँ बाजरे की रोटी पर घी चुपड़ कर देती थी. अमेरिकी संस्कृति जहां भी जाती है, वायरस की तरह वहां की लोक-संस्कृति को चट कर जाती है.

चित्रकारिता जगत में नया साल खुशियाँ लेकर आयेगा. आज हुसैन, रज़ा, सुजा, गायतोंडे आदि की पेंटिंग्स लाखों-करोड़ों में बिकती हैं. इस दुनिया का विस्तार हो रहा है. आज एनीमेशन आ गया है, कार्टून चैनल्स हैं, कार्टून फ़िल्में बनती हैं...इससे सैकड़ों नए-नए कलाकारों को खपने की जगह मिलती है. पहले स्थान बहुत सीमित था. आज के दौर को आप कार्टूनिस्टों का स्वर्णयुग कह सकते हैं. साल २०१० में पेंटर भी अच्छा काम और दाम पायेंगे.'

प्रोफेसर कमला प्रसाद (आलोचक, सम्पादक 'वसुधा'): मैं इस व्यवस्था में लगातार ह्रास देखता हूँ और इसीके बढ़ते जाने की आशंका है क्योंकि इसमें जैसे-जैसे गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ेगी, देश में पैसे का कब्ज़ा बढ़ेगा. चुनाव में, राजनीति में पैसे का कब्ज़ा बढ़ेगा. अमरीकी दोस्ती सघन होगी तो आतंकवाद, नस्लवाद, क्षेत्रवाद बढ़ेगा. हर समस्या का निदान क़ानून-व्यवस्था की समस्या माना जाएगा. नक्सलवाद की समस्या के लिए सेना की तरफ देखा जाएगा...तब हम क्या उम्मीद कर सकते हैं...साल २०१० में...२०११ में और उसके आगे के वर्षों में भी...



जबसे यह भूमंडलीकरण का राज आया है तबसे विकास की थोथी चर्चा होती है. समता की बात नहीं होती...तो ऐसे में कैसा जनतंत्र? रूसो ने कहा है कि ऐसे किसी जनतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती जिसमें समता न हो...आज हमारे देश के हर आदमी के अवचेतन में अज्ञात भय और अमूर्त गुस्सा व्याप्त है. यह जनतंत्र के चरित्र का सबसे घातक पहलू है.

ऐसी परिस्थितियों में उम्मीद की किरण हमारी जागरूक युवा पीढ़ी है और जो जागरूक मीडिया वाले लगातार विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक बातें जनता के सामने रखते चलते हैं, उनसे भी आने वाले समय में उम्मीद बंधती है. यह मीडिया बड़ी-बड़ी साजिशों को विफल करके नई उम्मीदों को जन्म देता है. अगले साल उन्हीं उम्मीदों के विस्तार की आशा करता हूँ. जनता में सामूहिक भाव-बोध आने वाले समय में सामाजिक परिवर्त्तन का कारक बनेगा. मैं अब भी मानता हूँ कि कला और संस्कृति का क्षेत्र तथा माध्यम अग्रगामी है और यही परिवर्त्तन की राह दिखाएगा.


निदा फाज़ली (मशहूर शायर): मुझे कोई उम्मीद नहीं है. पिछला साल अपने दुखों के साथ चला जाता है और नया साल अपने ग़मों के साथ आता है. मेरा एक शेर है-


'रात के बाद नए दिन की सहर आयेगी

दिन नहीं बदलेगा, तारीख़ बदल जायेगी.'


...सो कैलेण्डर बदलता है, कैलेण्डर के बाहर का माहौल नहीं बदलता. वह २००९ हो, २०१० हो या कोई और साल हो... बाहर की फिजायें, हवाएं, सदायें जस की तस रहती हैं.

बहुत बड़ी बात यह है कि भाजपा ने इंडिया शाइनिंग का नारा दिया था, कांग्रेस इंडिया इज शाइनिंग कह रही है...लेकिन जिस देश में नंदीग्राम हो, सिंगूर हो, भिंड हो, मुरैना हो, मोतिहारी हो... और ऐसे ही अनेक अंधेरों के क्षेत्र फैले हुए हों जो देश की आबादी के तीन चौथाई से ज्यादा हैं...वहां बहुत उम्मीद क्या करना...बस इन्हीं लोगों के लिए भूख है... मंहगाई है...महामारियां हैं...२००९ में भी थीं और क्या आप कह सकते हैं कि २०१० में नहीं रहेंगी?



आज़ादी से अब तक... और ब्रिटिश राज में तथा उसके पहले से भी आम आदमी का शोषण हमारी तहजीब की पहचान रहा है...पुराने युग में भी था...२०१० में भी रहेगा. नए साल के लिए मेरा कोई सुझाव नहीं है... बस इतना कहता हूँ कि भगवान ने इंसान को बनाया तो शैतान को भी नहीं मारा...रामकथा में दिलचस्पी रावण के कारनामों के चलते कायम रहती है...यही २०१० में होगा...इक़बाल का एक शेर है-


'गर तुझे फ़ुरसत मयस्सर हो तो पूछ अल्लाह से

क़िस्सा-ए-आदम को रंगीं कर गया किसका लहू.'


फ़िल्मी गीत-संगीत एक व्यापार है और व्यापार चलता रहता है. एक बात गौर करने लायक है और वो यह कि पहले फिल्मों की दुनिया में प्रवेश पाने के लिए जो पासपोर्ट मिलता था वह इस आधार पर मिलता था कि आपने कितनी बढ़िया शायरी की है, आप कितने जहीन हैं, आपकी कितनी किताबें छप चुकी हैं. शैलेन्द्र, साहिर, राजा मेंहदी अली खाँ, भारत व्यास आदि गीतकार यही पासपोर्ट लेकर दाखिल हुए थे. आज हालत यह है कि अगर आपमें ये विशेषताएं हैं तो आपको बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा. वजह यह है कि जैसा लिखवाने वाला वैसा ही लिखने वाला.

नए साल के लिए मैं अपना एक दोहा पाठकों को भेंट करना चाहता हूँ-


'किरकिट, नेता, एक्टर, हर महफ़िल की शान

स्कूलों में क़ैद है, ग़ालिब का दीवान.'


नई नस्ल के लिए मेरा यही सन्देश होगा कि वे स्कूलों में क़ैद ऐसे कई गालिबों को आज़ाद कराएं और उनका नेताओं, एक्टरों और क्रिकेटरों से ज्यादा सम्मान करें. शुक्रिया...धन्यवाद!"