चुनाव की चर्चा शुरू होते ही बाहुबली नेताओं का लेखा जोखा शुरू हो गया है। बाहुबली, यानी वो लोग जिन पर हत्या से लेकर अपहरण तक तमाम संगीन आरोप हैं, फिर भी वे विधानसभा से लेकर लोकसभा पहुंचने में कामयाब होते हैं। चुनाव दर चुनाव उन्हें लेकर स्यापा बढ़ता जा रहा है, और इसी अनुपात में उनकी सफलता का ग्राफ भी। 1996 में लोकसभा में ऐसे दागियों की तादाद 40 के करीब थी जो 14वीं लोकसभा में बढ़कर सौ हो गई1 आखिर क्यों?
ये एक फिल्मी ख्याल से ज्यादा कुछ नहीं कि बाहुबली लोगों को डरा-धमकाकर वोट लेते हैं। सच्चाई ये है कि टी.वी. के एसएमएस पोल में लोग कैसी भी राय जाहिर करें, उन्हें आपराधिक रिकार्ड वाले व्यक्ति को चुनने में कोई परेशानी नहीं होती। तो क्या जनता दोषी है?
दरअसल, उम्मीद की तमाम मीनारों को नेस्तोनाबूद होते देख जनता के बड़े हिस्से ने समाज ने सामूहिक उद्धार के हर विचार से नाता तोड़ लिया है। वो करती भी क्या। न कांग्रेसियों में गांधीवाद बचा, न समाजवादियों में समाजवाद। वामपंथियों ने वापमंथ को तिलांजलि दे दी तो स्वदेशी और शुचिता वाले दंगाई-रिश्वतखोर बनकर डराने लगे। हद तो ये हो गई कि दलितों के नाम पर राजनीति की नई परिभाषा गढ़ने वालों ने ब्राह्मणों से नहीं ब्राह्मणवाद के साथ गलबहियां कर लीं। ज्योतिबा फुले की जगह परशुराम जयंती पर छुट्टी का मंत्र फूंका जाने लगा।
विचारहीनता से उपजे इस खालीपन को भरा बाहुबलियों ने। उन्होंने लोगों को परेशान करने वाले किसी अफसर को हड़का दिया। ऐसे छोटे-मोटे काम भी करवा दिए जो यों भी हो जाने चाहिए थे। बेरोजगार नौजवानों को अपनी जीप पर बैठाकर इज्जत बख्शी। उन्हें आश्वस्त किया कि इलाके का दारोगा उन्हें परेशान नहीं करेगा। यही नहीं उन्हें ठेकेदारी के छोटे-मोटे काम भी दिलाए। जो सुरक्षा सरकार से मिलनी थी, वो बाहुबली देने लगे। उनका जनता से सीधा टकराव था भी नहीं। उनकी नजर तो उस पैसे पर थी दिल्ली या प्रदेश की राजधानियों से लूटे जाने के लिए ही गांव-कस्बों के लिए चलता है। विधायक और सांसद निधि का आकर्षण भी राजनीति में बेतरह खींच रहा था।
मंदी तो अब आई है। उन दिनों की याद कीजिए जब नई आर्थिक नीतियों ने मध्यवर्ग के सामने नया आकाश खोला था। उसी के साथ सामूहिक की जगह व्यक्तिगत लाभ एकमात्र मकसद हो गया था। 'खर्च करो -कमाना सीख जाओगे' का मंत्र मिलते ही इस वर्ग के ड्राइंगरूम में भ्रष्टाचार पर बहसें बंद हो गईं। प्रतिरोध की एक बड़ी शक्ति शांत होकर बिखर गई। इधर, सत्ता में भागीदारी के लिए वैचारिक की जगह जातीय और सांप्रदायिक गोलबंदी महत्वपूर्ण हो गई। अस्मिता की तलाश बाहुबलियों के दरवाजे तक ले गई। पैसे से मजबूत बाहुबलियों को उनकी जातियों ने नेता मान लिया। राजनीतिक दल भी जीतने की संभावना के आधार पर टिकट देने लगे। जाहिर है, बाहुबलियों की लाटरी लगनी ही थी, लगी।
यानी बाहुबलियों ने न वोट लूटे न चुनाव चिह्न। ये सबकुछ उनके बाहुबल पर यूं ही निसार हो गया। वैसे भी एक शक्तिपूजक समाज में बाहुबली ही स्वाभाविक नेता हो सकते हैं। जो दिमाग दुनिया भर में मंडराते लड़ाकू अमेरिकी जहाजों को देखकर श्रद्धा से भर उठता है, उसे इलाके के बाहुबली पर बलिहारी तो होना ही था। ये बात ओसामा बिन लादेन के प्रशंसकों पर भी सही उतरती है। बाहुबलियों ने स्थानीय सामाजिक जटिलताओं को समझा और देखते ही देखते नेतृत्व हथिया लिया। 'कोउ नृप होय, हमय का हानी' का संपुट पढ़ने वाली जनता को क्या फर्क पड़ता।
यों बाहुबली राबिनहुड बन गए जिनके लिए स्थानीय स्तर पर भरपूर सहानुभूति होती है। कानून के राज में सताए गए लोगों ने कानून तोड़ने वालों में अपना हीरो तलाश लिया (रुपहले पर्दे पर सहस्त्राबिद के महानायक अमिताभ बच्चन भी तो यही करते रहे हैं)। पर राजधानी में बैठे विचारक और पत्रकार जमीनी हकीकत को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। वे चुनाव दर चुनाव आंकड़े जुटाकर हैरान होते रहते हैं।
