Showing posts with label भगवान. Show all posts
Showing posts with label भगवान. Show all posts

Friday, November 11, 2011

मक्खियों के भगवान - मार्को देनेवी


मार्को देनेवी (1922-1998) एक अर्जेंटीनी साहित्यकार एवं पत्रकार थे, नैतिक मूल्यों और सिद्धांतों के हक़ में लिखने वाले प्रतिबद्ध उपन्यासकार-लेखक के रूप में उनकी प्रसिद्धि है. रियलिटी को नए, अनदेखे और कई बार जादुई परिवेश में ले जाना उनकी खासियत है. मैं खुद उनके काम से परिचित नहीं हूँ.. यह छोटी सी रचना मेरी पाठ्यपुस्तक में है, सीधे स्पैनिश से अनुवाद कर यहाँ रख रहा हूँ..

मक्खियों के भगवान

मक्खियों ने अपने भगवान की कल्पना की. वे भी मक्खी थे. मक्खियों के भगवान एक मक्खी थे, कभी हरी, कभी काली-सुनहरी, कभी गुलाबी, कभी सफ़ेद, कभी बैंगनी... एक अनोखी, अभूतपूर्व मक्खी, एक बेहद खूबसूरत मक्खी, एक विशालकाय मक्खी, एक भयावह मक्खी, एक दयालु मक्खी, एक क्रुद्ध मक्खी, एक न्यायशील मक्खी, एक जवां मक्खी, एक बूढ़ी मक्खी, मगर हमेशा एक मक्खी होते थे.

कुछ उनका आकार एक बैल जितना विशाल बताते थे, कुछ उन्हें इतना सूक्ष्म बताते थे कि वे अदृश्य थे. कुछ धर्मों में उनके पंख नहीं होते थे (वे उड़ते एवं हवा में रहते थे लेकिन भला उन्हें पंखों की जरूरत क्यों हो?), जबकि अन्य धर्मों में उनके असीम पंख होते थे. कहीं उनके श्रृंग सींग-नुमा होते थे, कहीं उनकी आँखें पूरे चेहरे में फैली होती थीं. कुछ लोगों के अनुसार वे लगातार भिनभिनाते थे, वहीं दूसरों का कहना था कि वे चुप रहते हैं लेकिन अन्तर्यामी हैं, बिना कहे भक्तों तक बात पहुंचा देते हैं. और सभी के अनुसार जब मक्खियाँ मरती थीं, उन्हें एक तीव्र विमान में स्वर्ग ले जाया जाता था. स्वर्ग ! सड़ते हुए मांस का एक ढेर था, सड़ता और बदबू मारता हुआ, जिसे मरी हुई मक्खियाँ अनंतकाल तक खाती रहती थीं किन्तु वह ख़त्म नहीं होता था, वह स्वर्गीय अवशिष्ट नित पुनर्निर्मित होता रहता था, मक्खियों के झुण्ड के नीचे वह नित नए रूप धरता था.. मगर यह पुण्यवान मक्खियों का झुण्ड था. क्योंकि पापी मक्खियाँ भी थीं, और उनके लिए एक नर्क था.. पापी मक्खियों का नर्क एक बिना कचरे की जगह थी, जहां अपशिष्ट नहीं थे, कूड़ा नहीं था, बदबू भी नहीं थी..जहां कुछ भी नहीं था, एक साफ़-सुथरी चमकती हुई जगह, और तुर्रा यह कि वहां हमेशा खूब उजाला रहता था. याने एक डरावनी घृणास्पद जगह....

Sunday, November 30, 2008

भाड़ में जाओ भगवान !