एक उदाहरण। अक्टूबर 2005 में मऊ में दंगे हुए। यूपी का कुख्यात माफिया कहे जाने वाला मुख्तार अंसारी वहां का विधायक था। दंगे के दौरान मुख्तार ने अपने सरकारी गनर और एक टी.वी.चैनल के स्ट्रिंगर को जीप में बैठाकर इलाके का दौरा किया और कैमरे की तरफ मुंह करके शांति की अपील की। इस स्ट्रिंगर ने बाकी स्ट्रिंगरों को फुटेज बांटा। यानी सभी चैनलों को फुटेज मिल गया।
पर प्रसारित हुई तो कहानी पलट गई। चैनलों ने ऑडियो गायब करके महज वीडियो दिखा दिया। ये साबित किया गया कि मुख्तार दंगा फैलाने निकला था। तस्वीरों में सरकारी गनर के हथियार को ए.के.47 बता दिया गया। किसी ने नहीं पूछा कि दंगे भड़काने विधायक निकलेगा तो अपनी जीप पर टी.वी.स्ट्रिंगर को क्यों बैठाएगा। चैनल ऑडियो सुनाते तो कहानी पलट जाती। बाहुबलियों के बारे में उनका स्टीरियोटाइप टूट जाता। इसलिए उन्होंने अपनी कहानी गढ़कर मुख्तार को मनचाही जगह फिट कर दिया। जाहिर है, दिल्ली-लखनऊ में खूब हो हल्ला मचा लेकिन स्थानीय लोग असलियत जानते थे। 2007 का चुनाव मुख्तार ने जेल में रहते हुए जीता। उसे हिंदू मुसलमान सबके वोट मिले। आखिर मुख्तार के फरमान पर मऊ में 22 घंटे बिजली आ रही थी।
ना, ना.....मकसद, मुख्तार को बरी करना कतई नहीं है। बस ये बताना है कि बाहुबली अब बिजली, पानी की गारंटी भी दे रहे हैं जो राज्य की जिम्मेदारी है। ऐसे में जनता उनके सौ खून माफ कर रही है। फिर वो कहीं ब्राह्मण, कहीं क्षत्रिय, कहीं पिछड़े, कहीं दलित तो कहीं मुस्लिमों के रहनुमा हैं। पूरा जाति-संप्रदाय उनके पीछे गोलबंद है। अब उनकी सिर्फ एक ही पार्टी है- सत्ता पार्टी। इसीलिए यूपी के वे सारे माफिया जो कल तक मुलायम के गुण गाते थे अब मायावती का झंडा उठाए हुए हैं। वे जानते हैं कि सत्ता संरक्षण में ही सरकारी धन के लूट का कारोबार निर्विघ्न चल सकता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि गाड़ी पर हरा झंडा लगा है या नीला।
वैसे एक दिलचस्प जानकारी ये है कि मायावती ने मुख्तार अंसारी को बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ाने का एलान किया है। और मुख्तार ने बिजली विभाग के आला अफसरों को पत्र लिखकर बनारस को 20 घंटे से ज्यादा बिजली सप्लाई की गारंटी करने को कहा है। पूरा विभाग नतमस्तक है और बहनजी की इच्छा को देखते हुए इस फरमान को जनता के बीच प्रचारित कर रहा है। निरंतर जीवन के लिहाज से दुनिया के सबसे पुराने शहर को पर्याप्त बिजली मिले, ये आजादी के 61 साल बाद भी नहीं हो पाया। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अवतार लिया है माननीय मुख्तार ने। और जनता को लग सकता है कि उसकी बंदूकें वो काम कर जाएंगी जो बड़े-बड़े वादाबहादुर नेता नहीं कर पाए।
ऐसे में क्या फर्क पड़ता है कि सामने बीजेपी के दिग्गज मुरली मनोहर जोशी होंगे। एक बड़ा तबका मानता है कि मुख्तार ने सौ-दो सौ मारे होंगे। जोशी जी तो जिस विचार पर सवार है उसकी वजह से हजारों मारे गए हैं, लाखों दिलों में दरार पैदा हुई है। संविधान लहूलुहान हुआ है। ध्वस्त होती बाबरी मस्जिद के सामने प्रफुल्लित जोशी जी और उनके कंधे पर सवार उमा भारती की तस्वीर को कौन भूल सकता है। और ये लोग यूपी का बहुमत रचते हैं। ये बात इससे भी साबित होती है कि बाबरी ध्वंस के बाद बीजेपी को कभी बहुमत नहीं मिला। खैर..
लुब्बेलुबाब ये कि बाहुबलिय़ों से निजात पाना है तो बड़ी लकीर खींचनी पड़ेगी। राजनीति में भी और समाज में भी। सन 42 का गांधी पैदा कीजिए या 1975 का जयप्रकाश। या फिर किसी और विचार की ओर देखिए। पर ईमानदारी को सम्मान देना और हवस पर काबू पाना सीखिए। मत भूलिए, जनता को वही नेतृत्व मिलता है जिसके वो लायक होती है। रास्ता मुश्किल लग रहा है तो मुंह ढंककर सो जाइए। देश संभालने के लिए बाहुबलियों की कमी नहीं।