हे अखिल ब्रह्मांड के स्वामी, हे परमपिता परमेश्वर, हे करुणा के सागर, हे दयानिधान परमात्मा, कहां हो...कहां हो भगवान! जल में, नभ में, धरा पर, पाताल में, किस लोक में, किस जगह लगाए बैठे हो समाधि? सो रहे हो किस शैया पर...तोड़ो निद्रा, बाहर निकलो, देखो! देखो खून की नदी, देखो मांस के लोथड़ों में तब्दील हो गए बच्चे, बूढ़े, जवान, किशोरियां, युवतियां, स्त्रियां, देखो कैसा होता है भुना हुआ इंसानी गोश्त! देखो इसका रंग, महसूस करो गंध, आओ...आते क्यों नहीं...?.
इतने कठोर कैसे हो गए तुम । आतंकियों के निशाना बने हर शख्स ने सिर्फ तुम्हें पुकारा, मरने के पहले सिर्फ तुम्हारा नाम उनके ओंठ पर था। पर तुम नहीं आए। क्या गुनाह था उनका ?..यही न कि वे एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां इंसानी जिंदगी की कोई कीमत नहीं। यही न, कि वे ऐसे नेताओं का जयकारा लगाने को अभिशप्त हैं जो इंसान कहलाने के लायक नहीं। यही न कि उनकी सुरक्षा घूसखोरों के हवाले है। पर इसकी इतनी बड़ी सजा ?
कहां हैं तुम्हारे भेजे बाबा, साधु साध्वियां। कहां हैं पीर, औलिया कहां हैं, कहां हैं सेंट पीटर, एस्टीफेंस, सारे...। अरे, तुम्हारी इच्छा के बगैर पत्ता तक नहीं फड़कता। फिर बंदूकें कैसे चल जाती हैं? बेगुनाह की जान कैसे जाती है? देखते-देखते एक नौजवान आतंकवादी कैसे बन जाता है? तुमने क्यों नहीं किया चमत्कार..? .तुम चाहते तो ए.के.47 से निकलते फूल, तम चाहते तो समंदर में रास्ता भूल जाती आतंकियों की बोट, तुम चाहते तो कोई न बिछड़ता अपनी मां से, पिता से, बहन से, भाई से...दोस्तों से कोई न बिछड़ता। क्यों नहीं किया तुमने ऐसा? किसी मंदिर से, मस्जिद से, गिरजे से...कहीं से नहीं निकली कोई रोशनी। नहीं गिरी बिजली आतंकियों पर। क्यों, क्यों, क्यों.?..
अरे, तुम चाहो तो अब भी जी उठें मुर्दा, भर जाएं घायलों के जख्म, दुनिया हो जाए थोड़ी बेहतर, पर नहीं चाहते तुम कुछ भी ऐसा। या फिर तुम चमत्कार कर ही नहीं सकते। तुम्हे लेकर किए जाने वाले सारे दावे फर्जी हैं, किताबी हैं। वही किताबें, जिनकी वजह से इंसान बन जाता है इंसान का दुश्मन। जिनके पहले सफे पर लिखा होता है “प्रेम” और आखिरी पर “घृणा”। जिन्हें पढ़ने के बाद आदमी एक दर्जा ऊपर उठ जाता है और फिर मारने लगता है उन्हें, जो एक दर्जा नीचे नजर आते हैं।
या तुम भी डरते हो आतंकियों से। तुम्हारे पास उनका मुकाबला करने का ताब ही नहीं। या ये सारे भस्मासुर तुम्हारे पैदा किए हुए हैं। हां..हां, हां... इन्होंने सारा कहर तुम्हारे नाम पर बरपाया है। तुम्हारे ही एजेंट हैं ये।
क्या कहा?..... माया है सब, तुम्हारा ही खेल?....लीला है?... ये खून, ये चीखें, ये जलती लाशें, सच्चाई नहीं सपना हैं! मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की मां का विलाप, हेमंत करकरे के बेटे के आंसू, गजेंद्र सिंह के बच्चों का दर्द सब भ्रम है! क्या इलियास, मकसूद, फिरोज के परिजनों की चीखें झूठी हैं। बस भी करो! बहुत हो गया... झूठे ही नहीं साक्षात झूठ हो तुम। तुम नहीं हो करुणानिधान, नहीं हो जगत के स्वामी। तुम हो नीरो! चंगेज खां! हिटलर..!
या फिर तुम खुद ही हो माया! हमारी कमजोरियों की उपज! जो भी हो, भाड़ में जाओ!